दशकूपसमा वापी दशवापीसमो ह्रदः।
दशह्रदसमो पुत्रो दशपुत्रसमो द्रुमः॥
अर्थ (Meaning):
इस श्लोक के अनुसार,
10 कुओं के बराबर 1 बावड़ी (जलकुंड) होती है।
10 बावड़ियों के बराबर 1 तालाब (ह्रद) होता है।
10 तालाबों के बराबर 1 योग्य पुत्र का महत्व होता है।
और 1 वृक्ष (पेड़) 10 पुत्रों के समान संपूर्ण पृथ्वी का कल्याण और पोषण करने वाला होता है।
जो जीवन की आग जला कर आग बना है
फ़ौलादी पंजे फैलाए नाग बना है
जिसने शोषण को तोड़ा शासन मोड़ा है
जो युग के रथ का घोड़ा है
वह जन मारे नहीं मरेगा
नहीं मरेगा
~ केदारनाथ अग्रवाल
चाहे पाताल का धन मिल जाए या इंद्रपुरी का वैभव... यह आशा रूपी पिशाचिनी कभी शांत नहीं होने वाली।
इच्छाओं के पीछे भागना छोड़िए, क्योंकि मन को परम विश्राम और स्थिरता केवल प्रभु के चरणों में ही मिलेगी। 🤗😌
जो संपूर्ण ब्रह्मांड को अपनी एक भृकुटी से नष्ट कर सकते हैं, वे आज ब्रह्मा जी के वरदान का मान रखने के लिए रणभूमि से भाग खड़े हुए।
भक्तों की लाज और मर्यादा की रक्षा के लिए प्रभु कोई भी लीला रच सकते हैं।
बोलिए राजा रणछोड़राय की जय! 🚩
एक बार एक ऋषि ने सोचा की पाप धोने के लिए सभी लोग गंगा जाते हैं। ऐसे में सारे पाप गंगा में ही समा जाते हैं। इस तरह तो गंगा भी पापी हो जाएगी। उस ऋषि ने यह जानने के लिए आखिर पाप जाता कहां है, तपस्या की।
तपस्या करने के फलस्वरूप देवगण प्रकट हुए। तब ऋषि ने उनसे पूछा कि गंगा में जो पापा धोया जाता है वह कहां जाता है। तब भगवान ने कहा कि चलो गंगा जी से ही पूछते हैं इस बारे में। ऋषि और भगवान दोनों ने ही गंगा जी से पूछा कि हे गंगे! सब लोग तुम्हारे यहां पाप धोते हैं तो इसका मतलब क्या आप भी पापी हुईं?
तब गंगा ने कहा कि मैं कैसे पापी हो गई। मैं तो सभी पाप लेकर समुद्र को अर्पित कर देती हूं। इसके बाद ऋषि और भगवान समुद्र के पास गए और उनसे पूछा कि हे सागर! गंगा सभी पाप आपको अर्पित कर देती है तो क्या आप पापी हो गए?
तब समुद्र ने कहा कि वो कैसे पापी हुआ। वो सभी पाप को भाप बनाकर बादल बना देता है। अब ऋषि और भगवान दोनों ही बादल के पास गए। उनसे पूछा कि हे बादल! समुद्र पापों को भाप बनाकर बादल बना देते हैं तो क्या आप पापी हुए?
बादलों ने कहा, मैं कैसे पापी हुआ। मैं तो सभी पाप को वापस पानी बना देता हूं और धरती पर गिरा देता हूं। इससे ही अन्न उपजता है। इसे ही मानव खाता है। उस अन्न में जो अन्न जिस मानसिक स्थिति से उगाया जाता है और जिस वृत्ति से प्राप्त किया जाता है और जिस मानसिक अवस्था में खाया जाता है उसी के आधार पर मानव की मानसिकता बनती है।
यही कारण है कि कहा जाता है कि 'जैसा खाए अन्न, वैसा बनता मन।' जिस वृत्ति से अन्न प्राप्त किया जाता है और जिस मानसिक अवस्था में खाया जाता है, वैसा ही विचार मानव का बन जाता है। ऐसे में हमेशा भोजन शांत रहकर ही ग्रहण करना चाहिए। अन्न जिस धन से खरीदा जाए वह धन भी श्रम का होना चाहिए।✍️🙏
सोना मत ख़रीदो…
दरअसल हिसाब गड़बड़ है।
और इस बार कहानी सिर्फ़ सोने की नहीं है। कहानी उस उधार की है… जिसका ब्याज़ अमीर कमाएँगे, और किश्तें तुम भरोगे।
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2015 में एक योजना आई Sovereign Gold Bond
महामानव ने कहा ,“मित्रों, तुम सोना मत खरीदो, हमें पैसे दे दो। हम तुम्हारे नाम का सोना मान लेंगे। ऊपर से ढाई प्रतिशत ब्याज़ भी देंगे।”
वाह।
मतलब जनता का पैसा सरकार के पास…और जोखिम?
वो बाद में देखा जाएगा।
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अब ज़रा हिसाब सुनिए।
2017 में सरकार पर SGB की देनदारी थी लगभग 6,664 करोड़।
फिर सोने के दाम बढ़ते गए, रुपया गिरता गया, डॉलर महंगा होता गया।
और 2023-24 आते आते वही देनदारी पहुँच गई 68,598 करोड़ पर।
930% की छलांग।
सिर्फ़ सात साल में।
ब्रिटिश साम्राज्य इतने तेज़ नहीं फूला, जितनी तेज़ यह देनदारी फूली है।
और अब कुल अनुमानित बोझ?लगभग डेढ़ लाख करोड़।
हाँ… वही डेढ़ जिसके पीछे इतनी शून्य लगती हैं कि आम आदमी की पूरी ज़िंदगी कैलकुलेटर बन जाए।
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अब पूरा खेल समझिए।
जिसने चार किलो सोना बॉन्ड में खरीदा था…उसका क्या गया?
सोना महंगा हुआ फायदा उसका।ऊपर से 2.5% ब्याज़ अलग।
मतलब शादी भी उसकी… बैंड भी उसका… और बिल कौन भर रहा है?
हम आप।
क्योंकि सरकार पैसा पेड़ से नहीं तोड़ती।
सरकार जब ये क़र्ज़ चुकाती है तो,
GST से चुकाती है।
पेट्रोल से चुकाती है।
टोल से चुकाती है।
सिलेंडर से चुकाती है।
तुम्हारी सैलरी से चुकाती है।
तुम्हारी चुप्पी से चुकाती है।
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कहानी का सबसे ख़तरनाक हिस्सा क्या है जानते हो?
सरकार ने जनता से पैसा लिया सोने के नाम पर…
लेकिन उतना फिजिकल सोना खरीदा ही नहीं गया जितना बॉन्ड बेचे गए।
अब सोना आसमान छू रहा है।
मतलब जिसने उधार लिया था, उसे अब बाज़ार भाव पर लौटाना पड़ेगा।
और बाज़ार भाव तय कौन करता है? नोएडा का टॉमी मीडिया नहीं… डॉलर करता है।
यानी एक तरफ़ रुपया कमज़ोर।दूसरी तरफ़ सोना महंगा।तीसरी तरफ़ ब्याज़ अलग।
इसे अर्थशास्त्र में liability कहते हैं।
गाँव में इसे कहते हैं “उधार लेकर शादी करना और बाद में खेत बिकना।”
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मुझे हँसी तब आती है जब टीवी पर वही लोग कहते हैं, “देश आत्मनिर्भर बन रहा है।”
कौन सा आत्मनिर्भर?
जो देश अपना तेल डॉलर में खरीदता है…
सोना डॉलर में खरीदता है…और फिर जनता को रुपये में राष्ट्रवाद बेचता है?
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सबसे मज़ेदार बात देखिए।
जब सोना खरीदना था तब कहा गया,
“देशहित में डिजिटल गोल्ड लो।”
अब जब लौटाने की बारी आई है तो देशहित अचानक जनहित बन जाएगा।
फिर टैक्स बढ़ेंगे। फिर कोई नई सेस आएगी।
फिर कहा जाएगा,
“देश कठिन दौर से गुजर रहा है।”
देश नहीं गुजर रहा महामानव केअंधभक्तों…
देश को गुज़ारा जा रहा है।
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राजाओं ने युद्ध हारकर खजाने गिरवी रखे थे।
आज लोकतंत्र में वोट जीतने के लिए भविष्य गिरवी रखा जा रहा है।
पहले जनता तलवार देखकर डरती थी, अब EMI देखकर डरती है।
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और अंत में सबसे बड़ा सवाल…
अगर यह योजना इतनी महान थी तो सोना मत खरीदो की अपील बार-बार क्यों करनी पड़ रही है?
क्योंकि असली डर यह नहीं कि जनता सोना खरीद लेगी।
असली डर यह है कि जनता हिसाब समझ गई तो क्या होगा।
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याद रखिए…
सरकारें कभी अपना पैसा नहीं लगातीं, वे सिर्फ़ जनता के भविष्य पर मुहर लगाती है।
उधार उसने लिया।जोखिम अमीर ने कमाया। और किश्तें हम तुम भरने वाले हैं।
फिर भी अगर तुम्हें लगता है कि राजनीति सिर्फ़ टीवी डिबेट है…
तो अगली बार पेट्रोल भरवाते समय मीटर ज़रूर देखना।
कई बार देश का सबसे बड़ा आर्थिक भाषण पंप मशीन चुपचाप दे रही होती है।
(पोस्ट की प्रेरणा महक सिंह तरार से)
#VijayShukla
27 नक्षत्र मंत्र , वैदिक, पौराणिक और नक्षत्र देवता मंत्र एवं वनस्पति जानिये 🧵
हमारे जीवन में नक्षत्रों का भी उतना ही महत्व है जितना की नवग्रहों का, ऋषि मुनियों ने सम्पूर्ण नक्षत्रों को कुल 🟰 २७ नक्षत्रों में बांटा है और ज्योतिष शास्त्र के अंतर्गत नक्षत्र आते हैं।
पीड़ा परेशानी होने पर हम ग्रहों की पूजा, दान और जप तो करते हैं पर नक्षत्रों को भूल जाते हैं। यहाँ आपको नक्षत्रों की विस्तृत जानकारी उपलब्ध करवा रही हूँ जिसमें उनके वैदिक, पौराणिक मंत्र, नक्षत्र देवता के मंत्र और नक्षत्र मंत्र हैं। अपने नक्षत्र मंत्र के जप करके आप लाभ उठा सकते हैं उसे बलवान कर सकते हैं साथ ही नक्षत्र के वनस्पति के वृक्ष को लगा कर उसके सेवन करने या नक्षत्र नियत जल देते हुए मंत्र जप कर लाभ ले सकते हैं और यदि किसी कारण से नक्षत्र लाभ नहीं दे रहा हो तो उसे अपने पक्ष में लाभ देने वाला बना सकते हैं। आपके जन्म नक्षत्र कैसा है और आपके जीवन पर क्या प्रभाव दे रहा है इसके लिए किसी विद्वान पंडित जी या ज्योतिषी से संपर्क कर इस जानकारी का लाभ ले सकते हैं।
23. धनिष्ठा (स्वामी-मंगल): धनिष्ठा नक्षत्र में नए कपड़े पहने से नौकरी व्यवसाय में नये आय के स्त्रोत का योग बनते हैं।
24. शतभिषा (स्वामी-राहू): शतभिषा नक्षत्र में नए कपड़े पहने से बचे क्योकि नक्षत्र में नए कपड़े पहने से विष या किसी जीव जंतु क काटने का भय रहता है।
25. पूर्वा भाद्रपद (स्वामी-गुरू): पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र में नए कपड़े पहने से बचना चाहिये ये इस नक्षत्र में नए कपड़े पहने से स्वयं के लिये हानिकारक होता हैं।
26. उत्तर भाद्रपद (स्वामी-शनि): उत्तर भाद्रपद में यदि आपका जन्म हुवा हैं तो आपकी संतान को इस नक्षत्र में नए कपड़े नहीं पहना ने चाहिये नहीं तो उनके लिये हानिकारक हैं।
27. रेवती (स्वामी-बुध): रवती नक्षत्र में नए कपड़े पहने से एकाधिक स्त्रोत से धन लाभ प्राप्त होता हैं।
।। आलोचना ।।
मैंने दिन की भी आलोचना की
और रात की..
बरसात की और तपन की भी
सूर्य की आलोचना की
और चन्द्रमा की
पर्वतों को भी बतलाई उसकी सीमा,
और पठारों को उसकी ऊँचाई
इस तरह देश, दुनिया और भूगोलों से
मोल लेता रहा दुनिया भर के तनाव
और वे होते रहे अपमानित मेरी वजह से
तो क्या लोगों की तरह वे भी मेरे
कभी काम नहीं आएंगे
जब मुझे उनकी सबसे ज़्यादा
ज़रूरत होगी..
~तनुज
जो जीवन की धूल चाट कर बड़ा हुआ है
तूफ़ानों से लड़ा और फिर खड़ा हुआ है
जिसने सोने को खोदा लोहा मोड़ा है
जो रवि के रथ का घोड़ा है
वह जन मारे नहीं मरेगा
नहीं मरेगा
~ केदारनाथ अग्रवाल
एक गांव में एक बुजुर्ग महिला रहती थी। वो बहुत ही सरल (भोली) थी
जो जैसा कह देता था मान जाती थी। घर में बेटा बहू और नाती पोते थे। भोली दिनभर अपने नाती पोते को खिलाती रहती थी।वो कभी किसी से नहीं झगड़ती थी। मंदिर रोज दर्शन करने जाती थी।
सब पूंछे कि भोली मंदिर जाने से क्या मिलता है? तो भोली झट से कहती ठाकुर जी तो मिलते हैं।सब ठहाके मार के हंसते और भोली का मजाक उड़ाते थे।
भोली किसी का बुरा नहीं मानती थी हमेशा खुश रहती थी।
एक दिन मंदिर के पुजारी को किसी काम से बाहर जाना था। उन्होंने भोली से कहा, माई ठाकुर जी से मिलने तो रोज आती होl
दो दिन भगवान् की पूजा तथा सेवा करो और भोजन बना कर खिलाओ। हमें जरूरी काम से बाहर जाना है।
दो दिन मंदिर में ही रहना अपने ठाकुर जी के साथ। भोली मान गयी, बोली ठीक है जैसा बनेगा खिला देंगे।
दो दिन की तो बात है। ठाकुर जी की बात थी भोली कैसे मना करती। रोज मिलने भी जाती थी।
भोली भगवान को मूर्ति नहीं इंसान की तरह समझती थी। हमेशा पुजारी जी से कहती थी आप बहुत काम करते हैं।भगवान को रोज नहलाना, कपड़े पहनाना और फिर खाना बनाकर खिलाना, भगवान से कह दो अपना काम खुद करें। दिनभर सजे बैठे रहते हैं।
पुजारी जी जानते थे कि ये तो भोली है। इसको कैसे समझाया जाए। पुजारी जी भी हंसकर रह जाते थे।पुजारी जी भोली को मंदिर की जिम्मेदारी सौंपकर चले गए।
भोली ने बाल्टी पानी भरा और बोली.. ठाकुर जी जल्दी आओ अपने आप नहा लो।ठाकुर जी ने आकर स्नान किया बोली.. कपड़े पहनो जल्दी और ये चंदन रखा है तैयार हो जाओ।
ठाकुर जी ने सब काम स्वयं ही कर लिया। भोली ने रसोई बनाई, थाली परोस दी और कहा.. जल्दी अपने आप भोजन करो।ठाकुर जी ने भोजन कर लिया। फिर भोली ने साफ सफाई की और फिर थक गई।
फिर बोली ठाकुर जी अब सो जाओ। ठाकुर जी सो गए और भोली भी वहीं बैठ गई।जब ठाकुर जी सो गए तो वो भी आराम करने कमरे में चली गई। इसी तरह दो दिन बीत गए।
पुजारी जी जब आए तो भोली से पूछा हमारे ठाकुर जी की सेवा अच्छी तरह से की है ना।
भोली बोली.. हमने तो ठाकुर जी का बस भोजन बनाया, ठाकुर जी ने अपने सारे काम स्वयं किए। हम बूढ़े कैसे इतना काम करते।
भोली बोली हम बहुत थक गये है अपने घर जा रहे हैं।
पुजारी जी को भोली की बात पर विश्वास नहीं हुआ... बोले, भोली माई एक दिन और काम कर दो फिर चली जाना अपने घर, हम भी बहुत थके हुए हैं एक दिन आराम करलें तो ठीक रहेगा।
भोली किसी तरह मान गयी।
भोली फिर वैसे ही ठाकुर जी को बुलाने लगी। जैसे पहले बुलाया था, पुजारी जी छुपकर सब देख रहे थे।ठाकुर जी आए और अपने आप स्नान करने लगे।
जैसे ही पंडित जी ने ठाकुर जी के दर्शन किए। उनकी आंखों से आंसू बहने लगे, भगवान अंतर्ध्यान हो गए।पुजारी जी भोली के चरणों में गिर पड़े और कहने लगे, भोली माई तुम ने आज मुझे भगवान के दर्शन करा दिए। तुम धन्य हो मैया।
मैंने इतनी सेवा की परन्तु विश्वास की कमी थी.. आज मेरी आंखें खोल दीं। ऐसी है भोली मैया की कहानी।
भोले भक्तों के भगवान होते हैं। उन्हें छल कपट नहीं भाता..!!
जय जय श्री राधे🙏🏻
एक बार अवश्य पढे ?? एक चतुर व्यक्ति को काल से बहुत डर लगता था। एक दिन उसे चतुराई सूझी और काल को अपना मित्र बना लिया,उसने अपने मित्र काल से कहा- मित्र, तुम किसी को भी नहीं छोड़ते हो, किसी दिन मुझे भी गाल में धर लोगे। काल ने कहा- ये मृत्यु लोक है. जो आया है उसे मरना ही है. सृष्टि का यह शाश्वत नियम है इस लिए मैं मजबूर हूं. पर तुम मित्र हो इसलिए मैं जितनी रियायत कर सकता हूं, करूंगा ही. मुझ से क्या आशा रखते हो साफ-साफ कहो।
व्यक्ति ने कहा- मित्र मैं इतना ही चाहता हूं कि आप मुझे अपने लोक ले जाने के लिए आने से कुछ दिन पहले एक पत्र अवश्य लिख देना ताकि मैं अपने बाल- बच्चों को कारोबार की सभी बातें अच्छी तरह से समझा दूं और स्वयं भी भगवान भजन में लग जाऊं। काल ने प्रेम से कहा- यह कौन सी बड़ी बात है, मैं एक नहीं आपको चार पत्र भेज दूंगा. चिंता मत करो. चारों पत्रों के बीच समय भी अच्छा खासा दूंगा ताकि तुम सचेत होकर काम निपटा लो।
मनुष्य बड़ा प्रसन्न हुआ सोचने लगा कि आज से मेरे मन से काल का भय भी निकल गया, मैं जाने से पूर्व अपने सभी कार्य पूर्ण करके जाऊंगा तो देवता भी मेरा स्वागत करेंगे। दिन बीतते गये आखिर मृत्यु की घड़ी आ पहुंची. काल अपने दूतों सहित उसके समीप आकर बोला- मित्र अब समय पूरा हुआ. मेरे साथ चलिए. मैं सत्यता और दृढ़तापूर्वक अपने स्वामी की आज्ञा का पालन करते हुए एक क्षण भी तुम्हें और यहां नहीं छोड़ूंगा। मनुष्य के माथे पर बल पड़ गए, भृकुटी तन गयी और कहने लगा- धिक्कार है तुम्हारे जैसे मित्रों पर.
मेरे साथ विश्वासघात करते हुए तुम्हें लज्जा नहीं आती? तुमने मुझे वचन दिया था कि लेने आने से पहले पत्र लिखूंगा. मुझे बड़ा दुःख है कि तुम बिना किसी सूचना के अचानक दूतों सहित चढ़ आए. मित्रता तो दूर रही तुमने अपने वचनों को भी नहीं निभाया। काल हंसा और बोला- मित्र इतना झूठ तो न बोलो. मेरे सामने ही मुझे झूठा सिद्ध कर रहे हो. मैंने आपको एक नहीं चार पत्र भेजे. आपने एक भी उत्तर नहीं दिया। मनुष्य ने चौंककर पूछा – कौन से पत्र? कोई प्रमाण है?
मुझे पत्र प्राप्त होने की कोई डाक रसीद आपके पास है तो दिखाओ। काल ने कहा – मित्र, घबराओ नहीं, मेरे चारों पत्र इस समय आपके पास मौजूद हैं। मेरा पहला पत्र आपके सिर पर चढ़कर बोला, आपके काले सुन्दर बालों को पकड़ कर उन्हें सफ़ेद कर दिया और यह भी कहा कि सावधान हो जाओ, जो करना है कर डालो। नाम, बड़ाई और धन-संग्रह के झंझटो को छोड़कर भजन में लग जाओ पर मेरे पत्र का आपके ऊपर जरा भी असर नहीं हुआ। बनावटी रंग लगा कर आपने अपने बालों को फिर से काला कर लिया और पुनः जवान बनने के सपनों में खो गए.
आज तक मेरे श्वेत अक्षर आपके सिर पर लिखे हुए हैं। कुछ दिन बाद मैंने दूसरा पत्र आपके नेत्रों के प्रति भेजा. नेत्रों की ज्योति मंद होने लगी। फिर भी आंखों पर मोटे शीशे चढ़ा कर आप जगत को देखने का प्रयत्न करने लगे. दो मिनिट भी संसार की ओर से आंखे बंद करके, ज्योतिस्वरूप प्रभु का ध्यान मन में नहीं किया। इतने पर भी सावधान नहीं हुए तो मुझे आपकी दीनदशा पर बहुत तरस आया और मित्रता के नाते मैंने तीसरा पत्र भी भेजा। इस पत्र ने आपके दांतो को छुआ, हिलाया और तोड़ दिया।
आपने इस पत्र का भी जवाब न दिया बल्कि नकली दांत लगवाये और जबरदस्ती संसार के भौतिक पदार्थों का स्वाद लेने लगे। मुझे बहुत दुःख हुआ कि मैं सदा इसके भले की सोचता हूँ और यह हर बात एक नया, बनावटी रास्ता अपनाने को तैयार रहता है। अपने अन्तिम पत्र के रूप में मैंने रोग- क्लेश तथा पीड़ाओ को भेजा परन्तु आपने अहंकार वश सब अनसुना कर दिया। जब मनुष्य ने काल के भेजे हुए पत्रों को समझा तो रोने लगा और अपने विपरीत कर्मो पर पश्चाताप करने लगा.
उसने स्वीकार किया कि मैंने गफलत में इन पत्रों को नहीं पढ़ा। मैं सदा यही सोचता रहा कि कल से भगवान का भजन करूंगा. अपनी कमाई अच्छे शुभ कार्यो में लगाऊंगा, पर वह कल नहीं आया। काल ने कहा – आज तक तुमने जो कुछ भी किया, राग-रंग, स्वार्थ और भोगों के लिए किया. जान-बूझकर ईश्वरीय नियमों को तोड़कर जो काम करता है, वह अक्षम्य है। मनुष्य वोने काल को करोड़ों की सम्पत्ति का लोभ दिखाया। काल ने हंसकर कहा- मित्र यह मेरे लिए धूल से अधिक कुछ भी नहीं है.
धन-दौलत, शोहरत, सत्ता, ये सब लोभ संसारी लोगो को वश में कर सकता है, मुझे नहीं। मनुष्य ने पूछा- क्या कोई ऐसी वस्तु नहीं जो तुम्हें भी प्रिय हो, जिससे तुम्हें लुभाया जा सके. ऐसा कैसे हो सकता है! काल ने उत्तर दिया- यदि तुम मुझे लुभाना ही चाहते थे तो सच्चाई और शुभ कर्मो का धन संग्रह करते. यह ऐसा धन है जिसके आगे मैं विवश हो सकता था. अपने निर्णय पर पुनर्विचार को बाध्य हो सकता था. पर तुम्हारे पास तो यह धन धेले भर का भी नहीं है।
इसलिए, बस वो जोड़ो जो ऊपर ले जा सको।
कहावतों का गुड़-गोबर करते लोग —
मैं कई बार एक राजस्थानी कहावत सुन चुका हूँ जो इस प्रकार कही जाती है —
“जाट, जुंवाई, भांणजा, रेबारी, सुनार
कदे न होवे आपणों , कर देखो व्योहार”
जबकि सच्चाई यह है कि असली कहावत कुछ और है । आज सोशल मीडिया पर एक मोहतरमा ने इस कहावत को अपलोड करके इसका असली अर्थ जानने की जिज्ञासा प्रकट की तब मुझे लगा कि सोशल मीडिया पर असली कहावत और उसका अर्थ पोस्ट करना चाहिए, हालाँकि मैंने उनकी ट्वीट को क़ौट करते हुए अपनी बात कह दी लेकिन व्यापक पहुँच के लिए इस कहावत की वास्तविकता पर फिर से अपनी बात रख रहा हूँ
असली कहावत की पहली लाइन ये है 👇🏻
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जार -जुआरी -बारजा -राह बारे सुनार —
अर्थात् जाट नहीं जार , जुंवाई नहीं जुआरी, भाणजा नहीं बारजा, रेबारी और सुनार नहीं राह बारे सुनार अर्थात् बिना स्थाई ठिकाने के सोना बेचने वाला व्यक्ति -
यहाँ जार का अर्थ है जाल-साज इंसान, जुआरी यानि जुआ खेलने वाला, बारजा उस व्यक्ति को कहते थे जो किसी चोर के पीछे या किसी खोए हुए पशु को ढूँढने के लिए निकला हो और राह-बारे सुनार का अर्थ है गली-गली घूमकर सोना बेचने वाला । अगर इस कहावत का अर्थ खोला जाए तो इसका मतलब है जार अर्थात जाल साज से सचेत रहो क्योंकि वो बातों के ज़रिए आपका विश्वास जीतकर धोखा करेगा, जुआरी पर भरोसा हमेशा घाटा देता है क्योंकि वो कहेगा कि मुझे कुछ पैसे दे दो अगली बाजी में वापस कर दूँगा, अगली बाज़ी वो जीतेगा या जो है वही गँवा देगा इसका क्या पता ! तो उसको अगर इस आस में उधार दे दिया कि वो अगली बाज़ी जीतकर वापस कर देगा तो समझो आपका पैसा गया— साथ ही यह ग़ैर -क़ानूनी भी तो है । जब पुराने समय में चोर के पीछे बार चढ़ते थे या किसी खोए पशु के पीछे बार चढ़ते थे तब ये तय नहीं होता था कि चोर या पशु कहाँ मिलेगा, कब मिलेगा, मिलेगा भी या नहीं — मान लो बार चढ़ा हुआ कोई व्यक्ति आपके गाँव में आ जाए और आपसे कहे कि मैं बार चढ़ा हुआ हूँ और मेरे खोए पशु या चोर के पीछे लगा हुआ हूँ आप मुझे सवारी के लिए अपना ऊँट दे दो, मैं वापसी में आपको लौटा दूँगा —तो इस बात का क्या भरोसा की वो व्यक्ति कब लौटेगा, उसी रास्ते से लौटेगा या नहीं, क्योंकि उसकी कोई निश्चित दिशा-दूरी-अवधि तो होती नहीं, ना ही कोई ठिकाना होता है इसलिए ऐसे व्यक्ति को अपना पशु देना मतलब उससे हाथ धोना है । राह- बारे सुनार अर्थात् हम जो सोना दुकान से खरीदते है उसमें कोई खोट हो तो हम सुनार को जाकर उससे बात कर सकते हैं क्योंकि दुकान उसका स्थायी ठिकाना है लेकिन किसी राह चलते सोना बेचने वाले से हमने सोना ले लिया तो नकली होने पर वापस मोड़ने किसके पास जाएँगे, यानि कोई गली-गली घूमकर सोना बेच रहा है तो उससे सोना मत ख़रीदो वरना ठगे जाओगे।
किसी शरारती तत्व ने इन शब्दों को तोड़ -मरोड़ दिया जबकि कॉमन सेंस की बात ये है कि जाट और रेबारी तो मेहनती और सीधी -साधी क़ौम है जो अनजान इंसान को भी राम -राम कहकर पानी पिलाती है । पश्चिमी राजस्थान के जाटों के गांवों में तो सदियों से नासेटू की परंपरा रही है अर्थात् गाँव से गुजरने वाले अनजान व्यक्ति को रात बासा और भोजन प्रदान करना । इसी तरह सुनार भी एक मेहनत कश क़ौम रही है एक अँगूठी घड़ने में भी हजारों हथौड़ी मारनी पड़ती है जड़ाऊ गहनों में इनकी कला का कोई सानी नहीं और सबसे महंगी धातु इनसे ख़रीदकर ही हम शान से चलते हैं । जाट राजस्थान की प्रमुख किसान जाति है और रेबारी प्रमुख पशुपालक— खेती व पशुपालन हमारे प्रदेश की अर्थ व्यवस्था का आधार रहे हैं । जँवाई को जब बेटी दे दी तब उससे बड़ा भरोसा और क्या होता है इसी तरह भानजे का मामा के साथ रिश्ता तो प्रेम -आदर और विश्वास की अनूठी मिसाल रहा है आज भी है । ऐसे में ये शब्द ख़ुद ही बयान कर रहे हैं कि ये मूल कहावत के साथ की गई शरारत है जिसका कोई तुक नहीं है । मेरा मानना है कि सभी जाति अच्छी है सबसे महत्वपूर्ण है उन्हें देखने और समझने का हमारा नज़रिया कैसा है वैसे भी मूल्यांकन तो इंसान का होता है जाति या किसी रिश्ते का नहीं ।सादर— प्रोफेसर श्यामसुन्दर ज्याणी, बीकानेर