बाटी में घी ज़्यादा परोस देते हैं...मेहमान जो थाली पर बैठे तो मनवार करके एक बाटी और खिला ही देते है ☺️ आइए कुछ दिन तो गुज़ारिये हमारे राजस्थान में 🙏 #padharomahredesh
मन बंजर है आज उन ख्यालों से
कल बुलबुला के खिलते थे
जो उन्हीं रास्तों मिलते थे वो
आज हम ही यहाँ हमारे पैरों तले हैं
उन्ही जाने माने राहगीरों के साथ
उन्ही चंद फकीरों के साथ
गैंर हम भी हैं वो भी हैं
उनका हमारा आज कोई ठिकाना नही (3/3)
वो कल हमारी साख के कायल थे
आज हमारी राख पर चलते हैं
इन्ही भूले हुए रास्तों पर
जिन्हें हम आज बिन देखे टहलते हैं
अनदेखे अनसुने अंधियारों में
ना जाने पहचाने उजियारों में
डूब गये हैं आज हम
अपनी ही बनाई दीवारों में, कतारों में... (2/3)
उन उदास गलियों में
सफर करते करते
इधर देखा उधर देखा
पर पहचाना कुछ भी नही
बचपन के बाद जीवन
बीता तो यहीं था
फिर यहाँ अनजान रास्तों
के सिवा आज कुछ जाना नही
जिंदगी गुज़ार ली हमने
इन रास्तों पर दौड़ते दौड़ते
पर आज किसी ने हमें
और हमने किसी को पहचाना नही.. (1/3)
“इस दिन के पीछे कई दिन झोले में पड़े होंगे
इस दिन के आगे ढेरों दिनों की सीढ़ियाँ उतरती-चढ़ती दिखेंगी।
पर ये दोपहर, न झोले में पड़ी मिलेगी,
न ही चढ़ती-उतरती सीढ़ियों में ही कहीं टकराएगी।
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मेरी माँ ..
जिन्होंने मेरे शिशु काल में हमेशा खटिया का गीला हिस्सा अपनाया
खाना खिलाने के लिए हमेशा बाबा को बुलाया,
मुझे गुल्लक भरना सिखाया
जब हताश हुईं तो आंखों में आंसू भरकर डराया
मेहमान के जाने के बाद रुपए छीनना जिनका अधिकार है या कर्तव्य मैं आजतक न समझ पाया
आज उनका दिन है ।
रेगिस्तान में हम धूप से चमकती हुई रेत को पानी समझ के दौड़ते हैं,भुलावा खाते हैं,तड़पते हैं।
कुछ सयाने कहते हैं रेत है और वे उस रेत को पानी समझने की गलती नहीं करते।
पर मैं कहती हूँ जो लोग रेत को पानी समझने की गलती नहीं करते,उनकी प्यास में ज़रूर कोई कसर होगी !
#अमृताप्रीतम ❤️