बाड़मेर के जसदेव धाम आगोर पर अतिक्रमण हटाने के दौरान प्रशासन ने जिस प्रकार महिलाओं को घसीटा और जबरदस्ती की, उसकी जितनी निंदा की जाए उतनी कम है। कानून का पालन कराना प्रशासन का कर्तव्य है, लेकिन अमानवीय व्यवहार कहां तक उचित है?
मेरी मुख्यमंत्री @BhajanlalBjp से मांग है कि मामले की निष्पक्ष जांच हो और दोषी अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की जावे।
#बाड़मेर_आदिवासियों_को_न्याय_दो @rpbreakingnews@1stIndiaNews@zeerajasthan_@News18Rajasthan
प्रधानमंत्री की जान जितनी कीमती है, उतनी ही एक दलित व्यक्ति की भी है। संविधान ने सभी को समान जीवन और सुरक्षा का अधिकार दिया है। फर्क सिर्फ इतना है कि सत्ता अब भी यह समानता महसूस नहीं करती।
यह वीडियो बांग्लादेश का नहीं है, बल्कि राजस्थान के जोधपुर का है। जेलु गाँव में एक गरीब भील आदिवासी परिवार का घर जलाया गया और उनकी जमीन हड़पने की कोशिश की गई। अगर भजनलाल शर्मा से राजस्थान की शासन व्यवस्था संभल नहीं रही है, तो उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए।
आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में पुलिस तंत्र अमानवीय और भ्रष्ट हो चुका है। वर्तमान सरकार में कुछ पुलिस अधिकारी नेताओं और उच्च अधिकारियों के श्रेय में मुगलों और अंग्रेजों से भी अधिक क्रूर व भ्रष्ट नीति अपना रहे हैं।
मुख्यमंत्री @BhajanlalBjp, @PoliceRajasthan और @IgpUdaipur से अनुरोध है कि आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में मानवता, नैतिकता और ईमानदार पुलिसिंग संस्कार अभियान चलाया जावे।
1913 में मानगढ़ पर गोविंद गुरु के नेतृत्व में हजारों भील आदिवासियों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बलिदान दिया था।
आज उसी बलिदान को वर्तमान राज्य सरकार ने कक्षा 4 की अंग्रेजी पुस्तक से हटाकर शहीदों के सम्मान के साथ साथ आदिवासी अस्मिता पर भी गम्भीर आघात किया है। यही सरकार कुछ समय पहले ही भील वीरांगना कालीबाई का इतिहास भी पाठ्यक्रम से हटा चुकी है।
जब से भाजपा सरकार में आई है तब से आदिवासियों के योगदान को हर जगह कमतर दिखाने का प्रयास करती रही है। आदिवासी अस्मिता को लेकर भाजपा की तुच्छ मानसिकता का यह परिचायक है कि चौथी कक्षा की किताब से मानगढ़ धाम के इतिहास को हटाने का काम किया है।
इससे पहले, शिक्षा की अलख जगाने वाली वीर कालीबाई का पाठ हटा दिया गया था। भाजपा ने ठान लिया है कि वो आदिवासियों का बलिदान, उनकी गाथाएं लोगों की स्मृतियों से हटा कर ही मानेगी। लेकिन आदिवासी समाज का बलिदान इतना कमजोर नहीं है कि उसे किताबों से हटा कर भुलाया जा सके।
भाजपा को आदिवासी समाज से अपने इस कृत्य के लिए माफी मांगनी चाहिए एवं आदिवासी समाज की वीरगाथाओं एवं मानगढ़ धाम के इतिहास को पुनः अविलंब सिलेबस में जोड़ना चाहिए।
कक्षा 4वीं के अंग्रेजी की पुस्तक में पेज संख्या 88 से 96 तक मानगढ़ नरसंहार के बारे में जो पाठ था, उस पाठ को वर्तमान राज्य सरकार ने हटाकर पूरे आदिवासी समुदाय के साथ बहुत बड़ा कुठाराघात किया है।
जब से वर्तमान सरकार बनी, तब से आदिवासी समाज के इतिहास को मिटाने का काम कर रही है। पहले भील वीरांगना काली बाई कलासूआ रास्तपाल कांड के इतिहास को हटाया और अब मानगढ़ के इतिहास को हटा दिया।
मानगढ़ खून से लहुलूहान वह स्थल है, जहां 1913 में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ गोविंद गुरु के नेतृत्व में हजारों भील आदिवासी शहीद हुए थे। आज बीजेपी सरकार में बैठे लोगों ने मानगढ़ इतिहास को पाठयक्रम से हटा कर शहीदों के साथ घोर अपमान किया है।
राजस्थान के जालौर के रानीवाड़ा ब्लॉक में एक स्कूल जाने की उम्र का बच्चा, जो मानसिक बीमारी से पीड़ित है, पिता ने मजबूरी में झंझीरों से बाँधा। गरीब परिवार के पास न इलाज है, न अस्पताल की सुविधा, न कोई सहारा। क्या यही राजस्थान की स्वास्थ्य व्यवस्था है?
हम मांग करते हैं:
1️⃣ बच्चे का तुरंत इलाज हो।
2️⃣ गाँव-गाँव में मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ पहुँचें।
3️⃣ गरीब परिवारों के लिए मुफ्त इलाज और पुनर्वास केंद्र खोले जाएँ।
सरकार @NhmRJOfficial@MeRajGovt जवाब दें—क्यों मानसिक बीमारियों का इलाज गरीबों और अनुसूचित क्षेत्रों तक नहीं पहुँचता? यह दर्द केवल एक परिवार का नहीं, पूरे समाज का है।
सरकारी अस्पतालों की सुविधाएं इसलिए भी बेहतर नहीं की जा रही हैं कि ,
चुनावी चन्दा देने वाले प्राइवेट हॉस्पिटल के मालिकों का अस्पताल वाला धंधा न चौपट हो जाए ।
आज भारत में आदिवासी समाज गंभीर खतरे में है। वे लोग जो इस भूमि के सबसे पुराने वाशिंदे हैं, जिन्होंने हजारों वर्षों से प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जिया, आज उसी धरती पर हाशिए पर धकेले जा रहे हैं। यही लोग इस देश के असली निर्माता हैं, जिन्होंने बिना किसी दिखावे के राष्ट्र की नींव को मजबूती दी। वे हमारे जंगलों, नदियों और पहाड़ों के रक्षक हैं, धरती के सुरक्षा कवच हैं। उनकी सांस्कृतिक विरासत ही भारत की असली आत्मा है। लेकिन आज उनकी जमीनें छीनी जा रही हैं, आवाज़ें दबाई जा रही हैं और अस्तित्व मिटाया जा रहा है। अब वक्त है कि हम उनके अधिकारों की रक्षा करें और उन्हें वह सम्मान दें जिसके वे सच्चे हकदार हैं।
8 दिन के बच्चे को सांस की दिक्कत थी,और सिस्टम खुद वेंटिलेटर पर है।बारिश में बच्चे को स्ट्रेचर पर ऐसे ढोया गया,जैसे अस्पताल नहीं मंडी हो।
सरकारी हेल्थकेयर ऐसा है,जहां छत से ज़्यादा भाषण की फुहारें मिलती हैं। नेता बोले AIIMS लाएंगे , पहले छत तो लगवा लो, फिर रोबोट का सपना देख लेना।
उदयपुर में बच्चा जिंदा बच गया पर सिस्टम फिर से मुंह छिपा के सो गया।
धीरू जब कहीं दरबार लगाता है तो उसके पास में मेला लगता है। मेले में खिलौने होते हैं। साथ आये बच्चे मेले से 10 रुपए वाले चश्मे की जिद्द करते हैं। लेकिन गरीब भक्त अपने बच्चे को चश्मा नहीं दिलाता, बल्कि इच्छापूर्ति के लिए चढ़ावा देता है ताकि धीरू गुची पहन सके।
श्रद्धा को नमन 🙏
कल्पना कीजिए कि आपके घर में किसी को अचानक रात में पेट दर्द हो जाये। आप इमरजेंसी में ज़िला सदर अस्पताल में ले कर मरीज़ को जाते हैं जहाँ पे डॉक्टर उसे तुरंत किसी बड़े मेडिकल कॉलेज में रेफेर कर देते हैं।
एंबुलेंस से तुरंत आप वहाँ से निकलते हैं। चूँकि आपको पता है कि मेडिकल कॉलेज में पता नहीं कितनी भीड़ होगी इसलिए आप एंबुलेंस से किसी निजी अस्पताल में उतरते हैं।
और अस्पताल में मरीज़ जैसे ही बेड पर लेटा, अभी कुछ इलाज शुरू भी नहीं हुआ है, डॉ ने देखा भी नहीं और आपका बिल हो गया 20,000 रुपए।
मार्केटिंग के नाम पर कमीशन के खेल ने तथा सरकारी अस्पताल के कर्मियों / डॉक्टरों , एंबुलेंस और निजी अस्पताल के गठजोड़ ने यही स्तिथि बना कर रखी है।
और इतनी भयावह स्थिति के बावजूद कोई इसके विरोध में कुछ लिखना तो छोड़िए, बात नहीं करना चाहता।
मध्यप्रदेश के बैगा आदिवासियों के साथ जो अन्याय हो रहा है, वह केवल ज़मीन की लूट नहीं, बल्कि मानवता पर हमला है। जिनके पास टूटी झोपड़ी, मिट्टी का चूल्हा और दो वक्त की रोटी के भी लाले हैं, उनके नाम पर भू-माफिया 200 एकड़, कहीं 500 एकड़ और कहीं रिसॉर्ट प्लानिंग तक कर रहे हैं।
बीजेपी सरकार की नीतियां ही इस शोषण को बढ़ावा दे रही हैं। सरकार बहुराष्ट्रीय कंपनियों, खनन माफियाओं और पूंजीपतियों के इशारों पर नाच रही है। आदिवासियों को उनके ही जल, जंगल, ज़मीन से बेदखल किया जा रहा है।
जो आदिवासी आज भी मजदूरी कर अपना पेट पाल रहे हैं, सरकार ने उनके नाम पर फर्जी दस्तावेज़ बनाकर जमीनें हड़प लीं। सवाल ये है कि इस पूरे लूटतंत्र के पीछे कौन है? सरकार क्या सो रही थी?
बीजेपी का "सबका साथ, सबका विकास" का नारा इस लूट के सामने मज़ाक बन चुका है। गरीबों के हिस्से में झोपड़ी और पूंजीपतियों के हिस्से में रिसॉर्ट, खनन और अरबों की जमीन।
यह सीधा आदिवासी अधिकारों पर हमला है। भाजपा सरकार को जवाब देना होगा कि किसके संरक्षण में यह भूमि लूट का खेल चल रहा है?
"यह सरकार नहीं, मुनाफाखोरों की दलाली कर रही है।"
@narendramodi@jualoram@DrMohanYadav51@rashtrapatibhvn
टाई लगाना और कोट पेंट पहनना तो आदमी LBSNAA में भी सीख जाएगा ,
लेकिन इंटरव्यू में सिर्फ टाई पर इतना न्यूएंसली फोकस और उसके आधार पर सामने वाले के व्यक्तित्व और इंटेलीजेंस को मापना मूर्खता है,
UPSC की परीक्षा में देश विभिन्न कोनों से लोग आते हैं, तमाम भेद होने के अलावा जो सबसे बड़ा भेद है वो है अमीरी और गरीबी ,
जो व्यक्ति अच्छे घर से आता है , स्वाभाविक है कि उसकी शिक्षा प्राइवेट स्कूल से और किसी अच्छे कॉलेज से हुई होगी , उसका एक्सपोजर गरीब छात्र से हर क्षेत्र में बेहतर होगा , उसका फैशन सेंस ,कॉन्फिडेंस लेवल ,बोल्डनेस भी बेहतर होंगी, लेकिन ये सब एट्रीब्यूटस तो ट्रेनिंग के दौरान भी बेहतर किए जा सकते हैं?
फिर इंटरव्यू को व्यक्तित्व और इंटेलीजेंस को प्राथमिकता में न रखकर लोगों के फिजिकल अपीयरेंस पर जोर और नंबर क्यों दिए जा रहे हैं ? साफ प्रेस की हुई कोट और टाई तो इंटरव्यू में सिर्फ एक छोटी सी फॉर्मेलिटी होनी चाहिए लेकिन उसके आधार पर आप उसकी मेहनत का आंकलन कैसे कर सकते हैं?
अगर ऐसे मूर्ख पैनलिस्ट वहां बैठ कर टाई और पतलून देखकर देश की ऑल इंडिया सर्विस में कौन जाएगा कौन नहीं का निर्णय कर रहे हैं तो इस परीक्षा के मूल भावना का ही कोई मतलब नहीं रह जाता ,
आज इस परीक्षा में सिर्फ अंग्रेजी , आईआईटियन और JNU के लोगों का बोलबाला है , आर्ट्स ह्यूमैनिटीज और नॉर्मल डिग्री कॉलेज बैकग्राउंड से आने वाले लोगों को कभी CSAT डस लेता है तो कभी सांप सीधी वाला 99 नंबर वाला इंटरव्यू रूपी सांप काट लेता है।
देश के अभिनेता गुटखा और शराब के ब्रांड बेचने में व्यस्त हैं ,
खिलाड़ी मैदान से ज़्यादा सट्टेबाज़ी के एप्स में चमक रहे हैं ,
नेता भाषणों में विकास के सपने और हकीकत में अपना व्यापार चमका रहे हैं ,
अफसरशाही रिश्वत और कमीशन की लय में थिरक रही है ,
नकल माफिया , भू-माफिया , खनन माफिया—सब राष्ट्र निर्माण में जी-जान से जुटे हैं ,
धर्म रक्षक सड़क पर आतंक फैला कर धर्म की सेवा कर रहे हैं ,
पुलिस सोशल मीडिया पोस्ट पकड़ने रील बनाने में व्यस्त है , अपराधी खुलेआम जश्न मना रहे हैं ,
मीडिया TRP की बोली में बिक कर सत्ता की गोद में बैठी है ,
बाबा लोग चैनलों पर ज्ञान और बाजार में प्रोडक्ट बेच रहे हैं ,
बेरोजगार युवा रोज़ नौकरी के बदले मोटिवेशनल स्पीच सुन रहे हैं ,
और आम आदमी बस टैक्स भरने , वोट देने और पेट भरने की जद्दोजहद में उलझा है।
फिर भी हम अमेरिका और चीन को पीछे छोड़ने का सपना आँखों में सजाए बैठे हैं...
क्योंकि विकास तो हो रहा है , बस दिखाई नहीं देता !
प्रश्न : लोकतंत्र क्या होता है.?
उत्तर :
लोकतंत्र वो व्यवस्था है जिसमें चुनाव आम आदमी के वोट से होता है ,
लेकिन जीतने के बाद ध्यान सिर्फ़ खास लोगों पर दिया जाता है।
जहाँ सरकार कोई भी बने—
👉 आम आदमी की दिक्कतें जस की तस रहती हैं ।
👉 मगर नेता के बंगले का साइज़ और गाड़ी की लंबाई हर कार्यकाल में बढ़ जाती है।
👉 अस्पताल में दवा मिले या न मिले, लेकिन हर चौराहे पर किसी नेता की मूर्ति जरूर मिलती है।
👉 रोजगार भले ही मिल न पाए, पर हर नए प्रोजेक्ट का नाम महान नेता जी के नाम पर होता है।
👉 गरीब का राशन अटकता है , पर मंत्री जी के बेटे की विदेश में पढ़ाई कभी नहीं रुकती।
👉 जनता लाइन में लगती है सब्सिडी के लिए , और नेता छुट्टी मनाने जाता है विदेश।
👉 आंदोलन करने पर आम जनता को लाठी मिलती है , और घोटाला करने पर नेताओं को जमानत।
और फिर हर 5 साल बाद ,
वो ही जनता जिसे सब कुछ भूल जाना होता है ,
फिर से लाइन में लगती है… लोकतंत्र बचाने के लिए।
इसी को आसान भाषा में लोकतंत्र कहते हैं — वोट जनता के नाम पर , सत्ता अपने नाम पर।