हेलो @shisir जी,
पशुपतिनाथ क्षेत्रमा अलपत्र अवस्थामा रहेका फ्रान्सेली नागरिकको केही नेपाली युवाहरूले राहदानी, पैसा र झोला लगायतका सबै सामान लुटपाट गरेपछि उहाँ अलपत्र परेको भन्ने सुन्नमा आयो। कृपया तुरुन्त पहल लिनुहोला @PM_nepal_@MofaNepal@shisir
Sharma Ji visited Nepal,
Sharma Ji had only heard negative stories about Nepal,
Sharma Ji was shocked to see that Nepal’s capital was cleaner than most of our Indian cities.
Most of the roads, streets and footpaths were garbage free.
He realised how we are being misled back in India.
Despite being looted in the name of Swachh Abhiyan, and despite yearly campaigns of cleanest cities drama,
Real work seems to be happening in neighbouring nations.
Minab: The Largest Mass Killing of Schoolgirls in History
The massacre of 167 girls, aged 7 to 12, in their classrooms at an elementary school in Iran is the greatest atrocity committed by the United States since the Vietnam War. Near the Strait of Hormuz, in a remote and almost unknown area of Iran, and for no reason that anyone can comprehend. Sixty others are hospitalized with injuries.
Later, on that very first day of the war, 40 volleyball players three full women’s teams were killed in a single airstrike. You may not even have heard about the slaughter of the schoolgirls. It is the largest mass killing of schoolgirls ever recorded in world history.
Yet no one is talking about it. I do not wish to overstate the point, but pause for a moment and consider: if Russia had killed 167 Ukrainian schoolgirls, if Palestinians had killed 167 Israeli schoolgirls, if Iran had killed 167 schoolgirls, it would have been the biggest news story in the world for years.
गांधी का गुड़!!
एक महिला,अपने बच्चे के साथ गांधी से मिलने आई। परिवार, आजादी की लड़ाई से जुड़ा था। घर मे गांधी की बाते होती, तो बच्चे को गांधी से मिलने की इच्छा थी
बापू ने पास बिठाया, बाते की। इतने में मां ने कहा- बापू, इसे समझाइए, ये गुड़ बहुत खाता है। मना करो, तो मानता नहीं।
गांधी ठिठके- कहा, इसे एक माह बाद लाना।
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माह भर बाद वो फिर आयी। गांधी ने बच्चे को समझाया, गुड़ खाने को मना किया। बच्चे ने वादा किया की गुड़ नही खायेगा।
मां ने पूछा- बापू, यही बात, पिछली बार कह देते। दोबारा क्यूं बुलाया?
गांधी ने कहा- मुझे खुद गुड़ खाने की आदत थी। इस माह मैंने खुद गुड़ खाना छोड़ दिया। जो काम मैं खुद करता हूँ, उसे न करने का उपदेश देने का मुझे कोई अधिकार नही।
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1934 में उन्होंने अछूतोद्धार यात्रा की। गांधी की सबसे कम जानी गई यात्राओं में एक है। गांधी हत्या के असली तार, इससे जुड़े है।
जब हिन्दुओ की एक तिहाई सीटें, उन्होंने दलितों के लिए आरक्षित करने का समझौता किया। यही पूना पैक्ट था। गांधी के प्रति नफरत का पहला ज्वार तभी उठा।
पत्र पत्रिकाएं, जैसे गीता प्रेस की कल्याण, और केसरी (तिलक का अखबार, जो अब उनके दामाद के हाथ मे था) गांधी पर जहर उगलते, चरित्र हत्या करते।
हत्या का पहला प्रयास, 1937 में पूना में हुआ।
जब उनकी गाड़ी में बम फेंका गया।
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ये यात्रा, अछूतों के प्रति नफरत, सामाजिक बहिष्कार को खत्म कराने की यात्रा थी।
यह समझाने को, कि वे इंसानी तौर पर बराबर है।और सामाजिक तौर पर समानता पर लाने के लिए विशेष अवसर देना होगा। उन्होंने अछूत की जगह- हरिजन नाम दिया- "ईश्वर के लोग"!!
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यह नया व्यवहार नही था। 1916 मे गांधी ने जब साबरमती आश्रम स्थापित किया, यह साउथ अफ्रीका के टॉलस्टॉय फार्म की तरह, एक बराबरी का समाज था।
अफ्रीका में गैर बराबरी रंग और धन के आधार पर होती है, भारत मे जाति के आधार पर। गांधी ने आश्रम में जाति पाँति न मानने का प्रण रखा।
और तब एक पत्र आया।
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ठक्कर बापा ने लिखा- दलित समाज के दूधाभाई को सपरिवार आश्रम में जगह दीजिये।
गांधीजी ने बेझिझक अनुमति दी। पर तूफान खड़ा हो गया। आश्रम के लिए चंदा देने वाले सवर्णों ने हाथ खींच लिए।
कुएं से पानी भरने को लेकर दूधाभाई को किया गया।खुद कस्तूरबा और उनके अन्य परिजनों ने एक 'अछूत' परिवार के साथ रहने पर आपत्ति जताई।
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गांधी के सामने दो रास्ते थे- अपने परिवार, और आर्थिक मदद को चुनें, या अपने सिद्धांतों पर टिके रहें।
कस्तूरबा से साफ कहा- तुम्हें यह स्वीकार नहीं, तो तुम आश्रम छोड़ सकती हो, लेकिन दूधाभाई यहाँ से नहीं जाएंगे।
अंततः आश्रम ने उस परिवार को अपनाया।गांधीजी ने बाद में दूधाभाई की बेटी लक्ष्मी को अपनी गोद ली हुई बेटी माना। उनके लिए, गांधी ने एक कुर्ता बुना, जो आज भी साबरमती आश्रम के अभिलेखागार में रखा है।
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छुआछूत, जाति आधारित दुर्व्यवहार- कानूनों और सजा से सरकारें बन्द नही करा सकती।
उल्टे ST/SC एक्ट या UGC जैसे नियम विवाद और नफरत को हवा देते है। गांधी का सत्य ही मत था, कि इसके लिए समाज के भीतर, आंतरिक चेतना की जरूरत है।
करुणा, मानवीयता और किसी के हक के प्रति सहानुभूति की जरूरत है।
इसी जातीय जकड़न को तोड़ने का नतीजा, उन्हें भारी पड़ी। गोडसे ने 1940 और 1941 में ही गांधी हत्या के प्रयास किये थे। तब न पाकिस्तान हुआ था, न दंगे।
गलियारा और 55 करोड़ वाली अफवाहें भी नही, जो उसने 1948 के सफल प्रयास के कारणों के रूप में गिनाया।
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लेकिन गोडसे, उसका सँगठन, उसके प्रेरणास्रोत सब सवर्ण थे। गांधी विरोधी थे।
उन्हें नफरत थी, क्योकि गांधी उनके वर्चस्व पर चोट कर रहे थे। गांधी हत्या का उनका इरादा समझ में आता है।
उससे बड़े कृतघ्न वे दलित चिंतक, साहित्यकार, और नेता है, जिन्होंने गांधी को ही अपना दुश्मन और पाखंडी करार दिया है।
जो प्रचार करते है कि "अम्बेडकर के दबाव में पूना पैक्ट के बाद, गांधी को अचानक दलितों की याद आयी"। उन्हें गांधी का गुड़ याद दिलाता हूँ कि जिस बात पर वे स्वयं, मन-कर्म से एलाइन न हों, उसे बोलते और सिखाते नही थे।
दूधाभाई का कुर्ता, अम्बेडकर से हुए जानलेवा समझौते के 15 साल पहले की घटना है।
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किसी मित्र ने UGC मसले पर पूछा कि देश में दलितों, पिछड़ी जातियों का शोषण कैसे रुकेगा?
सत्य के आग्रह से रुकेगा।
चेतना, करुणा जगाकर रुकेगा। जो शोषक है, उनमे जिम्मेदारी का अहसास जगाकर रुकेगा। दोनों पक्षों के बीच, सामंजस्य, सहयोग, दूरी मिटाकर बनेगा।
मगर इससे पहले- नेताओ, शासकों, उन्हें नियंत्रण करने वालों उनके दिलो में बैठा जातीय गौरव मिटने से रुकेगा।
उनकी कथनी और करनी का फर्क मिटने से रुकेगा। वो.. गांधी के गुड़ से रुकेगा।
❤️