Why surnames matter?
Caste as a habitus.
A piece I co-wrote long back but revived in light of yesterday’s discussion on social justice.
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कल इस स्पेस में जुड़िए।
हमारे मुख्य वक्ता है।
माननीय संजय सिंह जी, राज्यसभा सांसद, आप
माननीय मनोज काका जी, प्रवक्ता, सपा
डॉ. प्रियंका भारती जी, प्रवक्ता, राजद
प्रो. अम्बुज कुमार जी, साउथ फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी
प्रो. अरुण कुमार जी, नॉटिंघम यूनिवर्सिटी , यूके
प्रो. संदीप यादव जी, दिल्ली विश्वविद्यालय
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विज्ञान की प्रतिष्ठित पत्रिका नेचर ने एक लेख प्रकाशित किया है, जिसका शी���्षक है: “विज्ञान के क्षेत्र में चीन का असाधारण उत्थान और यह दुनिया को कैसे बदल देगा।”
1978 में, जब चीन ने दुनिया के लिए अपनी अर्थव्यवस्था के दरवाज़े खोले, तब वैश्विक वैज्ञानिक मंच पर उसकी उपस्थिति लगभग नगण्य थी। एल्सेवियर के स्कोपस (Scopus) उद्धरण डेटाबेस के अनुसार, उस समय चीन के शोधकर्ताओं ने अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिकाओं में 120 से भी कम शोध लेख प्रकाशित किए थे, जो दुनिया के कुल शोध प्रकाशनों का महज़ 0.02% था।
लेकिन 50 साल से भी कम समय में चीन वैश्विक वैज्ञानिक महाशक्ति बन गया है और अब शोध एवं विकास (R&D) के क्षेत्र में दुनिया का नेतृत्व करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
आज चीन शोध एवं विकास पर सबसे अधिक खर्च करने वाले देशों में शामिल है। वह पेटेंट आवेदनों की संख्या में अग्रणी है और परमाणु ऊर्जा तथा कृत्रिम जीवविज्ञान जैसी दर्जनों महत्वपूर्ण तकनीकों के अनुसंधान में अपना दबदबा बना चुका है।
चीन के ���िश्वविद्यालय और शोध संस्थान अब पश्चिम के पारंपरिक शैक्षणिक दिग्गजों को कड़ी टक्कर दे रहे हैं। नेचर इंडेक्स की रैंकिंग में भी चीन पहली बार शीर्ष स्थान पर पहुँच चुका है।
भारत में दवाओं के उत्पादन की हक़ीक़त।
भारत दुनिया का 20% जेनेरिक दवा का उत्���ादन करता है, लेकिन उसकी दवा उत्पादन व्यवस्था की एक बड़ी कमजोरी यह है कि वह जरूरी रासायनिक घटकों के लिए चीन पर निर्भर है। दवाओं पर ‘मेड इन इंडिया’ का लेबल लगा हो सकता है, लेकिन उन्हें बनाने के लिए आवश्यक कच्चे रसायनों पर चीन का नियंत्रण है।
2025 के अंत में चीनी कंपनियों ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में पेनिसिलिन-जी की कीमत घटाकर 13.50 डॉलर प्रति किलोग्राम कर दी। भारतीय कंपनियों को सरकार की उत्पादन-आधा��ित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना के तहत इसका लाभदायक उत्पादन करने के लिए लगभग 25 डॉलर प्रति किलोग्राम की कीमत चाहिए थी। इतनी बड़ी कीमत के अंतर ने भारतीय निर्माताओं के लिए प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल बना दिया।
विडंबना यह है कि भारत कभी स्वयं पेनिसिलिन का उत्पादन करता था। लेकिन सरकारी किण्वन संयंत्रों की बदहाली और निजी कंपनियों के उत्पादन बंद करने से घरेलू क्षमता कमजोर होती गई। अब चीन की कम कीमतों ने भारतीय कंपनियों के लिए नए संयंत्रों में ���िवेश करके बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू करना और कठिन बना दिया है।
दवा का असली आधार उसका सक्रिय औषधीय घटक है।
सक्रिय औषधीय घटक (एपीआई) वह रासायनिक पदार्थ है, जो दवा में बीमारी पर वास्तविक असर डालता है। उदाहरण के लिए, एंटीबायोटिक में यही घटक बैक्टीरिया से लड़ता है। इसके बिना तैयार गोली या कैप्सूल अपना अपेक्षित औषधीय प्रभाव नहीं दिखा सकता।
पेनिसिलिन जैसे एंटीबायोटिक के उत्पादन के लिए बड़े ��द्योगिक संयंत्रों में नियंत्रित परिस्थितियों में किण्वन प्रक्रिया अपना�� जाती है। इसमें सूक्ष्मजीव पोषक घोल से आवश्यक औषधीय अणु बनाते हैं। इसके बाद कई रासायनिक मध्यवर्ती पदार्थों की मदद से अंतिम उत्पाद तैयार होता है। इस श्रृंखला में किसी एक जरूरी पदार्थ की आपूर्ति रुक जाए, तो पूरा उत्पादन ठप हो सकता है।
भारत की दवा उद्योग व्यवस्था चीन पर कितनी निर्भर है?
वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने सक्रिय औषधीय घटकों, थोक दवाओं और रासायनिक मध्यवर्ती पदार्थों का कुल 4.35 अरब डॉलर ���ा आयात किया। इसमें चीन की हिस्सेदारी 73.7 प्रतिशत थी। दो साल पहले यह लगभग 70 प्रतिशत थी।
यानी जिस देश को दुनिया की फार्मेसी कहा जाता है, वह अपनी दवा उत्पादन व्यवस्था के लिए जरूरी रसायनों के बड़े हिस्से के मामले में चीन पर निर्भर है।
इस निर्भरता का सबसे गंभीर पहलू यह है कि चीन केवल सस्ते रसायनों की आपूर्ति नहीं करता, बल्कि कई महत्वपूर्ण औद्योगिक कड़ियों पर भी उसका दबदबा है। यदि चीनी कंपनियाँ क���मतें इतनी कम कर दें कि भारतीय निर्माताओं के लिए उत्पादन घाटे का सौदा बन जाए, तो घरेलू उद्योग कमजोर पड़ सकता है। बाद में जब भारत को इन रसायनों की सबसे अधिक जरूरत होगी, तब आपूर्ति रोकने या कीमतें बढ़ाने का जोखिम भी रहेगा।
उपलब्ध व्यापार आँकड़ों के आधार पर अनुमान है कि लगभग 25 से 35 महत्वपूर्ण सक्रिय औषधीय घटकों और मध्यवर्ती रसायनों के लिए भारत चीन पर अत्यधिक निर्भर है। इनमें कुछ ऐसे रसायन भी शामिल बताए जाते हैं, जिनका घरेलू उत्पादन लगभग समाप्त हो चुका है।
एंटीबायोटिक की आपूर्ति रुकी तो अस्पतालों पर क्या असर होगा?
पेनिसिलिन और सेफालोस्पोरिन जैसे बीटा-लैक्टम एंटीबायोटिक आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था के महत्वपूर्ण आधार हैं। इनका इस्तेमाल अनेक प्रकार के जीवाणु संक्रमणों के उपचार में किया जाता है। सर्जरी, गंभीर चोटों और अस्पतालों में संक्रमण के इलाज के दौरान इन दवाओं की उपलब्धता बेहद महत्वपूर्ण होती है।
इस क्षेत्र के कई मध्यवर्ती रसायनों के वैश्विक उत्पादन में चीन की हिस्सेदारी बहुत अधिक है। कुछ अनुमानों के अनुसार, यह 80 से 90 प्रतिशत तक हो सकती है। यदि आवश्यक रसायनों की आपूर्ति रुक जाए, तो भारत की दवा कंपनियों के पास लाखों-करोड़ों गोलियाँ बनाने की मशीनें होने के बावज��द उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
फरवरी 2020 में रेटिंग एजेंसी आईसीआरए ने दवा तैयार करने वाली कंपनियों के औसत भंडार का अनुमान लगभग डेढ़ से ढाई महीने लगाया था। इतना भंडार लंबे समय तक चलने वाली आपूर्ति बाधा या व्यापारिक प्रतिबंध से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं होगा।
2020 में संकट की एक झलक पहले ही मिल चुकी है।
चीन में कारखानों के बंद होने से 2020 की शुरुआत में रासायनिक पदार्थों की आपूर्ति बाधित हुई। ���ारतीय कंपनियों के भंडार पर दबाव बढ़ा और गुजरात तथा तेलंगाना के कुछ उत्पादकों को पैरासिटामोल जैसी बुनियादी दवाओं के लिए कच्चे माल की कमी का सामना करना पड़ा।
उस समय आपूर्ति बाधित होने की वजह कारखानों का बंद होना था। लेकिन यदि किसी देश की सरकार रणनीतिक कारणों से निर्यात रोकने का फैसला कर ले, तो संकट कहीं अधिक गंभीर और लंबा हो सकता है।
ब्राह्मण बाल गंगाधर तिलक के धागे खोल दिए गए हैं, 🔥
इतिहासकारों ने इसको लोकमान्य बताया क्योंकि ब्राह्मण था, समाज सुधार का एक भी कार्य तिलक ने नहीं किया,
Age of consent का विरोध किया, शर्मनाक।
2026 #NobelPrize laureate Henri Kagan discovered a new way of manipulating chemical reactions, allowing a greater excess of one of the mirror images to be created than was previously assumed possible. His discovery has been revolutionary for chemists who develop reactions for the manufacture of pharmaceuticals, flavours, scents and new materials.
2026 का रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार उन खोजों के लिए दिया गया है, जिन्होंने रसायनज्��ों को ऐसी रासायनिक अभिक्रियाएँ विकसित करने में सक्षम बनाया, जिनसे अणुओं का केवल एक विशेष दर्पण-प्रतिबिंबित रूप बनाया जा सकता है। इस विशेषता को होमोचाइरैलिटी (Homochirality) कहा जाता है।
जीवन की रसायनिकी स्वभावतः होमोचाइरल है। यह शब्द ग्री�� भाषा के दो शब्दों से बना है, जिनका अर्थ है—“समान” और “हाथ”। जैसे हमारे बाएँ और दाएँ हाथ एक-दूसरे के दर्पण-प्रतिबिंब होते हैं, वैसे ही कई अणु भी दो दर्पण-प्रतिबिंबित रूपों में मौजूद होते हैं। अमीनो अम्ल इसका एक प्रमुख उदाहरण हैं। हमारे शरीर की कोशिकाओं में बनने वाले प्रोटीन में अमीनो अम्लों का केवल एक ही रूप पाया जाता है, जबकि उसका दूसरा दर्पण-प्रतिबिंबित रूप प्रकृति में बहुत दुर्लभ है।
लं��े समय तक रसायनज्ञों के लिए यह एक रहस्य था कि प्रकृति में अणुओं का केवल एक ही दर्पण-प्रतिबिंबित रूप कैसे प्रमुख हो गया।
प्रयोगशाला में जब ऐसी रासायनिक अभिक्रियाएँ कराई जाती थीं, जिनसे दोनों रूप बन सकते थे, तो सामान्यतः दोनों लगभग बराबर मात्रा में बनते थे। लेकिन दवाओं जैसे जैविक रूप से सक्रिय अणुओं के निर्माण में केवल एक विशेष रूप की आवश्यकता हो सकती है, क्योंकि दोनों दर्पण-प्रतिबिंबित रूप ���रीर पर अलग-अलग प्रभाव डाल सकते हैं।
फ्रांस के हेनरी कागन (Henri Kagan)और जापान के केन्सो सोआई (Kenso Soai) की खोजों ��े इस रहस्य को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके काम से यह समझने में मदद मिली कि रासायनिक अभिक्रियाओं में एक ही दर्पण-प्रतिबिंबित रूप को कैसे प्राथमिकता दी जा सकती है।
इन खोजों ने दवाओं के निर्माण के लिए रासायनिक अभिक्रियाओं को डिजाइन करने के तरीके को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया है।
एलीट वर्ग सिर्फ आरक्षण मे रिफार्म चाहिये
जबकि SC/ST/OBC समुदायों को आज भी इसका पूरा लाभ नहीं मिल पाया है
दूसरी ओर, देश के बुनियादी मुद्दों के रिफार्म पर यह वर्ग पूरी तरह चुप रहता है, जैसे:
▪️ न्यायपालिका
▪️ ज़मीन के रिकॉर्ड
▪️ कृषि व श्रम कानून
▪️ टैक्स सिस्टम
इसका कारण स्पष्ट है: इन क्षेत्रों में सुधार होने से आम जनता का तो फायदा होगा, लेकिन पीढ़ियों से काबिज़ एलीट वर्ग का एकाधिकार (Monopoly) और वर्चस्व टूट जाएगा। वे रिफॉर्म मुश्किल होने की वजह से नहीं, बल्कि अपनी सत्ता बचाने के लिए टालते हैं
गिरिराज किशोर हिंदी के सम्मानित लेखक रहे हैं और उनकी अनेक रचनाएं पाठकों द्वारा आज भी सराही जाती हैं। उन्होंने IIT कानपुर में जातिगत भेदभाव और दलित छात्रों के अनुभवों को अपने चर्चित उपन्यास “परिशिष्ट” में बेहद मार्मिक ढंग से दर्ज किया है।
सनद रहे गिरिराज किशोर IIT कानपुर में 1975 से 1983 तक कुलसचिव और संस्थान में SC/ST छ��त्रों के साथ होने वाले अपमान, उपेक्षा और पूर्वाग्रह को उन्होंने करीब से देखा था। उपन्यास में इन्हीं अनुभवों की पृष्ठभूमि में उच्च शिक्षा संस्थानों में ‘जाति’, ‘मेरिट’ और ‘सामाजिक वर्चस्व’ के सवाल उठते हैं।
परिशिष्ट केवल किसी एक छात्र की कहानी नहीं है; यह उस संस्थागत वातावरण की पड़ताल है जहाँ आरक्षण के रास्ते आए दलित छात्रों को बराबरी का अवसर है कहने के बावजूद सामाजिक और मानसिक अपमान का ��ामना करना पड़ता है। इस अर्थ में, गिरिराज किशोर का यह ��ेखन आज भी IIT जैसे संस्थानों में जातिगत भेदभाव की बहस को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण साहित्यिक दस्तावेज है। आज कई वर्षों बाद “परिशिष्ट” का याद आना अनायास नहीं है।
जय हिन्द
मेरिट की एक और कहानी पढ़िए।
डॉ. अशोक पांडेय CSIR-NIIST से नौकरी कर सेवानिवृत्त हुए। उनके 43 शोधपत्रों को फर्जी/विश्वसनीयता से जुड़ी अनियमितताओं के कारण रिट्रैक्ट किया गया।
अब यही महोदय CSIR-IITR में विशिष्ट वैज्ञानिक (Distinguished Scientist) के तौर पर काम कर रहे हैं।
साइंस का प्रतिष्ठित जर्नल Nature हर साल रिसर्च आउटपुट के आधार पर दुनिया के संस्थानों की रैंकिंग जारी करता है। 2026 की रैंकिंग में भारत का एक भी संस्थान टॉप 200 में नहीं है। IISc बेंगलुरु 202वें और IIT मुंबई 282वें स्थान पर है, जबकि टॉप 100 में चाइना के 51 संस्थान शामिल हैं।
भारत क��� प्रीमियम संस्थानों में 90% से अधिक प्रोफेसर पदों पर तथाकथित ‘मेरिटधारियों’ का कब्ज़ा है। लेकिन जब वैश्विक स्तर पर रिसर्च और अकादमिक प्रतिस्पर्धा की बात आती है, तो यही ‘मेरिट’ अचानक सुषुप्त अवस्था में चली जाती है।
आख़िर ये कैसी मेरिट है, जो नौकरी और प्रमोशन पाने तक ही दिखाई देती है और उसके बाद दुनिया से प्रतिस्पर्धा करने के समय गायब हो जाती है?
भारत के शिक्षण संस्थानों में आज़ादी के 80 साल बाद भी SC, ST और OBC समुदायों का प्रतिनिधित्व उन्हें मिले न्यूनतम आरक्षण के आधे के बराबर भी नहीं है।
तथाकथित प्रगतिशील माने जाने वाले संस्थान JNU में OBC और आदिवासी समुदाय से एक भी प्रोफेसर नहीं है।
मुंबई स्थित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR) में भी SC, ST और OBC समुदाय से एक भी प्रोफेसर नहीं है।
OBC - 1
EWS - 6
Which roster points give EWS 6 points but OBCs only 1 point.
EWS is fraud and moreover these college administration is making them more fraudulent!
#EWSFraud
भारत में आरक्षण विरोधियों का एक आम कुतर्क होता है कि आरक्षण का लाभ कुछ जातियाँ या परिवारों के लोग ही पीढ़ी-दर-पीढ़ी लेते आ रहे हैं। डेटा के नाम पर उनके पास अक्सर अपने निजी पूर्वाग्रह होते हैं, लेकिन उन पूर्���ाग्रहों के समर्थन में वे कभी ठोस तथ्य या व्यापक आँकड़े प्रस्तुत नहीं कर पाते।
एससी-एसटी के लिए संवैधानिक आरक्षण 1950 से लागू है, जबकि ओबीसी आरक्षण मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर 1990 के दशक में, 1993 से लागू हुआ। इसके बावजूद आज भी केंद्र और अधिकांश राज्य सरकारों की नौकरियों में ओबीसी, एससी और एसटी का प्रतिनिधित्व उनके निर्धारित न्यूनतम आरक्षण प्रतिशत के बराबर तक भी नहीं पहुँच पाया है।
अब सवाल ���ह है कि अगर दशकों बाद भी इन समुदायों का प्रतिनिधित्व उनके आरक्षण के अनुपात तक नहीं पहुँच पाया है, तो यह दावा किस आधार पर किया जाता है कि आरक्षण का लाभ केवल कुछ जातियों या पीढ़ी-दर-पीढ़ी परिवारों के लोग ही उठा रहे हैं?
ओबीसी में क्रीमी लेयर की व्यवस्था पहले से लागू है। यानी एक निश्चित आय सीमा (आठ लाख रुपया सालाना) से ऊपर आने वाले परिवारों को ओबीसी आरक्षण का लाभ नहीं मिलता। फिर भी आरक्षण विरोधियों का वही पुराना तर्क लगातार दोहराया जाता है।
मान लीजिए, एक पीढ़ी को आरक्षण का लाभ मिलने के बाद अगली पीढ़ी को ��रक्षण से बाहर कर दिया जाए। तब तो ओबीसी, एससी और एसटी का सरकारी सेवाओं में जो प्रतिनिधित्व अभी बना है, वह भी धीरे-धीरे कम होना शुरू हो जाएगा। ऐसे में सामाजिक और ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों का प्रतिनिधित्व कैसे बढ़ेगा।
असली सवाल यह है कि जिन समुदायों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है, उनका प्रतिनिधित्व आज भी निर्धारित अनुपात तक क्यों नहीं पहुँच पाया है?
80 प्रतिशत से अधिक आबादी को बार-बार ऐसे कुतर्कों में उलझाने का उद्देश्य यह होता है कि आरक्षण के नाम पर सवाल उठाते-उठाते समाज के कुछ वर्गों के सरकारी संस्थानों में वास्तविक ओवर-रिप्रेजेंटेश��� पर सवाल ही न उठाया जाए?
दरअसल, इस तरह का कुतर्क करने वाले या तो आँकड़ों को समझना नहीं चाहते, या फिर आँकड़ों से पैदा होने वाले असहज सवालों से बचना चाहते हैं।
अब साल में कई बार लोग बड़ी संख्या में मूर्तियाँ स्थापित करते हैं और फिर उन्हें नदियों, झीलों और तालाबों में विसर्जित कर देते हैं। हर साल मूर्तियों की संख्या और आकार बढ़ता जा रहा है, जबकि भारत की नदियाँ और झीलें पहले ही प्रदूषण और अतिक्रमण से जूझ रही हैं। कई अध्ययनों में मूर्ति विसर्जन से जल की गुणवत्ता, तलछट और जलीय जीवन पर पड़ने वाले बड़े दुष्प्रभाव भी सामने आए हैं।
आस्था अपनी जगह है, लेकिन क्या बदलते समय और पर्यावरण की जरूरतों के अनुसार परंपराओं में भी बदलाव नहीं होना चाहिए? कृत्रिम विसर्जन कुंड, पुनः उपयोग होने वाली मूर्तियाँ या ऐसी सामग्री से बनी मूर्तियाँ, जिन्हें पानी में विसर्जित करने की जरूरत ही न पड़े इन विकल्पों पर गंभीरता से विचार किया जा सकता है।
और एक सवाल इतिहास के जानकारों से मूर्ति विसर्जन की यह परंपरा वास्तव में कब और क्यों शुरू हुई?
कोई ज्ञानी इस पर प्रकाश डाले।
देश मे UGC गाइडलाइंस आने के बाद से जितने भी भारतीय मुस्लिमों के खिलाफ हर मुद्दे को जोडकर कंटेंट बनाकर पैसा छापने वाले धार्मिक उन्मादी थे उन सबकी दुकान लगभग बंद हो गयी है।
दरअसल देश मे ऐसे नफरती कंटेंट क्रिएटर को गौर से देखिएगा तो समझ में आएगा इसमें 90% एक ही जाति समाज के लोग भरे थे जिनका मकसद देश के ��र मुद्दों में धार्मिकता जोड़कर सो��ल साइड से पैसे कमाना था।
धार्मिक आस्था में भोले-भाले पिछड़े-दलित हिन्दू कनेक्ट हो जाते थे, खुब व्यूह मिलता था, दनादन व्यूह से इनकी कमाई हो रही थी
लेकिन फिर एक दिन UGC गाइडलाइंस आ गया उसी दिन ये सारे कंटेंट क्रिएटर अचानक से हिन्दू से हटकर जाति विशेष के हो गए। अब इनलोगो का कंटेंट मुस्लिमों के खिलाफ नहीं बल्कि पिछड़े-दलितों के खिलाफ बनने लगा।
हिंदू ह्रदय सम्राट से मोदी जी सीधा जाति में जोड़कर सम���बोधित किया जाने लगा।
UGC गाइडलाइंस ने देश मे बता दिया कि बड़े संस्थानों में पत्रकारिता कर रहा जाति विशेष का व्यक्ति भी पहले जाति विशेष ही है,
UGC गाइडलाइंस ने देश मे बता दिया कि बड़ा बड़ा हिंदूवादी संगठन चलाने वाले भी पहले जाति विशेष है,
UGC गाइडलाइंस ने देश मे बता दिया कि पोडकास्टरों की भी जाति होती है।
UGC गाइडलाइंस ने देश मे बता दिया की पहले वर्ण व्यवस्था है ।
पर देश संविधान से चलेगा बाबा साहेब ��ंबेडकर के सर्वधर्म से चलेगा।
वैसे निश्चिंत रहिये देश मे अब समझने वाले लोगो को जमात भी बढ़ी है ।