शासन चलाने के लिए तानाशाही बहुत जरूरी होती है
अगर यह लड़की कांग्रेस के किसी प्रधानमंत्री को तो छोड़ो वर्तमान में विपक्ष के किसी मुख्यमंत्री को भी गोली मारने की बात करती तो इसके ऊपर टाडा मकोका UAPA न जाने क्या-क्या धारा लग जाती
यह जंतर मंतर पर कह रही है मोदी को गोली मार दो मैं खुद मोदी को गोली मारने की प्लानिंग कर रही हूं अगर कोई मोदी को गोली नहीं मारेगा तो मैं मारूंगी
'मौत होगी तो सरकार पर दबाव बनेगा...,
CJP के प्रदर्शन से जुड़े व्हाट्सएप चैट लीक, जानबूझकर हिंसा भड़काने का था प्लान?
'JNU संसद चलो कोऑर्डिनेशन' और 'चलो संसद - 20 जुलाई' नाम के व्हाट्सऐप ग्रुप्स से ये चैट्स लीक हुई है।
इन लीक ग्रुप चैट्स में कई चौंकाने वाले मैसेज है, जिसमें जानबूझकर लोगों की जान को जोखिम में डालने की बात कही गई है।
एक मैसेज में साफ तौर पर लिखा है, "भाई अगर किसी की मौत होती है तो उसमें तो सरकार पर ज्यादा प्रेशर आएगा।"
मोदी तेरे में दम है तो इन पर केस करके दिखा दे और आप लोग पुलिस केस से मत डरना बाद से बड़ा वकील खड़ा कर देंगे आप लोगों को छुड़ाकर लाएंगे :-अरविंद केजरीवाल
खुद के बच्चे अपने शानदार करियर का मजा ले रहे हैं और दूसरे के बच्चों को कैरियर किस तरह से बर्बाद कर रहे हैं आप खुद सोचिए
एक पुलिस केस क्रिमिनल केस हो जाने पर अदालतो के दरवाजे पर ठोकरे खाते-खाते पीढियां गुजर जाती है चाहे बड़ा से बड़ा वकील क्यों ना हो
✅🚨 CJP Protest में Nihang का खुला धमकी भरा बयान
“अगर हमने हमला शुरू कर दिया तो सबको इतना पीटेंगे कि शरीर पर नीले निशान पड़ जाएंगे… पुलिस हो या कोई भी, किसी को नहीं बख्शेंगे!”
ये “छात्र आंदोलन” बताया जा रहा था, अचानक ये Nihang कहाँ से आ गए? इनका इस प्रदर्शन से क्या लेना-देना?
साफ है - बड़े षड्यंत्र की बू आ रही है! सारी देश विरोधी ताकते इकट्ठा हो रही हैं
#CJPProtest #NihangThreat #DelhiViolence
लगता है प्रोटेस्ट के दौरान इस बहन को अब्दुल पसंद आ गया
कह रही है मेरे घर वाले भाजपा के बहुत बड़े चमचे हैं
उन्होंने कल मुझे फोन करके कहा कि तुम मुसलमान का साथ दे रही हो और वह मुझसे रिश्ता तोड़ रहे हैं
मैं आज खुद उनसे रिश्ता तोड़ रही हूं. इन्हें बच्चों को इंसाफ डलवाने से कोई मतलब नहीं है
ये देश में आग लगाकर पैसा कमाने आई है
लद्दाख के नाम पर शुरू हुआ वांगचुक का आंदोलन अब 'टुकड़े-टुकड़े गैंग' का नया अड्डा है! 🤡
अफजल गुरु के समर्थकों और SIMI/PFI से जुड़े उमर खालिद के पिता को मंच देकर ये कैसी क्रांति हो रही है? यह कोई प्रदर्शन नहीं, अर्बन नक्सलियों का पूरा इकोसिस्टम है!
इंदिरा गांधी को गोली मारी गई तो इतना बवाल हो गया और इन जैसों को मौका मिले तो ये मार भी देंगे..
मोदी को गोली मार दो...... मै तो मार दूँगी - एक मादा कॉकरोच
मोदी को गोली मारने से इनकी समस्या ख़त्म हो जायेगी?
शायद हाँ....NEET paper लीक तो बहाना है.. इन्हे अपने विरोधियो का क़त्ल करना है.. और देश बर्बाद करना है...!
बहुत बुरी खबर मिल रही है,
अराजक कॉकरोचों ने तलवारो से रैपिड एक्शन फोर्स के जवानों पर हमला किया है...
जब जब MC पप्पू भारत से बाहर जाता है तो वापस आने पर हमेशा भारत में अराजकता फैलती है...
अमेरिका ने फर्जी NGO वालों को 21 मिलियन डॉलर का फंड मोदी को हटाने के लिए दिया है...
छात्रों के भेष में सभी पार्टियों ने गुंडे और अराजक तत्वों को दिल्ली में जान बूझकर इकठ्ठा किया है...
@SupriyaShrinate नौटंकी जितना मर्जी करवा लो उतना ही ग्राफ गिरता जाएगा क्योंकि ये प्रायोजित कार्यक्रम हैं सारे सियारो की लड़ाई हो रही हैं कि जँगल में झांकने पर क्या होगा 🤭
@SupriyaShrinate संसद में जाकर चर्चा नही करनी सड़कों पर नारे लगा रहें है।
संविधान शायद यही सिखाया है ।
फिर संसद का क्या करना है सड़को पर ही मुद्दे हल कर लो ?
लोग देश के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग कर रहे हैं। सतह पर देखने से इस पूरे प्रकरण का वास्तविक उद्देश्य स्पष्ट नहीं दिखता, परंतु...
तिलचट्टों जैसी बेचैनी और हड़बड़ाहट ने मुझे भी आश्चर्यचकित कर दिया।
मैं स्वयं भी धर्मेंद्र प्रधान को इस मामले में छूट देने के पक्ष में नहीं था।
उन्होंने कहीं न कहीं विफलता दिखाई है।
उनकी कार्यप्रणाली की कठोर समीक्षा होना स्वाभाविक है।
किन्तु तभी मेरे मन में एक प्रश्न उठा।
इतनी अधीरता क्यों?
बोस्टन क्यों?
जर्मनी क्यों?
और सबसे महत्वपूर्ण—
अभी क्यों?
जून 2026 ही क्यों?
तब मैंने गहराई से पड़ताल आरंभ की।
जो तथ्य सामने आए, उनका प्रश्नपत्र लीक से बहुत कम संबंध था।
उनका संबंध था धन से।
बहुत अधिक धन से।
धर्मेंद्र प्रधान की मेज़ पर तीन महत्वपूर्ण निर्णय लंबित थे।
जिन पर जुलाई–अगस्त 2026 में निर्णय होना प्रस्तावित था।
ऐसे तीन निर्णय, जो भारतीय शिक्षा व्यवस्था की दिशा ही बदल सकते थे।
निर्णय–1
एनसीईआरटी की नई पाठ्यपुस्तकें।
कक्षा 9 से 12 तक।
नए गणित पाठ्यक्रम में शुल्ब सूत्रों को सम्मिलित किया गया है।
एक ऐसा विचार, जिसे कुछ लोग अत्यंत असुविधाजनक मानते हैं।
क्योंकि यह भारतीय बच्चों को यह बताता है कि गणित की परंपरा इस भूमि पर भी विकसित हुई थी।
यूरोप द्वारा उस ज्ञान की कथा पर अपना स्वामित्व स्थापित करने से बहुत पहले।
नया इतिहास पाठ्यक्रम इससे भी एक कदम आगे बढ़ता है।
आर्य आक्रमण सिद्धांत —
बाहर।
सिंधु–सरस्वती सभ्यता —
अंदर।
भारत की अपनी ऐतिहासिक कथा।
पुनः भारत को लौटाई गई।
निर्णय–2
15 मई 2026।
सीबीएसई का परिपत्र जारी हुआ।
कक्षा 9 से तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य।
जिनमें कम-से-कम दो भारतीय भाषाएँ हों।
निर्णय–3
एनटीए के लिए के. राधाकृष्णन समिति के सुधार।
विकेन्द्रित परीक्षाएँ।
प्रौद्योगिकी की दृष्टि से आत्मनिर्भर व्यवस्था।
जहाँ विफलता का कोई एकमात्र बिंदु न हो।
और हेरफेर का भी कोई एकमात्र अवसर न हो।
अब वास्तविक प्रश्न पूछिए।
यदि ये तीनों परिवर्तन लागू हो जाएँ,
तो सबसे अधिक नुकसान किसे होगा?
सबसे पहले शिक्षाजगत के कुछ प्रतिष्ठित संस्थानों को देखिए।
हार्वर्ड।
एसओएएस, लंदन।
कोलंबिया।
शिकागो।
ऐसे अनेक विभाग, जिनकी शैक्षणिक संरचना आर्य प्रवासन (Aryan Migration) की अवधारणा पर आधारित है।
कथित रूप से लगभग 500 मिलियन अमेरिकी डॉलर के वार्षिक अनुदान दाँव पर हैं।
इसके बाद विदेशी विश्वविद्यालय।
ब्रिटेन।
अमेरिका।
ऑस्ट्रेलिया।
जहाँ भारतीय छात्रों से प्रतिवर्ष लगभग 3.7 अरब अमेरिकी डॉलर की आय होती है।
करीब 18 लाख भारतीय विद्यार्थी।
यदि भारत की शिक्षा व्यवस्था सुदृढ़ होती है,
आत्मविश्वास बढ़ता है,
और बौद्धिक आत्मसम्मान पुनर्स्थापित होता है,
तो विदेश जाने वाले विद्यार्थियों की यह धारा धीरे-धीरे सिमट सकती है।
इसके बाद आता है कोचिंग उद्योग।
पहले चिंता उत्पन्न करो।
फिर आशा बेचो।
और यही क्रम दोहराते रहो।
आज लगभग ₹58,000 करोड़ का उद्योग।
जिसके 2028 तक ₹1,33,995 करोड़ तक पहुँचने का अनुमान है।
यह व्यवस्था सीमित अवसरों पर आधारित है।
और अंग्रेज़ी-प्रधान परीक्षाओं पर भी।
यदि एनटीए विकेन्द्रित हो जाए,
और भारतीय भाषाओं का विस्तार हो,
तो इस पूरे आर्थिक ढाँचे की बुनियाद डगमगाने लगती है।
एलन।
आकाश।
फिटजी।
बायजूज़।
रेज़ोनेंस।
दृष्टि आईएएस।
और इनके अतिरिक्त हजारों छोटे संस्थान।
वैश्विक निवेशकों ने इस पूरे तंत्र में अरबों रुपये का निवेश किया है।
न दान के लिए।
न देशभक्ति के लिए।
केवल प्रतिफल के लिए।
इसके बाद आता है गैर-सरकारी संगठनों (NGO) का तंत्र।
आक्रोश का उद्योग।
अनुदानों का चक्र।
ऐसी वैचारिक कथा, जो तभी तक जीवित रहती है जब तक भारत बौद्धिक रूप से दूसरों पर निर्भर बना रहे।
यदि बच्चों को उनका अपना इतिहास
सही और प्रमाणिक रूप में पढ़ाया जाने लगे,
तो वह स्थापित विमर्श स्वयं ही दम तोड़ने लगेगा।
अनुदान कथाओं का अनुसरण करते हैं।
और कथाएँ बदलती हैं,
तो अनुदान भी उनके साथ चले जाते हैं।
यदि इन सभी पक्षों को एक साथ जोड़कर देखा जाए,
तो एक रूढ़िवादी अनुमान के अनुसार
लगभग ₹3 लाख करोड़ का आर्थिक हित दाँव पर है।
अर्थात् 35 अरब अमेरिकी डॉलर से भी अधिक।
यह केवल विचारों का संघर्ष नहीं,
बल्कि आर्थिक अस्तित्व की लड़ाई है।
कथित रूप से भारत जिस व्यवस्था को बदलने जा रहा था,
वास्तविक संघर्ष उसी के विरुद्ध था।
शायद इसी कारण व्यंग्य और मीम बनाने वाली पूरी मशीनरी अचानक सक्रिय दिखाई दी।
इसी कारण 6 जून को विरोध प्रदर्शनों ने गति पकड़ी।
शैक्षणिक सत्र प्रारंभ होने से पहले।
और सुधारों के अपरिवर्तनीय बनने से पहले।
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