देश को अब ऐसी राजनीति चाहिए जो जाति-धर्म के शोर से ऊपर उठकर रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसान, भ्रष्टाचार और न्याय जैसे असली मुद्दों पर बात करे।
समय आ गया है कि जनता खुद आगे आए और एक ऐसी नई राजनीतिक शक्ति बनाए —
जो किसी परिवार या पूंजीपति की नहीं, बल्कि आम नागरिक की आवाज़ हो। इसलिए आइए साफ राजनीति, जवाबदेही और वास्तविक बदलाव के लिए एक नया संगठित जनान्दोलन शुरू करते हैं
@kiran_patniak@Psingh1164@kanpursneed@prksh_ambedkar@prajapat204
यह रमन है , इनको पता नहीं पुलिस से क्या दिक्कत है सवाल पूछ रहा कि गाड़ी कि नंबर प्लेट कहां है ?
यह डंडा किसने दिया है ?
इनको पता नहीं यह बिहार पुलिस है , पता नहीं चलेंगा कब भरत भूषण तिवारी बना दिया जाओंगे...
अब बिहार में गुंडा राज नहीं पुलिस राज चलता है और सवाल पूछना गुनाह है !
अब तो ट्रेन में भी फर्जी TTE असली TTE बनकर अवैध वसूली और धंधा कर रहे हैं।
एक युवक ने संक्रिय फर्जी महिला का खुलासा करते हुए कहा है
महिला खुद को TTE बताकर यात्रियों से पैसे वसूल रही थी
और अवैध तरीके से टिकट कट रही थी।
सफर करते समय ऐसे लोगों से हमेशा सावधान रहना चाहिए।
उनका आईडी कार्ड चेक कर लें और पूरी जानकारी लें उसके बाद ही पैसे दें ।
क्योंकि हमारी जागरूकता ही हमारी सेफ्टी है।
वाराणसी : यह तर्क शायद किसी भी समझदार इंसान के गले नहीं उतरेगा कि भारतीय रेलवे, जिसका अपना इतिहास 200 साल से भी कम (लगभग 170 साल) पुराना है, उसकी जमीन पर 800 साल पुरानी एक ऐतिहासिक मस्जिद ने 'कब्जा' कर लिया! यह सीधा-सीधा इतिहास और क्रोनोलॉजी (कालक्रम) का मजाक है।
एकलौता भरत तिवारी ने बिहार में जन सैलाब ला दिया 💪,उनके कर्म ब्यवहार से लोगो मे इतना प्रेम था कि आज उनके जाने के बाद भी प्रशासन से लोहा लेने को तैयार है लोग💪😡
इस भीड़ को देखकर ये तो अनुमान लगा ही सकते हैं कि उन्होंने अपने इतने कम जीवन मे कुछ कमाए न कमाए आदमी कमाए थे😭😭
कुछ लोग कह रहे हैं की भरत तिवारी के इनकाउंटर पर ही प्रोटेस्ट क्यों ? एनकाउंटर तो और भी आदमी का हुआ है। बात इतनी है की भरत तिवारी के बारे में थोड़ा जानिए तो शरीर का रोयां सिहर जाएगा। किसी फिल्म सी कहानी है।
एक गांव था जो गंगा के बाढ़ में समा गया। उस गांव के लोग दुबारा बसना शुरू हुए। अधिकतर आबादी पिछड़े और दलितों की थी। भरत तिवारी ने वहां लोगों के जरूरतों के लिए आवाज उठाना शुरू किया। नई बस्ती तक सड़क पहुंचाने से लेकर बिजली तक, चापाकल से लेकर राशन तक। लोग जहां बसे थे वो जगह बहुत नीचे था, पानी लग रहा था, भरत तिवारी अधिकारियों से लगातार कोशिश कर रहे थे की वहां कुछ मिट्टी भराया जाए ताकि लोगों को पानी लगने से बचाव हो। पिछले साल भर से भरत तिवारी स्थानीय प्रशासन और अधिकारियों से ज्ञापन, संवाद, दवाब, प्रोटेस्ट सब माध्यम से कोशिश कर रहे थे। धीरे धीरे प्रशासन ने उन्हें मानसिक रूप से परेशान करना शुरू किया, वो फ्रस्ट्रेट होने लगे व्यवस्था से, फिर उन्हें मानसिक विक्षिप्त बताया गया।
भरत तिवारी एक सच्चा हिन्दुस्तानी था, देशभक्त था, राष्ट्रवादी था, जनता के लिए काम करता था, उसे देश से प्रेम था। लेकिन जब वो व्यवस्था से हार गया, काले अंग्रेजों वाले सिस्टम ने उसे मजबूर कर दिया। फिर एक नौजवान को एक ही रास्ता दिखा की बहरों को सुनाने के लिए धमाके की जरूरत है। उसने अपने गले का महावीरी बेचके हथियार खरीदा और पुलिस वालों को मजबूर करने की कोशिश की। वो सिर्फ ये वादा चाहता था की आश्वासन दे की झूठा वादा नहीं करेंगे, लोगों का काम पूरा कर देंगे। पुलिस ने पहले आश्वासन दिया की हथियार डाल दो, वादा पूरा होगा। और जब भरत तिवारी ने हथियार डाल दिया तब उसे गोली मार दी गई।
भरत तिवारी क्रांतिकारी ही था, और कैसे होते हैं क्रांतिकारी ? आप उसके अंतिम यात्रा में जमा हुए लोगों के हुजूम का वीडियो देखिए। उन लोगों को सुनिए जिसके लिए वो काम करता था। लोग उसे उनके लिए भगवान बता रहे हैं। एनकाउंटर वैसे भी कानूनी रास्ता नहीं है। लेकिन उसमें भी बिना अपराधी बैकग्राउंड वाले एक समाजसेवी नौजवान जो व्यवस्था से फ्रस्ट्रेट होकर भटक गया और सरेंडर भी कर दिया, उसका एनकाउंटर एक सरकारी हत्या है।
🔥😂 अंध भक्त टेक्नोलॉजी का कमाल 🤡💥
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⬩➤ बीजेपी वाले अपने ही कार्यकर्ता का घर तोड़ रहे हैं 🏠💔😡
⬩➤ दीदी रो-रोकर कह रही है, अपने दुखड़े किस को सुनाऊँ 😢💔
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⬩➤ अंधभक्ति की टेक्नोलॉजी इतनी आगे बढ़ गई कि अपने ही सपोर्टरों का घर तोड़ रहे हो 🤡🔥
⬩➤ ये तो लेने के देने पड़ गए → प्रचार करने आए थे, लेकिन अपने लोगों का घर भी बर्बाद कर दिए 🏚️💸
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⬩➤ हर हर मोदी घर घर मोदी 😂🤣 → घर टूट रहा है, अब “हर हर मोदी” का नारा मजाक बन गया है 🤡
⬩➤ दीदी जी अब समझ आ गया ना → अपना ही घर नहीं बचा तो आम जनता का क्या हाल होगा 😭🏠
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⬩➤ इसमें भी नेहरू की गलती ढूंढ लो → हर फेलियर में नेहरू को घसीट लो, 12 साल का अपना रिकॉर्ड छुपाओ 🤦♂️
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⬩➤ अपनी ही कार्यकर्ता दादी का घर तोड़ रहे हो
ये विकास नहीं, घर-घर तबाही और जबरदस्ती का राज है 😤🔥
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Disclaimer: यह पोस्ट purely व्यंग्यात्मक और sarcastic है।
Public discussion और social commentary के लिए बनाई गई है।
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⬩➤ बीजेपी अब अपने लोगों को भी नहीं बख्श रही
BJP Remove → Bharat Bachao 🇮🇳✊🔥
*भरत तिवारी की मौत: एक सवाल, जो हर नागरिक को बेचैन करता है*
आज सवाल केवल भरत तिवारी का नहीं है।
सवाल यह है कि क्या इस देश में किसी व्यक्ति को अपनी बात रखने, आत्मसमर्पण करने और अदालत में अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए या नहीं?
भरत तिवारी कौन था, उसके ऊपर क्या आरोप थे, वह निर्दोष था या दोषी—इन सबका निर्णय अदालत को करना था। लेकिन यदि यह सच है कि आत्मसमर्पण के बाद उसे गोली मारी गई, तो यह केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं, बल्कि न्याय की उस भावना पर चोट है जिस पर हमारा संविधान खड़ा है।
एक मां ने बेटा खोया है, एक परिवार ने अपना सहारा खोया है। किसी भी मृत्यु पर संवेदनशील समाज का सिर झुक जाता है। क्योंकि इंसान की जान वापस नहीं लाई जा सकती। अदालत की सजा बाद में भी दी जा सकती थी, लेकिन जीवन समाप्त हो जाने के बाद कोई फैसला उस जीवन को वापस नहीं लौटा सकता।
लोकतंत्र की ताकत बंदूक की गोली में नहीं, कानून की किताब में होती है। यदि अपराधी को भी अदालत में सुनवाई का अधिकार नहीं मिलेगा, तो फिर आम नागरिक की सुरक्षा की गारंटी कौन देगा?
आज बिहार का यह मामला पूरे देश के सामने एक आईना बनकर खड़ा है। लोग पूछ रहे हैं कि आखिर सच क्या है? क्या मुठभेड़ वास्तव में अपरिहार्य थी या कोई और रास्ता भी था? क्या कानून की प्रक्रिया का पालन हुआ? क्या किसी व्यक्ति को अपनी सफाई देने का अवसर मिला?
ये प्रश्न किसी एक दल, जाति या विचारधारा के नहीं हैं। ये प्रश्न लोकतंत्र, संविधान और मानवता के हैं।
हम अपराध का समर्थन नहीं करते। हम अपराधियों के प्रति सहानुभूति की बात भी नहीं कर रहे। लेकिन हम यह अवश्य कहते हैं कि अपराध से लड़ते-लड़ते कहीं हम कानून को ही कमजोर न कर दें।
क्योंकि जिस दिन न्यायालय की जगह सड़क या बंदूक फैसला करने लगेगी, उस दिन कोई भी व्यक्ति स्वयं को सुरक्षित महसूस नहीं कर पाएगा।
भरत तिवारी अब इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन उनकी मौत एक ऐसा प्रश्न छोड़ गई है जिसका उत्तर बिहार ही नहीं, पूरे देश को चाहिए।
यदि वह दोषी था, तो अदालत सजा देती।
यदि वह निर्दोष था, तो न्याय उसे बचा लेता।
लेकिन जब किसी की मौत पहले हो जाए और फैसला बाद में खोजा जाए, तब लोकतंत्र के माथे पर एक प्रश्नचिह्न खड़ा हो जाता है।
सत्य जो भी हो, उसकी निष्पक्ष जांच हो।
न्याय केवल किया ही न जाए, बल्कि होता हुआ भी दिखाई दे।
#भरत_तिवारी #न्याय #संविधान #RuleOfLaw #Bihar #JusticeForTruth
*भरत तिवारी की मौत: एक सवाल, जो हर नागरिक को बेचैन करता है*
आज सवाल केवल भरत तिवारी का नहीं है।
सवाल यह है कि क्या इस देश में किसी व्यक्ति को अपनी बात रखने, आत्मसमर्पण करने और अदालत में अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए या नहीं?
भरत तिवारी कौन था, उसके ऊपर क्या आरोप थे, वह निर्दोष था या दोषी—इन सबका निर्णय अदालत को करना था। लेकिन यदि यह सच है कि आत्मसमर्पण के बाद उसे गोली मारी गई, तो यह केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं, बल्कि न्याय की उस भावना पर चोट है जिस पर हमारा संविधान खड़ा है।
एक मां ने बेटा खोया है, एक परिवार ने अपना सहारा खोया है। किसी भी मृत्यु पर संवेदनशील समाज का सिर झुक जाता है। क्योंकि इंसान की जान वापस नहीं लाई जा सकती। अदालत की सजा बाद में भी दी जा सकती थी, लेकिन जीवन समाप्त हो जाने के बाद कोई फैसला उस जीवन को वापस नहीं लौटा सकता।
लोकतंत्र की ताकत बंदूक की गोली में नहीं, कानून की किताब में होती है। यदि अपराधी को भी अदालत में सुनवाई का अधिकार नहीं मिलेगा, तो फिर आम नागरिक की सुरक्षा की गारंटी कौन देगा?
आज बिहार का यह मामला पूरे देश के सामने एक आईना बनकर खड़ा है। लोग पूछ रहे हैं कि आखिर सच क्या है? क्या मुठभेड़ वास्तव में अपरिहार्य थी या कोई और रास्ता भी था? क्या कानून की प्रक्रिया का पालन हुआ? क्या किसी व्यक्ति को अपनी सफाई देने का अवसर मिला?
ये प्रश्न किसी एक दल, जाति या विचारधारा के नहीं हैं। ये प्रश्न लोकतंत्र, संविधान और मानवता के हैं।
हम अपराध का समर्थन नहीं करते। हम अपराधियों के प्रति सहानुभूति की बात भी नहीं कर रहे। लेकिन हम यह अवश्य कहते हैं कि अपराध से लड़ते-लड़ते कहीं हम कानून को ही कमजोर न कर दें।
क्योंकि जिस दिन न्यायालय की जगह सड़क या बंदूक फैसला करने लगेगी, उस दिन कोई भी व्यक्ति स्वयं को सुरक्षित महसूस नहीं कर पाएगा।
भरत तिवारी अब इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन उनकी मौत एक ऐसा प्रश्न छोड़ गई है जिसका उत्तर बिहार ही नहीं, पूरे देश को चाहिए।
यदि वह दोषी था, तो अदालत सजा देती।
यदि वह निर्दोष था, तो न्याय उसे बचा लेता।
लेकिन जब किसी की मौत पहले हो जाए और फैसला बाद में खोजा जाए, तब लोकतंत्र के माथे पर एक प्रश्नचिह्न खड़ा हो जाता है।
सत्य जो भी हो, उसकी निष्पक्ष जांच हो।
न्याय केवल किया ही न जाए, बल्कि होता हुआ भी दिखाई दे।
#भरत_तिवारी #न्याय #संविधान #RuleOfLaw #Bihar #JusticeForTruth
UP- बरेली में कुछ स्टूडेंट ट्रेन से हरिद्वार जा रहे थे. किसी ने गलती से डस्टबिन पर कुल्ला कर दिया. GRP के सिपाही हरिओम ने इस गलती पर जेल का डर दिखाकर छात्रों से एक हजार रूपये की न्यौछावर वसूल ली.
छात्रों ने आपस में चंदा करके रिश्वत अदा की
कुछ चादरमोरों को लगता है की भरत तिवारी को लोग ब्राम्हण होने के लिए साथ दे रहे हैं तो सुन बे चादरमोर, लहन के बौरे
भरत भूषण तिवारी जिसके के लिए शासन प्रशासन से लड़ते लड़ते शहीद हो गए वो लोग पिछड़े और दलित समाज से थे, उन लोगों का कहना है की भरत तिवारी उनके लिए भगवान थे क्योंकि
भरत तिवारी के कारण उनके घरों तक बिजली आई,
भरत तिवारी के कारण उनको चलने के लिए सड़क मिला,
और उन्होंने अब वहां मिट्टी डलवाने के लिए SDM को पत्र लिखा और बोला तो SDM अपना Ego पर ले लिया और सब मिलकर उनकी हत्या कर दिया
सुनो ये चाचा पासवान जाति के हैं और इनकी आंसू देख
Bihar का युवा Bharat Tiwari कलयुग का भगत सिंह था !
गरीबों के लिए क्रांतिकारी योद्धा दलित पिछडे भगवान मान चुके थे 10 किमी तक अंतिम यात्रा में सिर्फ लोगों की भीड़ थी
अभी के समय में चार लोग कंधे देने के लिए नहीं मिलते हैं यहां लाखों लोग एक साथ चल रहे हैं...🫡♥️
एक भगत सिंह को फासी पर चढ़ा दिया-दूसरा भगत सिंह को एनकाउंटर कर दिया
बिहार के भरत तिवारी हत्याकांड मामले में सभी समाज के लोग आवाज़ उठा रहे है। एक दलित महिला भरत को भगवान बोल रही थी। अब यह पासवान चाचा रो रहे हैं
इससे इतना समझ आ रहा कि समाजसेवी भरत तिवारी ने ग्रामीणों के लिए बहुत कार्य किए है। यह किसी एक समाज का नहीं बल्कि सर्व समाज का मामला है।
इस Video को तब तक शेयर करें जब तक इन सभी कर्मचारियों के ऊपर सख्त कार्रवाई नहीं होती
ये हाल है @IndiaPostOffice के ना ही समय से खुलता है ना ही डिलीवरी मिलती है।
कमीशनबाज़ी का खेल चरम पर, छूते ही ढह गया आज़मगढ़ का डिवाइडर! भाजपा राज में जनता की गाढ़ी कमाई पर ठेकेदारों का सरेआम डाका।
यूपी में तथाकथित 'ज़ीरो टॉलरेंस' की हवा निकालता आज़मगढ़ का यह वीडियो देखिए! जनता की गाढ़ी कमाई के टैक्स से बने डिवाइडर की क्वालिटी ऐसी है कि हाथ लगाते ही वह ताश के पत्तों की तरह ढह रहा है। ठेकेदारों और अफ़सरों की जुगलबंदी, हिस्सेदारी और अंधाधुंध कमीशनबाज़ी ने प्रदेश के विकास को भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा दिया है।
सरकार दावों के विज्ञापन छपवाने में व्यस्त है और यहाँ धरातल पर जनता के पैसे को दोनों हाथों से लूटा जा रहा है। आख़िर इस महा-घोटाले और घटिया निर्माण के असली ज़िम्मेदार अफ़सरों और ठेकेदारों पर बुलडोज़र कब चलेगा?
उम्र बढ़ने के साथ शरीर भले ही कमजोर पड़ने लगे, लेकिन असली ताकत इंसान के हौसलों और सोच में होती है। अगर इरादे मजबूत हों तो उम्र सिर्फ एक संख्या बनकर रह जाती है।
ये हैं रोशनी देवी। इन्होंने 68 साल की उम्र में वेटलिफ्टिंग की शुरुआत की थी और आज 71 साल की उम्र में भी ऐसा प्रदर्शन कर रही हैं कि कई युवा लड़के लड़कियां भी पीछे रह जाएं। 103 किलोग्राम वजन उठाकर दादी ने साबित कर दिया कि जुनून, मेहनत और आत्मविश्वास के आगे उम्र की कोई सीमा नहीं होती।