भले ज़ियादा नहीं कम समझ में आते हों
कोई तो हो कि जिसे हम समझ में आते हों
कोई तो हो जो सबब पूछले उदासी का
कोई तो हो कि जिसे ग़म समझ में आते हों
कोई तलाश दे ऐसा कि एक शख़्स जिसे
हमारे शे'र नहीं हम समझ में आते हों
हरिओम शर्मा
जितना सोचता हूँ उस को उतनी खलती रहती है
इक ही बात मेरे ज़ेहन में यूँँ चलती रहती है
इक मैं हूँ कि जिस का दुनिया में बस इक ही यार है
इक वो है जो अपने यार ही बदलती रहती है
भुवन सिंह
कोई तरीक़ा ही नहीं इस को बचाने के लिए
दिल तो बना ही है मियाँ बस चोट खाने के लिए
उम्मीद मत रखना कि अब वादे निभाएगा कोई
हर शख़्स वादे करता है अब तोड़ जाने के लिए
भुवन सिंह
देने को दे सकूँगा फ़क़त अपनी जान मैं
अब देते देते थक चुका हूँ इम्तिहान मैं
रक्खा नहीं है कुछ भी यहाँ पर मेरे लिए
सो जा रहा हूँ छोड़ के अब ये जहान मैं
भुवन सिंह
बेटे को पता था कि
माँ कपड़े की फैक्ट्री में काम करती है
माँ को पता था कि
बेटा दुकान में काम करता है
लेकिन दोनों गाज़ीपुर की सड़कों पर मिले
बेटा मूंगफली बेच रहा था
और माँ पान और सिगरेट बेच रही थी
एक-दूसरे की तकलीफ़ देखकर दोनों रो पड़े
सच्ची घटना
कभी कलेक्टर का ऑफिस क्यों नहीं गिरता?
कभी मंत्री जी का ऑफिस क्यों नहीं गिरता?
गिरना और टूटना सिर्फ स्कूल, अस्पताल पुल और सड़कों को ही क्यों?
संसद गिरने से पहले नई बन जाती है
फिर स्कूल, सड़क, पुल और अस्पताल के गिरने का इंतज़ार क्यों?
अज्ञात