लेसन्स फ्रॉम जोहराम ममदानी..
न्यूयॉर्क की ठंडी हवा में एक आम अमेरिकन खड़ा है। सामान्य वस्त्रभूषा, खिला हुआ दोस्ताना मुखमंडल। कंधे पर बैग, हाथ मे चोंगा माइक.. 34 साल के जोहरान की शुरआत ऐसे ही हुई।
उसकी बातें- मकानों का किराया कैसे कम हो, मेट्रो कैसे दौड़े, पुलिस कैसे इंसाफ़ करे। गरीबो, बूढों, कामगारों की सामाजिक सुरक्षा कैसे मजबूत हो।
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उसकी पहचान उछाली जाती है- मुस्लिम है, इमिग्रेंट है, उसकी पत्नी सीरियाई है। खुद गुजराती है, जो युगांडा में जन्मा, 8 साल की उम्र में न्यूयार्क आया।
उसे आतंकवादी, रेडिकल, वामपन्थी कहा गया। खुद राष्ट्रपति ने जहर उगला। रिपोर्टरों ने उस पर फिलिस्तीन का प्रश्न फेंका।जोहरान ने इंसानी हक़ की ज़ुबान में जवाब दिया।
मंच पर मुट्ठी भांज “अल्लाहु अकबर” नहीं कहा।
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असम में तरुण गोगोई की सरकार है। अचानक चाय बागानों के बीच बदरुद्दीन अजमल खड़े होते हैं। टोपी सिर पर, मुस्लिम वेशभूषा, माइक थामे कहते हैं-
"मुस्लिम मुख्यमंत्री चाहिए"
तमाम मस्जिदों में दुआएँ, वोटों की अपील। अजमल का दल सिर्फ मुस्लिम क्षेत्रो में उतरता है। 2011 में 18 विधायक जीतते हैं। लगता है, अब आवाज़ बुलंद होगी।
कि तभी हेमंता बिस्वाशर्मा चीखते है- घुसपैठिए, हिंदू खतरे में, मुसलमानो की सरकार। अब हिंदू एकजुट होते हैं। बीजेपी सत्ता में है। NRC, और तमाम वे फैसले जो मुसलमानो को तंग करें, और हिन्दुओ को परपीड़ा का सुख दें।
पहचान और धर्म की राजनीति से अजमल की छोटी जीत पाई। लेकिन बड़ा खेल पलट दिया। आगे अजमल हारते हैं- रिकार्ड दस लाख वोटों से।
अपने समाज के हित को स्थाई डेमेज देकर।
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चारमीनार से कुछ दूर, असदुद्दीन ओवैसी खड़े हैं। सूट बूट, दाढ़ी तराशी हुई। संविधान और रोजगार की भाषा, लेकिन छोटा भाई 5 मिनट पुलिस हटा लेने की चुनौती देता है।
ओवैसी मुस्लिम इलाक़ों में लड़ते हैं। इसके बाहर वे “जय भीम, जय मीम” कहते हैं। तो हैदराबाद में जीत जाते हैं, लेकिन बाहर सन्नाटा है।
कभी बिहार महाराष्ट्र में कुछ मिला, तो फिर हाथ से निकल गया। इस बीच वे काम उनका बना गए, जो जमकर मुसलमानो के अहित की राजनीति करते हैं।
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न्यूयॉर्क में मुसलमान 3% हैं। असम में 34, हैदराबाद में 50% के करीब। पर आँकड़े बेमानी हैं। ज़ोहरान जीतते हैं, अजमल हारते हैं। ओवैसी मझधार में हैं।
ज़ोहरान को यहूदी, हिस्पैनिक, ब्लैक वोट मिला। वो खुद को डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट कहते हैं। वे हाउसिंग पर बोले, स्कूल पर बोले।
इस्लामोफोबिया और “ला इलाहा इल्लल्लाह” का मंत्र फूंका होता, तो फॉक्स न्यूज़ हेडलाइन बनाती, वोटर भाग जाता।
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ज़ोहरान ने जो किया, वो सबसे मुश्किल नहीं था। मस्जिद गए, नमाज़ पढ़ी, लेकिन कैंपेन में नमाज़ नहीं दिखाई। इस्लाम पहचान था, जिससे वे पीछे नही हटे।
पर इस्लाम, मुसलमान उनका एजेंडा नहीं थे। वे प्रोग्रेसिव यहूदियों से गले मिले। सबके हक की बात की। उनकी हंसी जबसे घातक हथियार थी। उनकी पार्टी DSA थी—आर्थिक न्याय की।
यहाँ अजमल ने गुस्सा बेचा। उनक जमीयत उल उलेमा ए हिन्द ने असम के मुस्लिमो का बेड़ा गर्क कर दिया।
ओवैसी सेकुलरिज्म की जबान बोलते हैं। लेकिन उनकी पार्टी का नाम ही “मजलिस- ए- इत्तेहादुल मुस्लिमीन” है।
उनका एजेंडा, मुसलमान की पहचान है।
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दुनिया जीतने के लिए, पहले अपनी दीवारें तोड़नी होती हैं। कभी नेहरू ने मुस्लिन कॉन्फ्रेंस का नाम बदलकर नेशनल कांफ्रेंस रखने सुझाव दिया। शेख अब्दुल्ला ने माना।
आज वह सेक्युलर पहचान की दल है। तमाम हिन्दूओ ने उसे 1935 से आज तक पाला है। दरअसल लोकतंत्र में बहुसंख्यक को डर बेचने की छूट है। लेकिन अल्पसंख्यक को स्वीकार्यता के लिए हमेशा प्यार बेचना पड़ता है।
इंसानियत का बड़ा दायरा लेना पड़ता है।
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लेकिन मेरी पोस्ट अजमल या ओवैसी के लिए नही। उन प्रतिभावान मुस्लिम युवाओं के लिए है जो राजनीतिक आकांक्षा रखते हैं। देश की 20 करोड़ आबादी में हजारों जोहरान है।
इस देश को उनकी जरूरत है।
लेकिन अलग दल, ठेठ धार्मिक पहचान, बाहुबल की राह उन्हें थोड़ी दूर ही ले जाएगी। उनकी उतनी सी यात्रा ही पूरे अल्पसंख्यक समाज के लिए घातक होगी।
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सार्वजनिक जीवन मे उतरने के पहले उन्हें याद रखना चाहिए। दुनिया जीतने के लिए पहले अपनी दीवार तोड़िये। आप अगर अल्पसंख्यक हैं, तो ज़ोहरान ही बनना पड़ेगा।
अफसोस, बहुसंख्यक को मोदी बनने की इजाज़त है।
जैसलमेर बस दुखांतिका हादसे में मौत का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है। हादसे के 4 दिन बाद आज महिपाल सिंह ने जोधपुर में इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। महिपाल सिंह वही युवक है जो जलती बस से निकलने के बाद लोगों से मदद की गुहार लगा रहा था। आखिरकार इलाज के दौरान महिपाल जिंदगी की जंग हार गया और मौतों का आंकड़ा बढ़कर 24 पर पहुंच गया।
जानकारी के मुताबिक महिपाल एयरफोर्स का एग्जाम देने जैसलमेर गया था। 13 अक्टूबर को उसके पिता नगसिंह उसे परीक्षा सेंटर पर छोड़ने गए थे और अगले दिन आने को कहा था। एग्जाम के बाद महिपाल अपने रिश्तेदार के यहां रुक गया था।
रामदेवरा के एका का रहने वाला महिपाल सिंह 14 अक्टूबर को अपने घर जाने के लिए बस में बैठा था। उसने बस में बैठते ही परिजनों को कॉल कर कहा कि "मुझे लेने मत आना। मैं बस में बैठ गया हूं।" थोड़ी देर बाद ही बस में आग लग गई।
इस हादसे में महिपाल सिंह करीब 35% झुलस गया था। डॉक्टर्स ने उसकी हालत क्रिटिकल बताई थी। सांस की नली में धुआं जाने से वह बोल नहीं पा रहा था। इशारों में ही बात कर रहा था। लेकिन, आज महिपाल जिंदगी की जंग हार गया।
"दिवंगत आत्माओं को ईश्वर अपने श्री चरणों में स्थान दें और परिजनों को दुख सहने की शक्ति दें।"
We were truly energized and motivated by the visit of our senior, now a member of our Congress family, to our JNU Admission assistance Helpdesk.
His words of appreciation mean a lot to us. This support boosts our commitment to students and our shared cause.
A heartfelt thanks
गृह मंत्री जी,
जिस ऑपरेशन के बारे में कर्नल सोफिया क़ुरैशी ने पूरी दुनिया को ब्रीफिंग दी, जिस घरती पर खड़े होकर आप मुसलमानों के खिलाफ़ नफ़रत भरी बातें कर रहे हैं उसी बंगाल के बेटे पैरा 6 के कमांडो झंटू अली शेख ने जान क़ुर्बान कर दी अभी उसकी कब्र की मिट्टी भी नहीं सूखी है, इसी ऑपरेशन के दौरान बिहार के छपरा के बेटे BSF इंस्पेक्टर मोहम्मद इम्तियाज़ ने जान दे जी, जिस ऑपरेशन के बारे में पूरी दुनिया के सामने भारत का पक्ष रखने के लिये भेजे गये प्रतिनिधिमंडल में दर्जन भर मुस्लिम सदस्य शामिल हैं, आप महज़ चुनावी वोट हासिल करने के लिये कह रहे हैं देश का मुसलमान ऑपरेशन सिंदूर के विरोध से ख़ुश होगा।
आपका ये बयान बेहद शर्मनाक है, आपको देश के मुसलमानों के ख़िलाफ़ इस तरह की भाषा इस्तेमाल करने के लिये देश से माफ़ी मॉंगनी चाहिये।