श्वासों के साथ अपने स्वरुप में उतरो, प्राण है अग्नि, प्राण है ज्योति प्राण से परे है आत्मा और उस आत्मा में है परमात्मा का ज्ञान, सामर्थ्य, उसका विस्तार और अपने आत्म स्वरूप में, परमात्मा स्वरुप में प्रतिष्ठित हो जाना।
#पतंजलिसंन्यासी
भगवान ने हम सबको यह वरदान दिया हुआ है कि हमें देवत्व, ऋषित्व को पाना है, आरोग्य को, अध्यात्म को पाना है, आत्म दर्शन को मोक्ष को उपलब्ध होना है।
#पतंजलिसंन्यासी
भगवान ने हम सबको यह वरदान दिया हुआ है कि हमें देवत्व, ऋषित्व को पाना है, आरोग्य को, अध्यात्म को पाना है, आत्म दर्शन को मोक्ष को उपलब्ध होना है।
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दिव्यता के बीज बोता है यह योग इसलिए इसको बीज मंत्र कहते हैं। यह दिव्य जीवन के बीज बोता है, हमारे भीतर उनको विकसित करता है और जो अशुभ के बीज है उनको निर्बीज करता है, निर्बीज समाधि तक हमको पहुंचाता है, हमारे जीवन को पूरा विकसित करता है, सब प्रकार की कुशलताएं जीवन में पैदा करता है।
योग की जो यात्रा है यह ज्ञात से अज्ञात की, प्रत्यक्ष से परोक्ष की, मूर्त से अमूर्त की, व्यक्त से अव्यक्त की, विश्वमय से विश्वातीत होने की, सद्गुणों से युक्त हो करके गुणातीत होने की, सब दिव्य भावों से युक्त हो करके भावातीत होने की यह साधना है।
जब हमें समर्थ गुरुओं का आश्रय मिलता है और हम गुरुओं, शास्त्रों, वेदों, आत्मा के अनुकूल आचरण करने लगते हैं तो जीवन दिव्य जीवन में आरोहण पाता है और हमारे भीतर देवत्व के, ऋषित्व के, ब्रह्मत्व की प्रतिष्ठा होने लगती है। यह जीवन की क्रमशः यात्रा है।
योग से भीतर के सारे रोग, विकार, दोष, पाप, अधर्म, दुःख, विकार, तनाव सब खत्म हो जाते हैं और हम नर से नारायण, जीव से ब्रह्म, मानव से महामानव हो जाते हैं, सामान्य चेतना से दिव्य चेतना में प्रतिष्ठित हो जाते हैं। यह है योग की महिमा।
#ओउम_जी_प्रणाम
73वें गंणतंत्र दिवस पर आजादी का अमृत महोत्सव के अवसर पर 75 करोड़ सूर्यनमस्कार में मेरी भागीदारी
#75करोड़_सूर्यनमस्कार के अभियान में सफलतापूर्वक पूर्वक 21 दिन का चैलेंज पूर्ण करने के उपरान्त जारी सूर्यनमस्कार प्रमाणपत्र
# #75croresuryanamaskar
#ओउम_जी_प्रणाम
73वें गंणतंत्र दिवस पर आजादी का अमृत महोत्सव के अवसर पर 75 करोड़ सूर्यनमस्कार में मेरी भागीदारी
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हमारा शरीर वज्र की भांति होना चाहिए, जो बलहीन होते हैं उनका अस्तित्व मिट जाता है इसलिए बल की उपासना करो। सबसे बड़ा बल है योग बल और योग बल से बढ़ता है आत्म बल, बुद्धि बल, ह्रदय का बल, संवेदनाओं का बल, सामर्थ्य का बल।
प्राणायाम सबसे बड़ा तप है और ओंकार सबसे बड़ा जप है। प्राणायाम का तप और मन ही मन ओंकार का जप ये जब दोनों एक साथ होते है तो हमारा शरीर, इंद्रियां, अंतःकरण, मन, बुद्धि, चित्त, हमारी आत्मा, अस्तित्व दिव्य हो जाता है।
#स्वामीरामदेव#SWAMIRAMDEV