Believe it or not-4
यह वी. कामकोटि हैं आईआईटी मद्रास के निदेशक।15 जनवरी 2025 को चेन्नई में एक गोशाला में दिए गए भाषण इन्होंने उदाहरण दिया कि जिसने तेज बुखार में गोमूत्र पीकर 15 मिनट में ठीक हो जाता है।
केवल इतना नहीं इन्होंने कहा कि गोमूत्र में एंटी-बैक्टीरियल, एंटी-फंगल और पाचन संबंधी गुण हैं, जो IBS जैसी समस्याओं में भी फायदेम��द हो सकता है।
खैर खबर यह नहीं है। खबर यह है कि यह भाषण देने वाले कामकोटि प्रधानमंत्री द्वारा पेपर लीक के बाद परीक्षा प्रणाली में सुधार के लिए बनाई गई टास्क फोर्स का हिस्सा हैं।
बधाई भारत! हमारा सारनाथ अब विश्व धरोहर है। सरकार का प्रयास सफल रहा।
भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद पहला उपदेश यहीं दिया था। भारत का राजचिह्न सारनाथ के अशोक स्तंभ के चार सिंहों पर आधारित है। यहीं मिले अशोक चक्र को तिरंगे के मध्य में स्थान दिया गया है। तीर्थ के लिए जाएं।
-देश के छात्रों व युवाओं केे आन्दोलन के चलते आज केन्द्रीय शिक्षा मन्त्री श्री धर्मेन्द्र प्रधान द्वारा इस्तीफा द���ये जाने का फैसला उचित, जो यह पहले ही ले लिया जाता तो बेहतर होता। साथ ही, हमारी पार्टी केन्द्र सरकार से यह भी अपेक्षा करती है कि जिन पुलिसकर्मियों ने जन्तर-मन्तर पर शान्तिमय ढंग से प्रदर्शन कर रहे निहत्ते लड़के व लड़कियों पर बरबर्तापूर्वक लाठी, डन्डों आदि से चोट पहु��चायी है जिससे ये बड़ी संख्या में गम्भीर रूप से घायल हुए, उनपर सख़्त कार्रवाई की जानी चाहिये।
-और ख़ास तौर से जिन पुरूष पुलिसकर्मियों ने लड़कियों के साथ बेहूदा व शर्मनाक बदसलूकी की और बल प्रयाग किया, उनको चिन्हित करके, उनके खिलाफ अनुशासनिक एवं क्रिमनल केस चला कर सख़्त से सख़्त क़ानूनी कार्रवाई की जानी चाहिये, जिससे कि भविष्य में इस तरह की घिनौनी हरकत करने की कोई हिम्मत ना कर सके।
- इसके साथ-स���थ, सरकार को आन्दोलन कर रहे छात्रों व युवाओं के ख़िलाफ जो भी FIR या complaint दायर की गई है, उन सभी को वापस ले लिया जाये, जिससे इनको आगे चलकर थानों व कोर्ट कचहरी के चक्कर ना काटने पड़े और इस वजह से उनका भविष्य भी ख़राब ना हो, जिससे फिर देश में सौहार्दपूर्ण वातावरण बन सके।
- साथ ही मेरा सभी आन्दोलनकारियों से यह कहना है कि वो इस मा��ले में किसी भी पार्टी को उनके इस संघर्ष का राजनीतिकरण ना करने दें तथा अपने भविष्य को भी ख़राब ना होने दें।
1.देश मे��� नीट-यूजी सहित विभिन्न परीक्षाओं के पेपरलीक व उसके उपरान्त परीक्षार्थियों द्वारा होने वाली आत्महत्याओं से उपजे छात्र-छात्राओं/युवाओं के ���कॉकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) आन्दोलन के नई दिल्ली जन्तर-मन्तर में लगातार जारी शान्तिपूर्ण धरना को हालाँकि लोगों की व्यापक सहानुभूति हासिल है, किन्तु सरकारी जवाबदेही के रूप में केन्द्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की उनकी ज़िद्दी माँग को लेकर विपक्ष व सरकार दोनों के बीच ज़बरदस्त राजनीति का बाज़ार काफी गर्म है, जिससे शिक्षा व्यवस्था में ज़रूरी व्यापक सुधार का असली मुद्दा ही कहीं लुप्त ना हो जाये?
2.वैसे इस गर्म मुद्दे को भुनाने हेतु विशेषकर विरोधी पार्टियों में सड़क से लेकर संसद तक में ज़बरदस्त होड़ लगी हुई है, उससे भी सरकार व विपक्ष के बीच तनाव व टकराव की भी परिस्थिति हिंसक होकर किसी न किसी रूप में राज्यों में भी फैल रही हैै, जिससे अपनी पार्टी के लोगों को सचेत व सजग रहने की सलाह।
3.इस प्रकार इस मुद्दे का पूरी तरह से राजनीतिकरण हो जाने के साथ ही जन्तर-मन्तर में ��न्दोलनकारियों के विरुद्ध पुलिस की कार्रवाईयों ने स्थिति को और अधिक गर्म व गंभीर बना दिया है।
4.इस भारी तनाव व टकरावपूर्ण स्थिति के कारण संसद का वर्तमान मानसून सत्र अभी तक एक दिन भी सही व सुचारू रूप से नहीं चल पाया है, जिससे देश व जनहित के और भी अनेकों महत्वपूर्ण मुद्दों पर सरकार की जवाबदेही एक प्रकार से रुक सी गयी है।
5.इसके साथ ही, सरकार सीजेपी के आन्दोलन से निपटने हेतु जो उपाय ढूंढने का प्रय���स कर रही है वह भ्रष्टाचार एवं अयोग्यता आदि के कारण होने वाले पेपरलीक होने के बाद की सख़्त कार्रवाई के द्योतक हैं, जबकि पेपरलीक के जघन्य अपराध ना हों इसके नियंत्रण हेतु उचित उपाय नहीं होता दिखने से भी लोगों में असंतोष बढ़ रहा है।
6.इसलिये वर्तमान राजनीतिक हालात में उग्र व निराश होने के बजाय अपने लागों को अपने मिशन के प्रति पूरी लगन व तन, मन, धन से लगातार डटे रहना है, यही अपील।
आज के डेट में सारी पार्टियां सिर्फ राजनीति कर रही है और जनता का आखरी उमीद बसपा बहन जी है आज 69000 शिक्षक भर्ती अभ्यर्थियों ने बसपा कार्यालय का घेराव किया और उनकी आख���री उम्मीद बहन जी और उन्हें पता है कि न्याय सिर्फ बसपा ही दिला सकती है सभी पार्टियों को बयान बाजी करती है @Mayawati
बहुजन समाज के लोग आज जिस गर्व और जोश के साथ जय भीम का नारा लगा रहे हैं, ��सके पीछे मुख्य रूप से मान्यवर कांशीराम साहब और बहन मायावती जी का संघर्ष है। जहाँ-जहाँ उनका आंदोलन पहुँच पाया, वहाँ बहुजन समाज राजनीतिक और सामाजिक रूप से मजबूत हुआ। कई राज्यों में बहुजन समाज के नेता मुख्यमंत्री तक बने, और यह दशकों के संघर्ष का परिणाम है।
इसलिए बहन जी की बात को शांत मन से समझिए। वह जो कहती हैं, उसमें आपके और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की चिंता और हित निहित है।
1.काकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) का देश की राजधानी नई दिल्ली में संसद के नज़दीक जन्तर मन्तर में पिछले कई दिनों से, ख़ासकर मेडिकल की नीट जैसी विशेष परीक्षा आदि में पेपरलीक व अन्य गड़बडियों के दुष्परिणामों से छात्र-छात्राओं व उनके परिवार के काफी बुरी तरह से प्रभावित हो रहे जीवन को लेकर जारी अनिश्चितकालीन आन्दोलन के कारण सड़क से लेकर संसद तक में ज़बरदस्त हंगामा बरपा है और अब इसका राजनीतिकरण करने से यह मुद्दा सरकार के साथ सीधे टकराव का हो ग��ा है, जिस विषम स्थिति से देश को निकालना ज़रूरी है, क्योंकि इससे दिल्ली में ही नहीं बल्कि विभिन्न राज्यों में भी आम जनजीवन प्रभावित हो रहा है।
2.वैसे चाहे पूरे देश में अयोध्या श्रीराम मन्दिर में चढ़ावा चोरी/ग़बन आदि का गर्म मामला हो या फिर आल-इण्डिया व राज्यों की परीक्षाओं आदि में पेपरलीक का मुद्दा हो, यह सभी मूलतः भ्रष्टाचार के हर स्तर पर पनपने का ही परिणाम है।
3.इसके साथ ही यह संवैधानिक नैतिकता (constitutional morality) से भी जुडा़ मामला है, जिसके अभाव में यह देश को दीमक की तरह खाता चला आ रहा है, जबकि संविधान निर्माता परमपूज्य बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर ने गुड गवरनेन्स हेतु इस पर ख़ास ध्यान देने की ज़रूरत पर विशेष बल दिया है।
4.संक्षेप में मेरा यही कहना है कि देश व जनहित से जुड़े वर्तमान विकट हालात के सौहार्दपूर्ण समाधान हेतु सरकार तथा माननीय कोर्ट जैसी संवैधानिक संस्थाओं को अपनी भूमिका निभ��ने की पहल करनी चाहिये तो यह बेहतर होगा।
5.साथ ही, सीजेपी के व्यापक हो रहे आन्दोलन का अब विभिन्न राजनीतिक पार्टियों द्वारा अपने-अपने संकीर्ण स्वार्थ में राजनीतिकरण करके सड़क से लेकर संसद तक में टकराव व हिंसा किया जाना घोर अनुचित। सरकार व आन्दोलनकारी दोनों मिलकर इसका शान्ति व सौहार्दपूर्ण समाधान जितना जल्द निकालें उतना ही उचित।
अनुराग...
तुम्हारे लिए तो आज भी दिल विश्वास ही नहीं कर पा रहा है।
हमारे देश के कर्मठ, बहादुर और निर्भीक IPS अफसरों में आपकी गिनती होती रही है।
1984 के दंगों की संवेदनशील SIT को अनुराग ने ही लीड किया था। देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) का उन पर इतना अटूट विश्वास था कि उन्होंने स्पष्ट कहा था कि कार्यकाल की अवधि पूरी होने के बाद भी अनुराग ही इस जांच को लीड करते रहेंगे।
"हम NPA (नेशनल पुलिस एकेडमी) के प्रशिक्षण के दिनों में साथ थे, संयुक्त राष्ट्र (UN) मिशन कोसोवो में भी कंधे से कंधा मिलाकर साथ रहे। हर हाल में, हर परिस्थिति में लड़ते रहने वाला एक ठोस, चट्टान सा बहादुर योद्धा... आखिर कैसे?"
अनुराग, तुम्हारा यूं चले जाना मन को एक कभी न भरने वाला शून्य दे गया है। विश्वास नहीं होता कि इतनी मजबूत हिम्मत वाला साथ��� आज हमारे बीच नहीं है।
अंधेरा चाहे कितना भी घना क्यों न हो, ज़िन्दगी हमेशा एक और मौका देती है... काश तुमने उस मोड़ पर एक बार पीछे मुड़कर देखा होता।
दुख की इस कठिन घड़ी में, हम पूरी मजबूती के साथ तुम्हारे परिवार के साथ खड़े हैं। ईश्वर तुम्हें शांति दे, मेरे दोस्त।
#AlwaysInOurHearts #IPSAnurag #RestInPeace #MentalHealthMatters #YouWillBeMissed
कल दिल्ली में हुई घटनाओं से मन दुखी भी है और गर्व से भरा भी।
हमारे युवाओं और Gen-Z ने साबित कर दिया है कि वे दूसरे देशों के मुकाबले कितने अलग हैं। लाठी और आंसू गैस के बीच संयम, आक्रोश के साथ अहिंसक बर्ताव और दुख में साहस तथा संकल्प - यह भारत के डीएनए की ताकत है। ये बच्चे किसी बहकावे में नहीं आए हैं, वे हमारे अप���े बच्चे हैं और देश के भविष्य की बागडोर संभालने वाले हैं। पुरानी पीढ़ी तो सिर्फ कुछ सालों के लिए केयरटेकर भर है।
हमें अब पारंपरिक राजनीति से ऊपर उठकर 'करुणामय शासन' (Compassionate Governance) की आवश्यकता है। करुणा दया या सहानुभूति नहीं, बल्कि दूसरों की पीड़ा को अपनी तकलीफ की तरह महसूस करके संवाद बनाना और निष्पक्ष ��माधान निकालना है।
जब मैं दुनिया भर में करुणा के वैश्वीकरण (Globalisation of Compassion) के लिए कार्यरत हूँ, तो अपने देश की सरकार और समाज से भी यही अपेक्षा करता हूँ कि वे इन बच्चों के साथ तुरंत करुणामय संवाद और समाधान का मार्ग अपनाएं।
आज कर्नाटक के मैसूर में आरक्षण के जनक कहे जाने वाले कोल्हापुर नरेश छत्रपति शाहू महाराज जी की जयंती पर बामसेफ द्वारा कार्यक्रम आयोजित किया गया जिसमें मुख्य रूप से @AnandAkash_BSP जी शामिल हुए।
आज आकाश आनंद जी का कार्यक्रम था और अधिकतर पार्टी के कार्यकर्ताओं मालूम ही नहीं था कि आकाश आनंद जी का कोई कार्यक्रम है या कोई कार्यक्रम की फोटो वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड ह���, ये खबर मुझे ख़ुद एक चेन्नई के बसपाई साथी से प्राप्त हुई थी।
आख़िरकार पार्टी की सोशल मीडिया पर निष्क्रियता क्यों? आख़िर आप लोगों क्यों नहीं एहसास कराना चाहते हैं कि आकाश आनंद बैठा नहीं है बल्कि महापुरुषों की विचारधारा पर चलकर उनके मिशन को लेकर सक्रिय हैं और इस मिशन को बहुत आगे तक ले जाने के लिए हम अपनी तैयारी में लगे हुए हैं।
��त्तर प्रदेश की माननीय राज्यपाल सुश्री आनंदीबेन पटेल का बयान चर्चा में है। उन्होंने राज्य सरकार की स्कूटी योजना की अव्यावहारिक शर्तों का उदाहरण देते हुए नौकरशाही (IAS) के काम करने के तौर-तरीकों पर एक बड़ा सवाल उठाया है। उन्होंने साफ संदेश दिया- "नीति निर्धारण व्यावहारिक होना चाहिए।"
प्रशासनिक व्यवस्था और IAS अधिकारियों की कार्यशैली को लेकर उनका यह आक्रोश, चिंता और खरी-खरी बातें बिल्कुल जाय�� हैं। मैं उनके इस विचार से सौ प्रतिशत सहमत हूँ। जब तक सरकारी नीतियां सिर्फ फाइलों और कागजों में खूबसूरत दिखेंगी और जमीन पर लागू होने लायक नहीं होंगी, तब तक लोक कल्याण का वास्तविक उद्देश्य कभी पूरा नहीं होगा।
नीति निर्माण में व्यावहारिकता का यह अभाव ही हमारी पूरी प्रशासनिक मशीनरी की सबसे बड़ी कमजोरी है। और इसका हल केवल आलोचना करने में नहीं है, बल्कि समस्या की जड़ तक जाकर पूरे 'सिस्टम' को बदलने में है। इसका ठोस और व्यावहारिक समाधान क्या है?
संविधान के लागू होने के 76 वर्ष बाद अब समय आ गया है कि हम भारतीय नौकरशाही के उस प्रसिद्ध ‘स्टील फ्रेम’ पर गंभीरता से पुनर्विचार करें, जिसे कभी प्रशासन की रीढ़ माना गया था। क्या यह व्यवस्था आज भी अपने मूल उद्देश्य पर खरी उतर रही है? क्या इसकी निष्पक्षता और ईमानदारी को सुरक्षित रखने वाले तंत्र प्रभावी हैं? क्या इसमें योग्य प्रतिभाओं को हम ला पा रहे हैं? और सबसे बड़ा प्रश्न: क्या यह ‘स्टील फ्रेम�� विकसित भारत के लिए उपयुक्त है, या अब समय आ गया है कि इसे अधिक लचीले, तेज और उत्तरदायी ढांचे, जैसे कार्बन फाइबर, से बदल दिया जाए?
व्यक्ति नहीं, सिस्टम!
एक आदर्श नौकरशाही की पहचान कुछ स्टार अधिकारियों से नहीं, बल्कि मजबूत सिस्टम से होती है। चुनाव प्रबंधन इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। चुनाव आयोग ने ऐसी प्रक्रियाएं और व्यवस्थाएं विकसित की हैं, जहां सफलता का श्रेय किसी एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि लाखों ��र्मियों के सा��ूहिक प्रयास को मिलता है। यही कारण है कि दुनिया के कई नवोदित लोकतंत्रों ने भारत के इस मॉडल को अपनाया है। दूसरा सिस्टम, आपदा प्रबंधन का है, जहां भारत ने बहुस्तरीय संस्थागत ढांचा विकसित करने में सफलता प्राप्त की है। आह भारत न केवल अपने संकटों से प्रभावी ढंग से निपटता है, बल्कि अन्य देशों की सहायता भी करता है। इन सफलताओं के समानांतर एक कठोर सच्चाई भी मौजूद है। अनेक क्षेत्रों में सिस्टम आज भी कमज���र है: जमीन की खरीद-फरोख्त, यातायात प्रबंधन, हाउस टैक्स संग्रह, नगर बसावट, आदि।
भर्ती: समस्या की जड़
किसी भी विभाग की गुणवत्ता उसकी भर्ती प्रक्रिया से तय होती है और यहीं सबसे बड़ी चुनौती छिपी है। UPSC जैसी प्रतिष्ठित परीक्षा के माध्यम से विभिन्न सेवाओं के लिए अधिकारियों का चयन किया जाता है। विडंबना यह है कि भारतीय विदेश सेवा के लिए चयनित अधिकारियों ने राजनीति शास्त्र का अध्ययन नहीं किया होता ���ै और न ही कोई विदेशी भाषा जानते हैं। कर और लेखा अधिकारी अकाउंट्स या आडिट की पढ़ाई नहीं किए होते। सबसे अहम बात यह है कि IAS को छोड़कर अधिकांश अभ्यर्थी उस सेवा में जाने का लक्ष्य लेकर नहीं आते, जिसमें उन्हें नियुक्त किया जाता है। जब न योग्यता हो और न रुचि, तो उत्कृष्टता की उम्मीद कैसे की जा सकती है? इस स्थिति को बदलने के लिए आवश्यक है कि विभिन्न सेवाओं जैसे विदेश सेवा, राजस्व, पुलिस, आडिट के लिए अलग-अलग परीक्षा प्रणालियां विकसित की जाएं। इस दिशा में कुछ सकारात्मक प्रयोग हुए भी हैं। उत्तर प्रदेश में हास्पिटैलिटी क्षेत्र के स्नातकों को कार्यालयों में व्यवस्था अधिकारी, मीडिया स्नातकों को सूचना अधिकारी और माइनिंग स्नातकों को खनन अधिकारी के रूप में नियुक्त किया गया है। इसके उत्साहजनक परिणाम सामने आए हैं। इसे आगे बढ़ाना होगा।
विशेषज्ञता की कमी
आज की प्रशासनिक संरचना में विशेषज्ञता का गंभीर अभाव दिखाई दे��ा है। लोक नीति के क्षेत्र में काम करने वाले अधिकारियों का चयन उनके ज्ञान के आधार पर नहीं होता। परिणाम, चाहे ��ार्वजनिक शौचालय का प्रबंधन हो या मेडिकल कॉलेज का निर्माण, हमारा सिस्टम प्रभावी व्यवस्था बनाने में सफल नहीं होता। नगर आयुक्तों द्वारा नगरीय प्रशासन की शिक्षा नहीं ली गई होती। पुलिस अधिकारियों को सर्विस में कानून, फॉरेंसिक विज्ञान की डिग्री लेने या, शारीरिक फिटनेस को अच्छा रखने के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं है। ग्राम सचिव के चयन के लिए भी ग्रामीण विकास की पढ़ाई जरूरी नहीं होती। हाँ, कुछ अधिक��री बहुत अच्छा काम करते हैं, लेकिन वे अपवाद हैं, सामान्य परिस्थिति नहीं।
प्रतिस्पर्धा और विकल्प का अभाव
जहां प्रतिस्पर्धा नहीं होती, वहां ठहराव आ जाता है। पोस्टिंग में प्रायः योग्यता या रुचि का ध्यान नहीं रखा जाता। इसके विपरीत, भारतीय राजस्व सेवा में एक व्यवस्थित, विकल्प-आधारित प्रणाली देखने को मिलती है। उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग ने भी ‘चॉइस-कम-मेरिट’ मॉडल अपनाकर सकारात्मक परिणाम प्��ाप्त किए हैं। यदि अन्य मंत्रालय भी इस दिशा में कदम बढ़ाएं- जैसे स्वास्थ्य मंत्रालय में डाक्ट��ों को नीति निर्माण में लगाया जाए तो सकारात्मक परिणाम मिलेंगे। भारतीय वन सेवा के अधिकारियों को वन मंत्रालय में नियुक्त होना चाहिए। शिक्षकों को शिक्षा मंत्रालय में और वित्तीय विशेषज्ञों को वित्त मंत्रालय में नियुक्त होना चाहिए।
लैटरल एंट्री और एग्जिट की आवश्यकता समय की मांग है कि प्रशासनिक व्यवस्था में लचीलापन लाया जाए। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र जैसी प्रणाली अपनाई जा सकती है, जहां प्र��फेशनल्स को निश्चित अवधि के लिए नियुक्त किया जाता है और हर कार्यकाल के बाद उन्हें पुनः प्रतिस्पर्धा में शामिल होना पड़ता है। इससे पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ती है। इसी सिद्धांत को जमीनी स्तर तक भी लागू किया जा सकता है। ग्राम प्रधानों द्वारा सचिवों के असहयोग की शिकायतें आम हैं। ऐसे पदों के लिए पारदर्शी चयन प्रक्रिया, जिसमें प्रधान का मुख्य रोल हो, न केवल कार्यक्षमता बढ़ाएगी, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही को भी मजबूत करेगी।
विकसित भारत की यात्रा
यदि भारत को एक विकसित राष्ट्र बनना है, तो उसकी प्रशासनिक व्यवस्था को भी उसी गति से विकसित होना होगा। अब यह प्रश्न पूछना होगा: क्या ‘स्टील फ्रेम’ से काम चल जाएगा या भारत की नई आकांक्षाएं एक ऐसे ढांचे की मांग करती हैं, जो अधिक लचीला और प्रभावी हो, ठीक कार्बन फाइबर की तरह? समय बदल चुका है। अब प्रशासन को भी बदलना होगा।
जब सवर्ण प्रोटेस्ट करता है तो प्रशासन दांत निपोरते हुए उनके साथ हाहाहा करते हैं, पर जब दलित न्याय मांगता है तो यही पुलिसवाले उन्हें गाली देते हैं, थप्पड़ मारते हैं।
जाति और सत्ता का फर्क है बाबू। वर्ना अविनाश पांडेय की क्या औकात कि वह दलितों को बहन की गाली दे देता।
मैं इसीलिए कहता हूँ कि दलित समुदाय के लोग अपने घर में आग लगाकर पड़ोसी के महल में बैठकर खुश होने वाली सोच का दंश झेल रहे हैं। अगर स��ाज ने आज बसपा को कमजोर न किया होता, तो क्या एक IPS अफसर की इतनी औकात होती कि वह "पूरी रोड गंदी कर दी सालों ने, इनके पिता जी की रोड नहीं है" जैसी गालियां देता? क्या वह आंदोलन में खड़े युवाओं को थप्पड़ मारता और बंदी वाहन में घुसकर समाज के युवाओं पर अपना जातीय रौब दिखाता? चूंकि वह मुख्यमंत्री योगी और गृहमंत्री अमित शाह का खास अफसर है, जाति से ब्राह्मण है, इसलिए सरकार उस पर कोई कार्रवाई नहीं कर रही है।
���लितों को हिंदू कहकर हिंदू एकता का नारा देने वाले लोगों का दोहरा चरित्र देखिए। आज वे खुलकर गालीबाज SSP अविनाश पांडेय के समर्थन में हैशटैग चला रहे हैं। इससे साफ सिद्ध होता है कि सवर्णों की हिंदू एकता का मतलब सिर्फ सवर्ण हितों को सुनिश्चित करना है। वरना जो द्विज हिंदू कल तक बिहार के कुख्यात अपराधी भरत तिवारी के लिए विलाप कर रहे थे, आज वे अविनाश पांडेय की गालीबाजी और गुंडागर्दी का समर्थन क्यों कर रहे हैं? सवर्ण प्रभुत्व ही इनकी हिंदू एकता का सार है; भाजपा सरकार और उसके अफसर इसी हित को बचाने के लिए काम कर रहे हैं।
“एक बार बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर को उनके पहनावे को लेकर ताना दिया गया कि गांधी जी साधारण कपड़ों में रहते हैं और तुम हमेशा सूट-कोट पहनते हो। इस पर बाबा साहेब ने कहा था कि मैं सूट-कोट इसलिए पहनता हूँ क्योंकि मैं चाहता हूँ कि मेरा समाज भी सम्मान और आत्मसम्मान के साथ सूट-कोट पहने, आगे बढ़े और बराबरी का जीवन जिए।
आज जब बहन जी सुविधाओं के साथ रहती हैं या AC कमरे में रहती हैं, तो कुछ लोगों को इससे भी परेशानी होती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या बहुजन समाज के नेताओं को सम्मानजनक और सुविधापूर्ण जीवन जीने का अधिकार नहीं है? जब समाज के वंचित वर्गों का कोई व्यक���ति ��ँचे पद पर पहुँचता है और सम्मान के साथ जीवन जीता है, तो उसे आलोचना का नहीं बल्कि सामाजिक प्रगति के प्रतीक के रूप में देखा जाना चाहिए।”
जय भीम जय बसपा
@SurajKrBauddh @Voiceofpavan @jitu_rajoriya @raviadi7793 @Ravindra_Jatav9 @PalVishwnathbsp @avi_383 @SurajpalJatav @BHEEM_BAUDH @love_donor_abhi @AnandAkash_BSP @JayantAmbedkar_
प्रश्न : कोंग्रेस का अध्यक्ष कौन है?
उत्तर : Mallikarjun Kharge
प्रश्न : राहुल गाँधी क्या है?
उत्तर : नेता प्रतिपक्ष
प्रश्न : दोनो में कौन बड़ा है जो सैद्धान्तिक रूप से गठबंधन करन��� का निर्णय लेगा?
उत्तर : Mallikarjun Kharge अध्यक्ष के तौर पर
प्रश्न : श्री अखिलेश यादव को Birthday की बधाई खड़के जी व राहुल ने दी। केवल राहुल के लिए विशेष लेख लिखा और पीडीए फलाना ढिलकाना, साथ आएंगे, हराएंगे जैसी कथा लिख दी। लेकिन साथ आएंगे या नही के लिए खड़के जी को क्यो नही लिखा?
उत्तर : यह ही तो हमारा आंदोलन है। एससी को पद पर बैठा एओ। power न दो। एग्जीक्यूटिव पावर न दो। केवल दिखाने के लिए। इससे समाज का क्या लाभ होगा?
अखिलेश सहित सभी को पता है कि भारत मे एससी को प्रतिनिधित्व दिखाने के लिए पद पर बैठा जरूर दिया लेकिन उनके पास ऐसी कोई एग्जीक्यूटिव निर्णय लेने को क्षमता नही है।
इसलिए अखिलेश ने चुनाव के दौर में पार्टी के अध्यक्ष की जगह उनके नेता प्रतिपक्ष को महत्व दिया।
हम जब तक एग्जीक्यूटिव पावर नही लेंगे। समाज का कोई लाभ नही है। बाबा साहब को भूख हड़ताल रूप से विवश करके गाँधीजी ने पूणा पैक्ट में हमसे यह ही छीना है, बाबा साहब की माँग पर हमें भी दो मत का अधिकार मिल रहा था, जिसमे एक मत से एग्जीक्यूटिव पावर रखने वाले सांसद संसद में जाते। जो गाँधीजी की कृपा दृष्टि से नही हो सका।
आज रिजर्व शीट पर एससी का हाल देख लीजिए। कोंग्रेस, भाजपा, सपा के एससी सांसदों का मुंह बंद रहता है।
इसलिए मान्यवर कांशीराम साहब कहते थे कि हमे;
"इस देश का शासक बनकर लेने वाला नही बल्कि देने वाला समाज बनना है"
विकास कुमार जाटव
PEPSICO कंपनी की Ex-CEO इंदिरा नूयी ने कहा, भारत सहित दुनिया के किसी भी अन्य देश में CEO नही बन सकती थी.
इंदिरा नूयी के कहा, अमेरिका की व्यवस्था वास्तव में योग्य-आधारित (मेरिटोक्रेटिक) है इसी कारण CEO बन पाई.
इंदिरा नूयी ने सही कहा, भारत की व्यवस्था मेरिटोक्रेटिक नही है,
इसी कारण भारत में हर बड़ी का कंपनी का CEO या MD सवर्ण समुदाय से हैं.
SBI : Arundhati Bhattacharya
SEBI : Madhabi Puri Buch
ICICI : Chanda Kochhar
India Intel : Nivruti Rai
Chanel : Leena Nair
Flex : Revathi Advathi
Nykaa : Falguni Nair
Biocon : Kiran Mazumdar
HCLTech : Roshni Malhotra
भारत में ज्यादा CEO इंदिरा नूयी की जाति से हैं या मारवाड़ी या अन्य सवर्ण जातियों से हैं. OBC SC और आदिवासी तो प्राइवेट सेक्टर में किसी निर्णायक भूमिका में नही हैं. अमेरिका में बैठ कर ये कुलीन महिला मैरिट की बात कर, अपनी ही जाति वालों को कटघरे में खड़ा कर रही है.