मैं राजीव से बात करना चाहता हूँ..
रात के 3 बजे, मालदीव के राष्ट्रपति ने इसरार की। थके हुए, मगर बेहद कृतज्ञ गयूम का सम्पर्क, सेटेलाइट फोन से राजीव से कराया गया।
राजीव उस रात सोए नही थे। उन्हें इस कॉल का इंतजार था।
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दिल्ली में राजीव से गयूम की मुलाकात तय थी, मगर अपरिहार्य कारणों से उनका दौरा स्थगित हो गया था। इसकी खबर विरोधियों को नही थी।
श्रीलंका में बैठे गयूम के विरोधी अरबपति ने सरकार पलटने की योजना बना रखी थी। लंकाई चीतों से डील सेट थी। गयूम दिल्ली में होते, माले में हमला होता।
भाड़े के लड़ाके, हाईजैक किये शिप से माले उतरे। बहुत से इसके पहले ही, आम वेशभूषा में माले पहुँच गए थे। 4 नवंबर 1988 की रात हमला हुआ।
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छोटा सा शहर- आप एयरपोर्ट, टेलीफोन एक्सचेंज, सेक्रेट्रीटीएट जैसी आधा दर्जन बिल्डिंग कब्जा कर लें, तो सत्ता आपकी हुई। भाड़े के विद्रोही कब्जा कर चुके थे।
लेकिन राष्ट्रपति को भी तो हिरासत में लेना होगा। वे अपने पैलेस में नही थे। हमले की खबर से वे कहीं छिप गए।
और वहीं से अमेरिका से मदद मांगी। मगर डिएगो गार्सिया से मदद आने में कुछ दिन लगते। श्रीलंका और पाकिस्तान से मदद मांगी।
पाकिस्तान ने क्षमता न होने का बहाना किया, श्रीलंका चीतों से उलझना नही चाहता था। तो ब्रिटेन से मदद मांगी। थैचर ने सलाह दी- भारत से मदद मांगो।
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राजीव कलकत्ता में थे, जब खबर आई। रक्षा और विदेश मंत्रालय की संयुक्त बैठक रखी गयी।राजीव सीधे एयरपोर्ट से वहीं पहुचें।
आर्मी, नेवी, एयरफोर्स का एक संयुक्त ऑपरेशन तय किया गया। नाम - ऑपरेशन कैक्टस
कई योजना बनी, बिगड़ी। पैराट्रूपर्स उतारने की बात सोची गयी, मगर माले इतना छोटा की ज्यादातर सैनिक, समुद्र में गिर जाते।
फिर एक डेयरिंग योजना बनी।
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शाम होते होते आगरा से हैवी एयरक्राफ्ट, फौजी, साजोसामान, जीपें लेकर प्लेन माले चला। और सीधे हुलहले एयरपोर्ट पर उतर गया। घुप्प अंधेरे में ये लैंडिंग जानलेवा हो जलती थी।
तुरन्त ही फौजी और जीपें बिखर गए। एयरपोर्ट थोड़ी बहुत सँघर्ष के बाद कब्जे में आ गया। इतने में और विमान उतर गए।
कुछ ही घण्टो में माले में विद्रोहियों की लाशें बिखरी पड़ी थी। खेल खत्म हो गया था।
सेफ हाउस में छिपे गयूम से माले के भारतीय राजदूत मिले। बताया कि विद्रोह कुचल दिया गया है। वे सेफ हैं।
राजीव को मदद की गुहार लगाए महज सोलह घण्टे हुए थे। त्वरित मदद से अभिभूत, थके हुए, मगर बेहद कृतज्ञ गयूम ने राजदूत से कहा - मैं प्रधानमंत्री राजीव से बात करना चाहता हूँ..
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इसके बाद, मालदीव एक स्ट्रेटजिक एसेट के रूप में भारत का ठिकाना बना। हिन्द महासागर में भारत को एक मजबूत ताकत बनाने में, वहां क्रिएट किया गया फौजी ठिकाना, हमे थाह देता रहा। तीन दशक तक ..
जब तक कि घर मे घुसकर मारने की बकैती नेशनल टीवी पर करने वाले,
औरो के बाथरूम में ताक झांक करने वाले..
दूसरो के स्वतंत्रता संग्राम में खुद को सेनानी बताने के शौकीन,
पड़ोसियों नाकाबंदी कर क्षुद्र ब्लैकमेलिंग करने वाले मूर्ख को, हमने राजीव के जूतों में फिट न कर दिया।
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दस साल पहले जिस व्यक्ति के राज्याभिषेक में समारोह में सभी सार्क देशों के नेता, लाइन लगाकर हाथ मिलाने आये थे..
तब मेरे,आपके, हिंदुस्तान की जनता के निर्णय से एक नई आशा भारत में ही नही, पूरे उपमहाद्वीप में फैली थी।
सबको लगा, कुछ बड़ा होने वाला है..
दस बरस बाद, सिर्फ निराशा है। उम्मीदों का बादशाह, बौना जोकर साबित हुआ है।
पदानुकूल बड़प्पन त्यागकर, क्षुद्र हरकतों से, छिछोरे समर्थकों की तालियां हासिल तो हुई। मगर पद , देश का वकार, इसके स्ट्रेटेजिक इंटरेस्ट, इसकी गरिमा का जनाजा निकल गया है।
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हाल यह है कि पाकिस्तान ही नही नेपाल, श्रीलंका, भूटान भी चीन को गोद मे जा बैठे है। ताजा ताजा मालदीव उसमे मिल चुका है। माले से भारतीय बेस खाली करवाया जा चुका है।
और हमारा छबीला राजा, लक्षद्वीप में बैठकर मालदीव को चिढा रहा है। उसके छल्ले लक्षद्वीप को मालदीव से बेहतर टूरिस्ट डेस्टिनेशन बनाने की देशभक्ति बेच रहे हैं।
हद्द है..
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इस दौर में राजीव की रह रह कर याद आती है। वो गरिमा, वो गम्भीरता याद आती है।
काश यह शख्स अगर 10 साल जिया होता। तब दुनिया की हर बड़ी ताकत दिल्ली में फोन लगाकर कहती..
- मैं राजीव से बात करना चाहता हूँ..
❤️
हैलो, मैं पप्पू ..
नहीं, चौकिये मत। कोई तंज नही, कोई तल्खी नही। आपने ये खूबसूरत नाम दिया, मुझे क्या एतराज हो सकता है।
सबकी जिंदगी में कोई पप्पू, राजू, बबलू, गुड्डू, बिल्लू जरूर होता है। जो बेहद करीब होता है। आप उससे खुलकर मिलते हैं, डरते नहीं। मैं वही हूँ..
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भाई, भतीजा, भांजा, दोस्त।
पप्पू, राजू, बबलू, गुड्डू..
जो आपको हंसाते हैं, बतियाते हैं और संभालते हैं। आपकी खुशियों को, और आपके बिखराव को, जब अकेले न सँभल रहा हो।
हाथ थामने को, कंधे दबाने को, कोई अपना तलाश रहे हों, पहली कॉल किसे लगाते है?
पप्पू? गुड्डू? राजू.??
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यकीन कीजिये, जब से होश संभाला है, बस संभालता आया हूँ।
उम्र नही थी, छोटा था.. कोई दस साल का। घर पर दो अंकल के साथ बैडमिंटन खेलता।एक सुबह उन अंकल के हाथ मे रैकेट नही, मशीनगन थी।
मेरी दादी को, मेरे आंगन मे,
दोनों अंकल ने मार डाला।
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हादसों को सम्भालने का सफर तब से शुरू हुआ।अपनों से घाव खाना, सहना, माफ़ कर, मुस्कुराकर आगे बढ़ना, यही सीखा है।
पर तब पिता ने समेटा, सम्भाला।
सफदरजंग रोड के उस घर मे रहना, हर रोज घायल करता। हमने घर बदल लिया। 10 जनपथ। हम प्रधानमंत्री के बच्चे थे, बेहद सुरक्षित। फिर एक दिन पिता लौटे।
सफेद चादर से ढंके।
हम उनका आखिरी चेहरा भी नही देख सके।
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मां टूटी हुई थी। हमने सम्हाला, सम्बल दिया।
हमारा जिंदा रहना मां की सबसे बड़ी प्राथमिकता थी। हम घर मे बन्द रहे, सारी सुविधायें, लेकिन जेल.. !!
कॅरोना में आप कुछ दिन लॉकडाउन में थे। मेरा बचपन ही लॉकडाउन में गुजरा। बाहर निकलने पर आपको डंडों का डर था, हमे गोलियों और बम का।
आप पूछेंगे की भला हमे कोई क्यों मारेगा। तो मां पूछती- दादी या पापा को किसी ने क्यूं मारा?
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हम नही चाहते थे की माँ राजनीति से जुड़े।मां भी नही चाहती थी, की हम राजनीति से जुड़ें। पर इस परिवार में जन्म की कुछ मजबूरियां हैं।
हम पुरखों की विरासत को मिट्टी में मिलते नही देख सकते। विरासत, ये भारत देश है, ..
जो नफरत में उलझा था,
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कांग्रेस कमजोर थी।
और काग्रेस राजीव की विरासत थी। तो मां ने जिम्मेदारी ली। टूटी फूटी कांग्रेस एक फिर सत्ता में आई। मां को थामे रखने मैं भी आया।
राजकुमार की तरह स्वागत हुआ। मोस्ट इलिजबल बैचलर, फ्यूचर पीएम, और जाने क्या क्या कहा आप लोगो ने..
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पांच साल बाद हम फिर जीते। तो मौका था मुझे, मंत्री बनने का, प्रधानमंत्री बनने का।
पर मुझे रुचि न थी।
सत्ता जहर है, और पीने वाले हमारे अपनो की लाशें, हमारे आंगन में हम गिनते रहे हैं।
10 साल बाद हम चुनाव हारे। पहले पहल लगा कि महज एक चुनाव की हार है। पर इस बार कुछ अलग था। सिर्फ सरकार नही बदली थी। यह देश बदला था, बड़ी तेजी से...
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इसका रंग, इसकी तासीर, इसकी दिशा!! राजनीति मे सिर्फ भाषा नही, पूरी व्यवस्था ही बदल गयी।
यह आम राजनीति, सरकारे बनाने की उठापटक नही थी। यह बेहद खतरनाक खेल था।
जो जारी है, जिसका निशाना, लोकतन्त्र है, आजाद जिंदगी है, बराबरी और मोहब्बत का फलसफा है..
तो इसलिए निशाने पर मैं हूँ,
आप भी हैं।
दरअसल वो सब निशाने पर हैैंं, जिनका फलसफा मोहब्बत और बराबरी है।
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मुझसे ज्यादा.. मेरा सरनेम, उनकी राह का रोड़ा है। मेरा होना, जिन्दा... और सामने खड़ा, उनका भय है।
खड़ा रहना, मेरी जिम्मेदारी!!
और यही मेरी ताकत भी।
मानता हूँ मैंने चुनाव हारे। पर एक बड़ी, बेहद बड़ी ताकत के हाथों मेरी हार हो रही है। बार बार हो रही है। मुझे हराने वाली ये ताकत, भाजपा नही है, ये सरकार नही है।
हराने वाली ताकत, जनता है।
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आप हैं, इस देश का युवा है, छात्र, व्यापारी, किसान , कर्मचारी है। जो अपनी भूमिका, कर्म, आदर्श, इतिहास, अपनी खुद की जरूरत और ईश्वर प्रदत्त जिम्मेदारियों से मुंह फेरे बैठा है।
वो हिंदुस्तानी तो नफरत के आगोश मे गांधी, नेहरू, बुध्द, नानक और निजामुद्दीन को नकार चुके है। जिनके दिल मे अल्लाह के बन्दों से निजात पाने का ख्वाब चलता है।
जो "फाइनल सॉल्यूशन" के सपने देखता है। जिसे नफरत और खून की नदी के पार, किसी समृद्ध भारत का नक्शा बेचा गया है।
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समाज के विभाजन और दिलों की टूट पर खेलता, किलकारी भरता, ये बिखरता भारत है।
और मेरी नियति..
बिखरे को सम्भालना है,
हंसना है, दिलासा देना है।
जोड़ना है।
भूलना, माफ करना, मुस्कुराना, हाथ थामना, गले लगाना, बस यही आता है। यही मेरी राजनीति है। आपको यह कमजोरी लगे, तो ठीक है।
आपका फैसला सर माथे..
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पर जब आप नफरत कर कर के थक जाएं, दिल डूबने लगे, तो घबराएं नही।
मैं यही हूँ।
आसपास ही चल रहा हूं, जोड़ रहा हूं।
जब जी करे? आ जाऐं।
या एक काल लगाएं और कहें;
हैलो.. पप्पू !!
❤️
हैप्पी बर्थडे राहुल
@RahulGandhi
इट्स आल अबाउट इकॉनमी, स्टुपिड !!!
क्लिंटन के इलेक्शन कैंपेन की टैगलाइन बनाया था। 15 साल पहले, राजीव इसे करके दिखा चुके थे। यह शख्स जानता था, कि विकास का मतलब, अर्थव्यवस्था है।
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वित्तमंत्री के रूप में एक बार बजट पेश किया राजीव ने- 1987-88 का। और वो देश का अनोखा बजट था - शून्य आधारित बजट।
हार्डवर्क वाले इसे नही जानते, रॉ विज़डम वालो को नही पता, ये एक मैनेजमेंट टूल है, ख़र्चपर नियंत्रण का।
पारंपरिक बजट में, होता ये है, की पिछले साल जो खर्च अनुमत था, इस साल भी सही मान लिया जाता है। बहस कुछ घट बढ़ की होती है।
इसका मतलब की 90 के दशक तक पुलिस वालों को 15 रुपये घोड़ा'चना एलाउंस मिलता है।
पुराने साल की परंपरा पर, अरबों का खर्च निकाल देना, करप्शन, और जवाबदेही से बचने का मार्ग था।जीरो बेस्ड बजट हर खर्च पर सवाल करता है।
इस पर खर्च 0 क्यो नही होना चाहिये? क्या इसकी जरूरत है? जीरो बेस्ड बजटिंग, फेजेस में, अगले 3 साल में पूर्णतया लागू की जानी थी।
यह प्रयास एक विडंबना का शिकार हुआ।
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राजीव पर भ्रस्टाचार का आरोप लगाकर बदनाम करने वाले VP अगले पीएम बने। ईमानदारी के उस कथित पुतले ने, इस प्रक्रिया को किनारे लगा दिया।
राजीव का आर्थिक योगदान उनके बड़े फैन्स भी नहीं जानते। जब राजीव गद्दी पर आए, 4.5% ग्रोथ थी। पंजाब में आतंक, उत्तर पूर्व अशान्त था। चीन-पाकिस्तान इस नए बछड़े को दबा देने के कॉन्फिडेंस में थे।
5 साल बाद पाकिस्तान "ऑपरेशन राजीव" और चीन "ऑपरेशन फाल्कन" के जख्म सहला रहा था । उत्तर पूर्व में शांति थी। सार्क, अखण्ड भारत बन रहा था।
मालदीव और लंका की सरकारे राजीव की अहसानमंद थी।
और इकॉनमी?? भारत के इतिहास में अकेली बार डबल डिजिट ग्रोथ मिली ।
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राजीव का पहला बजट ही नई दिशा में कदम था। 1985 में टैक्स की दरें घटी। लाइसेंस राज के खात्मे और निजी क्षेत्र में स्पर्धा की शुरआत, 1986 के बजट से हुई।
टैक्स स्लैब और राज्यो के बीच टैक्स का अंतर खत्म करने की शुरआत, राजीव गवरनेंट ने की। इसे GST की शुरआत कहिये।
तकनीक, और मशीन आयात आसान हुए।असल मे वे मीनारें जिसके शीर्ष पर मनमोहन और यशवंत और प्रणव बैठे हैं, राजीव उसकी नींव डाल गए थे।
पर एक गलती कर गए।
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1988 में पहली बार, वित्तमंत्री राजीव ने ही कार्पोरेट टैक्स पर निगाह डाली। दरें घटाया, लेकिन टैक्स से बचना कठिन किया। नतीजा दोतरफा आया।
कारपोरेट टैक्स से सरकार की आय बढ़ी। देश आगे बढ़ा। पर छापे भी पड़े। और मुम्बई क्लब के धन्नासेठ जो लाइसेंस राज में मजबूती से सिस्टम में मलाई काट रहे थे दिक्कत में थे।
इनमे एक रामनाथ गोयनका थे।
मीडिया मुगल भी थे।
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उनका अखबार था, इंडियन एक्सप्रेस। गोयनका ग्रुप के वित्तीय सलाहकार एस गुरुमूर्ति ने सरकार की बदनामी का अभियान छेड़ दिया।
सम्पादक सुमन दुबे को यह जर्नलिस्टिक एथिक्स के खिलाफ लगा। उनसे इस्तीफा ले लिया गया। नया सम्पादक आया
अरुण शौरी!!
अब इंडियन एक्सप्रेस में रोज एक स्टोरी होती, भ्रस्टाचार के नए आरोप। कुछ आरोप अमिताभ बच्चन के भाई अजिताभ के विदेशी खातों के थे। अमिताभ, तब राजीव के दोस्त और कांग्रेस सांसद थे, तो यह राजीव पर अप्रत्यक्ष हमला था।
वित्तमंत्री और फिर रक्षामंत्री रहे वीपी भी तमाम कानाफूसी उपलब्ध कराते रहे।जर्मन पनडुब्बी की खरीद या स्वीडन से तोप की खरीद .. कैबिनेट के अंदर से अफवाहों को हवा दी जा रही थी।
ये आरोप, आने वाले वक्त में कभी भी किसी कोर्ट या जांच में साबित नही हुए।
पर वीपी सहित राजीव के कुछ साथी दगा देकर, खिलाफ खड़े हो गए। अफवाहों के अप्रूवर बन गए ।
सड़क से सन्सद तक हुआं हुआं शुरू हो गयी। शोरगुल को जनता ने सही मान लिया, राजीव चुनाव हार गए।
जिस बछड़े को पाकिस्तान और चीन हरा न पाए, अपनो ने धराशायी कर दिया। क्या ये महज राजनीति थी???
इट वाज आल अबाउट इकॉनमी स्टुपिड !!!
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पुनश्च -
ये सब किस्सा आपको नही पता होगा। पर ये याद होगा कि अरुण शौरी कालांतर में अटल के जूनियर मंत्री बनें। कश्मीरी पंडित भगाने के विशेषज्ञ जगमोहन भी उसी सरकार में जूनियर मंत्री थे, याद है?
स्वदेशी जागरण मंच और RSS विचारक गुरुमूर्ति को इनाम जरा देर से मिला। मोदी सरकार ने रिजर्व बैंक के बोर्ड में बिठाया। कृतघ्न अमिताभ "कुछ दिन गुजरात मे गुजारने" की गुहार लगाते फिरते हैं। इंडियन एक्सप्रेस, मन की एक्सप्रेस हो चुका है।
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कारपोरेट के हाथ, देश की अस्मिता गिरवी रखना ही चाणक्य नीति हुई है।
देश को आगे ले जाने के लिए, कारपोरेट की ताकतों से लोहा लेने वाला व्यक्ति, अनुभवहीन और कच्चा माना जा सकता है। मगर मैं इसे अलग नजर से देखता हूँ।
यह कि श्रीपेम्बुदुर में आज के दिन जो खून बहा था..
उस खून में व्यापार नही था।
🙏
नेहरू की कथा कहता हूं
जब जब नेहरू का जिक्र आता है तो मुझे यूनान के एक पुराने देवता प्रोमीथियस, जिसे हिंदी में प्रमथ्यु भी कहते हैं, की कथा याद आती है. प्रोमीथियस स्वर्ग से धरती को देखता था. नीचे देखता तो इंसान बड़ी बदहाली में दिखाई देता. कभी उसके बच्चों को जंगली जानवर खा जाते, तो कभी वे जाड़े से मर जाते. देवताओं की तरह दो पांवों पर चलने वाला यह प्राणि सारे चौपायों से गया गुजरा नजर आता.
तब प्रोमीथियस को एक युक्ति सूझी. उसने देखा की स्वर्ग में आग है. इस आग ने देवताओं को बहुत से सुख, शक्ति और सुरक्षा दी है. अगर यह आग किसी तरह धरती पर इंसान के पास पहुंचा दी जाए, तो इंसान अपनी बहुत सी पीड़ाओं से मुक्त हो जाएगा.
आग पर स्वर्ग और देवताओं का कॉपीराइट था. प्रोमीथियस क्या करता. उसने स्वर्ग से आग चुरा ली. चुपके से आग धरती पर इंसानों को दे आया. आग मिलते ही इंसान की रातें रोशन हो गईं, उसका भोजन पकने लगा, जंगली जानवर उससे डरने लगे. धरती पर सुख की ऊष्मा पसरने लगी. सुख आया तो देवताओं की चाकरी बंद होने लगी. मनुष्य अब उन्हें कम अर्घ्य चढ़ाने लगा.
देवताओं ने जांच की तो पता चला कि कांड हो चुका है. देवताओं की बपौती आग, धरती पर पहुंच चुकी है. आदमी आत्मनिर्भर हो रहा है. यह पता लगते भी देर न लगी कि आग प्रमथ्यु ने धरती तक पहुंचाई है. प्रमथ्यु को बंदी बनाकर देवताओं के राजा के सामने पेश किया गया. हर कोई उसे कड़ी सजा देता चाहता था. ज्यादातर तो मृत्युदंड ही चाहते थे. लेकिन मृत्युदंड संभव नहीं था, देवता अमर होते हैं, वे भला कैसे मरें.
तब यूनान के इंद्र ने एक ज्यादा खतरनाक सजा सोची. प्रमथ्यु को स्वर्ग से निकालकर जमीन पर लाया गया. वहां इंसान की बस्ती के पास कम ऊंची पहाड़ी पर उसे सलीब पर टांग दिया गया. ठीक वैसे ही जिस तरह ईसा मसीह की सलीब पर टंगी तस्वीर हम देखते हैं. उसके शरीर में ठुकी कीलों से रक्त की धारा बह निकली. प्रोमीथियस असहनीय वेदना में टंगा हुआ था. फिर उसके कंधे पर एक गिद्ध बैठाया गया. यह गिद्ध दिनभर जीवित प्रमथ्यु का मांस नोचकर खाता. रात में जब गिद्ध सोता तो प्रमथ्यु का मांस फिर से भर जाता क्योंकि वह अमर देवता था. सुबह से गिद्ध फिर वही क्रम शुरू कर देता.
प्रमथ्यु की चीखें इंसानों की बस्ती तक पहुंचती रहतीं. सुबह की पहली किरण के साथ बस्ती वाले उस पहाड़ के नीचे पहुंच जाते. वे दिनभर प्रमथ्यु की चीखों को तमाशे की तरह देखते और शाम को फिर अपने घर आ जाते.
जिन मनुष्यों के लिए सलीब पर टंगा प्रमथ्यु अपना मांस नुचवा रहा था और असहनीय पीड़ा झेल रहा था, वे उसकी लाई आग से आगे बढ़ रहे थे और उसकी बेबसी का उत्सव मना रहे थे.
कथा यहीं समाप्त होती है. लेकिन कथा में बताई बात कभी खत्म नहीं होती. वह हर महापुरुष पर लागू होती है, जिसे गोली से नहीं मारा जा सका. लिंकन और गांधी सौभाग्यशाली थे कि उन्हें गोली से मार दिया गया. नेहरू अभागे थे, जो देश की मरते दम तक सेवा करते रहे. जब तक वे सेवा कर रहे थे, जब तक वे स्वर्ग की आग भारत तक ला रहे थे, वे बहुत लाड़ले थे. उनके जाने के बाद हमने उनके पूरे किरदार को सलीब पर टांग दिया और गिद्ध की तरह उसे नोच रहे हैं.
पहाड़ी के नीचे खड़े होकर उनकी पीड़ा का तमाशा देखने का सिलसिला अब इतना लंबा हो गया है कि तमाशाइयों की नई पीढ़ी यह भूल ही गई है कि इस शख्स को किस बात की सजा दी जा रही है. आज नेहरू की पुण्यतिथि पर उन्हें फिर याद दिलाता हूं कि नेहरू का जुर्म यही था कि जब अंग्रेजी राज में वह सारे सुख भोग सकता था, तब वह बागी हो गया. जब नौजवान ही था तब उसने जलिंया वाला बाग हत्याकांड की रिपोर्ट विस्तार से तैयार की. वह उन चंद लोगों में था जो लोकमान्य तिलक की अंतिम यात्रा में गांधी के साथ चल रहा था. वह उन लोगों में था जिसके प्रभाव में आकर उसके पिता ने अपना घर-मकान सब कांग्रेस को दे दिया था. वह उन लोगों में था जो पहली बार अपने पिता के साथ जेल गया था. वह उन लोगों में था जो सरदार भगत सिंह से मिलने जेल गया था. और भगत सिंह की रिहाई के लिए अंग्रेजों से लड़ रहा था. कांग्रेस के अंदर वह सुभाष चंद्र बोस का सच्चा दोस्त था. अपनी पत्नी कमला की मौत के बाद उनकी चिता की एक चुटकी राख वह जीवन भर अपने साथ रखता रहा. महात्मा गांधी के अंतिम उपवास में चुपचाप खुद भी उपवास करने वाला वह विरला प्रधानमंत्री था. जब वह संसद में ट्रिस्ट विद डेस्टिनी का भाषण दे रहा था, तब उसके दिमाग में लाहौर के वे हिंदू मुहल्ले चल रहे थे, जहां का पानी काट दिया गया था.
वह इतना बुरा था कि जब दुनिया बमों के ढेर पर बैठी थी, तब भी शांति की बात करता था. उसकी शांति का ऐसा जलवा था कि कोरिया के गृहयुद्ध को अंतत: उसी ने एक समझौते पर पहुंचाया था. वह पूरी दुनिया में सम्मानित था और रहेगा.
@prashantdutt6@RebornManish इतना दोगलापन। जो बंटवारे के बाद भारत में रह गये उन्हें भारत में रहने नही देना है। और जो छोड़कर चले गए वो भारत में वापस चाहिए। अगर भारत वाले ही नही चाहिए तो विभाजन पर इतना हंगामा क्यों? जश्न मनाओ जश्न।
कल एक पोस्ट लिखी,
राजीव- श्रीलंका के मसले पर..
कमेंट्स आये।
ये ऑपरेशन फेल था, बेवकूफी थी। 1200 भारतीय सैनिकों को जान गई। देश को कोई लाभ नही हुआ।
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एक सीनियर IAS हैं, उम्र में बड़े, मगर उनका प्रेम रहा मुझ पर। एक शाम, मैनें उनसे, दो अफसरों की कार्यशैली की तुलना की।
सुर्खियों में रहने वाले, पूर्व अफसर की तारीफ की। कहा- उसने फलां फलां क्राइसिस बढ़िया निपटाया।
और मौजूदा अफसर??
मैनें उसे उबाऊ..बोझिल, निष्क्रिय कहा।
साहब मुस्कुराए।एक घूंट लिया,
ग्लास रखा।बोले -
मनीशश्श.. काबिल अफसर वही है, जिसका कार्यकाल पब्लिक को बोझिल,और निष्क्रिय लगे। जिसके दौर में कोई संकट, लॉ एंड ऑर्डर, सुर्खियों की सिचुएशन ही न बने।
●●
लम्बी स्पीच का लब्बोलुआब था,कि जिले में, अपराध, सोशल टेंशन, विवाद, संकट के बादल हर समय घुमड़ते हैं।
बुद्धिमान अफसर निगाह रखता है, और आग भड़कने के पहले डिफ्यूज कर देता है। तो पब्लिक को उसका कार्यकाल उबाऊ, नॉन हैपीनिंग लगता है। जिस अफसर ने संकट झेला, हीरो बना, वह होशियार नही, नाकाबिल था।
संकट बनने ही न दे, काबिल तो वह है।
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तमिल ईलम की मांग श्रीलंका में शुरू हुई थी। इसे भारतीय तमिलों का समर्थन था। धन, हथियार, नेटवर्क, सेफ हाउस, रेमिंटेन्स, संचार सब भारत से होकर गुजरता था।
और एक ग्रेटर ईलम, याने अखण्ड तमिल राष्ट्र का कॉन्सेप्ट जमीन पकड़ने लगा था। तमिलनाडु और श्रीलंका के तमिल बहुल इलाकों को मिलाकर तमिल होमलैंड की सुगबुगी बन रही थी।
श्रीलंका में गृहयुद्ध का फ्यूचर कोर्स, राजीव सरकार ने भांप लिया था।आग श्रीलंका में ही बुझ जाए, बेहतर होता।
तमिलों को समर्थन की नीति त्यागी गयी। IPKF ने, दरअसल भारत में एक नए अलगाववादी आंदोलन की भ्रूण हत्या कर दी।
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राजीव के कई कदम, ऐसे प्रिवेंटिव एक्शन थे,
1- शाहबानो मसले में कोर्ट का आदेश, औरत के हक में, मानवीय फैसला था। मगर पर्सनल लॉ में दखल था। भविष्य में ऐसे और फैसलों का परनाला खोलता।
संविधान- सर्वोच्च कानून है, और पर्सनल लॉ उसकी गारंटी। राजीव ने उस गारन्टी को रिस्टोर किया।
हाँ, इसमे उन्हें राजनीतिक लाभ की आशा भी थी। जो बूमरैंग हुआ, और "तुष्टिकरण" शब्द भारतीय राजनीति में अविष्कृत हुआ।
2- राम मंदिर शिलान्यास, 1988 में ही न्यूट्रल प्लेस में कर चुके थे। सत्ता में होते तो 2-3 साल में एक गैर विवादित मन्दिर बन जाता।
देश कितनी डेथ, डिस्ट्रक्शन और नफरती राजनीति से समाज के भ्रंश को बाईपास कर जाता।
30 साल मन्दिर-मस्जिद, हिन्दू मुस्लिम प्रश्न की जगह हम कम्प्यूटर, इकॉनमी, युवाओं पर सोचते, तो देश कहां खड़ा होता? थिंक ईट ओवर..
उन्हें राजनीतिक लाभ की आशा भी थी। तो क्या दिक्कत है?? सम्विधान के साथ खड़े रहकर, एकता की राह बनाकर, वोट पाने की लालसा...
सम्विधान उखाड़कर, एकता नष्ट कर वोट कबाड़ने की लालसा से बेहतर है न?
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नार्थईस्ट में लालडेंगा समझौता, मिजो-कुकी, नगा सँघर्ष का अंत उनकी उपलब्धि है। जो आज आप नॉर्थ ईस्ट पर्यटन को जाते हैं, यह उस दौर का लगाया फल है।
असम समझौता तो गजब था।
कभी सोचा कि PM, अपनी पार्टी की गवर्मेंट से इस्तीफा दिलवाए, चुनाव कराए। और छात्रों के लुंजपुंज दल को जीतकर सरकार बनाने दे??
प्रफुल्ल मोहन्ता स्टूडेंट होस्टल से, CM हाउस शिफ्ट हुए। राज्य में शांति आयी।
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पंजाब समझौता सीमित कारगर रहा। ब्लू स्टार के बाद, इस समझौते ने पंजाब में शान्ति की खिड़की खोली।लेकिन आतंकी अब भी ताकतवर थे।
स्वर्ण मंदिर हथियारों और चरमपंथियो का सेफ हाउस था। "ऑपरेशन ब्लेक थंडर" हुआ। यह सेकंड "ब्लू स्टार" था, और सौ गुना सफल था।
पर लोग ब्लू स्टार को जानते हैं, इसे नही।आपको नही पता होना ही तो सफलता है।
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जब तक राजीव पीएम थे, कश्मीर में आतंकवाद नही था।
87 के चुनाव में,चरमपंथियों को बेईमानी से हराने की बात कही जाती है। वह कितना राजीव का काम था, कितना जगमोहन का, आप सर्च करें।
अतिवादी एक्शंस के कारण राजीव ने जगमोहन को हटा दिया था। वीपी सरकार उन्हें दोबारा राज्यपाल बनाकर लायी।
और उनका दोबारा आना, कश्मीर में नर्क के दरवाजे खुलने का क्षण था।
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एक और आरोप है- एंडरसन को भगा देना। तो क्या आपको पता है,कि एंडरसन को कोर्ट ने जमानत दे दी थी।
अब क्या भोपाल की सड़कों पर लिंच होने को छोड़ दिया जाता। उसे सुरक्षित निकाल दिया, ठीक किया।
वैसे, वो यहां रहता, तो कानूनन क्या ही उखाड़ लेते भाई?? केशव महिंद्रा, जो यूनियन कार्बाइड का लोकल हेड था, असली लापरवाह- उसका क्या उखाड़ लिए??
नथिंग??
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राजीव, घुटे हुए पॉलिटिशियन नही थे।
उनकी यही कमजोरी, हमारा लाभ थी। उनकी निगाह अगले चुनाव पर नही होती थी। कल की हेडलाइन पर नही होती थी।
वो 21 सदी के भारत निर्माण पर टिकी होती थी।
आज अगर राजीव जीवित होते तो इस देश की तस्वीर कुछ औऱ ही होती लेकिन आज वो हमारे बीच में नही है और आज ऐसा माहौल है जब हर तरफ झूठ का बोलबाला है तो देश के युवाओँ को सच बताने की जिम्मेदारी हर उस व्यक्ति की है जिन्होने आपको पढ़ा, सुना और देखा है
राजीव गाँधी ने इस देश को क्या दिया है उसका जवाब आपके हाथ मे है जिससे आप यह पोस्ट पढ़ रहे है यह राजीव गांधी ही थे, जिन्होंने भारत में दूरसंचार क्रांति लाई.आज जिस डिजिटल इंडिया का जाप साहब करते रहते है उसका मूल विचार राजीव का ही था मैं तो उन्हें डिजिटल इंडिया का आर्किटेक्ट और सूचना तकनीक का जनक मानता हूँ सी-डॉट से लेकर एमटीएनएल जैसी कंपनियां उनकी ही देन है
90 के दशक लाखो लोगो को रोजगार देने वाले एसटीडी पीसीओ बूथ उनकी ही देन है आज जो स्वरोजगार का मॉडल मोदी सरकार जनसेवा केंद्र के नाम कॉपी पेस्ट करके आपको परोस रही है उसकी नींव राजीव ने ही रखी थी
आज भारत का युवा आईटी सेक्टर में जो झंडे गाड़ रहा है उसके पीछे एक छोटी उम्र के प्रधानमंत्री की बड़ी सोच है राजीव गांधी ने देश में कंप्यूटर क्रांति लाने का काम किया राजीव विज्ञान और तकनीक की ताकत जानते थे उन्होंने सस्ते कंप्यूटर के लिए इंपोर्ट ड्यूटी कम कर दी थी . रेलवे में कम्प्यूटरों का इस्तेमाल करके टिकीटिंग भी शुरू करवाई .राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने से पहले 1970 में देश में पब्लिक डिपार्टमेंट ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स की शुरुआत हो गई थी लेकिन आईबीएम के साथ देश मे कम्प्यूटर के व्यवसायिक उपयोग को गति राजीव के प्रयासों से ही मिली थी आज अगर भारत आईटी सेक्टर का सुपर पावर है तो उसकी एक वजह राजीव भी है
मैं लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष सोच वाले राजीव गांधी को 21 वीं सदी के महान लोकतंत्र का सबसे बडा कैटेलिस्ट मानता हूँ राजीव मानते थे कि युवा ही देश का भविष्य है इसलिए उनकी लोकतांत्रिक भागीदारी बढ़ना चाहिए इसलिए राजीव सरकार ने 1989 में संविधान के 61 वें संशोधन के जरिए वोट देने की उम्रसीमा 21 से घटाकर 18 वर्ष कर इस लोकतंत्र की जवान कर दिया
राजीव गांधी ने शिक्षा क्षेत्र में क्रांति की पहल करते हुए नवोदय विद्यालयों की शुरुआत की औऱ गाँव के बच्चों को भी उत्कृष्ट शिक्षा मिले इसलिए गाँव -गाँव मे नवोदय विद्यालय खोलकर बच्चों को कक्षा 6 से 12 वीं तक की मुफ्त शिक्षा और हॉस्टल में रहने की सुविधा दी और आज नवोदय विद्यालय के विद्यार्थी पूरे देश विदेश मैं देश का झंडा ऊंचा कर रहे है
तो सुनो देशों के युवाओं तुम्हें राजीव ने सच का कंप्यूटर दिया है झूठ का मंतर नही, तुम्हे ज्ञान का गुगल दिया है झूठ का व्हाट्सएप नही , तुम्हे युवा लोकशाही दी है तानाशाही नही, तुमसे शिक्षा की बात की है मन की बात नही..
इसलिए अगर राजीव गाँधी के जन्मदिन पर तुम्हे कांगि, चमचा आदि इत्यादि बोले तो समझ जाना की राजीव आज भी जिंदा है क्योंकि अंधभक्त आज भी उनके काम को लेकर सजिन्दा है ।
देश के युवाओं के सपने को सच करने वाले भारत रत्न राजीव गांधी को जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई 🎂🎂
#घोरकलजुग #डाटावाणी #राजीव_गांधी
यह महान दृश्य है...
आजादी की बेला, बरसों का स्वप्न, खुली हवा में सांस, औऱ उपर लहराता तिरंगा। सोचता हूँ कि फहराने वाले के मस्तिष्क में क्या चल रहा होगा?
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वह जो नीचे खड़े हैं, तिरंगे को देख रहे हैं, नेहरू को देख रहे हैं। उनका दृश्य सीमित है। विशाल असलियत दूसरी ओर से दिखती है।
क्योकि ऊंचे किले की प्राचीर पर खड़े होकर, दूर तक दिखता है।
ये विशाल जनसमूह !!
ये वोटर नही, कार्यकर्ता और समर्थक नही, मुग्ध श्रोता भी नही। उन्मादित गर्वीलों का जमावड़ा नही है, ये दीन हीन, आर्थिक- सामाजिक रूप से निचुड़ चुका राष्ट्र है।
अंगभंग के ताजे रिसते घाव के साथ, घिसटते हुए भी जश्न मनाने आया है। वो खड़ा होकर तिरंगे की लहरों के संग डोल रहा है। अपने देश, अपने नेता की जयकार कर रहा है।
यह डराता है।
अगर आप मनुष्य हैं, तो डराता है।
आशा से भरी लाखों आंखों का केंद्रबिंदु होना आसान नही होता। क्या नेहरू, दबाव महसूस कर रहे थे?
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इस किले से कुछ दूर ही, हथियारों के साथ कुछ लोग, आग लगा रहे हैं, घाव बांट रहे हैं। शिकार खोज रहे हैं। उनकी भी एक विचारधारा है।
या शायद नही है।
कुछ का आक्रोश है, कुछ के लिए मौका है। औरो के घाव में अपनी मजबूती देखने की हुनक है।
क्या नेहरू का दिमाग..
उस धुएं के गुबार पर गया?
या वे कैबिनेट की अगली बैठक को सोच रहे थे?
देश ये आजाद हुआ है, पर बना नही है। सीमाएं तय नही, देश के भीतर 500 देश हैं।
त्रावणकोर, जूनागढ़, हैदराबाद, राजपूताना, कश्मीर.. दर्जन भर दूसरे भी अलगाव चाहते हैं। बाहर और भीतर की सीमाओं पर तनाव है।
पर सेना नही है, खुद उसमे बंटवारा चल रहा है। मुट्ठी भर हथियार, दर्जन भर जहाज, और फौजी..
उनका भी रेजीमेंट दर रेजिमेंट बंटवारा होना है। कुछ पाकिस्तान जाएंगे, कुछ इंग्लैंड।
राज्य नही है, पुलिस नही है, अफसर भी आधे इंग्लैंड लौट रहे हैं। जहां थोड़ी कुछ व्यवस्था है, अभी पक्की नही है।
नियम नही बने, कोई विधान नही है। चारो ओर धुंधलका, आतुर आंखों की आशायें, धुआं..
और जलते मांस की गंध..
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ऊबे जवाहर ने क्या, ऊपर तिरंगे को देखा होगा?
पिता तो नही रहे, तो पितातुल्य के पैरों में बैठकर कुछ सोचा जाये। पूछा जाये- इसकी गिरहें कहाँ से सुलझाना शुरू करूँ, बताओ न बापू।
पर वो निठुर भी इस वक्त पास नही। दूर बैठा है, हजारों मील.. कलकत्ता की हैदर मंजिल।
मियांवली की झुग्गी बस्ती में पनाह लिया वो वृद्ध, आजादी से उत्साहित नही। दंगे रोकने के लिए एक मुसलमान के घर सोया है।
गांधी दिल्ली आज नही लौटेंगे ।
कल भी नही, अगले हफ्ते भी नही। वो दंगाग्रस्त इलाकों जाएंगे। जलती बस्तियों के बीचोबीच, नंगे पैर घूमेंगे।
इसलिए कि जिस धरती पर इतना खून मिला हो, उस पर चप्पल पहनकर कैसे चलें।
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नेहरू ने फिर तिरंगे की ओर देखा होगा, और ताकत बटोरकर उन टिमटिमाती आंखों के सामने, वे मशहूर शब्द कहे होंगे।
रात को जाग कर लिखा भाषण, पढ़ा होगा।भीतर भीतर जलता हुआ दीपक जैसे सामने औरो को रोशन करे।
भाषण खत्म होता है।
सामने खड़े लाखो हाथ उठते है। तालियां बजाते हैं। जलसा खत्म...
यह तसवीर ले ली जाती है।
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जिसे आज आप देख रहे हैं। पचास, सौ या दो सौ साल बाद भी यह तसवीर देखी जाएगी।
जो दिखता है, वो तो सब देखेंगे। जो नही दिखता, कुछ ही लोग देख सकेंगे।
आपने देखा??
यह महान दृश्य है।
❤️
नारायण सुर्वे की कहानी कल पढ़ी होगी आपने। उनकी मृत्यु के कई सालों बाद जब उनके घर में एक चोर घुसा और चोरी के बाद उसे एहसास हुआ कि यह नारायण सुर्वे का घर है तो उसने माफी की स्लिप लगा दी और लौट गया।
उनकी एक कविता जो उन्होंने जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु पर लिखी थी (Thread में अंग्रेज़ी अनुवाद)
जब नेहरू गुजर गए
घर अपनी पीठ पर बोझ लिए बैठे गुनगुनाने लगे
कैसे शहर धूसर हुआ, फिर काला हो गया
और... अंधकार ने उजाले को निगल लिया।
पत्थरों में सजी फैक्ट्रियाँ
सिगार जलाते हुए विचारों में खो गईं।
फिर...
गीली शर्टें कंधों पर डाले
शेड्स की ओर मुड़ गईं।
'क्या हुआ, सुंदरे!... आज अगरबत्ती मत जलाना!... नेहरू नहीं रहे!'
'सच में? तो आज की छुट्टी ले लेते हैं! ...
बोझ उठाए दुनिया बिस्तर पर ढह गई।
मैं चलता रहा, उदास और अकेला
कैसी भयावह लग रही थीं सड़कों, कागज के शंकु में रोशनी ले जाता ठेला खींचने वाला।
मैंने पूछा,
"तुम अब यह रोशनी क्यों ले जा रहे हो?"
'ओह, साहब;
आगे अंधकार है, दांत निपोरते हुए!'
यह कहानी है जब नेहरू गुजर गए!
[मराठी से अनुवाद मेरा, @rajuparulekar की सहायता से ]
राहुल के बुरे दिन कैसे शुरू हुए??
शुरू हुए भट्टा परसौल से। किसानों की जमीन सरकारी प्रोजेक्ट के लिए लेने, और उचित मुआवजा न मिलने की समस्या को लेकर वे किसानों से मिलने जाना चाहते थे।
यूपी सरकार ने रोका, तो वे नाटकीय तऱीके से मोटरसायकिल में बैठकर चले गए। यह पहली गलती थी।
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दूसरी गलती थी, उड़ीसा में नियमगिरी का दौरा। यहां उन्होंने अपना फेमस जुमला बोला- आई एम योर सोल्जर एट डेल्ही..
राहुल, गरीबो का सिपाही बनने की कोशिश कर रहे थे। यह अच्छी बात तो नही थी।
गरीबो का सिपाही बनने के लिए आपको अमीरों के किले पर चढ़ाई करनी पड़ेगी। और अमीर जब आपका मित्र ही हो, तो चढ़ाई क्यो करना??
क्योकि नियमगिरी और भट्टा परसौल के बाद भू अधिग्रहण क़ानून आया। किसानों को जमीन के चौगुने मोल मिले,लेकिन अमीरों के प्रोजेक्टों की कॉस्ट तो चौगुनी हो गई। यह कीमत मुनाफे में छेद करती है। नुकसान देती है।
आखिर यह दुश्मनी क्यो निकाली राहुल ने??
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यूपीए-2 सरकार भी अपने पैरों पर जमकर कुल्हाड़ी मार रही थी। और उसमे आगे आगे थे- जयराम रमेश।
वे पर्यावरण मंत्री थे।
अब मंत्री को लालबत्ती कार लेनी चाहिए, बंगले में रहना चाहिए। चुपचाप फीते काटने चाहिए और नोट लेकर, नोटशीट पर दस्तखत करने चाहिए। पर मंत्रीजी एआईए- एसआईए स्टडी को पढ़ने लगे
जयराम रमेश ने अपना जॉब सीरियसली ले लिया। पर्यावरणीय मानकों पर सैंकड़ो प्रोजेक्ट रद्द किए, खारिज किया, फच्चर फंसा दिया। धनपशुओं के अरबो अधर में लटक गए।
अब हाथियों के कॉरिडोर के लिए, माइंस प्रोजेक्ट को रोकने का काम, कोई बुद्धिमान नेता रोकता है क्या??
जिस देश मे अक्ल से बड़ी भैंस होती है, वहां हाथी बड़ा या उद्योगपति? आप बताओ।
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एक के बाद ऐसे कई मामले हुए, और सरकार अमीर विरोधी सरकार बन गयी।
लेकिन अमीरों के हाथ, सरकार से भी लम्बे होते है। और चैनल उनमे से एक होता है।
देश के 3 में से 18 चैनल उसी के थे, जिसके लड़के के ब्याह में रिहन्ना नाचती है। लिहाजा सारे चैनल सुर बदलने लगे।
जो घोटाले, पांच सात साल बाद, कोर्ट खारिज करने वाला था, उनका तुरत फुरत मीडिया ट्रायल चला। चैनल के पर्दे पर आपकी अदालत लगी। एंकरों ने मनमोहन सरकार को, टीवी पर दोषी करार दे दिया।
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एक कंगारु कोर्ट रामलीला मैदान में भी लगाई गई। टीवी ने उसे 60-60 घण्टे का अनब्रोकन कवरेज दिया। इन कोशिशों से एकाएक, हवा बदलने लगी।
दरअसल तूफान पैदा हो गया।
जो बड़े बड़े पंखे लगाकर पैदा किया गया था। इन पंखों का कनेक्शन उन्ही घरानों से जुड़ा था, जिनके ब्याह में जस्टिन बीबर नाचता है।
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सरकार बदली, और फिर उसी मीडिया ने पप्पूकरण शुरू किया। टीवी और सोशल मीडिया पर 5 साल, एकतरफा नरेटिव चला।
पप्पू, पप्पू, पप्पू...
राहुल फिर भी लड़े। भीतर लड़े, बाहर लड़े, लेकिन अकेले। न कांग्रेस साथ थी, न जनता, न मीडिया, न सिस्टम। उस पर बीच चुनाव बालाकोट का ड्रामा।
यूँ समझिये, 2019 में अभिमन्यु को घेरकर मारा गया। जो सरकार बदलनी चाहिए थी, मजबूत होकर लौटी।
राहुल भी महज 8 सीटें बढ़ा सके।
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इस्तीफे, और साल दो साल की उहापोह के बाद राहुल ने फिर सर उठाया। वह किया, जो पहले नही किया था।
जनता से जुड़े। जो शब्दो से कह पाने में सफल न हुए, देहभाषा बोल गई। अब उसकी आंखें बोलती है, बदन बोलता है, देश सुनता है।
समझता भी है।
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पप्पू करण का वह दौर गुजर चुका है। राहुल मिट्टी पकड़ पहलवान की तरह अखाड़े में डटे हैं। पहले से कहीं ज्यादा मुखर, चमकदार, ताकतवर, निर्भय नजर आते हैं।
लेकिन अंदाज वही अक्खड़ है। वे खेत मे दिख जाएंगे, नाई की दुकान में, किसी बढई या मिस्त्री की वर्कशाप में दिख जाएंगे, सड़को पर चलते दिख जाएंगे...
लेकिन आज भी यह बन्दा, उस ब्याह में नही दिखता जहां देश का सारा पोलिटीकल क्लास नाचता है।
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यह तब जब सबसे बड़ा उद्योगपति, खुद न्योता लेकर दस जनपथ पहुँचा। राहुल नही मिले, वे भगदड़ में मरे लोगो को सांत्वना देने चले गए। मणिपुर चले गए। गुजरात चले गए।
एंटीलिया में हाजिरी नही दी,
सर न झुकाया।
इस जिद्दी लड़के के इसी अंदाज का कायल हूँ। अब भले ही इसी अंदाज ने जिसने पंद्रह साल पहले, कांग्रेस का, राहुल का, देश का सितारा डुबोया था।
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पर अच्छा लगता है, कि तमाम झँजवात में गिरने, बिखरने, टूटने के बावजूद भी कोई है जो डरा नही है, डिगा नही, बदला नही है।
वो आज भी अड़ा है..
वहीं खड़ा है।
भट्टा परसौल के किसानों से घिरा, नियमगिरी के आदिवासियों के बीच उस मंच पर, जहां से आती हुई आवाज, वैसी की वैसी रवानियत के साथ, कानो में गूंज रही है..
आई एम योर सोल्जर एट डेल्ही..
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और मैं कहता हूँ...बी देयर माई बॉय,
योर एरा हैज कम...
क्या इमरजेंसी घोषित कर देनी चाहिए...
आज सुबह रामलीला मैदान में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने, सेना और पुलिस से, मोदी सरकार के आदेश न मानने का आव्हान किया।
राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार ईवीएम फोर्जरी के बूते सत्ता में बैठी है। उसके द्वारा लिया गया हर फैसला अवैधानिक है। सेना और पुलिस उसे न माने।
सुरक्षा बलों से इस आवाहन के साथ, राहुल ने देश की जनता को भी "सम्पूर्ण क्रांति" का नारा दिया। उन्होंने देश की जनता और कांग्रेसियों को आगे बढ़कर, मोदी सरकार को उखाड़ फेंकने की अपील की।
इन्होंने कहा कि कुछ माह बाद होने वाले चुनाव का इंतजार नही करना चाहिए, क्योकि- " जिंदा कौमे 5 साल इंतजार नही करती"
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इसके बाद देश भर में हंगामा शुरू हो गया है। देश भर में टोलियां निकलकर "सिंहासन खाली करो कि- जनता आती है" "सम्पूर्ण क्रांति" "टोटल रिवोल्यूशन" का नारा लगा रही है।
पुलिस और भीड़ की झड़पों में कई मौतें हो चुकी है। पुलिसवाले लिंच किये जा रहे है। देश हिंसा की चपेट में हैं।
पूरा विपक्ष एक हो चुका है। जगह जगह कांग्रेसियों, सपाइयों, आपाइयो, शिवसैनिकों, और दूसरे दलों के नेता भीड़ की अगुवाई कर रहे हैं। भीड़ ने भाजपा के सांसदों और विधायको के घर दफ्तरों को घेर लिया है। उन्हें पीटकर, दबाव डालकर जबरन इस्तीफे लिए जा रहे हैं।
भीड़ कई राज्यों के मुख्यमंत्री निवास, और राजभवनों को घेर ओर बैठी है। उन्हें भी बंधक बनाकर, इस्तीफे के दवाव डाला जा रहा है।
पत्रकारों को पीटा गया है। पूरे देश मे रेलें रोकी जा रही हैं। जनजीवन अस्तव्यस्त है। जगह जगह डाइनामाइट बरामद किया गया है। एक केंद्रीय मंत्री की हत्या हो चुकी है।
प्रधानमंत्री मोदी की तमाम अपीलों के बावजूद हिंसा थम नही रही। विपक्ष उनके इस्तीफे की मांग पर अड़ा हुआ है।
देश के हालातों के मद्देनजर कैबिनेट की बैठक बुलाई गई है। विचार हो रहा है कि क्या इमरजेंसी लगाई जानी चाहिए???
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उपर लिखे पैरै काल्पनिक हैं। पर यह घटनाएं थोड़े बहुत नाम- स्थान- दल को परिवर्तित करके पढ़ें। ये 1975 के इमरजेंसी पूर्व हालात हैं।
तब सत्ता में इंदिरा थी, और जहां जहां राहुल लिखा है- आप जेपी पढ़ ले, संसोपा, जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी पढ़ लें।
और अपना बेलाग ओपिनियन बतायें कि इस तरह के हालात में यदि सम्विधान का अनुच्छेद 352 लागू नही किया जाए..
तो क्या बाबा साहेब ने वह प्रावधान, सम्विधान में क्या अचार डालने को रखा था??
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इमरजेंसी को कोसना, एक फैशन है।
नई पीढ़ी में उस दौर का अध्धयन, जानकारी, समझ जीरो है। लेकिन स्वयं को "निष्पक्ष" और "जागरूक नागरिक" दिखाना है, तो इमरजेंसी को कोसना अनिवार्य है।
च्युतियों के इस देश में हिस्ट्री के नग्न तथ्य भुलाकर, नारेबाजी और भेड़चाल में बुद्धि को तिलांजलि दे दी जाती है।
मुझसे नही होता। जिस दिन राहुल गांधी, कांग्रेस या विपक्ष इस तरह का हालात पैदा करे, मुझे उसकी आलोचना करने से गुरेज नही, पक्ष बदलने से गुरेज नही।
और तब और मोदी सरकार इन हालात में इमरजेंसी ठोककर, सबको जेल डाल दे, तो मेरे मत में यह अफसोसनाक, मगर जरूरी कदम होगा।
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जेपी की क्रांति फर्जी थी। टोटल रिवोल्यूशन एक फर्जी नारा था। आखिर किसके खिलाफ रिवोल्यूशन- सम्विधान के??
या सरकार के?? भला ये जिंदा कौम क्या होती है जनाब ??? महज 11 माह निर्धारित चुनाव में वोट करके इंदिरा को हटा देना, किसी मुर्दा कौम का लक्षण होता???
सड़को पे विस्फोट कर सरकार का इस्तीफा मांगने वाले, आजकल आतंकवादी कहलाते है। देशद्रोही और गद्दार का तमगा मिलता है। तो जेपी की "क्रांति" देशप्रेम कैसे??
और आप इतने वैचारिक दोगले कैसे??
सिंहासन खाली करो, जनता आती है। जनता नही, जनता पार्टी के लिए सिंहासन खाली कराना था।
और मैं आज तक समझ नही सका कि ये हालात इंदिरा की गलती की वजह से बने। सिवाय इसके की गुजरात मे गेंहूँ के दाम बढ़ गए थे।
व्हाट नॉनसेंस??
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फर्जी नारे, फर्जी रोमांटिसिज्म, फर्जी जेस्चर अपनाने से बचिए। अपनी अक्ल का इस्तेमाल कीजिए।
क्रांतियां फ्रांस की हों, रूस की, चीन की, या जेपी और अन्ना की... उन्होंने आने वाले कुछ दशकों के लिए अपने देश को गर्त में ही धकेला है।
सत्ता की सीमाएँ है, विपक्ष की भी सीमाएं है। और हम, या मोदी सरकार किस्मतवाली है, की राहुल नीत विपक्ष गैरजिम्मेदार नही। वो बदमाश नही। गलत तरीको, हंगामों और विध्वंसक तरीकों का सहारा नहीं लेता।
और इसलिए हम इसे बेकार विपक्ष समझते हैं।
क्योकि गैरजिम्मेदार, विध्वंसक विपक्ष की हमे पीढ़ियों से आदत पड़ी हुई है।
@RebornManish@CAGBAID जैन धर्म एवं दर्शन मूलतः अनीश्वरवादी है।जैन अवतारवाद या सृष्टि के रचयिता के रूप में ईश्वर को नहीं मानते।और इसी अर्थ में वे नास्तिक हैं। जैन दर्शन इस बात में विश्वास करता है कि विश्व की कोई भी आत्मा या जीव स्वयं को इस परिशुद्ध अवस्था तक ले जा सकता है कि वह स्वयं परमात्मा हो जाए।
आपसे चार्ली चैप्लिन मिलना चाहते है बापू..
- कौन चार्ली चैप्लिन.. ??
गांधी फिल्में नही देखते थे।
तो किसी ने बताया - जोकर है एक!!!
दूसरे ने टोका - नही बापू, एक्टर है,
बहुत फेमस है...
- ठीक है। मैं अभी नही मिलना चाहता...
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गोलमेज कॉन्फ्रेंस अटैंड करने को बापू लन्दन में थे। तमाम मुद्दे, राजनीतिक सवाल, दिमाग मे उलझ रहे थे। ऊपर से प्रेस वालो, सेलेब्रिटियों, पॉलिटिशियन्स का तांता लगा हुआ था।
कोई "मैडम तुसाड म्यूजियम" वाले बुला रहे थे। अब पता नही कि ये मैडम तुसाद कौन है? कोई एक गौहर जान भी है, कहते है कि मशहूर गायिका है।
मिलने को आतुर है- एक मुलाकात के लिए 12000 रुपये दान देने की चिट्ठी लिखी है। बस, वो अपना गाना सुनाना चाहती है गांधी को..
औऱ गांधी चाहते थे कि समय निकालकर लंकाशायर जायें। वहां के मिल मजदूरों से मिलें।
चार्ली वाली बात आई गयी हो गई।
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किंग्सले हॉल में उनके कार्यक्रम के आयोजक विलियम रिन्ड ने पूछा- आप चार्ली चैपलिन को मिलने समय नही दे रहे ?
गांधी ने अपनी असमर्थता जताई।
"आपको उससे मिलना चाहिए। वो दुनिया का सबसे मशहूर बन्दा है, ऑफकोर्स आपको छोड़कर.. रिन्ड हंसे।
और फिर गम्भीरता से कहा- वो आपके उद्देश्य से सहानुभूति रखता है।उसने गरीबी देखी है, बड़े क्रांतिकारी विचार रखता है। उससे मिलना, आपके कॉज में सहायक होगा..
गांधी ने सर हिलाया
ठीक है फिर..
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चार्ल्स स्पेन्सर चैपलिन, नाइट कमांडर ऑफ द मोस्ट एक्सीलेंट ऑर्डर ऑफ ब्रिटिश एम्पायर, उर्फ चार्ली चैप्लिन (KBE)...
एपोइंटमेंट लेकर, अपने पैरों चलकर उस फकीर से, जिसे 1982 में पिक्चर रिलीज होने के पहले कोई जानता नही था, मिलने आये।
अपनी ऑटोबायोग्राफी में वे याद करते हैं, ईस्ट इंडिया डॉक रोड में, स्लम एरिया का वह घर, जहां गांधी ठहरे थे।
और गांधी से मिलने के लिए सीढियां चढ़ते समय अपनी नर्वसनेस... वे गांधी से मिलकर क्या कहेंगे??
एक्टर थे, तो मन ही मन अपनी ओपनिंग लाइनें दोहरा रहे थे- "मि गांधी, मैं आपके देश और आपके लोगो की आजादी का समर्थक हूँ"
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मुलाकात अच्छी हुई। ऑटोबायोग्राफी में चार्ली लिखते है- चरखे को देखकर मैनें पूछ ही लिया, मि. गांधी, मैं आपके सारे विचारों से सहमत हूँ, लेकिन आप मशीनों का विरोध क्यो करते हैं?
गांधी बोले- चरखा चलाने का मतलब, सारी तकनीकी का विरोध नही। ये उससे जुड़े आर्थिक और राजनीतिक तंत्र का विरोध है। शोषण की व्यवस्था का विरोध है। गरीबो से समेटकर, चंद जेबें भरने का विरोध है।
इंगलैंड ने भारत के सारे उद्योग नष्ट कर, यहां मशीनों से प्रोडक्शन शुरू किया है। ताकि यहां माल बनाकर भारतीयों को बेच सकें। वहां का धन, यहां लाया जा सके।
हम मशीन से बने कपड़े का नही, उस शोषण के फ़लसफ़े का विरोध करते हैं। इसलिए चरखे से भारतीय खुद कपड़ा बनाये, खुद का उत्पाद पहने, चरखा चलाकर इसका संकेत देता हूँ।
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बातचीत के बाद दोनो ने साथ साथ प्रार्थना की। गांधी ने अपने तरीके से, चार्ली ने अपने तरीके से..
गांधी का भजन जरा लम्बा चला, तो चार्ली भी सुनते रहे। फिर दोनो ने भोजन किया।
ऑटोबायोग्राफी में चार्ली ने "मोस्ट ब्रिलिएंट मैन ही एवर मेट" और "वन ऑफ मोस्ट गॉड लाइक एज वेल" लिखकर गांधी से मुलाकात के अध्याय को समाप्त किया।
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प्रेस और मीडिया से, 45- बेक्टन रोड के दोनो फ्लोर पैक थे। हजारों लंदनवासी , सड़क पर इकट्ठे थे। गांधी और चार्ली की मुलाकात का गवाह बनने के लिए..
वो 2 सितंबर 1931 की शाम थी।
और 2024 की भी एक शाम है, जब पूड़ीपैक और 500 रुपये देकर, टेक्टरों से भीड़ इकट्ठा करवाने वाला नशेड़ी जोकर, गांधी की गुमनामी पर दया बरसा रहा है।
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उसके जैसे ही एक सनकी, आत्ममुग्ध, बौने, अवतारी तानाशाह का मजाक उड़ाते हुए, चार्ली ने अपनी सर्वकालिक महान क्लासिक " द ग्रेट डिक्टेटर" बनाई।
और उसके अंत में अपना सन्देश दिया।
चैप्लिन शांति का, अहिंसा का प्रेम, साहचर्य, की बात करते हैं। जब वे गरिमा औऱ मानवता को लालच, नफरत, अहंकार और मशीनो से ज्यादा जरूरी बताते है..
तो उनकी बात में गांधी से मुलाकात की छाप दिखती है।
और चैप्लिन की जुबान से जब गांधी बोलते दिखाई देते हैं, तब आपका, मेरा, और हिंदुस्तान का सीना..
गर्व से दोगुना हो जाता है।
❤️🙏
ऐसा व्यक्ति जिसके बारे में बात करते हुए शब्द कम पड़ जाएं।जिसका कद इतिहास में इतना बड़ा हो कि उसकी हर तारीफ छोटी लगे,ऐसे महान पुरुष की पुण्यतिथि पर शत शत नमन।याद रखना नेहरू पर उंगली उठाने वालो तुम एक शब्द नेहरू के खिलाफ़ बोलोगे,सौ लोग उठ खड़े होंगे। ये है नेहरू के किरदार की ताकत।
नेहरू की कथा कहता हूं
जब जब नेहरू का जिक्र आता है तो मुझे यूनान के एक पुराने देवता प्रोमीथियस, जिसे हिंदी में प्रमथ्यु भी कहते हैं, की कथा याद आती है. प्रोमीथियस स्वर्ग से धरती को देखता था. नीचे देखता तो इंसान बड़ी बदहाली में दिखाई देता. कभी उसके बच्चों को जंगली जानवर खा जाते, तो कभी वे जाड़े से मर जाते. देवताओं की तरह दो पांवों पर चलने वाला यह प्राणि सारे चौपायों से गया गुजरा नजर आता.
तब प्रोमीथियस को एक युक्ति सूझी. उसने देखा की स्वर्ग में आग है. इस आग ने देवताओं को बहुत से सुख, शक्ति और सुरक्षा दी है. अगर यह आग किसी तरह धरती पर इंसान के पास पहुंचा दी जाए, तो इंसान अपनी बहुत सी पीड़ाओं से मुक्त हो जाएगा.
आग पर स्वर्ग और देवताओं का कॉपीराइट था. प्रोमीथियस क्या करता. उसने स्वर्ग से आग चुरा ली. चुपके से आग धरती पर इंसानों को दे आया. आग मिलते ही इंसान की रातें रोशन हो गईं, उसका भोजन पकने लगा, जंगली जानवर उससे डरने लगे. धरती पर सुख की ऊष्मा पसरने लगी. सुख आया तो देवताओं की चाकरी बंद होने लगी. मनुष्य अब उन्हें कम अर्घ्य चढ़ाने लगा.
देवताओं ने जांच की तो पता चला कि कांड हो चुका है. देवताओं की बपौती आग, धरती पर पहुंच चुकी है. आदमी आत्मनिर्भर हो रहा है. यह पता लगते भी देर न लगी कि आग प्रमथ्यु ने धरती तक पहुंचाई है. प्रमथ्यु को बंदी बनाकर देवताओं के राजा के सामने पेश किया गया. हर कोई उसे कड़ी सजा देता चाहता था. ज्यादातर तो मृत्युदंड ही चाहते थे. लेकिन मृत्युदंड संभव नहीं था, देवता अमर होते हैं, वे भला कैसे मरें.
तब यूनान के इंद्र ने एक ज्यादा खतरनाक सजा सोची. प्रमथ्यु को स्वर्ग से निकालकर जमीन पर लाया गया. वहां इंसान की बस्ती के पास कम ऊंची पहाड़ी पर उसे सलीब पर टांग दिया गया. ठीक वैसे ही जिस तरह ईसा मसीह की सलीब पर टंगी तस्वीर हम देखते हैं. उसके शरीर में ठुकी कीलों से रक्त की धारा बह निकली. प्रोमीथियस असहनीय वेदना में टंगा हुआ था. फिर उसके कंधे पर एक गिद्ध बैठाया गया. यह गिद्ध दिनभर जीवित प्रमथ्यु का मांस नोचकर खाता. रात में जब गिद्ध सोता तो प्रमथ्यु का मांस फिर से भर जाता क्योंकि वह अमर देवता था. सुबह से गिद्ध फिर वही क्रम शुरू कर देता.
प्रमथ्यु की चीखें इंसानों की बस्ती तक पहुंचती रहतीं. सुबह की पहली किरण के साथ बस्ती वाले उस पहाड़ के नीचे पहुंच जाते. वे दिनभर प्रमथ्यु की चीखों को तमाशे की तरह देखते और शाम को फिर अपने घर आ जाते.
जिन मनुष्यों के लिए सलीब पर टंगा प्रमथ्यु अपना मांस नुचवा रहा था और असहनीय पीड़ा झेल रहा था, वे उसकी लाई आग से आगे बढ़ रहे थे और उसकी बेबसी का उत्सव मना रहे थे.
कथा यहीं समाप्त होती है. लेकिन कथा में बताई बात कभी खत्म नहीं होती. वह हर महापुरुष पर लागू होती है, जिसे गोली से नहीं मारा जा सका. लिंकन और गांधी सौभाग्यशाली थे कि उन्हें गोली से मार दिया गया. नेहरू अभागे थे, जो देश की मरते दम तक सेवा करते रहे. जब तक वे सेवा कर रहे थे, जब तक वे स्वर्ग की आग भारत तक ला रहे थे, वे बहुत लाड़ले थे. उनके जाने के बाद हमने उनके पूरे किरदार को सलीब पर टांग दिया और गिद्ध की तरह उसे नोच रहे हैं.
पहाड़ी के नीचे खड़े होकर उनकी पीड़ा का तमाशा देखने का सिलसिला अब इतना लंबा हो गया है कि तमाशाइयों की नई पीढ़ी यह भूल ही गई है कि इस शख्स को किस बात की सजा दी जा रही है. आज नेहरू की पुण्यतिथि पर उन्हें फिर याद दिलाता हूं कि नेहरू का जुर्म यही था कि जब अंग्रेजी राज में वह सारे सुख भोग सकता था, तब वह बागी हो गया. जब नौजवान ही था तब उसने जलिंया वाला बाग हत्याकांड की रिपोर्ट विस्तार से तैयार की. वह उन चंद लोगों में था जो लोकमान्य तिलक की अंतिम यात्रा में गांधी के साथ चल रहा था. वह उन लोगों में था जिसके प्रभाव में आकर उसके पिता ने अपना घर-मकान सब कांग्रेस को दे दिया था. वह उन लोगों में था जो पहली बार अपने पिता के साथ जेल गया था. वह उन लोगों में था जो सरदार भगत सिंह से मिलने जेल गया था. और भगत सिंह की रिहाई के लिए अंग्रेजों से लड़ रहा था. कांग्रेस के अंदर वह सुभाष चंद्र बोस का सच्चा दोस्त था. अपनी पत्नी कमला की मौत के बाद उनकी चिता की एक चुटकी राख वह जीवन भर अपने साथ रखता रहा. महात्मा गांधी के अंतिम उपवास में चुपचाप खुद भी उपवास करने वाला वह विरला प्रधानमंत्री था. जब वह संसद में ट्रिस्ट विद डेस्टिनी का भाषण दे रहा था, तब उसके दिमाग में लाहौर के वे हिंदू मुहल्ले चल रहे थे, जहां का पानी काट दिया गया था.
वह इतना बुरा था कि जब दुनिया बमों के ढेर पर बैठी थी, तब भी शांति की बात करता था. उसकी शांति का ऐसा जलवा था कि कोरिया के गृहयुद्ध को अंतत: उसी ने एक समझौते पर पहुंचाया था. वह पूरी दुनिया में सम्मानित था और रहेगा.