मैंने 10 फरवरी 2020 को देश की संसद में भी स्पष्ट रूप से कहा था कि आरक्षण किसी को दी हुई खैरात नहीं, बल्कि एक संवैधानिक अधिकार है।
मेरी और मेरी पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) की सोच बिल्कुल स्पष्ट है—आरक्षण को समाप्त करने की बात तो दूर, आरक्षण की समीक्षा भी हमें कभी स्वीकार्य नहीं है।
सामाजिक न्याय और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए हमारी प्रतिबद्धता अटूट है।
"आरक्षण" ऐसा विषय है जो कभी खत्म होना सम्भव नही है। सुब्रह्मण्यम स्वामी ने सासंद रहते हुए कहा भी था कि;
"हम आरक्षण को खत्म नही कर सकते है। हाँ, इसे उस स्तर पर ले जा सकते ही जँहा इसका होना या न होना बराबर है"
इसलिए;
1.आरक्षण खत्म नही होगा। यह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य भी जानते है क्योंकि उनकी तीनो की कुल आबादी 8% से 10% के बीच है। उनके बस का नही है आरक्षण खत्म करवा सके। मात्र एक अफवाह की मोदी सरकार सँविधान परिवर्तित कर रही है उससे 65 शीट घट गई। आरक्षण विरोध पर भाजपा 20 शीट से 30 शीट पर आ जायेगी, या अपने पुराने दिन अथार्त 2 शीट पर। इसलिए भाजपा के बस का नही है।
2.लेकिन राज्यो ने वाकई एससी आरक्षण को निष्प्रभावी कर दिया है । उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश का मेडिकल का कितना बड़ा विबाद चल रहा है। राज्य सरकार कोई ठोस जवाब नही दे रही है। इसके अलावा स्कॉलरशिप सही समय पर नही आ रही है। काफी बता रहे है कि सामान्य की स्कॉलरशिप 5 माह पहले ही आ गयी।।एससी एमबीबीएस छात्रो की अभी तक नही आई।
इसके अलावा अधिकतर नौकरी संविदा व ठेके , आउटसोर्सिंग पर चल रही है। जँहा आरक्षण नही है।। काफी सेक्टर में आरक्षण इतना निष्प्रभावित कर दिया है जिसका आम एससी को पता नही चलता है। हम डेटा संग्रह, पुराने डेटा से तुलना, अवलोकन, रिसर्च करके इन सभी पर नजर रखते है। आवाज उठाते है। लेकिन इस चक्कर मे बैंक बैलेंस व जेब हल्की हो जाती हैं। पिछले 3 महीनों में कम से कम 20 ऐसे विषयो पर नजर पड़ी जिसमे एससी को भारी नुकसान हुआ है। लेकिन अकेले हर विषय पर अभियान चलाना अकेले के बस का नही है।
3.ऐसे विषयो को Pay back to Society के माध्यम से अभियान चलाने में लोगो से सहयोग करने के लिए बार बार कहने पर अजीब सा व्यक्तिगत बुरा लगने लगा है,क्योंकि 20 में से 2 का रिस्पॉन्स आता है। कभी कभी विचार आता है, छोड़ो, जब मेरी आर्थिक स्तिथि अच्छी है तब काहे इसमे समय दे, औरों की तरह इंजॉय करे क्योंकि बाकी अन्य जिसे विषय बताया जाए कि फलाना छीन रहा है। अभियान चलाते हैं सम्मलित नही होना चाहते तो आर्थिक रूप।से पुश करे। लेकिन दूसरा ऐसा सोचता है कि यह बताने वाले अथार्त हमारा काम है। इसलिये एक समय बाद हम भी थक जाएंगे। इसी प्रकार सैकड़ो थककर घर आराम कर रहे है।। इसलिए आरक्षण हटाओ अभियान की जरूरत नही है। एससी एसटी एक दिन स्वयं इसे बिलकुल निष्प्रभावी करवा ही देगा।
4.आरएसएस की इच्छा आरक्षण खत्म करने की है। लेकिन उसे भी पता है कि 8% से 10% वाले समाज के बस का नही है।
5.सबसे मुख्य बात की;
आरक्षण की वजह से हिन्दू धर्म बचा हुआ है।।
क्योंकि एससी/एसटी/ओबीसी में धीरे धीरे हिस्सा ईसाई बनने के लिए तैयार बैठा है। आरक्षण उन्हें करने से रोक देता है। एससी को हिन्दू कहने की शुरुआत ही 1910 के बाद शुरू हुई। क्योंकि उस समय लग गया था कि देश से अंग्रेज भागने वाले है, इसलिए अपनी अपनी जनसँख्या ज्यादा दिखाने के लिए हिन्दू व मुस्लिम में हौड मची थी। इसलिए ब्राह्मण धर्म ने जँहा शिकागो सम्मलेन 1891 में हिन्दू धर्म की जगह "ब्राह्मण धर्म" के नाम से हिस्सा लिया, वंही एससी/एसटी को मुस्लिम आकर्षित न कर ले, अपना "ब्राह्मण धर्म" नाम छोड़कर "हिन्दू धर्म" कहलवाना पड़ा।
6.महत्वपूर्ण बात यह है कि;
"बाबा साहब ने आरक्षण कभी माँगा ही नही। उन्होंने मुस्लिम, सिख, ईसाई को मिल रहे अलग निर्वाचन मण्डल व्यवस्था में एससी को शामिल करने की माँग करी थी क्योंकि एससी अवर्ण जातिया थी। ब्राह्मण धर्म से सम्बंधित नही रही।।उनका स्टेटस मुस्लिम, सिख, ईसाई की तरह स्वतंत्र था। जो स्वीकार कर ली गयी। लेकिन इसके खिलाफ गांधी धरने पर मरने की हालत तक बैठ गए। हमसे वो छीन गया। जो अगर नही छिनता तो आज हमारी स्तिथी बेहतर होती"
7.लेकिन प्रयास जारी रहें। बाबा साहब जब सँघर्ष कर रहे थे और जब उन्हें उनके अनुयायिओं ने बताया कि पास के गांव के एससी इस्लाम अपना रहे है तब बाबा साहब ने सार्वजनिक घोषणा करी की में "बौद्ध विचारधारा" अपनाऊंगा। जिसे 20 साल बाद उन्होंने अपनाया भी। इस वजह से इस्लाम का प्रभाव एससी बस्तियो के बाहर ही रुक गया। एक तरह से ;
" हिन्दुओ को बाबा साहब का एहसानमन्द होना चाहिए। नही तो अभी तक मुस्लिम 14% से 40% या ज्यादा दिखते"
8.वर्तमान में ईसाई एससी बस्तियो में घुसने की कोशिस कर रहा है। लेकिन "आरक्षण" की वजह से पिछले 20 सालों से नाकाम हो रहा है। क्योंकि ईसाई बनते ही आरक्षण खत्म। इसलिए लोगो का आकर्षण उस तरह नही है। बल्कि जो बन गए है, उनके घर अगर लोकल प्रशासन जाति प्रमाणपत्र "रद्द" क्यो न किया जाए का नोटिस भेज देंगे तो वो भी भागकर वापस आएंगे।
इसलिए आरएसएस को तो ज्यादा जोर शोर से आरक्षण की वकालत करनी चाहिए। बाकी;
विकास कुमार जाटव
ब्रिटिशकालीन भारत में अंग्रेजों ने जमींदारी जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से शासन किया और पहले से सामाजिक एवं राजनीतिक प्रभुत्व रखने वाले वर्गों को अपने शासन में सहयोगी बनाया। इसके परिणामस्वरूप धन, धरती और राजपाट पर कुछ विशेष वर्गों का वर्चस्व और मजबूत हुआ। 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ, लेकिन आजादी के बाद भी धन, धरती और सत्ता-संसाधनों पर समाज के एक बड़े वर्ग का वर्चस्व बना रहा और भूमि तथा संसाधनों का न्यायपूर्ण बंटवारा नहीं हो सका।
इसी असमानता को कम करने के उद्देश्य से स्वतंत्र भारत में भूमि सुधार लागू किए गए। लेकिन प्रभावी क्रियान्वयन की कमी, कानूनी एवं प्रशासनिक अड़चनों और प्रभावशाली भू-स्वामी वर्गों के प्रतिरोध के कारण भूमि सुधार अपने व्यापक उद्देश्यों को पूरी तरह हासिल नहीं कर सके। भूमि और संसाधनों की असमानता से पैदा हुआ असंतोष आगे चलकर कई उग्र सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों की पृष्ठभूमि बना, जिनमें नक्सल आंदोलन भी शामिल था।
ऐतिहासिक रूप से सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षणिक अवसरों से वंचित समुदायों के प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए संविधान में आरक्षण का प्रावधान किया गया। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को संविधान लागू होने के साथ ही आरक्षण का संवैधानिक प्रावधान मिला। वहीं, अन्य पिछड़ा वर्ग को केंद्र सरकार की नौकरियों और केंद्रीय शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर 1990 के दशक में लागू हुआ।
आरक्षण का संवैधानिक आधार मुख्यतः सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन तथा पर्याप्त प्रतिनिधित्व का अभाव है। इसके बावजूद आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए आर्थिक आधार पर EWS आरक्षण की व्यवस्था की गई। ऐसे में आज आवश्यकता है कि आरक्षण और प्रतिनिधित्व की पूरी व्यवस्था की वास्तविक स्थिति का आंकड़ों के आधार पर मूल्यांकन किया जाए।
हम लंबे समय से सामाजिक-आर्थिक एवं जातिगत जनगणना की मांग कर रहे हैं, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि देश की धन-संपत्ति, जमीन, शिक्षा, रोजगार, प्रशासन, राजनीति, मीडिया और अन्य महत्वपूर्ण संस्थानों में विभिन्न सामाजिक समूहों की कितनी हिस्सेदारी है। जब तक विश्वसनीय और व्यापक आंकड़े सामने नहीं आएंगे, तब तक सामाजिक न्याय और समान हिस्सेदारी की वास्तविक तस्वीर पूरी तरह सामने नहीं आ सकती।
हमारी मांग है कि जिसकी जितनी संख्या है, उसकी उतनी भागीदारी सुनिश्चित की जाए। महिलाओं को उनकी जनसंख्या के अनुपात में स्थानीय निकायों, संसद और विधानमंडलों में प्रभावी प्रतिनिधित्व मिले। OBC समाज को लोकसभा और विधानसभाओं में उचित राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिले। SC, ST और OBC के लिए राज्यसभा तथा विधान परिषदों में भी उचित और प्रभावी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाए।
उच्च न्यायपालिका में प्रतिनिधित्व, पदोन्नति में आरक्षण, सरकारी योजनाओं और बजट में आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी, सरकारी ठेकों और सरकारी खरीद में आरक्षण तथा निजी क्षेत्र में प्रतिनिधित्व की व्यवस्था पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए, ताकि सामाजिक न्याय केवल सरकारी नौकरियों तक सीमित न रहे।
निजी क्षेत्र में हमारे समाज के लोग केवल मजदूरी करने के लिए नहीं हैं। उन्हें प्रबंधन, निर्णय लेने वाली संस्थाओं और नेतृत्व के पदों पर भी उचित हिस्सेदारी मिलनी चाहिए। आर्थिक विकास में भागीदारी तभी सार्थक होगी, जब विकास के साथ निर्णय लेने की शक्ति में भी समान भागीदारी सुनिश्चित हो।
मीडिया लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। इसलिए मीडिया संस्थानों में भी ऐतिहासिक रूप से वंचित समाजों की पर्याप्त भागीदारी और प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाना चाहिए, ताकि समाज के हर वर्ग की आवाज लोकतांत्रिक विमर्श में प्रभावी रूप से सामने आ सके।
यह लड़ाई किसी के अधिकार छीनने की नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से वंचित समाजों को उनके संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकारों के अनुरूप न्यायपूर्ण हिस्सेदारी दिलाने की लड़ाई है। हमारा लक्ष्य है-- धन, धरती, सत्ता और देश के महत्वपूर्ण संस्थानों में न्यायपूर्ण हिस्सेदारी तथा वास्तविक सामाजिक न्याय।
1. दिल्ली के जंतर मंतर पर संविधान में एस.सी., एस.टी. व ओ.बी.सी. समाज को दिये गये आरक्षण के विरुद्ध अभी हाल ही में जमा हुये कुछ लोगों द्वारा आर्थिक आधार पर आरक्षण को लागू करने की उठाई गई यह नई माँग कतई भी उचित व देशहित में नहीं है। उन्हें आरक्षण के सम्बंध में ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिये जिससे समतामूलक समाज, विकसित व सम्मानित देश बनाने के संवैधानिक कार्यों को आघात पहुँचे।
2. वैसे भी देश में सदियों से जातिवाद की अमानवीयता का शिकार रहे एस.सी., एस.टी. व ओबीसी समाज के लोगों हेतु संविधान में की गई आरक्षण की व्यवस्था के बारे में परमपूज्य बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर का यह कहना था कि ’जातिवाद का परित्याग ही सबसे बड़ी देशभक्ति है’। अतः लोग सही देशभक्ति का परिचय ज्यादा दें तो यही उचित होगा।
3. जहाँ तक आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की बात है, तो केन्द्र व राज्य सरकारों द्वारा भी ग़रीबी उन्मूलन के एक नहीं बल्कि अनेकों कार्यक्रमों पर काफी सरकारी धन हर वर्ष ख़र्च किया जाता है, किन्तु उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार आदि के कारण इसका सही लाभ अगर देश के लोगों को नहीं मिलता है तो यह तो सरकारी व्यवस्था का सीधा-सीधा दोष है।
4. इसके अलावा, आर्थिक आधार पर आरक्षण की नई व्यवस्था भी देश में लागू है, जिसका भी सही लाभ अपरकास्ट समाज के ग़रीब परिवारों को नहीं मिल पा रहा है बल्कि इसमें छलावा अधिक है।
5. वास्तव में ख़ासकर यही वह भ्रष्ट व जातिवादी सरकारी व्यवस्था है जिसने आरक्षण के संवैधानिक रचनात्मक प्रावधान को कभी सही से ज़मीन पर लागू ही नहीं होने दिया है, जिस कारण एससी, एसटी व ओबीसी समाज के लोग, आज़ादी के इतने लम्बे अरसे के बाद आज तक भी, ग़रीबी, जातिवादी द्वेष, शोषण, अत्याचार व जातिवाद के ज़हर का दंश हर दिन हर स्तर पर लगातार झेलते रहते हैं।
6. अतः सभी सरकारें भी आरक्षण विरोधी तत्वों को शरण व संरक्षण बिल्कुल भी ना दें तो यह व्यापक देश व जनहित में होगा। लोगों से भी अपील है कि वे आरक्षण जैसे अहम् एवं संवेदनशील मुद्दे पर सस्ती राजनीति ना करें और ना ही होने दें।
7. हालाँकि उसी ही दिन पार्लियामेन्ट थाना के बाहर एक पीड़ित व्यक्ति के मामले में एफआईआर दर्ज कराने के लिए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता श्री राहुल गाँधी कई घन्टों तक धरने पर बैठे रहे, जिसका पार्टी को कोई ऐतराज़ नहीं है।
ऽ लेकिन उसके बग़ल में जंतर-मंतर पर दलित व शोषितों के जातीय आधार पर दिये जाने वाले आरक्षण को ख़त्म करवाने के लिए धरना-प्रदर्शन भी चल रहा था, वहाँ पर वे व उनका कोई भी कांग्रेसी साथी उन्हें समझाने तक के लिये भी नहीं गये, जिससे इन वर्गों के प्रति इनकी आरक्षण विरोधी मानसिकता अभी भी साफ झलकती है।
ये बुद्धिस्ट मूर्तियां बसडीला ( देवरिया ) से मिली हैं।
बसडीला है नाम तो टीला होगा ही।मूर्तियां एक टीले से मिली हैं।
देवरिया पास में है तो जहां - जहां देव है, वहां - वहां बुद्ध हैं।
कुछ और भी मूर्तियां मिली हैं। मगर इन तीनों में बुद्ध स्पष्ट दिखाई पड़ रहे हैं।
पंडित सुबह-सुबह अपने घर के आंगन में स्नान कर रहे थे। तभी उनका किशोर बेटा आया और उनके नहाने से बह रहे पानी से एक लोटा जल भरकर उनके सिर पर वापस डाल दिया !
पंडित गुस्से से चिल्लाए- क्या कर रहा है बेवकूफ, ये गंदा पानी मेरे ऊपर क्यों डाल रहा है ?
बेटे ने आध्यात्मिक शांति के साथ जबाब दिया- आपको खुश करने की कोशिश कर रहा हूँ पिताजी ! आप पानी की गंदगी नहीं बस मेरी भावनाओं को देखिए !
पंडित जोर से चीखे- मेरे नहाने से निकला गंदा पानी वापस मेरे ऊपर डाल रहा है और बोल रहा है कि खुश कर रहा हूँ। इससे मैं क्यों खुश होऊंगा मूर्ख ?
बेटा उसी आध्यात्मिक सहजता से बोला- तो शिव की जटाओं से होकर निकली गंगा का जल वापस शिव के ऊपर डलवाने से भोलेनाथ क्यों खुश होंगे पिताजी ? आपकी कथाओं के अनुसार साफ-सुथरी और निर्मल गंगा तो अनवरत उनके सिर पर गिर रही है, तो फिर उनके नीचे से उठाकर गंदा जल वापस काहे उनके ऊपर डलवाते हैं ? ऐसा करने से शिव काहे खुश होंगे और अगर शिव खुश होंगे तो आप खुश काहे नहीं हो रहे ?
पंडित- अरे बेवकूफ ! कथा कहानियां तो मूर्ख और अंधविश्वासी लोगों को धार्मिक आस्था से बांधे रखने अपने पास बुलाने का निमित्त मात्र हैं। किसी भी बहाने से वो लोग हमारी दुकान पर आएंगे, धार्मिक कर्मकांड करवायेंगे, तभी तो हमारा धंधा चलेगा और उससे कमाई होगी। अपना खानदानी बिजनेस नहीं समझता गधा कहीं का ? पंडित के गुस्से में अब समझाने वाले भाव थे।
बेटे ने फिर सवाल किया- जब वो हमारे ग्राहक हैं तो उन्हें पैदल और तकलीफ़ उठाकर दुकान (मंदिर) पर आने को काहे कहते हो ? आराम से आएंगे तो भी तो हमारा बिजनेस चलेगा।
पंडित ने उत्तर दिया- इसकी दो वजह हैं मूर्ख !
पहली वजह यह है कि पैदल चलकर आने से उनके पैसे ट्रैवलिंग में खर्च नहीं होते हैं और वो पैसे हमारे काम आते हैं। इससे गरीब आदमी भी जेब में कुछ न कुछ लेकर ही आता है।
दूसरी वजह ये है कि इन लोगों का तकलीफ़ सहना ही तो धर्म के प्रति इनकी आस्था बढ़ाता है। तू ये बात अभी नहीं समझेगा। तू अभी धर्म शास्त्रों का अध्ययन कर फिर तुझे समझ आयेगा।
पंडित के बेटे को अब कुछ-कुछ समझ आने लगा है !
लेकिन...
इन मूर्ख कांवड़ियों, अंधविश्वासी भक्तों और मानसिक गुलामों को कब समझ आएगी ?
हमको पर्यावरण की रक्षा करनी है तो हमने 'विकास' के नाम पर जो गलत चीजें सीखी है उसको छोड़ कर कुछ पुरानी अच्छी चीजों को वापस लानी होगी। कपड़े की थैली और पानी का मटका पर्यावरण सुरक्षा के दो अच्छे प्रतीक बन सकते हैं।
@Hasmukhpatelips ભાજપ,કોંગ્રેસ અને અન્ય પાર્ટી ના ધારાસભ્યો અને સાંસદો જ્યારે પોતાના બાળકો ને સરકારી શાળા માં ભણાવશે ત્યારેજ સરકારી સ્કૂલો ની સ્થિતિ સારી થશે.