Have you ever wondered why people follow Jyotish/Astrology? Is jyotish a truth, or is it some kind of belief system?
I have explored the topic. Please read.
From Calculation to Consolation: The Logic Behind Phalit Jyotish and How We Turn Math Into Meaning
1. When Logic Feels Like Magic:
Mathematics is often perceived as the epitome of rationality and precision, yet to many, it carries an almost mystical allure. No matter where you are in the world, 2 + 2 always equals 4. Its rules are unwavering and dependable.
In a world rife with uncertainty and emotional turmoil, this consistency acts like an anchor, providing a sense of stability. For centuries, humans have turned to mathematics and patterns to find meaning. From astrology to numerology, we have extended the realm of logic into the domain of symbolism—using numbers and planetary positions not merely for calculations but for weaving narratives.
In moments of emotional need, we project our inner experiences onto the structured framework of mathematics, deriving personal meaning from its order. This essay delves into this psychological process, with a focus on Phalit Jyotish (predictive astrology), exploring how we transform precise calculations into comforting stories that address our deepest human needs.
किसी भी ऐसे आंदोलन के पीछे एक पूरा अर्थतंत्र काम कर रहा होता है। पैसे का ट्रांसफर, खाने-पीने की व्यवस्था, टेंट, आने-जाने, रहने-ठहरने और तरह-तरह के खर्चे, यह सब कोई न कोई संगठित तरीके से फंड कर रहा होता है। उसके साथ-साथ लोगों को भड़काने, एकत्रित करने और लगातार सक्रिय बनाए रखने के लिए मैसेजिंग का भी पूरा नेटवर्क चलता है।
पिछले दस बड़े ऐसे एपिसोड उठाकर देख लीजिए, आप पाएँगे कि इन सब चीज़ों को समय रहते प्रीएम्प्ट करने में बीजेपी सरकार लगभग पूर्णतः असफल रही है। और यह असफलता कोई एक-दो बार की नहीं, बल्कि लगातार दिखाई देती है।
The answer, I think, lies in Modi's personality, and that personality has been shaped primarily by the experiences of his political life.
For nearly twelve years, following the 2002 Gujarat riots, he faced sustained criticism and campaigns against him across large sections of the media, academia, activist networks, literature, the arts, and various intellectual forums, both in India and internationally. They literally bayed for his blood.
My reading is that this period left a deep psychological imprint on him. It likely reinforced the belief that even a single major mistake, especially one involving the use of state force against civilians, could be amplified into a global political and media crisis beyond his control. Once such an ecosystem became activated, he may have concluded that it would pursue him relentlessly, just as he believed had happened before.
That, in my view, explains a great deal about his governing style. Whenever protests become highly organized, particularly when they are backed by influential left-liberal networks, he appears far more reluctant than many of his supporters expect to authorize a forceful response. It is not merely hesitation.
At times, he seems willing to absorb significant political costs, prolonged disruption, and even place extraordinary burdens on the state's own uniformed personnel rather than risk an escalation that could trigger another large-scale domestic and international backlash.
Whether that assessment is correct or not, it offers a more plausible explanation of his conduct than simply assuming indecisiveness or weakness. His restraint appears to be rooted in political memory and psychological experience rather than in a lack of state capacity.
देखिए, मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं में पेपर लीक और भ्रष्टाचार की समस्या के पीछे कई कारण हैं। सबसे पहला कारण इंजीनियरिंग और मेडिसिन, दोनों क्षेत्रों की प्रोत्साहन संरचना (incentive structure) में बहुत बड़ा अंतर है।
मेडिसिन ऐसा पेशा है जहाँ अधिकांश वरिष्ठ डॉक्टर निजी प्रैक्टिस करते हैं। उनका अपना क्लिनिक, नर्सिंग होम या अस्पताल होता है। उस पूरी व्यवस्था को आगे भी परिवार में ही चलाना होता है, इसलिए स्वाभाविक रूप से वे चाहते हैं कि उनका बेटा या बेटी भी डॉक्टर बने। उनके पास पर्याप्त आर्थिक संसाधन भी होते हैं। परिणाम यह होता है कि लगभग हर ज़िले में कुछ ऐसे अत्यंत संपन्न परिवार मिल जाएँगे जिनके लिए करोड़ों रुपये खर्च कर देना भी बड़ी बात नहीं है, यदि उससे उनके बच्चे का मेडिकल कॉलेज में प्रवेश सुनिश्चित हो जाए।
यही कारण है कि मेडिकल सीटें हमेशा से अत्यधिक sought-after रही हैं। पहले तो इस पेशे में आर्थिक समृद्धि थी ही, साथ ही सामाजिक प्रतिष्ठा भी असाधारण थी। यदि कोई व्यक्ति MBBS डॉक्टर होता था, तो किसी भी ज़िले के सबसे प्रतिष्ठित लोगों में उसकी गिनती होती थी। इसलिए धन, सामाजिक प्रभाव और राजनीतिक पहुँच, तीनों का दबाव मेडिकल शिक्षा पर लगातार बना रहा। समय के साथ यह पूरा क्षेत्र ऐसे प्रभावशाली और संपन्न लोगों के हितों से गहराई से जुड़ता चला गया।
IIT की स्थिति इससे काफ़ी अलग है। पहला अंतर यह है कि IIT में प्रवेश लेने के बाद भी नौकरी अपने-आप सुनिश्चित नहीं होती। दूसरा, IIT Advanced का स्वरूप मूलतः गणित, भौतिकी और रसायन विज्ञान की गहरी समझ पर आधारित है। यह परीक्षा अपेक्षाकृत अधिक meritocratic है और इसकी पूरी शैक्षणिक संरचना देश के सबसे प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थानों के शिक्षकों और अकादमिक तंत्र द्वारा संचालित होती है। जब लोग IIT की प्रतिष्ठा की बात करते हैं, तो वास्तव में उसका आधार IIT Advanced ही होता है।
इसके विपरीत, मेडिकल शिक्षा की संस्थागत संरचना लंबे समय से अनेक प्रकार के बाहरी प्रभावों के प्रति अधिक संवेदनशील रही है। अस्पतालों के प्रबंधन से लेकर विभिन्न मेडिकल निकायों, मान्यता देने वाली संस्थाओं और पेशेवर संगठनों तक, भ्रष्टाचार और प्रभावशाली नेटवर्क की शिकायतें लंबे समय से सुनाई देती रही हैं। इस समस्या का एक कारण यह भी रहा कि सरकारों ने दशकों तक इस पूरे क्षेत्र में संस्थागत सुधार को प्राथमिकता नहीं दी। कई मामलों में स्वयं सरकारी तंत्र के लोग भी इसी व्यवस्था का हिस्सा बनते रहे। इसलिए यह कोई नई समस्या नहीं है, बल्कि दशकों से चली आ रही एक संस्थागत विरासत (legacy issue) है।
अगर पुराने State PMT परीक्षाओं को याद करें, तो वहाँ की स्थिति कई बार और भी अधिक गंभीर होती थी। उन परीक्षाओं में किस स्तर तक समझौते, प्रभाव और अनियमितताएँ होती थीं, यह उन लोगों को अच्छी तरह पता है जो उस व्यवस्था को क़रीब से जानते थे। केवल इतना अंतर था कि उस समय राष्ट्रीय स्तर पर मीडिया का ध्यान और सोशल मीडिया की निगरानी आज जैसी नहीं थी। इसलिए वे घटनाएँ उतनी व्यापक चर्चा का विषय नहीं बन पाती थीं, जितनी आज बनती हैं।
इन सभी कारकों का सम्मिलित प्रभाव एक ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण कर रहा है, जिसे किसी एक कारण से नहीं समझा जा सकता।
इसीलिए Gen Z को समझने के लिए केवल उसके व्यवहार को देखना पर्याप्त नहीं है। यह समझना ज़रूरी है कि उसका निर्माण किन सांस्कृतिक, तकनीकी और सामाजिक कारकों से हुआ है। जब तक हम उसके निर्माण की प्रक्रिया को नहीं समझेंगे, तब तक उसके व्यवहार का सही विश्लेषण भी नहीं कर पाएँगे।
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Gen Z आख़िर ऐसे क्यों हैं? (एक विश्लेषण)
Gen Z की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक यही है कि यह पहली ऐसी पीढ़ी है जिसका पालन-पोषण लगभग पूरी तरह इंटरनेट युग में हुआ है। इसका सोशलाइज़ेशन मुख्यतः डिजिटल माध्यमों से हुआ है, न कि उन भौतिक अनुभवों, सामाजिक प्रशिक्षणों और वास्तविक मानवीय संपर्कों के माध्यम से जिनसे पहले की पीढ़ियाँ गुज़रती थीं।
दरअसल, Gen Z के लिए सोशलाइज़ेशन की परिभाषा ही बदल गई है। पहले सामाजिक स्वीकृति परिवार, मित्रों, पड़ोस, विद्यालय, कार्यस्थल और वास्तविक सामाजिक संबंधों से मिलती थी।
आज उसके स्थान पर इंस्टाग्राम, यूट्यूब और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर अजनबियों से मिलने वाला validation आ गया है। यह एक विचित्र विरोधाभास पैदा करता है। एक ओर बार-बार यह कहा जाता है कि "हमें दुनिया की परवाह नहीं", लेकिन दूसरी ओर लाइक्स, फॉलोअर्स, रीट्वीट्स, व्यूज़ और डिजिटल प्रशंसा की लगभग असीम भूख दिखाई देती है।
पहनावा, फैशन, जीवनशैली और यहाँ तक कि दैनिक व्यवहार भी इस डिजिटल स्वीकृति को प्राप्त करने का माध्यम बनते जा रहे हैं।
महिलाओं के व्यक्तित्व-निर्माण में भी कुछ अलग प्रकार की नई प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं। विशेषकर सोशल मीडिया और पॉप कल्चर के प्रभाव में जो स्त्रीवादी अभिव्यक्ति उभरती है, वह कई बार अत्यधिक प्रतिक्रियात्मक और over the top प्रतीत होती है।
अनेक महिला कॉमेडियन और महिला इन्फ्लुएंसर्स की सामग्री का बड़ा हिस्सा बार-बार उन्हीं विषयों के इर्द-गिर्द घूमता दिखाई देता है जिन्हें कभी सामाजिक वर्जना माना जाता था, जैसे यौनिकता, शरीर, जननांग, पीरियड्स और उनसे जुड़ी सांस्कृतिक निषिद्धताएँ। कई बार उनकी अभिव्यक्ति का बड़ा हिस्सा इन्हीं विषयों तक सीमित होकर रह जाता है। यह भी एक नई सांस्कृतिक प्रवृत्ति और व्यक्तित्व-प्रक्षेपण का निर्माण कर रहा है।
यहीं सबसे बड़ा विरोधाभास भी दिखाई देता है। एक ओर स्त्रीवाद महिलाओं के सम्मान, गरिमा और सशक्तिकरण की बात करता है, वहीं दूसरी ओर Gen Z की लोकप्रिय भाषा गाली-गलौज से इस हद तक भर चुकी है कि उसकी अधिकांश गालियाँ प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से स्त्रियों के विरुद्ध यौन हिंसा, अपमान या बलात्कार की कल्पना पर आधारित होती हैं। फिर भी यही भाषा पूरी सहजता से स्वीकार कर ली जाती है। विरोधाभास दिखाई ही नहीं देता।
यह कोई अचानक पैदा हुई स्थिति नहीं है। पॉप कल्चर पिछले कई दशकों से इसी प्रकार की भाषा, हास्य और सांस्कृतिक संवेदनशीलता का प्रशिक्षण देता आया है। इसलिए आज जो दिखाई दे रहा है, वह किसी एक पीढ़ी की समस्या नहीं, बल्कि एक लंबे सांस्कृतिक विकासक्रम का परिणाम है।
पिछले कई दशकों में सांस्कृतिक और बौद्धिक क्षेत्रों में जिन विचारधाराओं का प्रभाव रहा, उन्होंने सार्वजनिक संवाद, कला, मनोरंजन और सामाजिक प्रतिष्ठा के मानकों को भी गहराई से प्रभावित किया। आज जो नई डिजिटल संस्कृति दिखाई देती है, वह केवल उन्हीं प्रवृत्तियों का विस्तार नहीं है; उसमें इंटरनेट, एल्गोरिद्म-आधारित सोशल मीडिया, त्वरित संतुष्टि, आभासी पहचान और वास्तविक सामाजिक संपर्कों के क्षरण जैसे नए तत्व भी जुड़ गए हैं।
वामपंथियों के प्रोटेस्ट आख़िर कैसे बड़े होते हैं?
The organizational capability of the deep state and the broader left-liberal ecosystem is enormous. They can mobilize dozens of different factions of society in a coordinated way, creating a tremendous amount of pressure and disruption for any government.
Just look at this protest. At a minimum, you can identify fifteen to twenty different groups and interest blocs which are, in one way or another, perpetually at odds with the BJP, the RSS, and more broadly, with what they see as traditional India. These groups naturally converge whenever there is a major protest against this government. They become the usual suspects and the natural allies of almost every anti-government mobilization.
The situation is very different on the right. It is not that right-wing issues lack public resonance. In fact, many of them enjoy substantial support among ordinary people. The problem is organizational capacity. The right lacks the nationwide and global ecosystem needed to simultaneously mobilize diverse support groups, intellectual networks, media narratives, civil society organizations, and institutional infrastructure in the way the left-liberal ecosystem can.
Whatever organizational resources the right does possess are concentrated largely within the formal political establishment itself. That is a significant limitation because a political party, by its very nature, has electoral compulsions, institutional constraints, and the burden of governance. As a result, the broader intellectual, social, and organizational ecosystem outside electoral politics remains comparatively underdeveloped. In many areas, the right-wing political establishment itself is also compromised or hesitant when it comes to consistently taking up broader civilizational, institutional, or even straightforward questions of justice and equality.
https://t.co/RjPB0XQNmg
आज के समय में आप अधिकांश युवा लड़कियों को देखेंगे कि मेकअप अपने-आप में एक तरह का रिचुअल बन चुका है। तरह-तरह के प्रोडक्ट्स इस्तेमाल करना, अलग-अलग स्किनकेयर रूटीन और मेकअप रूटीन फॉलो करना, यह अब उनके रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिस पुरुषवादी सत्ता के ख़िलाफ़ संघर्ष की बात की जाती है, उसी पुरुष की नज़रों में आकर्षक दिखने के लिए अपने जीवन का अच्छा-खासा समय, पैसा और मानसिक ऊर्जा भी खर्च की जाती है। इसलिए सज-धजकर सार्वजनिक जगहों पर जाना कोई नई या असामान्य बात नहीं है।
ये जो आप देख रहे हैं कि चौदह-पंद्रह-सोलह साल की मेमने जैसी लड़कियां जिस तरह की गालियाँ दे रही हैं, जिस तरह की अभद्रता और मूर्खता का परिचय दे रही हैं, यह एकाएक नहीं हुआ है। इसके पीछे कम-से-कम पिछले पंद्रह-बीस साल की सांस्कृतिक ट्रेनिंग काम कर रही है।
ज़रा पिछले पंद्रह साल उठाकर देखिए। इन बच्चों का सांस्कृतिक पालन-पोषण किन लोगों ने किया है? कैरीमिनाटी, भुवन बाम, स्टैंड-अप कॉमेडी, रोस्टिंग कल्चर, डिस रैप, इंस्टाग्राम और उसके तथाकथित इन्फ्लुएंसर्स, जिनकी पूरी भाषा आउटरेज, रोस्टिंग, अहंवाद और गाली-गलौज से भरी पड़ी है। धीरे-धीरे यही इनके लिए सामान्य भाषा बन गई और यही इनके आदर्श भी बन गए।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि बहुत-से लोग अपने आपको फेमिनिस्ट भी कहते हैं। लेकिन ज़रा उनकी गालियों को ध्यान से देखिए। उनमें से अधिकांश गालियाँ प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से स्त्रियों के अपमान, यौन हिंसा या बलात्कार की धमकियों पर ही आधारित होती हैं। इस विरोधाभास पर शायद ही कभी कोई गंभीर चर्चा होती है।
लेकिन असली प्रश्न यह नहीं है कि ये बच्चे ऐसा क्यों बोल रहे हैं। असली प्रश्न यह है कि वे ऐसे बने कैसे? पिछले पंद्रह-बीस वर्षों से जिन लोगों को उन्होंने अपना आदर्श माना, जिनसे उन्होंने भाषा, हास्य, व्यवहार और दुनिया को देखने का तरीका सीखा, उन्हें जाकर देखिए। तब समझ में आएगा कि आज जो दिखाई दे रहा है, वह अचानक पैदा नहीं हुआ है; वह एक लंबे सांस्कृतिक प्रशिक्षण का परिणाम है।
सिर्फ अजीत अंजुम की बात नहीं है। एक सुजाता हैं, मैंने उन्हें भी देखा कि वे भी ऐसी बच्चियों को इसी तरह भड़का रही थीं।
देखिए, मेरा मानना है कि वामपंथी राजनीति का एक बहुत पुराना तरीका रहा है। जेएनयू जैसे परिसरों में भी अक्सर यह आरोप लगाया जाता रहा है कि छात्रों, विशेषकर लड़कियों, को उनके परिवारों से वैचारिक और भावनात्मक रूप से दूर करने की कोशिश की जाती है। इस सोच के पीछे यह धारणा होती है कि जब व्यक्ति अपने पारिवारिक ढाँचे से कट जाता है, तो वह वैचारिक संगठनों पर अधिक निर्भर हो जाता है और उसे आंदोलन या तथाकथित क्रांति के लिए संगठित करना आसान हो जाता है।
मेरे अनुसार, ऐसे लोगों का एक बड़ा समूह तैयार करना, जिनके पीछे परिवार जैसा मज़बूत भावनात्मक आधार न हो, किसी भी कट्टर वैचारिक आंदोलन के लिए सुविधाजनक होता है। ऐसे लोगों को पैदल सिपाहियों की तरह इस्तेमाल करना अपेक्षाकृत आसान हो जाता है और इसी आधार पर तथाकथित क्रांति के सपने देखे जाते हैं।
इसीलिए पारिवारिक मूल्यों को लगातार नकारात्मक रूप में प्रस्तुत करना, परिवार संस्था को पिछड़ा, दमनकारी या अप्रासंगिक बताना, और जहाँ तक संभव हो परिवार के भीतर के संबंधों को कमज़ोर करना, मेरे विचार से ऐसी कई विचारधाराओं का एक मानक modus operandi रहा है, जिनका अंतिम उद्देश्य किसी-न-किसी रूप में सत्ता और समाज पर वैचारिक नियंत्रण स्थापित करना होता है। क्योंकि जब परिवार जैसी स्वतंत्र सामाजिक संस्था कमज़ोर होती है, तब व्यक्ति अपने भावनात्मक, नैतिक और सामाजिक सहारे के लिए राज्य, वैचारिक संगठनों या अन्य केंद्रीकृत संरचनाओं पर अधिक निर्भर हो जाता है।
मेरा यह भी मानना है कि केवल कुछ वामपंथी धाराएँ ही नहीं, बल्कि आधुनिक वैश्विक वैचारिक और तकनीकी अभिजात वर्ग के कुछ हिस्सों में भी परिवार संस्था को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। उनके लिए परिवार एक ऐसी स्वतंत्र सामाजिक इकाई है, जो व्यक्ति को राज्य, बाज़ार या किसी वैचारिक संगठन के पूर्ण नियंत्रण में जाने से रोकती है। इसलिए परिवार जैसी संस्थाओं को कमज़ोर करने की प्रवृत्ति मुझे बार-बार दिखाई देती है।
इस देश में इतनी बौद्धिक संपदा की कमी नहीं है कि क्या किया जाना चाहिए, यह किसी को पता न हो। ऐसे बहुत लोग हैं जिन्हें समस्याएँ भी समझ में आती हैं और उनके समाधान भी पता हैं। समस्या यह नहीं है कि क्या किया जाए और क्या न किया जाए। समस्या यह है कि जिनके पास करने का अधिकार है, क्या वे समझते भी हैं, क्या वे करना भी चाहते हैं, और क्या उनकी प्रवृत्ति वास्तव में वह सब करने की है?
आप पाएँगे कि राजनीति में मूलतः शक्ति-संचयन वाले लोग हैं। उनका मुख्य उद्देश्य शक्ति कैसे प्राप्त करनी है, उसे कैसे बनाए रखना है और उसका उपभोग कैसे करना है, यही रहता है। समस्याओं को गहराई से समझना और उनका स्थायी समाधान निकालना उनकी प्राथमिकता बहुत कम होती है।
अंधापन (भाजपा का) ही बुनता है भविष्य का जाल।
किसी भी समाज में मनुष्य कैसा बनेगा, वह किन बातों पर क्रोधित होगा, किन बातों से आक्रोशित होगा, किन बातों पर बेचैन होगा और किन परिस्थितियों में हिंसक हो जाएगा, यह सब आकस्मिक नहीं होता। इसका निर्माण उसकी शिक्षा, उसके प्रशिक्षण, उसके सामाजिक नैरेटिव और उसके आत्मबोध से होता है। वह स्वयं को कौन मानता है, नागरिक के रूप में राज्य को कैसे देखता है, सत्ता की भूमिका क्या समझता है, और शासन को किस दृष्टि से परखता है, यही बातें उसके चरित्र का निर्माण करती हैं।
दक्षिणपंथ के बौद्धिक वर्ग के अनेक लोग पिछले पंद्रह-बीस वर्षों से इन विषयों पर लगातार लिखते और बोलते रहे हैं। उन्होंने बार-बार चेताया कि यदि समाज के सांस्कृतिक और बौद्धिक आधार की उपेक्षा की जाएगी, तो उसके गंभीर परिणाम सामने आएँगे। दुर्भाग्य से, भारतीय जनता पार्टी के राजनीतिक नेतृत्व ने इन बातों को लगभग कभी गंभीरता से नहीं लिया। इसलिए मुझे उसके प्रति कोई विशेष भावनात्मक सहानुभूति नहीं है। सहानुभूति वहीं होती है जहाँ अपने विचारों की प्रतिध्वनि दिखाई दे। यदि मैं आज भी इस पक्ष के साथ खड़ा दिखाई देता हूँ, तो उसका मुख्य कारण केवल यह है कि दूसरा पक्ष मुझे अधिक दुराग्रही, अधिक हिंसक और अधिक विनाशकारी प्रतीत होता है।
समाज में जो परिवर्तन आज दिखाई दे रहे हैं, वे अचानक नहीं आए हैं। युवाओं के बीच गाली-गलौज, अशिष्ट भाषा और आक्रामक व्यवहार का जो सामान्यीकरण हुआ है, वह एक लंबे सांस्कृतिक परिवर्तन का परिणाम है। कैरी मिनाटी, भुवन बाम और उसके बाद इंटरनेट पर उभरी अनेक प्रवृत्तियाँ केवल व्यक्तिगत सफलता की कहानियाँ नहीं थीं; वे समाज की बदलती सांस्कृतिक दिशा के संकेत भी थीं। उस समय न समाज ने इस पर गंभीर चर्चा की, न सरकारों ने इसे कोई महत्त्वपूर्ण प्रश्न माना। जबकि धीरे-धीरे एक ऐसी पीढ़ी तैयार हो रही थी जो बिना पर्याप्त समझ के तीखे मत बना लेती है, जल्दी निर्णय करती है और गहराई से सोचने की क्षमता खोती जा रही है।
शिक्षा व्यवस्था की समस्याओं पर वर्षों तक लोग लिखते-बोलते रहे, परंतु प्रशासन ने शायद ही कभी उसे राष्ट्र-निर्माण का केंद्रीय विषय माना। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं, बल्कि बेहतर मनुष्य का निर्माण भी होना चाहिए था। इस दिशा में जो सुधार अपेक्षित थे, वे नहीं हुए।
इंटरनेट और सोशल मीडिया के विस्तार के बाद भी सरकारों का ध्यान मुख्यतः तकनीकी और प्रशासनिक पक्षों तक सीमित रहा। समाज, संस्कृति और सभ्यता के दीर्घकालिक प्रश्न उनकी प्राथमिकता में शायद ही कभी रहे। सामान्यतः राजनीति अपने सीमित लक्ष्यों के इर्द-गिर्द संचालित होती है। हमारे यहाँ भी राजनीति का बड़ा हिस्सा सत्ता, संसाधनों और आर्थिक नियंत्रण के इर्द-गिर्द घूमता है। इसलिए अधिकांश नेता सांस्कृतिक या बौद्धिक प्रश्नों में न तो विशेष रुचि लेते हैं और न ही उन्हें समझने का धैर्य रखते हैं।
विशेष रूप से भाजपा के नेतृत्व को देखें तो बड़ी संख्या में ऐसे लोग दिखाई देते हैं जो किसी गहरी बौद्धिक परंपरा से नहीं आए हैं। वे सड़क की सांस्कृतिक ऊर्जा को राजनीतिक शक्ति में बदलने में दक्ष हैं, परंतु शासन को उच्च सांस्कृतिक और बौद्धिक मूल्यों पर खड़ा करने की दृष्टि अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है। शासन केवल चुनाव जीतने, विरोधियों को नियंत्रित करने और सत्ता बनाए रखने तक सीमित नहीं होना चाहिए। उसे समाज की गुणवत्ता बढ़ाने का भी माध्यम होना चाहिए।
आज हमारे सामने इंस्टाग्राम की पीढ़ी है। उसके लिए गाली-गलौज, अशिष्टता, सनसनी, अश्लीलता और हर विषय को तमाशा बना देना सामान्य बात होती जा रही है। यह केवल नैतिक प्रश्न नहीं है; यह बौद्धिक विकास के संकट का भी संकेत है। यदि ध्यान से देखें तो पढ़ने की आदत घट रही है, भाषाओं का स्तर गिर रहा है। बहुत से बच्चे सामान्य, शुद्ध हिंदी भी सहजता से नहीं समझ पाते। अंग्रेज़ी की स्थिति भी बहुत अलग नहीं है। गहरी समझ के स्थान पर पॉप कल्चर उनका मुख्य संदर्भ बन गया है।
उनके आदर्श वे लोग हैं जिनके सोशल मीडिया पर करोड़ों फ़ॉलोअर हैं। सफलता का अर्थ लाइक्स, व्यूज़, वायरल होना और लगातार सनसनी पैदा करना रह गया है। मानव-मन की नकारात्मक और तमाशाई प्रवृत्तियों को भुनाकर लोकप्रियता अर्जित करना एक सामान्य मॉडल बन चुका है। ऐसे वातावरण में गंभीर अध्ययन, चरित्र-निर्माण और बौद्धिक अनुशासन स्वाभाविक रूप से पीछे छूट जाते हैं।
इस स्थिति को बदलने के लिए केवल भाषण पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए दीर्घकालिक निवेश, गंभीर चिंतन, शिक्षा में सुधार और संस्कृति के प्रति वास्तविक प्रतिबद्धता चाहिए। दुर्भाग्यवश, इन प्रश्नों पर भाजपा व्यापक रूप से असफल रही है। कई बार तो ऐसा लगता है कि ये प्रश्न उसकी राजनीतिक चेतना में प्रवेश ही नहीं करते। और यदि कुछ लोग इन विषयों पर बोलते भी हैं, तो वह प्रायः औपचारिक या प्रतीकात्मक स्तर पर ही रह जाता है। केवल शोर मचाने या चिंता व्यक्त कर देने से समस्या का समाधान नहीं होता। उसके लिए आत्मबोध, गहरी समझ और निरंतर श्रम की आवश्यकता होती है।
यही कारण है कि मुझे भाजपा के राजनीतिक नेतृत्व से विशेष सहानुभूति नहीं होती। उन्होंने न कभी इन प्रश्नों को गंभीरता से सुना, न उन लोगों को महत्त्व दिया जो वर्षों से इन विषयों पर चेतावनी देते रहे। हम अपने स्तर पर देश और समाज के हित की बात करते रहेंगे, क्योंकि हमारा दायित्व राजनीति से बड़ा है। लेकिन राजनीति और बौद्धिक जीवन दो अलग-अलग क्षेत्र हैं।
आज का दक्षिणपंथ भी मूलतः दो भागों में विभाजित दिखाई देता है। एक ओर उसका बौद्धिक वर्ग है, जो समाज, संस्कृति, शिक्षा और सभ्यता के प्रश्नों पर गंभीर चिंतन करता है। दूसरी ओर उसका राजनीतिक वर्ग है, जिसकी प्राथमिकताएँ अलग हैं। वर्तमान समय में इन दोनों के बीच की दूरी पहले की तुलना में कहीं अधिक बढ़ चुकी है।
इसी कारण पहले जिस स्तर का वैचारिक समर्थन भाजपा और आरएसएस को दक्षिणपंथ के बौद्धिक वर्ग से प्राप्त होता था, वह धीरे-धीरे कम हुआ है। उसकी जगह अब एक प्रकार की निराशा और उदासी ने ले ली है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि राजनीतिक नेतृत्व को इस परिवर्तन का शायद आभास भी नहीं है। सत्ता कभी-कभी इतनी आत्ममुग्ध हो जाती है कि उसे अपने ही वैचारिक आधार के क्षरण का पता नहीं चलता।
ऐसी स्थिति में समर्थन का प्रश्न भी सीमित हो जाता है। यदि समर्थन बचता है, तो उसका कारण केवल यह रह जाता है कि दूसरा पक्ष अधिक आक्रामक, अधिक हिंसक और अधिक विनाशकारी दिखाई देता है। पर यह सकारात्मक समर्थन नहीं, बल्कि एक नकारात्मक विकल्प है। किसी स्वस्थ लोकतंत्र या सुदृढ़ समाज की नींव इस प्रकार की विवशता पर नहीं रखी जा सकती।