ब्राह्मण जाति का विषय इस समय की राजनीति में केंद्रीय प्रश्न बन चुका है। कुत्सित राजनीति करने वाले कुछ भी कहकर लोगों को भड़काते हैं। मैं मौजूदा राजनीति को दोष नहीं देता।
दोष है तो आजादी के बाद के अकादमिक शोध एवं अन्य लेखन की दशा और दिशा का। जो सप्लाई ही गलत तथ्यों की हुई है तो किसी सामान्य विद्यार्थी या नेता को क्या ही दोष दिया जाए। विश्वविद्यालयों में जो विषबीज विगत 70 साल में रोपे गए हैं, उसी का दुष्परिणाम है।
उदाहरण के लिए, कोई नहीं बताता है कि कोचीन, त्रावणकोर के राजा शूद्र थे, उनके ब्राह्मण भी अलग अलग थे। मराठों के बीच यादव, निंबालकर, पालकर आदि राजवंशों के ब्राह्मण अलग अलग थे। इनमें बहुत ऊपर नीचे थे। स्वयं शिवाजी की मां जीजाबाई अपने पति शाहजी राजे को कड़वे शब्द बोलती थीं, क्योंकि शाहजी राजे मुगलों की चाकरी में जो थे।
मुगलों की चाकरी को लेकर मराठा गणराज्य के जमींदारों, सूबेदारों में एक दूसरे के प्रति बहुत कड़वाहट और तूतड़ाक होती ही रहती थी। इस कार्य में आज के कथित पिछड़े वर्ग के तत्कालीन राजा सदैव मोर्चेबंदी करते थे। शिवाजी के राज्याभिषेक के समय भी बहुत कुछ हुआ।
शिवाजी राजे का जब उद्भव और विस्तार हुआ तो निंबालकर, पालकर, यदुवंशी राजवंशों ने अपने अपने सैलरीड मंत्रियों, और विशेष ब्राह्मणों को शिवाजी को शूद्रवंश का सिद्ध कर देने के लिए मोर्चे पर लगा दिया। तर्कवादियों के अनुसार ऐसा इसलिए किया गया ताकि शिवाजी का राज्याभिषेक न हो सके।
यद्यपि कि ऐसा कोई सार्वदेशिक नियम भारत में कभी नहीं रहा कि शूद्रवंशी शासक नहीं होंगे। नंदवंश से लेकर केरल और बंगाल तक सैकड़ों प्रमाण हैं कि शूद्र वंशी शासक हुए हैं, बाकायदा राज्याभिषेक होता था। फिर भी इतिहास में ऐसे तथ्य नहीं रखे गए। कोई तो दुष्चक्र था।
उदाहरण के लिए, मैंने विगत 8 वर्षों से लगातार रानी रासमणि की जमींदारी और रियासत को बढ़-चढ़कर प्रकट किया है। आश्चर्य होता है कि कैवर्त जाति(अनुसूचित जाति) की रानी के बारे में हमारे विश्वविद्यालय, आईसीएसएसआर, आईसीएचआर ने 2014 में शासन बदलने के बावजूद कोई बड़ा प्रोजेक्ट स्वीकृत ही नहीं किया। क्योंकि विषय ही संज्ञान में नहीं है।
एनसीईआरआटी की पुस्तक में भी इसका वर्णन नहीं है। खैर, बात ब्राह्मण की हो रही है। भारत के प्रत्येक गणराज्य के ब्राह्मणों की प्रकृति वहां के राजाा के अनुसार ही हमें दिखाई देती है। काशी के ब्राह्मणों को इस मामले में आदर्श कहा जा सकता है। धर्म की चर्चा होगी तो मार्ग काशी के लोग दिखाते आए हैं। केरल और महाराष्ट्र के ब्राह्मणों को बार-बार इसी काशी ने रास्ते पर लाकर खड़ा किया है।
उदाहरण के लिए, शिवाजी राजे के राज्याभिषेक को काशी के ब्राह्मणों ने पूरी धार्मिक मान्यता दी। पंडित गागाजी भट्ट काशी के 500 ब्राह्मणों को लेकर पूरे गाजे-बाजे के साथ रायगढ़ पधारे थे। महीनों उत्सव चला। महाराष्ट्र के ब्राह्मणों की बुद्धि को काशी के ब्राह्मणों ने ही तब शुद्ध किया। निंबालकर, पालकर और यदुवंशी मराठी राजाओं के ब्राह्मणों की बोलती बंद कर दी।
दूसरा उदाहरण, केरल से आदिगुरु शंकराचार्य काशी आए। कम उम्र में संपूर्ण वैदिक वांग्मय पर उनका अधिकार अद्भुत था। बात-बात पर शास्त्रार्थ करने का अहंकार भी उनके सर चढ़कर बोल रहा था। मैं क्षमापूर्वक विनत भाव से कह रहा हूं, और ऐसा कहने में आदिगुरु के प्रति मन में पूरी श्रद्धा है। फिर भी लिख रहा हूं। क्योंकि युग युग से भारत के अन्य गणराज्यों के विद्वानों में यही चाह रही है कि उन्हें काशी के ब्राह्मणों को शास्त्रार्थ में परास्त करने में बहुत रुचि रही है। सो यही रुचि आदिशंकर के मन में भी शायद जग गई।
काशी के ब्राह्मणों से वह शास्त्रार्थ चाहते थे। काशी के ब्राह्मणों ने क्या किया, यह इतिहास में दर्ज है। काशी के ब्राह्मणों ने आदिशंकर को कहा कि पहले हमारे डोमराजा से वार्ता कर लीजिए। उनसे संतुष्टि नहीं मिले तो आकर हमसे शास्त्रार्थ करिएगा। आदिशंकर ने बात मान ली। वह डोमराजा से मिलने मणिकर्णिकाघाट रवाना हो गए।
इस ऐतिहासिक भेंट का वर्णन आदिशंकर के प्रत्येक जीवनग्रंथ में है। उन डोमराजा से मिलने के बाद आदिशंकर उनके चरणों में लोट गए। मनीषा पंचकम नाम से स्तुति गाई। चांडालोअपि मम गुरुः। चांडाल को आदिशंकर ने अपना गुरु घोषित किया।
यह ऐतिहासिक क्रांतिकारी कार्य हमारे आदिशंकर ने इसी धरती पर किया है। काशी की धरती पर किया है। ऐसा दृश्य बुद्द और महावीर के जीवन में भी दुर्लभ है। इसीलिए आदिशंकर ने इतिहास रच दिया।
ब्राह्मण पर कोई डिबेट होनी है तो काशी की परंपरा को ध्यान में रखा ही जाना चाहिए। यहां स्वामी रामानंद और रैदास, रामानंद और कबीर की परंपरा भी एक साथ चलती है।
काशी भारत की ही नहीं संपूर्ण विश्व की आध्यात्मिक राजधानी और आत्मा है। संसार के सभी मत-संप्रदाय को काशी में जगह मिली है तो इसलिए नहीं कि कोई राज्यादेश है। यह इसलिए है क्योंकि काशी के विद्वानों और यहां बसने वाले समस्त ज्ञाति-वर्णों ने सदा से सबमें शिव भाव का यहां रहकर दर्शन किया है। जीवसेवा को शिवसेवा बताया है।
भारत के हर गणराज्य के हर जाति-वर्ण का स्वभाव सदा से भिन्न भिन्न रहा है। सबको एक तराजू में तौलने और एक चश्मे से देखने वाले और बात-बात पर किसी भी गणराज्य का उदाहरण देकर कुतर्क करने वाले अपने सामान्य ज्ञान को दुरुस्त कर लें।
NEET के बाद महाराष्ट्र में TET का पेपर लीक , न नरेंद्र और न ही देवेंद्र पेपर लीक रोक पा रहे है। अब लगता है देवराज इंद्र से ही उम्मीद बची हुई है ।
#NEET#TET
A few drops of water…
and someone lost his life.
Uttam Nagar, Delhi
An 11-year-old girl threw a Holi
One young man, Tarun, was killed.
Sometimes the trigger is small…
but the anger behind it is much deeper.
#delhi#uttamnagar#tarun#hinduism#holi
महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने शिक्षा, नारी सशक्तिकरण और सामाजिक समानता का दीप जलाया। उनका जीवन हमें सिखाता है कि सच्चा धर्म मानवता, ज्ञान और सेवा में है। जयंती के अवसर पर हम संकल्प लें कि कुरीतियों से मुक्त, शिक्षित और समरस समाज को योगदान दिया
#MaharshiDayanandSaraswati
संस्कृत के आदि कवि तथा अति प्रसिद्ध ’रामायण’ के रचयिता होने के लिये विख्यात महर्षि वाल्मीकि जी की आज जयंती पर देशवासियों व विशेषकर उनके समस्त अनुयाइयों को हाार्दिक बधाई एवं शुभकामनायें।