चिरकुट लोग आजीवन चिरकुट ही रहते हैं.
कद से नहीं, कर्म से,
और पद से नहीं, प्रवृत्ति से.
वे किसी ऊँचाई पर चढ़कर भी बौने ही दिखाई देते हैं, क्योंकि उनकी आत्मा घुटनों के बल चलती है.
चिरकुट लोग कभी अकेले नहीं चलते,
झुंड में चलते हैं, क्योंकि भीड़ की छाया में व्यक्तित्वहीनता कम दिखाई देती है.
वे इतिहास पढ़ते नहीं, इतिहास पर अपना नाम बड़े अक्षरों में लिखने की नाकाम कोशिश अवश्य करते हैं.
उनकी भाषा में विचार कम और शोर अधिक होता है.
वे हर प्रभावशाली व्यक्ति के आगे अपना विवेक गिरवी रख देते हैं, लेकिन हर छोटे आदमी पर शक्ति का प्रदर्शन करते हैं.
आप तो बस इतना समझ लो कि
चिरकुट लोग आजीवन चिरकुट ही रहते हैं.