आज का दिन ख़ास है... आज सम्मानित बड़े भाई श्री आशुतोष त्रिपाठी भैया का जन्मदिन है... ऐसे दिन लोगों के लिए वर्ष में ज़रूर एक दिन ही आते हैं. किन्तु, हम दोनों भाई इसे रोज़ाना अनुभूति करते हैं... हम आज अलग-अलग संस्थानों में ज़रूर कार्य कर रहे हैं... लेकिन, जब तक रात में एक-दूसरे से मिल न लें, घर नहीं जाते. भले यह मुलाक़ात पांच मिनट की ही क्यों न हो...
आशु भैया से प्रतिदिन कुछ न कुछ सीखने को प्राप्त होता है. उनका अपने प्रति कार्य के प्रति लगाव और जुनून देखता हूं तो बाबा विश्वनाथ से प्रार्थना करता हूं कि इसका 10 फ़ीसदी भी मेरे भीतर डाल देते तो बेहतर होता. बहरहाल, इन सब बातों से भी परे एक रिश्ता है जिसे शब्दों में पिरोना तौहीन होगा... कुछ बातें नहीं ही कहनी चाहिए, उसे सिर्फ़-ओ-सिर्फ़ एक दूसरे के दिलों में ही महसूस करते रहना चाहिए.
आशु भैया आशावाद, परोपकार के जीते जागते प्रतीक हैं. हर व्यक्ति की मदद के लिए तत्पर रहते हैं, मग़र उसका क़भी गायन नहीं करते. मैं भी जब परेशान होता हूं तो सिर्फ़ आपका ही सहारा लेता हूं.
लिखने को बहुत कुछ है... मग़र, अपनों की और अपनों में आपकी ख़ूबियाँ गिनाने से बहुत ड़रता हूँ...इसीलिए, केवल इतना कहना चाहता हूं कि एक अच्छे पुत्र, एक आज्ञाकारी भाई, एक पत्नीव्रता पति और एक अनुशासित व करुणामयी पिता को जन्मदिन की हार्दिक बधाई एवं मंगलकामनाएं. आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण हों. सदा निरोगी रहें. दीर्घायु हों. जीवनपर्यन्त सफलता के पथ पर अग्रसर रहें. जीवन में कामयाबी के शिखर के पायदान पर काबिज हों. सदा लोगों के लिए मददगार रहें. बाबा विश्वनाथ का आशीर्वाद बना रहे, यही कामना है.
जाति न पूछो साधु की!
UPSC की सिविल सेवा परीक्षा निर्विवाद रूप से मेधा, धैर्य और सतत परिश्रम की खरी कसौटी होती है. इसमें सफल हुए सभी अभ्यर्थी बधाई के पात्र हैं.
विडंबना है कि कुछ लोग घोषित हुए सफल अभ्यर्थियों को जाति के आधार छंटनी करते हुए बधाई दे रहे हैं. यह विभेदक अप्रोच क्यों?
नज़्म: फ़रवरी
फ़रवरी की ये हवाएं बड़ी बेअंदाज़ ओ क़ातिल हैं
शरारत बसी इनमें नज़ाकत की महक भी आती है
मशवरा है तुम बाल खोलकर बाहर न निकलना
अपनी ख़ूबसूरती पर इसकी बूंदें मत पड़ने देना
नहीं तो ये ले लेगी तुम्हें अपने आग़ोश में
और तुम बेवज़ह गुनगुनाने लगोगी
कविताएं, शायरियां, नज़्में ओ ग़ज़लें पढ़ने लगोगी
अपनी आदतों को बदलने पर मज़बूर हो जाओगी
हर न पसंद को पसंद में तब्दील करने की कोशिश करोगी
प्रीतम की तलाश में दर-दर भटकने लगोगी
सूरज की आंखमिचौली ओ बादलों की आवाजाही भाने लगेगी
तब तुम न रोक पाओगी ख़ुद को
और हार बैठोगी दिल अपना
लेके लाल गुलाब दर बदर टहलोगी
दिल को तश्तरी पर सजा
उसका हक़दार तराशोगी
पर, जब न मिलेगा तुम्हें कोई तुम्हारे जैसा
थककर, टूटकर, झुंझलाकर
ख़ुद को ही कोसोगी
क्योंकि, हर इंसां के लिए मोहब्बत नहीं बनती
और इश्क़ दोतरफ़ा हो यह उम्मीदें भी कम हैं
इसलिए, मशवरा है तुम बाल खोलकर बाहर न निकलना.
~शाश्वत
मेरी आंखों में सुबहें होंगी
रातें भी जग-जग कर रहेंगी
दिन में हर पल जो हो सो हो
तुमसे दिल्लगी न छूटेगी
अब तुम्हारी याद न मिटेगी
कोरे कागज़ पे लिख दिया जो नाम
सदाएं भी रह-रह कर वही पुकारेंगी
जो बस गया है वो दिल में घर की तरह
कैसे निकाल दें किसी पराए की तरह
परवरदिगार भी क़भी इसकी मंज़ूरी न देगा
मैं उसे चाहता हूं ये बात कैसे झूठी होगी
अब तुम्हारी याद न मिटेगी
मैंने सोचकर कई बार रास्ता बदला
मंज़िलों से समझौता तक कर डाला
पर दर पे तुम्हारी न जाने कैसे आ जाता हूं
तुम्हारे ही बालकनी तले खड़ा हो जाता हूं
लगता है अकेले मेरी ज़िंदगी भी न चलेगी
अब तुम्हारी याद न मिटेगी
गलतियां जो भी हुईं अनजाने में
आपका दिल दुखाने का इरादा न था
आपकी ही ख़ातिर हमने जलाया ख़ुद को
यूं बेवज़ह ख़ुद को तबाह करने का माद्दा न था
अब लौट आओ, नहीं तो बाहें फैलाना भूल जाऊंगा
किसी को चाहना कैसे है, ये जताना भूल जाऊंगा
उम्मीद, ख़्वाहिश, आरज़ू सब तुम ही हो मेरी जानां
अरे बात करो मुझसे, नहीं तो बात करना भूल जाऊंगा
सुनो, ता'उम्र तुमसे ये दिल्लगी न छूट सकेगी
बस, इसीलिए अब तुम्हारी याद क़भी न मिटेगी
अब तुम्हारी याद न मिटेगी
अब तुम्हारी याद न मिटेगी ...
~शाश्वत
#Shashwat
हुंकार---
ज्योतिर्धर कवि मैं ज्वलित सौर-मण्डल का,
मेरा शिखण्ड अरुणाभ, किरीट अनल का।
रथ में प्रकाश के अश्व जुते हैं मेरे,
किरणों में उज्जल गीत गूँथे हैं मेरे।
मैं उदय-प्रान्त का सिंह प्रदीप्त विभा से,
केसर मेरे बलते हैं कनक-शिखा से।
ज्योतिर्मयि अन्त:शिखा अरुण है मेरी,
हैं भाव अरुण, कल्पना अरुण है मेरी।
पाया निसर्ग ने मुझे पुण्य के फल-सा,
तम के सिर पर निकला मैं कनक-कमल-सा।
हो उठा दीप्त धरती का कोना-कोना,
जिसको मैने छू दिया हुआ वह सोना।
रंग गयी घास पर की शबनम की प्याली,
हो गयी लाल कुहरे की झीनी जाली।
मेरे दृग का आलोक अरुण जब छलका,
बन गयी घटाएँ विम्ब उषा-अंचल का।
उदयाचल पर आलोक-शरासन ताने
आया मैं उज्जवल गीत विभा के गाने।
ज्योंतिर्धनु की शिंजिनी बजा गाता हूँ,
टंकार-लहर अम्बर में फैलाता हूँ।
किरणों के मुख में विभा बोलती मेरी,
लोहिनी कल्पना उषा खोलती मेरी।
मैं विभा-पुत्र, जागरण गान है मेरा,
जग को अक्षय आलोक दान है मेरा।
कोदण्ड-कोटि पर स्वर्ग लिये चलता हूँ,
कर-गत दुर्तभ अपवर्ग किये चलता हूँ।
आलोक-विशिख से वेध जगा जन-जन को,
सजता हूँ नूतन शिखा जला जीवन को।
जड़ को उड़ने की पाँख दिये देता हूँ,
चेतन के मन को आँख दिये देता हूँ।
दौड़ा देता हूँ तरल अग्नि नस-नस में,
रहने देता बल को न बुद्धि के बस में।
स्वर को कराल हुंकार बना देता हूँ,
यौवन को भीषण ज्वार बना देता हूँ।
शुरों के दृग अंगार बना देता हूँ,
हिम्मत को ही तलवार बना देता हूँ।
लोहू में देता हूँ वह तेज रवानी,
जूझती पहाडों से हो अभय जवानी।
मस्तक में भर अभिमान दिया करता हूँ,
पतनोन्मुख को उत्थान दिया करता हूँ।
म्रियमाण जाति को प्राण दिया करता हूँ,
पीयूष प्रभा-मय गान दिया करता हूँ,
जो कुछ ज्वलन्त हैं भाव छिपे नर-नर में,
है छिपी विभा उनकी मेरे खर शर में।
किरणें आती है समय-वक्ष से कढ़ के,
जाती हैं अपनी राह धनुष पर चढ़ के।
हूँ जगा रहा आलोक अरुण बाणों से,
मरघट में जीवन फूँक रहा गानों से।
मैं विभा-पुत्र, जागरण गान है मेरा,
जग को अक्षय आलोक दान है मेरा।
~ रामधारी सिंह 'दिनकर'
विवेकानंद अस्पताल शहर के पुराने और भरोसेमंद अस्पतालों में से एक है, जहां ऐसी घटना का होना बहुत ही निंदनीय है। जिम्मेदारी जिसकी भी उसको सामने खड़ा करना चाहिए था उसको अंदाजा होना चाहिए था कि उसकी लापरवाही की वजह से हम अपने मरीज अपनी दादी के साथ आखिरी समय पे न साथ हो सके #Shame
विवेकानंद हॉस्पिटल पर आरोप:
1. देरी से इलाज और पहले पैसे जमा करने की मांग।
2. अत्यधिक बिल और दवाई की जानकारी नहीं दी गई।
3. मौत के बाद संपर्क नहीं किया गया।
4. पुलिस ने कार्रवाई का आदेश दिया, नहीं तो स्वयं मुकदमा दर्ज करेगी।
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