बड़ी खबर आ रही है। देश के दो बड़े उद्योगपतियों में आपस में मार हो गई है। सुभाष चंद्रा और मुकेश अंबानी खुलकर एक दूसरे के खिलाफ आ गए हैं।
मुकेश ने अपने टीवी चैनल पर सुभाष के खिलाफ कुछ भी खबर चलाने को फ्री हैंड दे दिया है। वहीं सुभाष चंद्रा ने जी नेटवर्क पर एक बयान जारी कर खुले तौर पर मुकेश अंबानी का नाम लिया है और कहा है कि अंबानी मेरा चैनल खरीदने की कोशिश कर रहा था अब बदनाम कर रहा है।
ये एकदम ग़लत हो रहा है। देश के प्रधानमंत्री को किसी बच्ची से क्या ख़तरा हो सकता है। उन्हें एतराज़ हैं तो वो कहें। वो सक्षम हैं और रैलियों में कहते भी हैं। उनके नाम पर न्यूज़ चैनल अति किए जा रहे हैं।
आरक्षण फिल्म का यह दृश्य आज उन लोगों को जरूर देखना चाहिए, जो आरक्षण हटाओ आंदोलन चला रहे हैं। आरक्षण किसी की कृपा नहीं, बल्कि सदियों के सामाजिक भेदभाव और असमानता के खिलाफ प्रतिनिधित्व और अवसर सुनिश्चित करने का संवैधानिक माध्यम है। इतिहास को समझे बिना आरक्षण का विरोध करना सामाजिक न्याय की वास्तविकता से आंखें मूंदना है।
युवाओं के आंदोलन का एक बड़ा सबक बड़े मीडियावालों के लिए भी है: Mainstream Media को Main Street Media बनना होगा।
इस आंदोलन ने बड़े-बड़ों की position ROTATE कर दी है, मीडिया भी इसका अपवाद नहीं है। आज संकट सिर्फ़ ‘राष्ट्रीय सरकार’ के लिए ही नहीं, तथाकथित ‘राष्ट्रीय मीडिया’ के लिए भी बराबर का ही है। जवाबदेही का सवाल केवल किसी एक के लिए नहीं है।
जब कोई ‘वोकल फॉर लोकल’ का नारा दे रहा था, तो नेशनल मीडिया के लोग समझ ही नहीं पाए कि वे जिस बात का प्रचार कर रहे हैं, वह केवल किसी प्रोडक्ट तक सीमित नहीं रहेगी। अगर राष्ट्रीय मीडिया अपनी चकाचौंध और पैकेजिंग में न्यूज़ को प्रोडक्ट बनाकर पेश करेगा, तो फिर आम लोग भी लोकल और स्थानीय चैनलों पर ज़्यादा भरोसा करेंगे, क्योंकि वे उनकी पहुँच में हैं और उनमें उन्हें अपनी भाषा-बोली का अपनापन भी दिखता है, साथ ही उन स्थानीय पत्रकारों के दिनभर के दौड़ते-भागते रहने के संघर्ष में सच्चाई भी दिखती है।
जनहित के लिए समर्पित ’आकार में छोटे लेकिन विचार में बड़े’, ये सभी सच्चे न्यूज़ व व्यूज़ चैनल्स या यूट्यूबर जर्नलिस्ट-पैनलिस्ट केवल दिखावटी औपचारिकता पूरी नहीं करते हैं, बल्कि जनमानस के बीच की बातें करते हैं। ये ऊपरी-ऊपरी औपचारिक कॉस्मेटिक जर्नलिज्म नहीं करते हैं; बल्कि जनता के मसलों, मुद्दों और जन सरोकार से जुड़े सच्चे विषय उठाते हैं। ये सरकार के सहयोग से कॉरपोरेट मीडिया की तरह चमचमाते नहीं हैं बल्कि जनता के ऐतबार से चलते हैं। ये एक हाथ से माइक या मोबाइल पकड़ते हैं और दूसरे से अपने गमछे से पसीना पोंछते हैं। ज़मीन से जुड़ी यह ‘माटी पत्रकारिता’ या कहें ‘Grounded Journalism’ ही सच्चे जर्नलिज़्म का भविष्य है।
अब जनता ‘नाटकीय निरर्थक विवाद’ नहीं, ‘वास्तविक सार्थक संवाद’ देखना चाहती है।
अब ‘जिसका दाना, उसका गाना’ वाला चारण युग अपने अंतिम पड़ाव में है।
ये बहुत मजेदार है😂😂
राहुल गांधी ने कहा - मैंने एक छात्र से पुछा कि तुम 'Student'हो और 'Idiot' भी है तो यह तीसरी कैटेगरी कहा जाती है।
छात्र- कौन सी तीसरी कैटेगरी?
राहुल गांधी- अंधभक्त वाली तीसरी कैटगरी 😂😂