लगता है दवाई एकदम सही जगह पड़ी है!!
अगर भारत की संसद विदेशी फंडिंग से जुड़े FCRA नियमों को और सख्त करने जा रही है, तो उससे अमेरिका के एक सांसद को इतनी बेचैनी क्यों हो रही है?
इसका जवाब तो वह स्वयं दे रहे हैं। उनका कहना है कि प्रस्तावित बदलाव ईसाई समुदाय पर सीधा हमला है और इससे सरकार को चर्चों तथा धार्मिक परोपकारी संस्थाओं पर नियंत्रण का अधिकार मिल जाएगा।
मतलब, एक तरह से वे यह स्वीकार कर रहे हैं कि NGO की आड़ में विदेशी फंडिंग का इस्तेमाल भारत में धर्मांतरण जैसी गतिविधियों के लिए किया जाता है? वरना इस बयान का क्या तुक है?
कुछ ही समय पहले अमेरिका के विदेश मंत्री भारत दौरे पर आए थे और उन्होंने अपनी यात्रा की शुरुआत कोलकाता स्थित मदर टेरेसा की संस्था से की थी। जबकि उस संस्था को लेकर अतीत में धर्मांतरण से जुड़े आरोप लगते रहे हैं। तभी से यह चर्चा थी कि अमेरिका FCRA नियमों में प्रस्तावित बदलाव को लेकर भारत पर दबाव बनाने की कोशिश करेगा।
अब इस अमेरिकी कांग्रेस सांसद के बयान से यह चर्चा और भी मजबूत होती दिखाई देती है।
OTT प्लेटफार्म अपनी स्वतंत्रता का नाजायज फायदा उठा रहे हैं.
अत्यधिक बोल्ड कंटेंट के बाद अब OTT टीनएज सेक्सुअलिटी को खुलकर एक्स्प्लोर कर रहा है.
टीनएज सेक्सयूएलिटी हमेशा टीनएज के बीच उनका आंतरिक मामला और सेक्स एजुकेशन का हिस्सा रहा है.
कुछ सालों से OTT पर टीनएज लाइफ को बोल्ड अंदाज में स्क्रीन पर दिखाने का चलन शुरू हुआ है.
सेक्सुअल कंसेंट की एज 18 है, लेकिन अब 16 करने की मांग उठ रही है. अगर ऐसा हुआ तो यह समाज में महिलाओं के लिए घातक सिद्ध होगा.
टीनएज लाइफ सेक्स एक्सपेरिमेंट की उम्र नही है. यह पढ़ने और कुछ कर दिखाने की उम्र है. बंद कमरे और बाथरूम के कुछ पलों को हाईलाइट कर OTT टीनएज को बदनाम कर रहा है.
Photo : Dhriti (The Family Man)
भाजपा के फायरब्रांड एवं राजद की डेंटलब्रांड प्रवक्ता की डिबेट की स्क्रिप्ट
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सुधांशु त्रिवेदी-- लालूजी ने 1990-2005 तक शासन किया तो उस वक्त जीडीपी क्या थी?
शूर्पदंता भारती-- बहुजनों को जीडीपी से मतलब नहीं है ! समझे रे पोंगा पंडित... हमें डीपी से मतलब है जिसमें हम मंडल मसीहा लालूजी की फोटो लगाते हैं
सुधांशु जी-- अरे आप चिल्लाईये मत...आप यह बताइए ना कि लालूजी ने कितना रोजगार दिया
शूर्पदंता भारती-- अब एक बहुजन महिला चिल्लाने लगी तो पेटवा में दर्द उठने लगा आपलोग के.. आयें.. आयें... अभी लालूजी न रहते तो तुम सब मनुवादी हमको बराबर में ना रखके जमीन पर बइठा देता..
सुधांशु जी-- मुद्दों पर बात करिए ना मैडम... लालूजी ने अपने परिवार के अतिरिक्त किसका कल्याण किया? प्रति व्यक्ति इनकम कितनी बढ़ाई?
शूर्पदंता-- तुम मनुवादियों को तो मजा चखा दिया ना... बूझे की नहीं ! इस स्टूडियो में बस ब्राह्मणवादी भरे हैं ! यहाँ बहुजन को नहीं बोलने दिया जाएगा...
अंजना ओम-- अरे मैडम आप कहाँ की बात कर रही हैं, उनके प्रश्न का सीधा उत्तर दीजिए फैक्ट्स के साथ
शूर्पदंता-- अब एगो भूमिहारिन बताएगी कि एक बहुजन महिला को क्या और कैसे बोलना है... वो वाला जमाना गया... अबकी सावन भादो में, गोरी कलाई कादो (कीचड़) में
श्वेता सिंह-- क्या बदतमीजी है ये प्रियंका जी... आप ऐसे टारगेट नहीं कर सकती हैं किसी को
शूर्पदंता-- पहले ठाकुर का कुँआ था.. अब स्टूडियो भी ठाकुर का है... वाह रे ठकुराईन... लेकिन ईयाद रखियेगा... तेजस्वी जी की सरकार आने पर 786% आरक्षण होगा और इन सबपर बहुजनों का कब्जा होगा !
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अंजना-- एक ब्रेक के लिए रुकते हैं.....
लाड़ली बहना रिटर्न्स इन बिहार!!
बिहार में इस बार महिलाओं ने वोटिंग के मामले में सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं।
इतिहास में अब तक का सबसे अधिक महिला मतदान प्रतिशत दर्ज किया है।
पुरुषों और महिलाओं के बीच मतदान का अंतर लगभग 10 प्रतिशत रहा -
जहाँ पुरुष मतदाता 62.8% रहे, वहीं महिलाओं का मतदान 71.6% तक पहुँच गया।
अगर यह मान लिया जाए कि मतदान से ठीक पहले राज्य सरकार द्वारा किया गया 10,000 कैश ट्रांसफर महिलाओं को मतदान केंद्रों तक लाने में मददगार रहा, तो यह लोकतंत्र के लिए एक चिंताजनक संकेत है।
मेरा कहने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि नीतीश कुमार की सरकार ने इसके अलावा महिलाओं के लिए कुछ नहीं किया -ऐसा बिल्कुल नहीं है। काफी समय से नीतीश कुमार ने महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में ठोस काम किए हैं ,और इसका असर भी साफ़ दिखाई देता है -इस वजह से उन्होंने महिला वोटर वर्ग में मजबूत पकड़ बनाई है।
लेकिन पुरुषों और महिलाओं के बीच वोट प्रतिशत का इतना बड़ा अंतर -लगभग 10% - असामान्य रूप से बहुत ज्यादा है। बिना किसी तात्कालिक पुश के यह संभव नहीं लगता, और वह पुश हालिया कैश ट्रांसफर योजना ही प्रतीत होती है।
एक्ज़िट पोल में NDA गठबंधन को बढ़त दिख रही है।
ऐसा पैटर्न हमने पहले मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और झारखंड में भी देखा था।
यह ट्रेंड अच्छा नहीं है -अगर यही चलता रहा, तो लोकतंत्र में लेवल प्लेइंग फील्ड की अवधारणा ही खत्म हो जाएगी। सत्ताधारी दल मतदाताओं तक सीधे पैसे पहुँचा देंगे, और विपक्ष के पास जनता को देने के लिए सिवाय वादों के अलावा क्या बचेगा।
आप किसी भी राजनीतिक दल के समर्थक हों, इस ट्रेंड को लेकर चिंतित जरूर होना चाहिए।
DO NOT BUY GOLD TOMORROW. Dhanteras is not the day for buying gold. Not even for buying steel katori, jharoo etc. It is the day to take care of your health. And of course you know health is wealth. SHARE THIS WITH ALL.
राइट विंग में जिस तरह से जातिवादी गालीबाजों को आगे बढ़ाया गया, उसको देखकर क्या बूढ़े क्या युवा, क्या पत्रकार, क्या रिटायर्ड अधिकारी, सबमें गाली देने की होड़ मच गई। ये गालीबाज़ पूरे बेशर्मी से दिन भर हिंदू समाज के भिन्न भिन्न जातियों को गाली देते हैं और फिर सप्ताह में एक दिन मुसलमानों को गाली देकर हिंदुत्ववादी होने का प्रमाण पत्र रिसीव करते हैं।
यदि ये राइट विंग के प्रतिनिधि हैं तो राइट विंग का क्या हाल होने वाला है, सोचना मुश्किल नहीं है।
शेष लोगों को प्राथमिकता के आधार पर ऐसे लोगों को पहचानना होगा और उनसे दूरी बनानी होगी, उनका खुलकर विरोध करना होगा।
चाहे हमारा आपका मन दूसरे समाज के कुछ वोकल माइनॉरिटी द्वारा किए गए गाली गलौज पर कितना भी प्रतिक्रिया देना चाहे, लेकिन हमे ख़ुद को भी रोकना होगा। हिंदुत्ववादी होना कोई आसान सौदा नहीं है, इसके लिए सहनशीलता, त्याग, संवाद और साहचर्य विकसित करना अनिवार्य शर्त है। कोई भी गालीबाज़ हमारा ईगो सहलाकर हमें बेवक़ूफ़ न बनाने पाये, यह सावधानी रखना हमारी ज़िम्मेदारी है। हिंदू समाज का प्रत्येक तत्व हमारा अपना है, कोई असहमति भी होगी तो उसे तरीक़े से व्यक्त किया जाएगा, अपना घर नहीं तोड़ा जाएगा।
भीमस्मृति शब्द अटल जी ने दिया। उन्होंने यह शब्द कहा तो उनसे परेशानी नहीं हुई लेकिन रामनाथ कोविंद जी ने कहा तो बहुत गहरे तक कुछ लोगों के घाव कर गया। ये सब बातें यह बताने के लिए काफ़ी हैं कि भीम राव अंबेडकर जैसे ज़िद्दी लोग समाज के लिए कितने जरूरी थे।
अटल जी ने सन 2001 में दलित संगम में कहा था कि अब यह देश मनुस्मृति से नहीं बल्कि भीमस्मृति अर्थात् भारत के संविधान से चलता है। यह बात उन दलितों और पिछड़ों को भी समझना चाहिए कि वह अटल जी के नाम के आगे बाजपेयी देखकर कुंठा में पड़कर उनका विरोध न किया करें। वह वास्तव में बहुत हिम्मती और समरस समाज के लिए जीवन लगाने वाले व्यक्ति थे।
इसी प्रकार जब वीर सावरकर जी ने कहा कि इस देश में वर्ण व्यवस्था समाप्त होकर रहेगी तो जातिवादी पंडा गिरोह ने कहा कि यह ईश्वर की बनाई व्यवस्था है, इसे कोई माई का लाल खत्म नहीं कर सकता। वीर सावरकर ने तमाम जातिवाद विरोधी कार्यक्रम शुरू किया जो महाराष्ट्र के कई जिलों में बहुत सफल हुआ। उसके बाद सावरकर जी ने लिखा था, ये पंडा जिस ईश्वर को मानते हैं कम से कम मैं उस ईश्वर से अधिक मज़बूत हूँ।
मेरे जीवन में एक समय ऐसा आया जब मैं खुद को पेशेवर और व्यक्तिगत रूप से बहुत ख़राब स्थिति में पाया। मेरी योग्यताएँ कागज पर अभी भी मायने रखती थीं, लेकिन दुनिया आगे बढ़ चुकी थी। दोस्त गायब हो गए थे, मान्यतायें फीकी पड़ चुकी थी, और भविष्य अंधकार लग रहा था।
उस बुरे समय में, मैंने सार्वजनिक सेवा (IAS) में वापसी का एक आखिरी प्रयास करने का संकल्प लिया, हालाँकि मुझे शक था कि कोई मुझ पर फिर से भरोसा करेगा। क्या मुझे कश्मीरी होने, मुस्लिम होने के लिए जज किया जाएगा?
यह मौका मेरी कल्पना से जल्दी आया। एक सच्चे दूरदर्शी व्यक्ति ने मेरी साधारण शुरुआत और मेरे संघर्षों के मूल्य को समझा। उन्होंने मेरी यात्रा के पीछे के इरादे को पढ़ लिया, और एक प्रीस्ट किंग की तरह मेरी पिछली सभी गलतियों के लिए क्षमा किया, उन्होंने मेरे गलतियों के बजाय उसमें निहित उद्देश्यों से मुझे समझा।उनके एक इशारे ने मेरे जीवन को फिर से गरिमापूर्ण बनाया।
किसी दिन मैं पूरी कहानी बताऊँगा, लेकिन आज के लिए इतना ही काफी है।
उस व्यक्ति को जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएँ, जिन्होंने अरबों जिंदगियों को बदल दिया।
- शाह फैजल (वर्तमान में कश्मीर में IAS अधिकारी, जिन्होंने मोदी विरोध में कभी IAS से इस्तीफ़ा देकर राजनितिक पार्टी बनाई थी।)
माना कि, आप @INCIndia#ITCell प्रमुख हैं, इसलिए काटकर ही डालने का अभ्यास है, लेकिन कम से कम इसी पर पूरा वीडियो डाला होता @SupriyaShrinate जी। आप लोग पूरा सुनिए और प्रतिक्रिया दीजिए
म्यांमार में बैठ कर राहुल की वोट चोरी का प्रेजेंटेशन कौन बना/बनवा रहा था?
राहुल गाँधी जब अमेरिका के कॉलेजों में, कैम्ब्रिज कॉलेज की कैंटीन में या अन्य विदेशी सभागारों में यह पूछते हैं कि ‘भारत में लोकतंत्र की हत्या हो रही है और यूरोप-अमेरिका देख रहा है, कुछ करता क्यों नहीं’, तो उनकी आशा होती है कि वो उनके स्वप्न को पूरा करने में सहायता करें।
वह स्वप्न क्या है? वह स्वप्न है सत्ता में ऐसे नहीं आ सकते, तो वैसे आ जाएँ। चुनाव जीत नहीं पा रहे, हारने को मोरल विक्ट्री बताते हैं, और सुप्रिया हाथ हवा में लहराती है, कभी सोशल मीडिया की खरीदी गई रीच के कारण उन्हें लोकप्रिय मान लिया जाता है।
ऐसे में कई उपद्रवों को इनका समर्थन मिलता रहा: शाहीन बाग, किसान आंदोलन, पहलवान आंदोलन, किसान आंदोलन २.०, ईवीएम हैकिंग नैरेटिव आदि। इसी में अगला और लेटेस्ट है: वोट चोरी।
हालाँकि, राहुल गाँधी की मानसिक क्षमता इतनी है नहीं कि वो नित नए नैरेटिव गढ़ सके, तो उन्हें विदेश से हेल्प की आवश्यकता पड़ती है। ‘वोट चोरी’ में भी @khurpenchh ने एक खुलासा किया है जिसमें दिखता है कि उन्हें जो पढ़ना था, वो कोई और लिख रहा था।
उनका प्रेजेंटेशन म्यांमार में बैठे किसी व्यक्ति ने, भारत में बैठे किसी व्यक्ति के साथ बैठ कर बनाया, यह उस फाइल के मेटाडेटा को पढ़ने पर दिख रहा है। यही कारण है कि दूसरों का लिखा पढ़ने वाले राहुल, प्रोजेक्टर की लाइट जाने के बाद स्क्रीन न चलने पर, एक शब्द नहीं बोल पा रहे थे।
म्यांमार में कौन है? मलेशिया में कौन है? थाइलैंड में कौन है? थाइलैंड में भारतीय पासपोर्ट से घुस कर, क्या ब्रिटिश पासपोर्ट के प्रयोग से कोई बाहर जा सकता है? यदि हाँ तो कहाँ, और क्यों?
क्या भारत के LoP सरकार को वापस आ कर यह जानकारी देते हैं कि वो विदेश यात्राओं पर क्यों निकलते हैं, किस से मिलते है? क्या यह छुट्टी मात्र है? क्या वर्ष भर में साठ विदेश यात्राएँ छुट्टी मात्र होती हैं?
नेपाल में जो हो रहा है, बांग्लादेश में जो हुआ, उसी की आशा में कॉन्ग्रेस समर्थकों के ट्वीट देख लीजिए। वो चाहते हैं कि हमारी संसद में आग लगा दी जाए। आग लगाने के लिए चिंगारी चाहिए।
राहुल गाँधी वह मशाल स्वयं नहीं लेना चाहते। इसी कारण से ऐसे नैरेटिव बनाए जाते हैं जहाँ युवा वर्ग उग्र हो जाए क्योंकि उसे आधी सूचना दी जाती है। युवाओं को भड़काना सबसे आसान है, विद्यार्थियों को सड़कों पर लाना सबसे आसान है।
‘भारत के भविष्य’ के नाम पर सोशल मीडिया के धुरंधर पटकथा लिखते हैं, उन्हें उकसाते हैं कि उनका रक्त उबल क्यों नहीं रहा है। वो जानते हैं कि छात्र यदि जूते में स्मोक बम ले कर संसद में भी उतर जाता है, तो भी पुलिस कुछ नहीं करेगी। उसे वो भगत सिंह बना देंगे।
यह एक प्रोजेक्ट है जो विदेश से संचालित है। आज के खुलासे में केवल एक सूत्र पकड़ा गया है जो संभवतः इन्होंने सोचा नहीं होगा। पर आप सोचिए, कि विदेशी धरती से कैरोसीन छिड़कने की बातें करने वाले, क्या सत्ता से इतने लम्बे समय दूर रह सकेंगे जबकि उनके आस-पास लाख-पचास हजार की संख्या में ‘छात्र’ प्रधानमंत्री की ब्रा ले कर भाग रहे हैं, संसद को आग लगा रहे हैं?
खुरपेंच की रिपोर्ट नीचे संलग्न है।
सम्राट अशोक और वर्तमान भारत के बीच एक अटूट रिश्ता है। जिसकी आँख थोड़ी भी खुली होगी, उसे वह स्पष्ट दिखाई देगा।
चाहे भारत का राष्ट्रीय ध्वज हो, चाहे भारत के राष्ट्रपति के बैठने का आधिकारिक स्थान हो, चाहे भारत का संविधान हो, चाहे भारत का राजकीय चिह्न हो, चाहे शांतिकाल के सैन्य पुरस्कार हों, सब जगह सम्राट अशोक हैं।
जो भी इस लोकतांत्रिक भारत में ख़ुद को सम्राट अशोक द्वारा स्थापित चिन्हों से दूरी बनाना चाहता है, वह लोकतांत्रिक भारत के पूरे सिद्धांत से और उसकी आत्मा से दूरी बनाता है। ऐसे लोगों ने कई पीढ़ी प्रयास करके देख लिया है, लेकिन कभी सफल नहीं हो पाये। आगे भी कभी सफल नहीं होंगे।
इज़राइली अखबार “द जेरूसलम पोस्ट” में मिसगेव इंस्टीट्यूट ऑफ़ नेशनल सिक्योरिटी एंड ज़ियोनिस्ट स्ट्रेटजी के सीनियर फेलो ज़ाकी शलोम का आज़ एक महत्वपूर्ण लेख प्रकाशित हुआ है। इसमें लेखक ने कहा है कि इसराइल को अब भारत से सीखने की आवश्यकता है कि दुनिया के सामने आत्मविश्वास के साथ बिना झुके कैसे खड़ा होना है।
लेख में बताया गया है कि भारत अमेरिका के मज़बूत संबंधों में दरार तीन कारणों से आई, पहला अमेरिका द्वारा टैरिफ़ का हो हल्ला मचाना, दूसरा भारत के रूस से पुराने और विशेष संबंध और तीसरा भारत पाकिस्तान युद्ध के समय अमेरिकी प्रशासन का न्यूट्रल होना। इन तीनों कारणों से भारत और अमेरिका धीरे धीरे दूर होते चले गए और उसके बाद राष्ट्रपति ट्रम्प ने भारत के संप्रभुता और सम्मान पर टिप्पणी करनी शुरू कर दी और भारत के इकॉनमी को डेड इकॉनमी कह दिया लेकिन भारत न डरा और न ही दबा। बदले में भारत ने अमेरिकी राष्ट्रपति के फ़ोन कॉल उठाने बंद कर दिया। जहाँ पाकिस्तान ने भारत पाकिस्तान युद्ध में अमेरिका की सराहना की और राष्ट्रपति ट्रम्प को नोबल पीस प्राइज़ देने की माँग की, वही भारत ने न्यूट्रल रुख़ रखा एयर ट्रम्प के तथाकथित योगदान की चर्चा भी नहीं की। भारत पर 50% टैरिफ़ की घोषणा की गई, जहाँ तमाम देश टैरिफ़ के बाद ट्रंप से मुलाक़ात करने चले गए, वहीं भारत ने इस पर जवाब देना ही बंद कर दिया। अंत में क्या हुआ? अंततः अमेरिका को समझ आ गया कि यदि ऐसी मूर्खता जारी रही तो भारत के साथ जो उसके स्ट्रेटजिक इंटरेस्ट जुड़े हैं, वह प्रभावित होंगे, इसलिए नए सिरे से फिर से रास्ते खुल गए। मोदी को दबाने के लिए रूस यूक्रेन युद्ध को मोदी युद्ध कहा गया पर मोदी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
अपने देश के बारे में लेखक ने लिखा है कि इज़राईल ने जब ख़ान यूनुस अस्पताल पर हमला किया और उसमें 20 लोग मारे गए तो उस समय अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से जो दबाव आया उसे इसराइल नहीं झेल पाया और सेना से लगाए प्रधानमंत्री तक, सब ने तुरंत माफ़ी माँग ली। इस तरह से हड़बड़ी में माफ़ी माँगना अपने अपने को युद्ध अपराधी घोषित कराने जैसा है। यह बात अलग है कि मारे गए लोग हमास के आतंकी निकले और सूचना सही निकली। यदि इसराइल के प्रशासन में बैठे लोग भी भारत जैसा धैर्य दिखाते तो यह गलती कतई नहीं होती। इसराइल को भारत से सबक लेना चाहिए कि अपने देश के लिए जो ठीक है, वह सब करना उस देश का काम है और विश्व के दबाव में हड़बड़ी में गड़बड़ी नहीं करना चाहिए।
वैसे हमारे देश में बहुत सारे कट्टर लोग रोज मोदी जी को इसराइल से सीखने की सलाह देते हैं लेकिन इसराइल के रक्षा विद्वान उसे भारत से सीखने को कह रहे हैं।
जस्टिस पारडीवाला का फैलाया रायता सुप्रीम कोर्ट कैसे साफ़ करेगा, अब सुप्रीम कोर्ट के भी समझ के बाहर हो गया। राष्ट्रपति द्वारा सुप्रीम कोर्ट से पूछे 14 प्रश्नों पर चल रही सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह पुराने मामलों को नहीं देखेंगे, वह केवल राष्ट्रपति जी में जो प्रश्न भेजा है, उस पर अपनी व्याख्या देंगे। दरअसल कोई भी विषय जो संविधान में परिवर्तन का कारण बन सकता है वह बिना संवैधानिक बेंच के संभव ही नहीं है और जस्टिस पारडीवाला ने दो जजों के बेंच के साथ राष्ट्रपति राज्यपाल के महत्व को ही समाप्त कर दिया और निर्णय दिया कि यदि राष्ट्रपति किसी बिल को तीन महीना से अधिक समय के लिए रखते हैं तो उन्हें वह बिल पास करना पड़ेगा।
अब सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों की बेंच परेशान है कि करें तो क्या करें? जस्टिस पारडीवाला बेंच की निम्न गलतियाँ खुलकर सामने आ रही हैं जो वह कोई भी व्यक्ति बरदाश्त नहीं कर सकता जो देश के लोकतंत्र और इस सर्वोच्च न्यायालय का सम्मान करता हो क्यूंकि जस्टिस पारदीवाला जैसे लोग बार अपने मूर्खतापूर्ण हरकतों से सर्वोच्च न्यायालय के सम्मान को न केवल गिरा रहे हैं बल्कि लोकतंत्र को भी चुनौती दे रहे हैं।
1- अनुच्छेद 32 में मूल अधिकार व्यक्ति के लिए है तो उसका प्रयोग राज्य सरकार करके कैसे सुप्रीम कोर्ट आ सकती है? और आ गई तो जस्टिस पारदीवाला ने उसे सुनने योग्य कैसे समझ लिया?
2- राज्यपाल और राष्ट्रपति के अधिकारों को कैसे कोई कोलिजियम का जज छीनने का दुस्साहस कर सकता है?
3- वह कोई भी निर्णय जिससे संविधान में ही परिवर्तन हो जरा है, उसे दो जज कैसे सुन सकते हैं?
4- क्या सुप्रीम कोर्ट को यह अधिकार है कि वह सीधे भारत के राष्ट्रपति को आदेश देना शुरू कर दे?
5- यदि सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए ऐसे आदेश को राज्यपाल अथवा राष्ट्रपति कूड़े के ढेर में फेंक दें तो भला सुप्रीम कोर्ट क्या कर लेगी जबकि संविधान स्पष्ट रूप से उन्हें किसी भी कोर्ट के सामने प्रस्तुत नहीं किया जा सकता?
6- यदि राष्ट्रपति और राज्यपाल के हस्ताक्षर के बिना तीन महीने में बाय डिफॉल्ट क़ानून बनाने का दबाव डाला जाये तो कल को कोई राज्य, राष्ट्रीय अखंडता के ख़िलाफ़ अथवा सुप्रीम कोर्ट के ख़िलाफ़ ही क़ानून पारित कर दे तो क्या होगा?
7- यदि सुप्रीम कोर्ट इस रिफरेन्स में यह कह दे कि सुप्रीम कोर्ट, राष्ट्रपति को आदेश नहीं दे सकता तब जस्टिस पारदीवाला के न्यायिक क्षमता पर सवाल उठना चाहिए कि नहीं?
8- आज सुप्रीम कोर्ट ख़ुद को जस्टिस पारदीवाला केस से बचाने के लिए कह रहा है कि वह केवल इस रिफरेन्स पर अपनी व्याख्या देगा लेकिन यदि राष्ट्रपति में जस्टिस पारदीवाला केस के मामले में सुप्रीम कोर्ट से रेफ़रेंस माँग लिया तब कोर्ट क्या करेगा? क्यूँकि रिफरेन्स माँगना राष्ट्रपति का अधिकार है, सुप्रीम कोर्ट में पहले भी साफ़ हो चुका है कि यदि राष्ट्रपति ने रिफरेन्स माँगा है तो उसको देना सर्वोच्च न्यायालय का काम है।
9- यदि सुप्रीम कोर्ट यहाँ तक चढ़ आता है कि देश में सब बराबर है और इसका हवाला देकर वह राष्ट्रपति और राज्यपाल को भी कोर्ट के सामने प्रस्तुत होने का आदेश देने के आत्मघाती मोड में आता है तो फिर इस सवाल का क्या जबाब होगा कि जब बोरे में भरकर जजों के घर पर नोट की गड्डियाँ मिल रही हैं तो उन्हें आख़िरकार सीधे FIR करके जेल क्यों नहीं भेजा जा रहा?
सुप्रीम कोर्ट के कई जज सुप्रीम कोर्ट के प्रति आम समाज में विश्वास घटाने वाला कार्य कर रहे हैं। इन जजों को यह नहीं पता है कि वह जो रोज़ गढ्ढा खोद रहे हैं, उसमें वह ख़ुद गिरने की तैयारी कर रहे हैं। विशेष रूप से सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पारदीवाला के तमाम निर्णय सुप्रीम कोर्ट को समस्या में डाल रहे हैं, ऐसे में क्या इनको आगे चलकर चीफ जस्टिस बनाया जा सकता है, यह बहुत बड़ा प्रश्न है।
सुप्रीम कोर्ट में राष्ट्रपति जी द्वारा भेजे 14 प्रश्नों पर चल रही कार्रवाई में कल बहुत कुछ रोचक देखने सुनने को मिला जो सुप्रीम कोर्ट का भी भविष्य निर्धारित कर सकता है। तमिलनाडु की तरफ़ से अभिषेक मनु सिंघवी ने राज्य सरकार का पक्ष रखा। दरअसल पूरा मामला तब शुरू हुआ जब तमिलनाडु विधानमंडल द्वारा पारित विधेयक को राज्यपाल ने राष्ट्रपति के पास भेजा दिया और राष्ट्रपति ने अपने विचार के लिए इसे लंबे समय तक होल्ड कर लिया।
तमिलनाडु सरकार ने इस देरी के ख़िलाफ़ आर्टिकल 32 का हवाला देकर सीधे सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई और दो जजों की बेंच जिसमे बार बार चर्चा में रहने वाले जस्टिस पारडीवाला भी शामिल थे, ने न केवल सुनवाई कर डाली बल्कि राष्ट्रपति को आदेश दे दिया कि वह कोई भी बिल अपने पास अपनी इच्छा से नहीं रोक सकते और यदि ऐसी स्थिति बनती है तो वह कानून तीन महीने के बाद अपने आप लागू हो जाएगा। इस पूरे निर्णय के कई सारे लूपहोल हैं जिसके कारण कल सुप्रीम कोर्ट में कुछ रोचक चर्चा हुई और कई प्रश्नों का जबाब अभिषेक मनु नहीं दे पाये।
1- आर्टिकल 32 का उपयोग कोई भी “नागरिक”, सरकार अथवा सरकार के किसी अंश द्वारा किये गए उन कार्यों के ख़िलाफ़ कर सकता है जहाँ उसके मूल अधिकारों का हनन हो। लेकिन क्या इस आर्टिकल का प्रयोग एक सरकार दूसरे सरकार के ख़िलाफ़ कर सकती हैं? संविधान को यदि ध्यान से पढ़ा जाएगा तो यह आर्टिकल “सरकार” से “व्यक्ति” को बचाने के लिए है, ऐसे में यह याचिका सुनी ही क्यों गई?
2- सुप्रीम कोर्ट को यदि संविधान के संबंध में कोई व्याख्या करनी होती है तो संवैधानिक पीठ बनाई जाती है जो कम से कम पाँच जजों की होती है, फिर दो जजों की बेंच ने कैसे संविधान को बदलने का आदेश दे दिया और “जितनी जल्दी संभव हो उतनी जल्दी” की जगह “तीन महीना” की समय सीमा लिख दिया? यदि यह निर्णय लागू हुआ तो यह कोर्ट द्वारा संविधान का पुनर्लेखन जैसा होगा।
3- यदि सुप्रीम कोर्ट के आदेश को राष्ट्रपति और राज्यपाल मानने से इनकार कर दें, तो ऐसी स्थिति में कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट का मामला होगा, लेकिन संविधान के अनुसार राज्यपाल और राष्ट्रपति अपने किसी भी निर्णय के प्रति कोर्ट के सामने प्रस्तुत नहीं किए जा सकते। तो फिर इस कंटेम्प्ट का क्या होगा?
4- यदि दो जजों की बेंच संविधान का पुनर्लेखन करेंगी तो फिर संसद का क्या काम बचेगा? फिर देश में लोकतंत्र कहा जाएगा?
5- यदि बिना राष्ट्रपति और राज्यपाल के हस्ताक्षर के देश में नियम क़ानून बनने लगेंगे, तो जो भारत को मूलतः एक राष्ट्र माना गया है और जिस कारण राष्ट्र की एकता और अखंडता सुरक्षित रहती है, उस व्यवस्था का क्या होगा?
राज्य में अलगाववाद के हावी होने पर कोई ऐसी पॉपुलर गवर्नमेंट राज्य में चुनी जा सकती है जिसका निर्णय राष्ट्र के ख़िलाफ़ जाने लगे और राज्यपाल राष्ट्रपति मुकदर्शक रहें तो फिर राष्ट्र की अखण्डता का क्या होगा?
6- यदि सुप्रीम कोर्ट के आदेश से ही तीन महीने में राज्य कोई ऐसा क़ानून बनाये जो बाद में सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज हो जाये तो भला सुप्रीम कोर्ट ख़ुद के ख़िलाफ़ ख़ुद को कैसे जज कर सकती है?
यह सब ऐसे प्रश्न हैं जो यह स्पष्ट कर रहे हैं कि विभिन्न मामलों में चर्चित रहे जज पारडीवाला के साथ जस्टिस महादेवन ने जो निर्णय दिया है, वह संविधान में जो पॉवर बैलेंस है उसको बड़ा झटका है।
अब यदि पाँच जजों की बेंच इस मामले पर यह कहती है कि राष्ट्रपति और राज्यपाल को टाइम लाइन नहीं दिया जा सकता तो प्रश्न यह खड़ा होगा कि क्या जस्टिस पारदीवाला के बेंच का निर्णय गलत था? और यदि सुप्रीम कोर्ट ही ग़लत निर्णय दे रहा है तो तो जो यह निर्णय हुआ है उसका क्या होगा? एक बात और याद रखना है कि जस्टिस पारदीवाला की जैसी सीनियरटी है उसके हिसाब से लंबे समय तक वह चीफ जस्टिस रहने वाले हैं। इधर थोड़े ही समय में उनके अगुवाई में एक के बाद एक ऐसे निर्णय हुए हैं जो लगातार सुप्रीम कोर्ट के लिए परेशानी का कारण बने हैं। क्या ऐसे व्यक्ति को केवल वरिष्ठता के आधार पर चीफ जस्टिस बनाना उचित होगा?
क्या आने वाला समय जुडिसियल एक्टिविज्म से आगे बढ़कर जुडिसियल टेररिज्म का तो नहीं है? ऐसी स्थिति क्या भारत जैसे विशाल देश में अस्थिरता को नहीं बढ़ाएगा??
“द वाल स्ट्रीट जर्नल” ने खबर प्रकाशित करके लिखा है कि दुनिया के चार सबसे ताक़तवर नेताओं में से तीन क्रमशः शी जिनपिंग, पुतिन और मोदी चीन में मिल रहे हैं।
उसके बाद ज़ेलेंस्की का ट्वीट आता है कि मैंने भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी से लंबी चर्चा की और बताया कि किस तरह से वॉशिंगटन, इस युद्ध को रोकने के प्रयास कर रहा है और किस प्रकार से रूस, लगातार यूक्रेन के निर्दोष नागरिकों को मार रहा है। आगे उसने लिखा कि मैंने मोदी जी से कहा है कि वह चीन में SCO की मीटिंग में यूक्रेन के पक्ष को रखें और रास्ता निकालें।
उधर ट्रम्प के ट्रेड सलाहकार पीटर नोवरो ने मोदी को नीचा दिखाने की दृष्टि से उनकी भगवा वस्त्र में ध्यान मुद्रा में फ़ोटो शेयर करके लिखा कि ये रूस यूक्रेन युद्ध नहीं है, ये मोदी का युद्ध है। उसने सोचा की ऐसी तस्वीर लगाकर वह भारतीय लोगों को नीचा दिखायेंगे लेकिन उसके नीचे कई हज़ार भारतीय नागरिकों ने हिंदू आइडेंटिटी के प्रति गर्व के अनुभव वाले कमेंट लिखे।
उसके पहले ख़बर आई कि भारत न केवल रूस से सबसे ज़्यादा कच्चा तेल ख़रीद रहा है बल्कि उसे रिफाइन करके यूक्रेन को डीजल बेच रहा है। भारत फ़िलहाल यूक्रेन के कुल डीजल आयात का 15% अकेले बेच रहा है।
उसके बाद ख़बर अमेरिकन मीडिया में ब्रेक हुई कि ट्रंप ने जब कनाडा से लौटने के बाद प्रधानमंत्री मोदी को फ़ोन किया तो उसने कई बार यह बताया कि किस तरह से आसिम मुनीर ने उसका नाम नोबेल पीस प्राइज़ के लिए भेजा लेकिन प्रधानमंत्री ने जानबूझकर इस फ़ोन काल के दौरान ट्रम्प के इस बात पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, इसलिए व्यक्तिगत संबंध ख़राब हुए।
अब आज़ एक और चर्चा यूरोपियन मीडिया के हवाले से आया है कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भारत के राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू को ट्रम्प के सत्ता में आते ही पत्र लिखा था और जब उनका टैरिफ़ वार शुरू हुआ था तभी कहा था कि चीन अब पुरानी बातों से आगे बढ़ना चाहता है और इसीलिए बॉर्डर डिस्प्यूट को भी हमें समाप्त किया है और आगे भी सकारात्मक होकर चलना चाहते हैं। भारत सरकार ने जून तक अमेरिका को समझने के लिए इस पत्र का कोई उत्तर नहीं दिया लेकिन जब अमेरिका ने भारत पर दबाव बनाना चाहा तो राष्ट्रपति महोदया ने उसका उत्तर भेजा और उसके बाद चीनी प्रधानमंत्री की यात्रा हुई। उसी यात्रा में यह तय हुआ कि असहमति विवाद में न बदले और प्रतियोगिता दुश्मनी में। जिसके बाद प्रधानमंत्री ने अपनी चीन यात्रा प्लान की।
मैंने अपना जो पिछला लेख लिखा था उसमें बताया था कि यदि आप अपनी रीढ़ की हड्डी सीधा रखने का प्रयास करते हैं तो उसकी एक कीमत चुकानी पड़ती है लेकिन उस सीधे रीढ़ के कारण दुनिया में अपना एक ऐसा पहचान बनाते हैं जो सभी घाटे से आगे की विषयवस्तु है। भारत फिलहाल उसी मोड़ पर है, आज वह ग्लोबल प्लेयर बन चुका है। इसमें किसी को कोई शंका नहीं होनी चाहिए।