माननीय @myogiadityanath जी! विधानसभा सदन में 70k शिक्षकों-कर्मचारियों को पुरानी पेंशन का सकारात्मक आश्वासन व 1-Apr-2005 पूर्व विज्ञापित शिक्षकों का प्रकरण रिव्यू कराने हेतु आभार। बेसिक शिक्षकों हेतु भी शीघ्र OPS शासनादेश जारी करें।*
#RestoreOPSforBasicTeachers@CMOfficeUP
मनुस्मृति पोलखोल Part5
चैप्टर 1, श्लोक 26-32
श्लोक 26
कर्मणां च विवेकार्थं धर्माधर्मौ व्यवेचयत्।
द्वन्द्वैरयोजयच्चेमाः सुखदुःखादिभिः प्रजाः॥ २६॥
अर्थ:
ब्रह्मा ने कर्मों के भेद को समझाने के लिए धर्म और अधर्म को अलग किया और प्रजा को सुख-दुःख आदि द्वंद्वों से जोड़ दिया।
आलोचना:
यहीं से “धर्म-अधर्म” की सत्ता शुरू होती है। सवाल यह है कि धर्म और अधर्म तय कौन करेगा? मनुष्य की करुणा, न्याय और समानता या ब्राह्मणों का गपोड़-शास्त्र?
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श्लोक 27
अण्व्यो मात्रा विनाशिन्यो दशार्धानां तु याः स्मृताः।
ताभिः सार्धमिदं सर्वं सम्भवत्यनुपूर्वशः॥ २७॥
अर्थ:
पांच महाभूतों की नष्ट होने वाली सूक्ष्म मात्राओं—रूप, रस, गंध, शब्द, स्पर्श—के साथ यह संसार क्रमशः उत्पन्न होता है।
आलोचना:
यहां संसार को सूक्ष्म तत्वों से बना बताया गया है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब सारी सृष्टि समान तत्वों से बनी है, तो मनुष्य-मनुष्य में जन्म से ऊंच-नीच कहां से आ गई?
अगर जीवन का आधार समान है, तो किसी का स्पर्श “शुद्ध” और किसी का स्पर्श “अशुद्ध” कैसे?
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श्लोक 28
यं तु कर्मणि यस्मिन्स न्ययुङ्क्त प्रथमं प्रभुः।
स तदेव स्वयं भेजे सृज्यमानः पुनः पुनः॥ २८॥
अर्थ:
सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा ने जिस जीव को जिस कर्म में नियुक्त किया, वह बार-बार जन्म लेकर वही कर्म करता रहा।
आलोचना:
यह श्लोक बेहद खतरनाक है। इसमें कहा गया कि जीव का कर्म पहले से नियुक्त है और वह जन्म-जन्मांतर तक वही करता रहता है। यही विचार आगे जाति-आधारित पेशे और सामाजिक गुलामी को धार्मिक आधार देता है।
यानी अगर किसी को सेवा-कर्म में डाल दिया गया, तो वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी वही करेगा। अगर किसी को ज्ञान पर अधिकार दे दिया गया, तो वह जन्म से श्रेष्ठ माना जाएगा।
यह मनुष्य की स्वतंत्रता पर हमला है।
यह प्रतिभा, शिक्षा, मेहनत और चुनाव के अधिकार को खत्म करता है।
यह कहता है—तुम्हारा भविष्य तुम्हारे जन्म से पहले तय है।
ऐसी सोच न्याय नहीं, ब्राह्मणवादी कैद है।
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श्लोक 29
हिंसाऽहिंसे मृदुक्रूरे धर्माधर्मावृतानृते।
यद्यस्य सोऽदधात्सर्गे तत्तस्य स्वयमाविशत्॥ २९॥
अर्थ:
सृष्टि के समय ब्रह्मा ने जिस जीव में हिंसा-अहिंसा, कोमलता-क्रूरता, धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य जैसे गुण रखे, वह जीव उनमें प्रवृत्त हुआ।
आलोचना:
यह श्लोक नैतिकता को व्यक्ति की स्वतंत्र चेतना से हटाकर पूर्वनिर्धारित गुणों में बदल देता है। यानी कोई हिंसक है, कोई अहिंसक है, कोई सत्यवादी है, कोई असत्यवादी है—क्योंकि सृष्टि में ऐसा डाल दिया गया।
यह सोच खतरनाक है, क्योंकि इससे अन्याय का जिम्मेदार व्यक्ति या समाज नहीं, “पूर्व-निर्धारित प्रकृति” बन जाती है।
जो अत्याचारी है, वह कह सकता है—मेरा स्वभाव ऐसा है।
जो शोषक है, वह कह सकता है—मेरा कर्म ऐसा है।
जो पीड़ित है, उसे कहा जाएगा—तुम्हारा भाग्य ऐसा है।
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श्लोक 30
यथर्तुलिङ्गान्यृतवः स्वयमेवर्तुपर्यये।
स्वानि स्वान्यभिपद्यन्ते तथा कर्माणि देहिनः॥ ३०॥
अर्थ:
जैसे ऋतुएं अपने-अपने समय पर अपने चिह्न धारण करती हैं, वैसे ही जीव अपने-अपने जन्मजात कर्म प्राप्त करते हैं।
आलोचना:
यहां मनुष्य के कर्म को ऋतुओं की तरह प्राकृतिक बताया गया है। यही सबसे चालाक तुलना है। ऋतु का आना प्राकृतिक है, लेकिन किसी मनुष्य को जन्म से सेवक, किसी को जन्म से ज्ञानी और किसी को जन्म से शासक मानना प्राकृतिक नहीं है।
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श्लोक 31
लोकानां तु विवृद्ध्यर्थं मुखबाहूरूपादतः।
ब्राह्मणं क्षत्रियं वैश्यं शूद्रं च निरवर्तयत्॥ ३१॥
अर्थ:
लोकों की वृद्धि के लिए ब्रह्मा ने अपने मुख से ब्राह्मण, बाहु से क्षत्रिय, जंघा से वैश्य और चरणों से शूद्र को उत्पन्न किया।
आलोचना:
यह श्लोक मनुस्मृति की जातिवादी रीढ़ है। यहां पहली बार समाज को शरीर के अंगों से जोड़कर ऊंच-नीच का धार्मिक ढांचा बनाया जाता है।
यह केवल प्रतीक नहीं है; इतिहास में इसी प्रतीक ने सामाजिक सत्ता बनाई। शूद्र को पैरों से पैदा बताकर उसे नीचे रखने की वैचारिक जमीन तैयार की गई।
यह श्लोक मानव-समानता के विरुद्ध धार्मिक असमानता का घोषणापत्र है।
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श्लोक 32
द्विधा कृत्वाऽऽत्मनो देहमर्धेन पुरुषोऽभवत्।
अर्धेन नारी तस्यां स विराजमसृजत्प्रभुः॥ ३२॥
अर्थ:
ब्रह्मा ने अपने शरीर को दो भागों में विभाजित किया। आधे भाग से पुरुष और आधे से स्त्री उत्पन्न हुई। फिर उस स्त्री से विराट की रचना की।
आलोचना:
यहां ऊपर से यह समानता जैसी लग सकती है कि आधा पुरुष और आधा स्त्री। लेकिन मनुस्मृति का आगे का चरित्र देखें तो स्त्री को स्वतंत्र व्यक्ति नहीं, पुरुष-नियंत्रित सत्ता के अधीन माना जाता है।
अगर स्त्री सृष्टि का आधा हिस्सा है, तो उसे आधा अधिकार क्यों नहीं?
समाज में स्त्री को द्वितीय दर्जे का क्यों माना गया?
@harnathsinghmp कृपया महानुभाव सटीक जानकारी करें , वरुण गजानन महीपत संस्कृत सब बुद्धिष्ट प्रतिमान है सातवीं सदी में इंडोनेशिया में वह मुस्लिम हो गये और आप लोग हिन्दू हो गए
घोर अन्याय।
ये आज़ादी के 78 साल बाद के भारत की स्थिति है।
किस धर्म ग्रंथ में लिखा है की यादव कथावाचक नहीं हो सकता?
मुटुक मणि सिंह यादव जी कथावाचक हैं, कथा पढ़ने के जुर्म में इनका सिर मुड़वा दिया गया, पेशाब पीने के लिए मजबूर किया गया।
जाति के नाम पर भेदभाव इंसान के साथ जानवर जैसा व्यवहार यही है “मनुवाद”
सुनिए भंतेबिनाचार्य जी ने क्या कहा हिंदुओं के पास मूर्ति नहीं थी बुद्ध की मूर्ति चुराचुरा कर देवताओं की मूर्ति बना ली हिंदू के पास मंदिर नहीं होता था बुद्ध के बिहारों को चुराचुरा कर इन्होंने अपना मंदिर बना दिया
#Repeal_BTact1949#महाबोधि_मुक्ति_आंदोलन#ब्राह्मणों_महाबोधि_छोड़ो
होली क्या बुद्धिज्म का है?
आख़िर ऐसी कौन सी घटना हुई थी बुद्धिज्म में जिसके कारण पूरा भारत बुद्धिस्ट कैलेंडर के फाल्गुन पूर्णिमा का जश्न मनाने लगा?
ब्राह्मणों ने बुद्धिज्म के इस दिन पर रंग गुलाल खेलना कब सुरु किया?
कब बुद्धिज्म के ओरिजिनल हिस्ट्री की जगह काल्पनिक मनोहर कहानियों होलिका दहन इत्यादि की घुसपैठ करा दिया?
इन तमाम मुद्दों पर ज़ोरदार डिबेट आज 7:30pm, 13 March 2025 Rational World Youtube पर लाइव देखना न भूले ।
सभी शंकराचार्यों, महामंडलेश्वर सहीत सभी धार्मिक ठेकेदारों को ओपन डिबेट चैलेंज है होली कब कैसे सुरु हुआ पर लाइव डिबेट कर लेवे । जॉइन लिंक लाइव चैट में पिन रहेगा ।
नोट : सबूत और वाजिब तर्कों के साथ बात रखने वालो को उनका पक्ष रखने का पूरा मौका दिया जाएगा ।
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13th Day Hunger Strike at Mahabodhi Mahavihar update.
अमेरिका भिक्खू संघ आया समर्थन में । बुद्ध की सबसे पवित्र स्थान महाबोधि महाविहार का कंट्रोल, हिंदू नहीं भिक्खू को मिलनी चाहिए ।
#Repeal_BTact1949#महाबोधि_मुक्ति_आंदोलन
@rajkumarbhatisp 1811 में भारत की जनसंख्या 20करोड थी इस हिसाब से 3.6 % ब्राह्मण 732000 थे इनमें से बिद्धान वेद पाठी संस्कृत ज्ञाता सिर्फ 0.1% यानि 732 थे , यह सभी ब्राम्हणो को गुरुकुल समझ रहे हैं यह ब्राम्हण खेतों में वेदपाठ बिना अर्थ के पढ़ते थे 19 करोड़ 93 लाख को शिक्षा नहीं देते थे
@avadhojhaAAP Right sir ,we salute your struggle to save democracy,
bjp wants to flash back by time machine as 1952 by targeting minorities to get majority by majority political relegion hindu.
विश्विद्यालय बौद्ध के थे। दुनिया भर से पढ़ने लिखने लोग बौद्ध यूनिवर्सिटी में आते थे । पुरातत्व सबूत बौद्ध के मिले है । जिस काल खंड की बात चल रही है उस समय की भाषा लिपि बौद्ध की थी ।
पर सबसे कमाल की बात है आम भारतीय निष्कर्ष खोज क्रेडिट हिंदू को दे रहे है जिसका उस कालखंड में न कोई पुरातत्व सबूत मिला है न ही कोई मेनुस्क्रिप्ट ।
अंग्रेजो ने उस लिपि को डिकोड किया और लिपि का नामकरण भी बुद्धिस्ट पुस्तक के आधार पर किया ।
ईमानदारी से देखा जाये तो पिछड़े वर्ग का हक अधिकार 'यादव-समाज' और एससी-एसटी वर्ग का हक अधिकार 'जाटव-समाज' की वजह से सुरक्षित है.!
क्योंकि ये दोनों जातियाॅं अपने अधिकारों को लेकर सैकड़ो वर्ष से जागरूक और संघर्षशील हैं.!
इसीलिए आरएसएस जानबूझकर पूरे पिछड़े समाज को यादव समाज से लड़ा रखा है और अब आरक्षण बॅंटवारे का लॉलीपॉप देकर पूरे एससी-एसटी वर्ग को जाटव समाज से लड़ाने का षडयंत्र रच रहा है.!
आरएसएस को पता है कि यादव समाज और जाटव समाज के अलावा उनका मुकाबला अभी कोई अन्य दलित पिछड़ा समाज नहीं कर पाएगा.!
आरएसएस के फेंके जाल मे फॅंसकर अगर हम सभी दलित पिछड़े समाज के लोग बिखरे तो आरएसएस सबको बारी बारी गुलाम बना लेगा, आरक्षण वारक्षण देना तो बहुत दूर की बात है.!
-केशव देव मौर्य
राष्ट्रीय अध्यक्ष,महान दल
ऋग्वेद को पुराना बताने में कोई भी #गपोड़ाकार उर्फ #इतिहासकार पीछे न रहा यहाँ तक की जातक कथाओं में आए वासुदेव शब्द जो पाली पक्कित में लिखवाये रॉक इंस्क्रिप्शन में आता है को भी ऋग्वेद का कृष्ण साबित करने की कोशिश की है ।
लेकिन कागज का गपोड़ कबतक टिकता दम तोड़ दिया ।
कागज पर लिखी किताबों में कृष्ण संस्कृत में है जिसका मतलब काला होता है, जबकि पाली पक्कित शिलालेख में आया वासुदेव, बुद्धिस्ट जातको का है।
कितना भी कोई गपोड़ ले पर ये नहीं बता पा रहा है की अगर कागज पर गपोड़ा गया ऋग्वेद पुराना है तो उसमे वासुदेव होना चाहिए था या फिर कृष्ण नाम ही असली है तो सभी रॉक इंस्क्रिप्शन में कृष्ण शब्द ही होना चाहिए था ।
बेसनगर हेलोडेरस पिलर इंस्क्रिप्शन पाली पक्कित में है और बुद्धिस्ट का है #गपोड़ाकारो ने जबरन उसे भ्रामणवादियों का बता कर हाईजैक करने की कोशिश की है बस सवाल जैसे उठा की पाली पक्कित और धम्म लिपि में और कृष्ण की बजाय वासुदेव क्यो लिखा है तब से सभी कोमा में है ।