सरकारला ही डॉक्युमेंट्री समाजमाध्यमांवरून गायब करायची आहे. याचं कारण काय असेल ते तुम्हाला ही डॉक्युमेंट्री बघितल्यावर कळेलच. त्यामुळे सरकारने ही डॉक्युमेंट्री गायब करायच्या आधी बघून घ्या !
कार्टूनिस्ट @satishacharya ने अपने यूट्यूब चैनल पर एक वीडियो बनाया है, जिसका शीर्षक है: “क्या कार्टूनिस्ट अब ‘राष्ट्रविरोधी’ हैं? व्यंग्य से सत्ता क्यों डरती है।” वीडियो उसी सिलसिले पर है, जिसमें भारत के राजनीतिक कार्टूनिस्टों के कार्टून और खाते सोशल मीडिया पर रोके जा रहे हैं।
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सबसे पहले वह बात जो हर कोई जांच सकता है: क्लिप का मूल रूप। नेहा का कहना है कि संदेश बांग्लादेश के सोशलिस्ट स्टूडेंट फ़्रंट के सम्मेलन के लिए बना था और उसका लोगो, उनका नाम और संगठन की जानकारी काटकर उसे चलाया गया। वीडियो में दिखायी गयी मूल क्लिप के कोने में बांग्ला में छठे केंद्रीय सम्मेलन का चिह्न और नीचे नाम-पट्टी साफ़ दिखती है, जो उनके दावे से मेल खाती है। एक विदेशी छात्र संगठन के सम्मेलन में एकजुटता का संदेश भेजना और अपने देश में सत्ता बदलने का एलान करना, दो अलग बातें हैं। पहली बात दुनिया भर के छात्र आंदोलनों में आम है, और भारत में भी विदेशी आंदोलनों के साथ एकजुटता की लंबी परंपरा रही है। नेहा के जवाब में यह फ़र्क़ साफ़ है: एकजुटता बांग्लादेश की सारी धाराओं के साथ नहीं, सिर्फ़ उसकी प्रगतिशील धारा के साथ है, और यही फ़र्क़ क्लिप में कट गया था। बांग्लादेश के उस दौर में हिंसा और अल्पसंख्यकों पर हमलों की ख़बरें भी आयी थीं, इसलिए ऐसे संदेशों में यह कहना कि किसके साथ और किस बात पर, पहले से ज़्यादा ज़रूरी है।
@NehaAisa
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बोलने वाले मोहन भागवत रंगीन हैं, संघ की गणवेश और टोपी में, उंगली सीधी सामने। जिस तरफ़ वह इशारा कर रहे हैं, वहां सब कुछ धुंधले नीले में है, जैसे कोई पुरानी याद। बैनर पर लिखा है 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन 2011'। यानी जिस सत्ता-पलट की बात आज हो रही है, उसका नक़्शा कार्टून को उसी मंच पर मिलता है। @satishacharya की चुटकी मंच के कोनों में छिपी है। एक आदमी पर्दे की ओट से झांक रहा है, कुछ चेहरे कतार में खड़े मुस्कुरा रहे हैं, नीचे भीड़ मुट्ठियां उठाये हुए है। कार्टून सवाल पूछता नहीं, बस याद दिला देता है कि महत्वाकांक्षा का समर्थन पहले किस मंच पर किसने किया था।
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अल जज़ीरा के 101 ईस्ट की यह खोजी फ़िल्म पूछती है कि क्या सत्ता और सियासत आज भी उन लोगों को बचा रही है जो 2006 में एक मंगोलियाई अनुवादक की हत्या के पीछे थे। यह मामला बताता है कि जब किसी अपराध के तार सत्ता के ऊंचे गलियारों तक जाते दिखें, तो इंसाफ़ अक्सर अधूरा रुक जाता है: हाथ चलाने वाले सज़ा पाते हैं, सवाल हुक्म तक नहीं पहुंचता। एक ग़रीब मुल्क से आयी औरत, रक्षा सौदों की दलाली और ख़ुफ़िया दस्ते, यह तस्वीर सिर्फ़ मलेशिया की नहीं है। दक्षिण एशिया में भी हथियार सौदों और सत्ता के गठजोड़ पर उठे सवाल बरसों दबे रहे हैं।
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फ़रक्का की बहस अक्सर दिल्ली और ढाका के बीच की कूटनीति बनकर रह जाती है, जबकि उसकी असल क़ीमत गंगा किनारे के किसान, मछुआरे और बाढ़ में डूबते गांव चुकाते हैं। गाद से उथली हुई नदी बाढ़ को और बढ़ाती है और सूखे में पानी घटाती है। नयी संधि सिर्फ़ क्यूसेक के बंटवारे पर न रुके। नदी किनारे की बस्तियों, पंचायतों और राज्यों को बातचीत में जगह मिले, यही न्यायपूर्ण रास्ता होगा।
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दस लाख से ज़्यादा रोहिंग्या लगभग एक दशक से कैंपों में हैं और दुनिया की नज़र अब दूसरी जंगों पर है। ऐसे में एक शरणार्थी का यह कहना कि उसे गवाह की तरह नहीं, अपने भविष्य के शिल्पकार की तरह देखा जाए, पूरी मानवीय व्यवस्था पर सवाल है। भारत समेत पूरे दक्षिण एशिया के लिए भी यह आईना है, जहां बेवतन लोगों को अक्सर सिर्फ़ सुरक्षा के ख़तरे की तरह देखा जाता है।
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डॉन में माहिर अली का यह लेख बताता है कि यूरोप का ग़ुस्सा किसी एक देश की कहानी नहीं, बल्कि किराये, फ़ीस और बजट कटौती के उसी दबाव की उपज है जो कराची से पेरिस तक महसूस होता है। जब सरकारें क़र्ज़ का हवाला देकर स्कूल की छत तक ठीक नहीं करतीं, पर अमीरों पर टैक्स की बात टाल देती हैं, तो सड़क ही आख़िरी रास्ता बचता है। ख़तरा यह है कि इस नाराज़गी को धुर दक्षिणपंथ प्रवासियों के ख़िलाफ़ मोड़ दे। आंदोलन की असली मांगें, अच्छे स्कूल और सस्ते घर, उसी शोर में दब सकती हैं।
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हिंदुत्व और हिंदू धर्म के फ़र्क़ की बात नयी नहीं, ख़ुद सावरकर ने यह फ़र्क़ माना था। इस लेख का असली सवाल यह है कि जब किसी नेता या कारोबारी की आलोचना को आस्था पर हमला कहा जाने लगे, तो बहस की जगह कहां बचती है। सावरकर और फ़ासीवाद के रिश्ते पर इतिहासकारों में मतभेद है, और यह लेख एक पक्ष की दलील है, कोई अंतिम फ़ैसला नहीं। फिर भी कबीर और रैदास की परंपरा वाले देश में यह याद दिलाना ज़रूरी है कि आस्था का दायरा किसी एक पार्टी या संगठन से कहीं बड़ा है, और धर्म को बचाने का दावा अक्सर उसके सबसे खुले हिस्सों को ही छोटा करता है।
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बाणगंगा में सर्वपितृ अमावस्या के बाद मरी मछलियों की ख़बर शायद एक दिन से ज़्यादा नहीं टिकती, मगर @devduttmyth इसी घटना से एक पुरानी बहस खोल देते हैं। वह पूछते हैं कि मौत की वजह लापरवाही हो, तो उसका कर्म किसके खाते में जाएगा। फिर वह मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति के हवाले से याद दिलाते हैं कि श्राद्ध की प्राचीन विधि में पितरों को मछली भी अर्पित होती थी, यानी आज के “शुद्ध” शाकाहारी कर्मकांड की वैदिक वंशावली पर ही सवाल उठता है। बात यहीं नहीं रुकती। कोली मछुआरों के शहर में उन्हीं को मकान न मिलना, मछली बाज़ार हटाने की मुहिमें और अशोक के ज़माने की रोक, इन सबको वह एक ही धागे में पिरोते हैं। आख़िर में हिंदू, सिंधी, ईसाई और इस्लामी कथाओं की एक लंबी फ़ेहरिस्त है, जिसमें मछली और मछुआरा बार-बार लौटते हैं। यह लेख इसलिए पढ़ने लायक़ है कि वह धर्म, खान-पान और रोज़ी के बीच खड़ी दीवारों को एक छोटे, ठोस दृश्य से परखता है।
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इंडिया टुडे हिंदी में अनिलेश एस महाजन का यह विश्लेषण बताता है कि 'रिजीम चेंज' का शोर अब सिर्फ़ टीवी बहस नहीं, संघ के मंच से मिली वैचारिक मंज़ूरी है। जब मतदाता सूची की सफ़ाई ख़ुद एक संगठन की पुरानी मांग हो, तो आयोग की निष्पक्षता पर उठे सवाल और गहरे हो जाते हैं। भागवत ने विरोध की जो शर्तें गिनायीं, आंदोलन उन पर खरा उतरता है: संविधान के भीतर, शांतिपूर्ण, मक़सद साफ़। असली इम्तिहान यह है कि सत्ता ख़ुद इन पैमानों को मानती है या नहीं।
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प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में इतिहास के शोधार्थी अधिप अमीन ने न्यूज़लेटर डिस्पैचेज़ फ़्रॉम अनदर वर्ल्ड में भारत और फ़्रांस के आंदोलनों को साथ रखकर पढ़ा है। भारत वाले हिस्से में वे कॉकरोच जनता पार्टी का सफ़र शुरू से गिनाते हैं और उसकी ताक़त के साथ उसकी हद भी बताते हैं।
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सागरिका घोष वैसे तो ख़ुद एक विपक्षी दल की सांसद हैं, पर उनके सवाल किसी दल के नहीं, हर मतदाता के हैं। घुसपैठ के नाम पर करोड़ों नाम कटें और घुसपैठियों की गिनती कभी सामने न आये, तो शक होना स्वाभाविक है। बंगाल में 93 फ़ीसदी अपीलों में नाम बहाल होना बताता है कि ग़लती अपवाद नहीं, ढर्रा थी। जिनकी अपील अभी सुनी ही नहीं गयी, उनका वोट किसके भरोसे है?
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वोट चोरी के ख़िलाफ़ आंदोलन इसी सवाल पर खड़ा है कि वोटर लिस्ट से किसके नाम कटे और क्यों। ऐसे में रिपोर्टर को सड़क से उठाना सीधे सूचना पर ताला लगाना है। जो देखा ही नहीं जाएगा, उसका हिसाब भी नहीं मांगा जा सकेगा। पामेला फ़िलिपोज़ की शिकायत बड़े चैनलों और उनके चेहरों से है, पर सवाल हर न्यूज़रूम से है। जिस दिन किसी महिला पत्रकार पर उल्टा मुक़दमा दर्ज होता है, उस दिन चुप्पी भी एक पक्ष चुनना है।
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सोहिनी सेनगुप्ता का यह लेख याद दिलाता है कि वोट का हक़ और सड़क पर बेख़ौफ़ चलने का हक़ अलग-अलग नहीं हैं। जिस तंत्र में मतदाता सूची से नाम कटने पर सवाल पूछना जुर्म बन जाए, उसी में औरत का रात को घर में बैठे रहना भी असुरक्षित हो जाता है।
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दुनिया के नब्बे फ़ीसदी से ज़्यादा लोग मांस खाते हैं। भारत का शुद्ध शाकाहारी अल्पसंख्यक वही है, जिसने इतिहास में छुआछूत भी चलायी। देवदत्त पटनायक कहते हैं कि यह संयोग नहीं है।
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दुर्गा पूजा में बंगाल के वामपंथी बुक स्टॉलों पर हुई कार्रवाई और हमलों के बहाने सबरंग इंडिया पूछता है कि सार्वजनिक जगह पर विचार रखने का हक़ किसकी मर्ज़ी पर टिका है।
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पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक समाचार कंपनी का फ़ेसबुक पेज बहाल करने का आदेश दिया और कहा कि बिना कारण बताये ब्लॉक करना प्राकृतिक न्याय के ख़िलाफ़ है।
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