सोनिया गाँधी जितना महान बनने के लिए नरेंद्र मोदी को दूसरा जन्म लेना पड़ेगा.
मई 1991 राजीव गाँधी की हत्या होती है आंतकी ग्रुप लिट्टे द्वारा. हत्या की ज़िम्मेदार नलिनी श्रीहरण
को गिरफ्तार करके अदालत द्वारा फांसी की सज़ा सुनाई जाती है.
लेकिन एक गड़बड़ी हो जाती है, नलिनी उस वक़्त प्रेग्नेंट निकलती है और कानून अनुसार प्रेग्नेंट women को फां���ी नहीं दीं जा सकती.
नलिनी को बेटी पैदा होती है. 2 साल की ज़ब उसकी बेटी होती है तो उसको पता लगता है उसकी फांसी की सज़ा उम्रकैद में बदल गयी है.
और इसको करवाने वाली वही देवी थी जिसके पति की नलिनी ने हत्या करवाई थी.
सोनिया गाँधी ने दयायाचिका में लिखा कि मैं भी एक माँ हूँ, और मैंने और मेरे परिवार ने तुमको माफ़ी देती हूँ.
एक लड़की द्वारा गाली देने पर आहत ��ोने वाले
एक त्याग की मूर्ति की जर्सी गाय कहने वाले
तुम तो उसके पैरों के बराबर नहीं हो.. समझे.
मैं पहले दिन से इस बात पर कायम हूं कि CJP को BJP ने ही बनाया है.
पहले दिन से प्लान था कि विपक्ष को डिस्क्रेडिट करके, अपने हिसाब का विपक्ष तैयार कर दिया जाए.
एयरपोर्ट पर परमिशन देना हो, या जंतर-मंतर पर धरना चलते देना हो. सब कुछ प्लान के हिसाब से था.
मैं ये गारंटी के साथ कह सकता हूं- 20 तारीख से पहले मोदी सरकार चाह देती तो 1 घंटे धरना ना ��ल पाता, लेकिन सरकार ने स्क्रिप्ट के हिसाब से चलने दिया.
वांगचुक जिन्हें खुद अमित शाह ने जेल से निकाला था, उनका भूख हड़ताल करना, और अचानक से एक सुबह उन्हें उठा लेना. सब कुछ स्क्रिप्ट के हिसाब से था.
बस 20 तारीख को जो हुआ, वो ना BJP को पता था, ना ही CJP को अंदाजा. बड़ी संख्या में लोग दिल्ली पहुंच गए.
यहां से सब कुछ स्क्रिप्ट के बाहर चला गया. इसलीए CJP की पूरी टीम ही मौके से गायब हो गई. किसी को एक लाठी नहीं पड़ी.
देश भर से आए बच्चों ने सब कुछ झेला, और उसके बाद ये मामला बहुत बड़ा हो गया. जो अब BJP और CJP के कंट्रोल स��� बाहर था.
स्क्रिप्ट का अंत करीब-करीब ऐसा ही था, जिसमें सरकार संवेदनशील लगे और विपक्ष के नाम पर कुछ लोग खड़े कर दिए जाएं, जो सरकार के हिसाब से हों.
क्योंकि विपक्ष पिछले 3 साल में बहुत ज्यादा मजबूत हो गया था. खासकर युवाओं के बीच में अपनी पहुंच मजबूत की थी. इसी बात को तोड़ने के लिए CJP का नाटक किया गया.
जब 20 तारीख के बाद मामला स्क्रिप्ट के बाहर गया तो पहले कुछ वक्त इ��तजार हुआ. फिर वांगचुक को खुद सरकार ने सूप पिलाकर मामला खत्म किया.
और आखिर में धमेंद्र का इस्तीफा हो गया.
इस्तीफे के बाद जिस तरह से सरकार के मंत्री बता रहे हैं कि धरना तत्काल खत्म किया जाए, वो बताता है कि इसे कौन चला रहा था.
आप खुद सोचिए, ये जितने सेलिब्रेटी हैं, ये अचानक से कैसे बोलने लगे. एक जैसी टीशर्ट पहनकर, कॉओर्डिनेटेड तरीक से. जिनके लिए पैसा ही सब कुछ है, वो देश की चिं��ा क्यों करने लगे, वो भी अचानक.
अब लोगों के बीच ये भ्रम पैदा हो गया कि CJP की सरकार सुन रही है, विपक्ष वही है. सरकार यही भ्रम लोगों में बनाए रखना चाहती है. और स्क्रिप्ट के हिसाब से ये बात लोगों में चली गई.
सरकार को अपने हिसाब का विपक्ष मिल गया, जिसे वो अपने हिसाब से चला सकती है. जो भी इस भ्रम जाल में फंस रहा है, वो अपना और देश का नुकसान कर रहा है.
इस पूरे आंदोलन में लेफ्ट के जितने भी छात्र संगठन, कांग्रेस के छात्र और युवा संगठन और बाक��� विपक्ष के छात्र संगठन शामिल हैं, उनकी मंशा साफ थी. वो असल में विपक्ष का काम कर रहे थे.
इस आंदोलन में जितने भी युवा थे, जो देश के अलग-अलग कोनों से जुड़े, सबकी मंशा साफ थी.
बस CJP का मामला अलग है, जिसपर बहुत संदेह है. इसे लेकर सावधान रहना ठीक.
द पास्ट, कैन नेवर फाइट द फ्यूचर!!
इस दृश��य के तुरंत बाद, शिक्षामंत्री ने इस्तीफा दे दिया। जिस व्यक्ति को, चार साल पहले ही अक्षमता और अकर्मण्यता के लिए हटा देना चाहिए था, उसे हटाने के लिए भारत के युवा को अनशन, प्रदर्शन और खुलेआम गाली गुफ्तार पर उतरना पड़ा।
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और अब भी यह इस्तीफा, सरकार के आत्मनिरीक्षण, मंत्रिपरिषद के कार्यो की मॉनिटरिंग, इवेल्यूएशन और इंडिकेटर्स के आधार पर नही, मजबूरी में हुआ है।
यह नोट करने की बात है।
एंटायर कैबिनेट जडमूर्ख, बकलोल, घमंडी, नालायको और बेईमानो से भरी है। ��प कोई भी विभाग उठाकर देख लें। और इनकी मजबूत उपस्थिति का कारण सिर्फ एक है- वफादारी।
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नेता के प्रति, पार्टी के प्रति,
आरएसएस के प्रति।
इस सरकार के मंत्रियों को जनता नही, इसके मालिकानों से डर है। और मालिकान को परफॉर्मेंस, एफिशिएंसी, रिजल्ट नही चाहिए।
तो जिस गवर्मेंट के निर्माण मे ही मेरिटोक्रेसी बुनियाद नही, उससे परफॉर्मेंस की आशा बेकार है।
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और यह आंदोलन, इस निराशा से उपजी कुंठा का विस��फोट है। यह सूचक भी है, कि जिस तरह का समाज बनाने की कोशिश आरएसएस और उसके हजारों बेनाम संगठन कर रहे थे- वह प्रोजेक्ट स्पेक्टिकुलरली फेल रहा है।
उल्टे, इसने समाज को, इन युवाओ के पीछे लामबंद कर दिया है। जो देश में अंतहीन निरर्थक धार्मिक-जातीय विभाजन और अस्मिता की राजनीति को साफ साफ नकारता है।
और वह युवा, इस मंच पर राहुल गांधी के साथ ��ड़ा हो गया है।
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यह तस्वीर दर्शनीय है।
एग्जेक्टली वैसी है, जैसी होनी चाहिए।
सेंटर में वे है, जो क्षुब्ध है, पीड़ित हैं, आक्रोशित हैं। राहुल किनारे हैं, हाथ बांधे, उनकी आवाज को सुनते हुए।
बिल्कुल ऐसी ही लीडरशिप चाहिए।
हमे नेता ऐसा चाहिए- जो सुने।
अटेंशन दे, इस देश के बच्चों को प्यार से निहारे।
इस पूरे आंदोलन को, एक बार भी हाईजैक करने की कोशिश राहुल ने नही की। वे जंतर मंतर नही गए, वीडियो शूट न करवाये, बड़बोल बयान न दिए।
मगर अपने राजनीतिक वजूद को चुपचाप, छात्रों के पीछे खड़ा कर दिया।
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देश का अगला दशक, उसके छात्र बनाते है।
जो शिक्षक डॉक्टर, इंजीनियर, इनोवेटर, बिजनेसमैन, सोशल साइंटिस्ट और तमाम पेशों में जाकर हिंदुस्तान को अगले स्तर पर ले जाने वाले हैं।
नेता का काम तो महज उनकी सुनना, समझना, और उसकी सफलता के लिए- जरूरी सिस्टम रास्ते साफ करना है।आने वाले कुछ दशक, (अगर राहुल की यही तासीर बनी रहे,तो) आधुनिक भारत का स्वर्णयुग हो सकते है।
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और 1990 के मंदिर मस्जिद, मुसलमान, कश्मीर, हलाला, तलाक, पाकिस्तान, नफरत और ध्वंस की राजनीति, 2026 में कर रही भाजपा, आरएसएस और उनके तमाम गुंडे संगठन - आज के बाद- भारत का पास्ट हैं।
इस तस्वीर में दिख रहे लोग, ठीक इसी क्रम में जैसे कि वे खड़े है-भारत का फ्यूचर हैं। इनका वक्त आ गया है। इन्हें जीतना ही है।
हीन प्रतिगामी शक्तियों को मैदान छोड़ना ही होगा।बिकॉज द पास्ट,
कैन नेवर फाइट द फ्यूचर!!
❤️
प्रीति जिंटा ने महीने दो चार पोस्ट करती हैं, इससे ज्यादा वो सोशल मीडिया का इस्तेमाल नही करतीं.
21 July को 3.25 मिनट पर उन्होंने छात्रों के आंदोलन के समर्थन पोस्ट किया की सरकार को सोनम वांगचुक से बातचीत करनी चाहिए,
जल्द से जल्द कोई हल निकलना चाहिए. सोनम वांगचुक की जान कीमती हैं, उन्हें अनशन खत्म कर देना चाहिए.
24 घंटे के भीतर ही प्रीति जिंटा का गला सुख गया. सरकार के प्रति अपनी निष्ठा साबित करने के लिए, आज सुबह 7.14 मिनट पर उन्होंने पोस्ट कर छात्रों के आंदोलन को उपद्रवियों का आंदोलन बताने की कोशिश की.
प्रीति जिंटा तुमसे ना हो पाएगा. तुम अपना बिजनेस और डॉलर का मुनाफा देखो. छात्रों के चिंता के लिए Congress, SP, ASP और AAP जैसे दल हैं.
राजा युद्ध के मैदान से दूर ऊंचे टीले पर खड़ा होकर अपनी सेना को युद्ध लड़ते हुए देख रहा है.
युद्ध जीत गए तो, रणभूमि में जाकर श्रेय लूट लेंगे और अगर सेना युद्ध हार गई तो यहां से भाग लेंगे.
CJP के तीनों प्रवक्ता सुबह स�� जंतर मंतर से गायब हैं. जबकि उन्हें आज आंदोलनकारियों के साथ होना चाहिए था.
जानबूझकर सौरव दास और आशुतोष रंका ने JP Nadda से मिलने गए. जंतर मंतर पर युवा पुलिस का लाठी डंडा खा रहे हैं. 19 July को सोनम वांगचुक ने भी ट��वीट और चिट्टी के माध्यम से युवा को भड़काया.
युवाओं को भी सोचना चाहिए किसी के निजी महत्वाकांक्षा का मोहरा क्यों बनना. आंदोलन मोटिव अचीव करने से ज्यादा लीडरशिप प्रोड्यूस करने के लिए किया जा रहा है.
आदरणीय सोनम वांगचुक जी, सादर अभिवादन।
20 तारीख के संसद मार्च को आप आजादी का दूसरा आंदोलन कह रहे हैं। एक आन्दोलन 2011 में हुआ था। एक शातिर बुड्ढे ने कतिपय एक्टिविस्टों के साथ भ्रष्टाचार मुक्त भारत की बात कही थी। उस आंदोलन का आपने भी समर्थन किया था। आपने लद्दाख में अन्ना हजारे के समर्थन में और जन लोकपाल बिल की मांग को लेकर सांकेतिक उपवास भी रखा था।
वह आंदोलन हम लोगों की जवानी खा गया इस देश की युवा पीढ़ी का बचपन खा गया। इस देश के अल्पसंख्यकों से मनुष्य होने का दर्जा खा गया। यहां के आदिवासी, दलितों के अधिकार खा गया।
आपका बहुत सम्मान है लेकिन इस सरकार के होने में आपका भी बरा��र का योगदान है। आपके मंतव्य में कोई संशय नहीं है लेकिन यह बात प्रमाणित है कि जो कुछ चल रहा है उसमें आपकी खुन्नस और बीजेपी जैसी नफ़रती पार्टी का हित भी शामिल है।
आजादी का मतलब समझना बहुत मुश्किल है। आपको तो बस जेल में डाला आगे बहुतों के घर उजाड़ दिए गए, उनका इनकाउंटर कर दिया गया। उमर खालिद, शरजील की जवानी कहां बीत रही? आप उनका ��ाम नहीं ले रहे, लीजिये।
यह जो आपने लिखा है MY ILLEGAL DETENTION बेहद भद्दा और व्यक्तिगत लग रहा है।
Why did God Almighty create the hair around the genital organs, and why did the Prophet, peace and blessings be upon him, command us to shave them?
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चाइना से फंडिंग ले रहा - पाकिस्तान
अमेरिका से फंडिंग ले रहा - पाकिस्तान
ईरान से सस्ता तेल ले रहा - पाकिस्तान
इजराइल से फायदा ले रहा - पाकिस्तान
हम पर अटैक कौन कर रहा - पाकिस्तान
नमस्ते ट्रम्प जिसने नहीं किया वो - पाकिस्तान
सबसे कम पढ़ा लिखा देश - पाकिस्तान
सबसे घटिया इकॉनमी वाला देश - पाकिस्तान
लेकिन ईरान USA वॉर में CEASEFIRE का क्रेडिट कौन ले रहा - पाकिस्तान
TRUMP अपनी पोस्ट में क्रेडिट जिसको दे रहा वो - पाकिस्तान
मतलब उनकी विदेश नीति हमसे अच्छी हो गयी? और हम उससे 100 गुना आगे हैँ और
हमारी बात तक नहीं है??
हमने असल में प्र��ानमंत्री नहीं, इलेक्शन कैंपेन करने वाला आरएसएस का वर्कर चुना था क्या?
हर सिलेंडर पर 29% की बचत।
विद सच ए सिम्पल सॉल्यूशन।
खबर पढ़ा तो दांतो तले उंगली दबा ली- 14 किलो के सिलेंडर में 10 किलो ही गैस मिलेगी। क्या गजब है, वैज्ञानिक सोच है - जब पूरे सिलेंडर में 71.42% गैस से ही भर सकते हैं..
तो 100% की जरूरत क्यो है?
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हमारी छठवीं में विज्ञान की किताब में लिखा था कि गैस, निराकार होती है। वह फैलकर पूरा स्थान घेर लेती है। तो 10 किलो गैस भरने के बाद, उस लाल सिलेंडर का कोई भी कोना, आप खाली खोजकर नही दिखा सकते।
इसके बावजूद, कांग्रेस की अदूरदर्शिता के कारण हम महंगी गैस को 14 किलो तक ठूंस ठूंसकर भरते रहे। अरबों डॉलर की विदेशी ��ुद्रा बर्बाद हुई। अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हुआ।
और देश कर्ज में डूबता गया।
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पर अब देश इकॉनमिक्स, और साइंस के साथ है। हर चीज का नये सिरे से हिसाब हो रहा है। अभी कल परसों की रैली में प्रधान जी ने कहा ही था कि हरेक का हिसाब होगा।
लोगो ने सोचा कि केवल तृणमूल पार्टी को कह रहे है। पर ऐसा नही ��ोता। प्रभु प्रजा-प्रजा में भेद नही करते। कपड़े आप जैसे पहनें, धर्म कोई भी माने-
सिलेंडर सबको एक जैसा मिलेगा। दाम भी नही बढ़ेंगे, युद्ध के बावजूद सप्लाई बदस्तूर रहेगी। कोई कमी नही- 10 केजी इच।
एंड दैट्स कॉल्ड मातृचोट..
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स्केच पेन के एक स्ट्रोक से, देश का 29% गैस कंजम्प्शन घटा देना, आम मस्तिष्क की चीज नहीं। गजब तो यह है कि यह साधारण समाधान, आज तक भारत मे किसी को यह बात सूझा ही नही।
जीनियस ऐसे ही ह��ते हैं। पिछली बार एक आदमी ने पेड़ से सेब गिरते देखा था। इसके बाद उसने ग्रेविटी खोज निकाली। जरा सोचिए, करोड़ो साल से सेव पेड़ से गिरते आये हैं।
लाखो लोगो ने गिरते देखा होगा।
पर ग्रेविटी खोजी सिर्फ न्यूटन ने..
क्योकि वो जीनियस था। और संयोग देखिए।
एन फ़ॉर नरेंदर, एन फ़ॉर न्यूटन।
दोनों का ईजाद किया फार्मूला भी काफी सिमिलर है। न्यूटन ने लिखा था - जी इज इक्वल टू एम वन एम टू बाई आर स्क्वेयर.. कुछ समझ आया?
नहीं?? अरे बेटा, ये जो हर सिलेंडर पे 4 किलो बचा..
वही एक्स्ट्रा टू एबी है।
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जीनियस लोग नया काम नही करते, वे पुराने काम को जीनियस तरीके से करते हैं। और अब आखरी बात..
गैस 14 किलो ही क्यो रहती थी।
नेहरू की गलती है। अन्वेषण से पता लगा की नेहरू का जन्मदिन 14 नवम्बर को होता है। जैसे कांग्रेस ने जगह जगह नेहरू यू��िवर्सिटी, नेहरू स्टेडियम, नेहरू साइंस सेंटर बनाये
वैसे ही गैस 14 किलो रखी-
उनका नाम अमिट बनाने के लिए।
लेकिन अब गैस 10 किलो रहेगी।
इतिहास का एक और दाग मिटेगा।
एक और कांग्रेसी किला ढहेगा।
💪😎✌️
एक डॉलर की कीमत आज 94 रुपए से भी ऊपर पहुंच गई है।आइए !एक दिलचस्प तुलना करते हैं।
22 मई 2004 को जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने थे तब ड��लर की कीमत 45.25 रुपए थी जब मई 2014 में मोदी प्रधानमंत्री बने तब डॉलर की कीमत 58.30 रुपए थी यानी मनमोहन सिंह के 10 सालों में मात्र 13 रु की वृद्धि हुई यानी सिर्फ 28.73 प्रतिशत की वृद्धि।
अब यही आप नरेंद्र मोदी की सरकार में डॉलर की कीमत में वृद्धि को देखिए। मई 2014 में मोदी प्रधानमंत्री बने तब डॉलर की कीमत 58.30 रुपए थी ...ठीक ! और आज डॉलर की कीमत 94 है यानि कुल 35.70 रुपए की वृद्धि।
प्रतिशत में देख��� तो मोदी सरकार में मनमोहन जी की तुलना में यह 61 प्रतिशत से भी अधिक है
अब आप बताइए कि किसकी सरकार बेहतर रही?
- गिरीश मालवीय
पाकिस्तान ने UNSC क�� द्विवार्षिक सीट इस वर्ष फिर से हासिल की। उसे 182 वोट मिले।
जुलाई में वह उसका अध्यक्ष बनेगा।
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ईरान से बार्डर शेयर करने वाला वह एक अमेरिकी एलाई है। लेकिन वहां कोई ईरानी मिसाइल नही गिरी। ट्रम्प ने उस पे कोई टैरिफ नही लगाया, बल्कि पाकिस्तानियों साहिब को व्हाइट हाउस बुलाकर भोज खिलाया, तारीफ की।
रूस ने उसे तेल में डिस्काउंट ऑफर किया है। और संयुक्त युद्धाभ्यास कर चुका है।
उसे चीन से जेट मिल रहे हैं।
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सऊदी अरब के साथ स्ट्रेटजिक म्युचुअल डिफेंस साइन कर रहा है। तुर्की के साथ 24 समझौते किये हैं। $5 बिलियन ट्रेड टारगेट रखा है। UAE से इन्वेस्टमेंट आ रहा है।
पड़ोस के बंग्लादेश, नेपाल, मालदीव, श्रीलंका में नई सरकारें उसके पाले में हैं। सीमा पर तंग कर रहे दुष्ट अफगानियों पर मिसाइल मार मारकर उसने 500 लोग मार दिये, पर किसी ने प्रतिबन्ध लगाया, न निंदा की।
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उस पर से युवान में पेमेंन्ट करके स्ट्रेट ऑफ हरमुज से अपने तेल टैंकर निकालकर ले जा रहा है। यहां तक ठीक है, पर इस बात पर हमसे मात खा गया..
कि उसके विदेशमंत्री की आंखों से लेजर लाइट नही निकलती।
🌸🥴
#धुरंधर
माई डियर फ्रेंड औरंगजेब!!
शिवाजी अपने पत्र में, औरंगजेब को इस तरह से सम्बोधित तो नही करते। मगर लिखा इसी अंदाज में है , कि कोई धीर-शीलवान शुभचिंतक- गलत राह पर जा रहे, किसी नासमझ मित्र को समझाए।
यह पत्र 1679 में छत्रपति ने औरंगजेब को लिखा था।
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मूल पत्र तो फारसी (ईरानी भाषा) में है, जिसे उनके PA, लीला प्रभु ने अपनी हस्तलिपि में लिखा था।
प��्र का अंग्रेजी अनुवाद यदुनाथ सरकार किताब-हिस्ट्री ऑफ औरंगजेब (खंड 3) में उपलब्ध है। नीचे उसका हिंदी तर्जुमा है।
शिवाजी लिखते है...
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आलमगीर बादशाह स��ामत को,
यह सदा का शुभचिंतक शिवाजी, ईश्वर की कृपा और बादशाह की मेहरबानी का आभार प्रकट करता है।
यद्यपि विपरीत भाग्य के कारण, मैं आपकी शाही हाजिरी से बिना इजाजत के चला आया था। फिर भी मैं अपने कर्तव्य और कृतज्ञता के अनुसार पूरी तरह से सेवा करने को सदैव तैयार हूँ।
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मेरी उत्कृष्ट सेवाएँ और राज्य की भलाई के प्रति निष्ठा भारत के राजकुमारों, खानों, अमीरों, राजाओं और रईसों, फारस, तुर्की, मध्य एशिया, ��ीरिया के शासकों, सातों जलवायुओं के निवासियों तथा जमीन-समुद्र के राहगीरों तक सबको ज्ञात हैं।
संभवतः इनकी चमक आपके विशाल मन तक भी पहुँची होगी। इसलिए लोक-कल्याण की भावना से कुछ निवेदन प्रस्तुत करता हूँ।
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हाल ही में मेरे कानों में यह बात पड़ी है कि मेरे साथ युद्ध से आपका खजाना खाली हो गया है।
इसलिए आपने हिंदुओं से जज़िया के नाम पर धन वसूलने का हुक्म दिया है ताकि शाही जरूरतें पूरी हों।
बादशाह सलामत!
मुगल सल्तनत को खड़ा करने वाले महान बादशाह अकबर ने 52 बरस, पूर्ण शक्ति से राज्य किया।
उन्होंने तमाम धर्म और संप्रदायों — ईसाई, यहूदी, मुसलमान, दादूपंथी, आकाश- पूजक, ब्राह्मण, जैन आदि के साथ सुलहकुल (सार्वभौमिक सौहार्द) की नीति अपनाई।
उनका उद्देश्य सभी प्रजा की रक्षा और ���ंरक्षण था। इसलिए वे "जगतगुरु" कहलाए।
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आपके दादा जहाँगीर और पिता शाहजहाँ में भी जज़िया वसूलने की शक्ति थी। लेकिन उन्होंने अपने हृदय में कट्टरता हावी नही होने दी।
वे दोनों, सभी मनुष्यों को,
ईश्वर की रचना मानते थे।
इसलिए उनकी समृद्धि और सौभाग्य बढ़ता रहा। किंतु आपके शासन में बहुत से किले और प���रांत आपके हाथ से निकल चुके हैं।
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और बाकी भी जल्दी निकल जाएँगे, क्योंकि मैं उन्हें बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ूँगा।
आपकी प्रजा दब गई है
हर गाँव की उपज घट गई है...
सेना में बेचैनी है,
व्यापारी शिकायत करते हैं,
मुसलमान रोते हैं,
हिंदू तप रहे हैं।
रात को अधिकांश लोगों के पास रोटी नहीं, दिन में गाल पीट-पीटकर वे स्वयं को सताते हैं।
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ऐसी दयनीय स्थिति में जज़िया का बोझ और बढ़ाना, आपके राज���ी स्वभाव को कैसे मंजूर हो सकता है?
यह बदनामी पश्चिम से पूर्व तक फैल जाएगी और इतिहास की किताबों में दर्ज होगी कि हिंदुस्तान का बादशाह भिखारियों की थाली से जज़िया वसूलता है।
ब्राह्मणों, जैन साधुओं, योगियों, संन्यासियों, वैरागियों, दरिद्रों, भिखमंगों और अकाल- पीड़ितों से धन की वसूली??
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बादशाह सलामत!
यदि आप सच्चे ईश्वरी ग्रंथ कुरान और ईश्वर के वचन पर विश���वास करते हैं, तो वहाँ अल्लाह को रब्बुल-आलमीन(सारे संसार का रब) कहा गया है,
न कि केवल रब्बुल-मुसलमीन
(केवल मुसलमानों का रब)।
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बादशाह सलामत..
इस्लाम और हिंदू धर्म मात्र नाम के भेद हैं।
सच्चा ईश्वरी चित्रकार इन विविध रंगों से समस्त मानव जाति का चित्र बनाता है। मस्जिद में अजान उसी की याद में होती है, मंदिर में घंटी उसी की पुकार में बजती है।
किसी के मत-मजहब पर कट्टरता दिखाना ईश्वर के वचन में फे���-बदल करने के समान है।आश्चर्य है कि आपके अधिकारी आपको वास्तविक स्थिति नहीं बताते।
बल्कि जलती आग पर, घास ढकते हैं!
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न्याय की दृष्टि से जज़िया बिलकुल वैध नहीं है।
भारत में यह एक नई बात है और हानिकारक भी। आशा है आप इस विषय पर पुनर्विचार करेंगे। आपकी शाही सूरज महानता के क्षितिज पर सदैव चमकता रहे!
- दस्तखत और मुहर
(छत्रपति शिवाजी)
■■■■
शिवाजी का यह पत्र, उनकी नीति, रीति और सोच का आईना ��ै। अटल बिहारी की भाषा मे कहें तो उन्होंने अपने राज्य में "प्रजा प्रजा में भेद" नही किया।
सदा राजधर्म का पालन करने वाले शिवाजी के नाम पर, हिन्दूपद पादशाही स्थापित करने की कोशिश कर रहे, गुंडों के गैंग को, यह पत्र पढ़ना चाहिए।
उनके बादशाह सलामत..
और तमाम डियर फ्रेंड्स को भी।
🙏
आई मिस संबित पात्रा!!
एक दौर में, सुषमा स्वराज भाजपा की प्रवक्ता होती थी। अरुण जेटली भी बारहा, प्रेस कांफ्रेंस किया करते थे।
क्या शुद्ध हिंदी। अहाहा..
और अंग्रेजी, क्या शानदार विचार,
विट, मुस्कान और धारदार हमला..
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दौर बदला, ��र संबित पात्रा आ गए।
हिंदी वैसी ही संस्कृतनिष्ठ, वाचाल, हर सवाल का तत्क्षण उत्तर, श्लोक उछाल देते। मगर कथन की गुणवत्ता सस्ती, तिर्यक अर्थ।
शब्दजाल में तथ्य, और प्रश्न का उत्तर खोजना कठिन होता था। लगता था, यह बन्दा क्या ही इधर उधर की बकवास कर रहा है??
मुद्दे पर बात क्यो नही करता?
लगा, इससे बुरा प्रवक्ता हो सकता है भला?
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जी हां। हो सकता है
समझ मे आया, जब आये तोतलु महाराज। जिनका नाम भूल गया हूँ। बस यह याद है कि एक बार बहस में आने के पहले पजामा पहनना भूल गए थे।
टोंटी, पप्पू, इटली - एक डिबेट में जितनी बार कहते है, उतनी बार राम का नाम लेते, तो भवसागर तर जाता। भला इससे ज्यादा उल-जलूल कोई बोल सकता है?
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जी हां, बोल सकता है। सुधांशु त्रिवेदी..
श्लोक फ़्लोक वह भी बोलते हैं लेकिन कथ्य में कुतर्क के सिवाय कुछ भी नही। शुद्ध उच्चारण और अशुद्ध कथन का सुंदर नमूना त्रिवेदी को देखकर लगा कि इनसे बेहतर तो अर्धनग्न गौरव भाटिया थे।
इतने बढ़िया, कि अब नाम याद आ गया। वे कम से कम सीधी सपाट भाषा मे, खुलकर बकवाद तो करते है। अब यहां, इससे बेकार प्रवक्ता होगा क्या जहान में?
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हां जी हां। हैं न..
"निशि Can't Do बे" अब संसद में भाजपा का चेहरा हैं। मुंह खोलते हैं, कि दिल्ली की हवा के 100 किमी दायरे में दुर्गंध फैल जाती है। कथ्य, तथ्य, शैली, नीयत- हर लक्षण सिर्फ ऊब और जुगुप्सा पैदा करता है।
अरे, इनसे तो सुधांशु बाबू करोड़ गुना बेहतर हैं।
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सुषमा, और जेटली- अटल सरकार को डिफेंड करते थे। उनके पास तथ्य और तर्क थे, और सरकार भी तथ्य तर्क से पर्याप्त डिफेंड हो जाती थी।
पात्रा, सुधांशु, भाटिया, निशिकांत- सभी उच्च शिक्षित हैं। संभ्रांत और संस्कार वाले परिवारों में पले बढ़े हैं।
लेकिन जिस दौर में उन्हें अपने दल को डिफेंड करने का काम सौंपा गया है, वह कथ्य और तथ्य के स्वीकृत मानकों के तहत सम्भव नही।
उन्हें स्तर से गिरना ही पड़ता है।
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तो मेरा मानना है, कि यह उनकी निजी स्तर नही। पिछले 12 साल में उनकी भाषा, प्रस्तुति में नियमित गिरावट एक इंसिटीट्यूशन के भीतर, लगातार हो रही बौद्धिक और नैतिक गिरावट का मीटर है। इस गिरावट में सुधार का कोई लक्षण, या योजना नहीं है।
तो जो लोग सोच रहे हैं कि क्या इससे बुरा प्रवक्ता कोई हो सकता है, ��े जरा और इंतजार करें। जो अगला आएगा, वह सम्भव है संसद में मां बहन की गालियां दे।
देन यू विल आल्सो मिस संबित पात्रा।
❤️
गणतंत्र दिवस 26 जनवरी को ही क्यों?
भारतीय संविधान निर्माता आम व्यक्ति थे ही नहीं, उन्होंने न केवल संविधान लिखने पर ही विचार-विमर्श किया बल्कि उ��को लागू करने की तारीख पर भी उनका विचार-विमर्श जारी रहा।
संविधान की चर्चाओं को जिस तरह से 12 खंडों में दर्ज किया गया, वो केवल एक दस्तावेज नहीं बल्कि भारत की विविधता का संग्रह है कि किस तरह आप किसी विषय पर असहमति दिखाते हुए भी साथ काम कर सकते हो।
सोचिए जो 26 नवंबर 1949 को बनकर तैयार हो चुका था, उसको लागू करने के लिए 26 जनवरी की तारीख ही क्यों चुनी गई।
संविधान का अंतिम ड्राफ्ट 26 नवंबर 1949 को तैयार हो गया थ��, परंतु संविधान लागू हुआ 26 जनवरी 1950 को। इसके पीछे मूल कारण यह था कि 31 दिसंबर 1929 को लाहौर में कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता पंडित जवाहर��ाल नेहरू के नेतृत्व में पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पारित किया गया।
नेहरू जी ने अंग्रेजों को ये चेतावनी दी कि हमें आने वाली 26 जनवरी यानी 26 जनवरी 1930 तक पूर्ण स्वराज मिल जाना चाहिए।
लेकिन अंग्रेज कहां मानने वाले थे, तो नेहरू भी कम न थे। उन्होंने स्वतंत्रता से पहले पहला स्वतंत्रता दिवस मनाने की घोषणा 26 जनवरी 1930 को की और स्वतंत्रता दिवस मनाया भी गया।
26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस मनाया गया था, यद्यपि देश आजाद हुआ 15 अगस्त 1947 को, लेकिन 26 जनवरी का ऐतिहासिक महत्व था, इसलिए संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया था।
इस बात से ये भी साबित होता है कि उस वक्त के नेता कैसे एक-दूसरे के विचारों का सम्मान किया करते थे।
आप सभी को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।
सौरभ द्विवेदी का ओवरकॉनफिडेंस
इंडिया टुडे ग्रुप से इस्तीफ़े के बाद परसों यानि वसंत पंचमी के दिन सौरभ ने एक्सप्रेस ग्रुप में अपनी अगली पारी की घोषणा कर दी है। जिसने कई कयासों को विराम दे दिया है, जिसमें सौरभ के मुंबई सिफ़्ट होने, एक्टर बनने और पटकथा लेखन विशेष रूप से शामिल है। उनका राजनीति में जान��� का भी कयास कल गलत साबित हो गया।
सौरभ बुंदेलखड़ क्षेत्र के जालौन जिले के चमारी गाँव के है, और उन्होंने अपनी पत्रकारिता की पढ़ाई भारतीय जनसंचार संस्थान दिल्ली से 2007 में की। इसके बाद नवभारत टाइम्स और दैनिक भास्कर जैसे बड़े समाचार पत्रों में काम किया।
सौरभ दैनिक भास्कर के लुधियाना एडिशन के सिटी एडिटर भी रहे। वही उनकी मुलाक़ात कमलेश किशोर सिंह ताऊ, रजत सैनी, कुलदीप मिश्र से हुई जो सौरभ के जाने के बाद लल्लनटॉप के एडिटर है।
सौरभ ने इंडिया टुडे में शुरुआती समय में आज तक हिंदी वेबसाइट में काम किया। लल्लनटॉप की वेबसाइट और बाद में उसके तमाम डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की शुरुआत की। सौरभ इंडिया टुडे हिंदी पत्रिका के एडिटर भी रहे है।
सौरभ के पास ख़बरों के संकलन और वितरण के सभी माध्यमों का पर्याप्त अनुभव है जो कि देश में बहुत कम लोगों के पास है। सौरभ बहुत की पढ़ाकू किस्म के एडिटर है। उनका ए��्सप्रेस में होना वहाँ क��यों की नींद उड़ाने के लिए पर्याप्त है।
अब जब सौरभ एक्सप्रेस ग्रुप में है तब उनके पास एक प्रतिष्ठित समूह के सहयोग के साथ-साथ रामनाथ गोयनका( इंडियन एक्सप्रेस) और प्रभाष जोशी(जनसत्ता) जैसे दिग्गजों की विरासत साथ में है। राजकमल झा जैसे एडिटर का मार्गदर्शन और ख़ुद का 2 दशक का पत्रकारिता का अनुभव भी है।
कल के बाद से कई लोग सौरभ की नई टीम और उनके भविष्य को लेकर नए सिरे से कयास लगाना शुरू कर दिया है��� कई लोग सौरभ की पोस्ट के कई मायने निकालने में लगे है जैसे इंडियन एक्सप्रेस का हिंदी वर्जन आयेगा जो प्रिंट और डिजिटल दोनों में होगा। सौरभ की पोस्ट से डिजिटल का संकेत तो मिलता है पर प्रिंट के बारे में स्थति साफ़ नहीं है।
लेकिन एक समस्या है। सौरभ का स्वभाव तानाशाह जैसा है। वो जहाँ भी रहते है डिक्टेट करने की कोशिश करते है। और ये सब धुरंधरों के बीच थोड़ा मुश्किल होता है ये सौरभ और उनके नए सहयोगिय���ं के लिए थोड़ा मुश्किल हो सकता है।
सौरभ की छवि लंबे-लंबे इंट्रो वाले एंकर की भी है। अगर वो प्रिंट में जाते है तो उनके दर्शक बहुत निराश होंगे और उनसे छिटक भी सकते है। वैसे भी जबसे न्यूज़पिंच आया है तबसे यूट्यूब पर तबाही मचाये हुए है।
सौरभ में अपने करियर एक दशक अज्ञातवास में बिताया है और कई प्रयोग किए पर उन्हें सफलता लल्लनटॉप में मिली।
इससे मुझे एक उदाहरण याद आता है कि हॉटमेल जोकि अब आउटलुक हो गया है और माइक्रोसॉफ्ट के स्वामित्व में है के सह-संस्थाप��� सबीर भाटिया ने 1998 जब हॉटमेल को माइक्रोसॉफ्ट को बेचा तब वे अति आत्म-विश्वास से भरे हुए थे कि वे फिर से मैसेजिंग की दुनिया में क्रांति कर देंगे जैसे उन्होंने हॉटमेल लाकर ई-मेल की दुनिया में की थी।
पर उनका अगला उपक्रम JaxtrSMS फेल हो गया। उन्होंने 2006 में भारत में नैनो सिटी बनाने का भी प्रयास किया और वो भी पूरी तरह से विफल हो गया।
यही उदाहरण मार्क जुकरबर्ग का थ्रेड को देखकर लगता है। वो उतना सफल नहीं रहा जितना कि फेसबुक।
कभी-कभी आप एक झटके में वो सब पा जाते जिसकी आपने कल्पना भी नहीं की होती है और कभी कबार आप सब सोच विचार कर फेल हो जाते है और किस्मत को कोसते है।
अगर सौरभ द्विवेदी का हाल सबीर भाटिया जैसा होता है और उन्हें एक्सप्रेस में वो सफलता हाथ नहीं लगती है जो लल्लनटॉप में मिली है, तो भारतीय पत्रकारिता के इस चमकते सितारे की चमक पर बहुत गहरा असर पड़ेगा और समय की रफ़्तार में कहीं हो जायेगा।
और अंत में यही कि सौरभ का लल्लनटॉप छोड़ना, न्यूज एक्सप्रेस ज्वाइन करने से बड़ी घटना थी।
पाकिस्तानी विदेश नीति का शानदार नमूना!!
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डिस्क्लेमर- जैसा शीर्षक से आप समझ गए है, मैं यहां पाकिस्तान की प्रशंसा करने जा रहा हूँ।
देशभक्त लोग यही से पढ़ना छोड़ दें। सीधे कमेंट में जाकर गाली दें।
हालांकि नेहरू की आलोचना का माल मत्ता मिलेगा। तो चाहे तो पढ़ भी सकते है��।
लेकिन किसी विषय पर नारेबाजी के पहले, उसकी हिस्ट्री जानना आवश्यक है।
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तो हिस्ट्री यह है, की भारत को सिर्फ ब्रिटिश इलाके हस्तांतरण में मिले थे।
रजवाड़े, इस बात के साथ आजाद कर दिए गए थे कि वे भारत से मिलें, या पाकिस्तान से- उनकी मर्जी। कश्मीर भी रजवाड़ा था।
15 अगस्त से लेकर 1 अक्टूबर तक वह किसी से नही मिला था, तो उसके पास फिलहाल स्वतन्त्रता थी।
और राजा का इरादा, किसी से नही मिलने का था।वह कश्मीर को एशिया का स्विट्जरलैंड बनाना चाहते थे।
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इन हालात में, गिलगित बाल्टिस्तान- जो नक्शे में हरा रंग है- वहां क्रांति हो गयी। वे लोग, डोगरा राजा के घोर अलोकप्रिय राज में नही ��हना चाहते थे।
वे स्वेच्छा से गिलगित बाल्टिस्तान के लोग पाकिस्तान में मिल गए।
और इन्ही इलाको के कबायली, बाकी के कश्मीर पर अटैक किये।
राजा ने झटपट भारत मे विलय मंजूर किया। तब भारत की सेना ने जाकर कश्मीर बचाया। वह जो नक्शे का पीला हिस्सा है।
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गिलगित बाल्टिस्तान का एक हिस्सा था- "शक्सकम वैली"...
चीन के काशगर इलाके से व्यापारिक और सांस्कृतिक रूप से मिला हुआ। चीन ने यहां डी फैक्टो कब्जा भी र��ा था। परन्तु कश्मीर राजा के नक्शे, इसे कश्मीर का हिस्सा दिखाते थे। कोई 20 हजार स्केवयर किलोमीटर का विवाद था।
1963 में चीन पाक में समझौता हुआ।
कोई साढ़े 5 हजार स्क्वेयर किलोमीटर जमीन पर पाकिस्तान ने चीन का कब्जा स्वीकार लिया। बदले में बाकी विवादित हिस्से पर चीन ने पाक का अधिकार मान लिया। अंतरास्ट्रीय सीमा तय हो गयी।
दोनों हंसते हंसते घर गए।
आज चीन, और पाकिस्तान ऑल वेदर फ्रेंड है।
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इसके 4 सा�� पहले...
चीनी पीएम-चाउ एन ला�� भारत आये। ऐसे ही समझौते का ऑफर दिया। कहा- नेफा (अरुणाचल) हम आपका मान लेते है। जहां आपका डी फैक्टो कब्जा है।
एक्सई चिन हमारा मान लो, जहाँ हमारा डी फैक्टो कब्जा है।
सीमा तय हो जाएगी।
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ये एक फेयर डील थी। मुझे ऐसा लगता है।
नेहरू को भी लगा।
तो उन्होंने पार्लियामेंट में प्रस्ताव रखा।
समझाया- एक ऐसी जमीन के लिए विवाद बनाये रखना, जिसमे घास का पत्ता नही उगता, जहां से एक रुपये का रेवेन्यू नही।
लेकिन सुरक्षा में जवान मरें, और देश के बजट का 5-7% , सालों साल- वहीं खपत होता रहे। तो बेहतर यही कि विवाद शांत कर, लेन देन से निपटान किया जाए।
इस प्रस्ताव के जवाब में संसद मे ऐतिहासिक बहस (बकैती) हुई।
- वीरता,
- भारत माता,
- देशभक्ति,
- हक,
- हमारी जन्मभूमि,
- स्वर्ग से सुंदर
- सिर गंजा है तो कटवा लें क्या??
etc etc..
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देशो के बीच जमीन विवाद, अंततः लेन देन से निपटते हैं, या युद्ध से। जितनी जल्द निपटे, उतना अच्छा। पीढ़ियों का विलम्ब, सांस्कृतिक बैर पैदा करता है।
जख्म नासूर बन जाते हैं।
और इसलिए- यहां नेहरू की आलोचना का स्कोप है।
- वे सुप्रीम थे, सर्वशक्तिमान, सर्वमान्य। संसद में बहस करने की जरूरत नही थी।
- 1954 में भारत का नक्शा उन्होंने छपवाया था। तो उन्हें मालूम था कि बाउंड्री कहाँ ,सही है, और कहां फेक.. तो दमदारी से समझौता साइन कर देते।
कोई क्या ही उखाड़ लेता?
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जो देश, सदियों हमारा मुरीद रहा।
जहाँ से हजारो साल पुराने सांस्कृतिक, धार्मिक तार जुड़े हैं। जहां से ह्वेनसांग और फाह्यान, भारत मे सिर झुकाकर विद्याध्ययन को आते थे। इस बुद्ध की भूमि को चूमते..!!
उनसे एक ऐसी जमीन के लिए एतिहासिक दुश्मनी खरीद ली गयी, जो तब भी हमारे कब्जे में नही थी। न आज है..
और न कभी होगी।
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चीन सीमा पर हमारे, या ब्रिटिश के, या कश्मीर राजा की दिखाई सीमाएं, सिर्फ मैप का खेल हैं।
यह सम्भव नही की आप "सांस्कृतिक रूप से हमारा" का जाप जपकर, कोई सीमा मनवा लें। क्योकि उतना ही समावेश, वहां चीनी संस्कृति, इतिहास और एथनिसिटी का भी है।
यह आप खुद भी अपने भीतर यह स्वीकार करते है। इसलिये तो अरुणाचल, सिक्किम, लद्दाख, मणिपुर के लोगों को "चिंकी-चायनीज" कहकर पुकारते हैं।
उन्हें चाकू भी मारते हैं।
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संसद में भारी वीरता का प्रदर्शन करने वाले महावीर त्यागी का गंजा सिर नही कटा। लेकिन पिछले 60 सालों में हजारो भारतीय युवा, आम जनता के बच्चे, पिता, भाई- जो सेना की वर्दी पहन, इस भूमि के लिए युद्ध किये-
उनका कटा।
युद्ध, फेल नेताओ की फेल कूटनीति की पैदाइश होता है। मेच्योर्ड देश, दूरदर्शी नेता, ऐसे सीमा विवाद लेन देन करके, समय रहते सुलझा लेते हैं।
अगर नहीं, तो खोखली वीरता के दावों के बीच..
संसाधन लुटाते है। मूछें उमेठते, पैर पटकते हैं। बेटे मरवाते हैं, और फिर वैश्विक स्तर पर अलग थलग, हर जगह थपेड़े खाते हैं।
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1959 में मौका था। हम बराबर थे।
फेयर डील मिली थी। अब वह भी नही मिलेगी।
जब तक आप चीन को लड़कर हरा न दें।
क्योकि जब आप मस्जिदों के नीचे मन्दिर खोज रहे थे, उस वक्त वह मैन्युफैक्चरिंग पॉवर बन रहा था। आर्थिकी सुदृढ कर रहा था। और वैश्विक शक्ति के रूप में उभर रहा था।
अब वह इंच बाय इंच, किलोमीटर दर किलोमीटर, सीमा पर आगे बढ़ रहा है। बस्तियां बसा रहा, हमारी पेट्रोलिंग और डी फैक��टो कण्ट्रोल बाधित कर रहा है- तो हम चीन का नाम तक लेने की हिम्मत नही कर पा रहे।
सर कटाने की बात तो दूर है।
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और उधर पाकिस्तान, चीनी मदद से इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा कर रहा है। हमारे जेट गिरा रहा है।
इसलिए कि 60 साल पहले..
समय रहते चीन से विवाद सुलझा लिया था।