विमुक्ति (पूरी कविता...)
कठिन सवालों पर
ढीले-ढाले ज़वाबों से काम चल रहा
कौन सोचे मरने की
क्यों लगे
यह बात बेतुकी और बेबुनियादी
जीवन में अनिवार्यता
जीने के लिए ही
पूरी तरह से नहीं मिलती
खुल्ली छूट के कुछ गंभीर रहे परिणाम।
मरना चाहे
तो आदमी इस चिंता में भी मर सकता है
कि उसकी नयी शर्ट पर
इस्त्री नहीं हो पायी
और अब उसकी सिलवटें
कलेजे में कभी भी चुभ सकती हैं
इतने अनिवार्य हैं दुःख
कि हर दूसरे रोने में
हम किसी को सरापते हैं
नींद से अनमने
बार-बार छूटने की कोशिश चलती रही
कैसे छूट पाएंगे
उस श्राप से
जिसे देने वालों की संख्याऍं
गणना में
दिए जाने वालों से
कई-कई गुना रहीं
पछतावे का विकल्प
अब केवल सुंदर परिकथाओं में बचा
इस काल में
मॉंगने से जो मिलता है
उसका वजन सीधा उस जगह चढ़ता
जहाँ मनाही है..
और..और
छीन लेना भी आधुनिक है।
ख़ैर, चंदन की महक चुकती
ईंधन से
देह से
वायु-सा छुटकारा मिलता
फैले दुर्दिनों से मुक्ति का योग
दुनिया ख़ुश हुई ही कब?
उनकी नाक में
चिपकते हुए
सबसे मूल्यवान इत्र
ठहरे ही कब?
उड़ती राख की दिशाऍं
सही पते तक ले जातीं
मैं कहूँ या तुम कहो
मैं कौन?
तुम कौन?
…अनवरत रहे
इस विराट कमरे के दो छोरों पर
क्यों ‘इन्हें-उन्हें’ छूने को गल रहे
दरवाज़े
क्यों नहीं आने देते नये-नये लोग
अकेले क्यों हैं उत्तरदायी?
ऋतुऍं क्यों हैं शुष्क?
क्यों हैं बंजर?
क्यों नहीं उखड़ पा रहे इस जड़ लगे ज़मीन से?
इस बीच टकराती है एक सुंदर रात
स्वप्नसहित।
मैं इससे निकल कर बढ़ रहा
अकेला-अकेला
हर्ष-मुद्रा, गर्वीला
जितने प्रतिउत्तर हैं—मेरे हैं
जितना भार था—हवा है
जिनकी मनाही थी—चुन रहा हूँ एक-एक निडर
मृगतृष्णा—मृगतृष्णा
अचानक सारी इच्छाएँ
फिसलती काई से सवाल में
उम्मीद परिवर्तित शंकाओं में
कौन सोचता!
किसी के साथ चलने से पहले
रुकना पड़ेगा
तो किसी एक को रुकना होगा—अकेले!!
मैं ठहरा कु-फैसले वाला।
हाँ! कई-कई बार आते रहे दिवा स्वप्न भी
जिनमें मैं खेलता नहीं
उस दृश्य में
मैं वो वस्तु हूँ
जिससे खेला जा रहा
फिर अकेलापन,
मैं चाह के भी
उस स्वप्न में
किसी प्रिय-उपस्थिति की
कल्पना नहीं कर सकता
इनके साथ
मरघटों के आसपास
दस-बारह सीढियों पर
चढ़ सकने की कामना लिए जा रहे मरूँ…
सोचता हूँ…
कहाँ-कहाँ नहीं मरा मैं
जबकि
मैं मरने से डरता
लेकिन
इस डर को
मारने के लिए
मरना भी चाहता
जीते-जी
इस तरह रहूँ
कि कोई भी
मेरा हाथ पकड़े
तो तैयार दिखे!
निराश अकेलेपन में रीता हृदय
गीत का गाते रहने का साथ
मरूस्थल की कामनाऍं
जीवन धधक सीमाओं के परे
फिर जीने को कहता;
मैं दोहराता
दादी की सुनायी हुई परियों की कहानी
जिसमें सब अन्त में
खुशहाल ही लौटते
रात्रि-स्वप्न के खुले आज़ाद सितारे
किसी श्राप में भी
रोज उगते-डूबते
फिर उग सकते हैं
हर बार
छूकर गलते ही नहीं रहेंगे
किसी रोज़ ज़ख्म भरने को अमादा हो आएंगे
ऋतुएँ साथ देंगी
हम बंजर उन्हें भी अच्छे नहीं लगेंगे
हम साथ चलेंगे
हर अनिवार्य दुःख में
हमारे पास संयुक्त उत्तर होंगे।
- नीरज
“एक बार विदाई दे मां, घूरे आसी...” (माँ, मुझे एक बार विदा करो, मैं फिर वापस आऊँगा...)
मात्र 18 साल की उम्र में जब आम युवा अपने भविष्य के सपने देखता है, तब खुदीराम बोस ने भारत माता की आज़ादी के लिए फांसी का फंदा चुन लिया।
आज उनके बलिदान दिवस पर उनका जीवन हमें यह सीख देता है कि युवाओं को किसी भी प्रकार के अन्याय के सामने झुकना नहीं चाहिए, बल्कि पूरी ताकत से लड़ना चाहिए। उनका यह अमर बलिदान देश के हर नागरिक के दिल में राष्ट्रप्रेम की ज्योति जलाए रखेगा।
अमर शहीद खुदीराम बोस को भावभीनी श्रद्धांजलि! 🇮🇳🕊️
हैदराबाद में बोनालू उत्सव के दौरान कलाकारों ने पारंपरिक नृत्य और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं। इस अवसर पर श्रद्धालु तेलंगाना सचिवालय परिसर स्थित नल्ला पोचम्मा मंदिर में माता को पारंपरिक 'बोनम' अर्पित करने के लिए शोभायात्रा में शामिल हुए। पूरे रास्ते भक्ति और उत्साह का माहौल देखने को मिला। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने पूजा-अर्चना कर माता का आशीर्वाद लिया।
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देश के दिल 'दिल्ली' में सजने वाली कविता की महफ़िल में आप सभी काव्य प्रेमियों की प्रतीक्षा रहेगी🙏
दिनांक: 9 अगस्त 2026
समय: शाम 6 बजे
स्थान: यमुना स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स, दिल्ली
हाईवे पर फसल सुखाना यानी खतरे को न्योता देना। सड़क पर अनाज फैलाने से फिसलन, असंतुलित होने और गंभीर हादसों का जोखिम बढ़ता है। सुरक्षा को प्राथमिकता दें, फसल सुखाने के लिए निर्धारित एवं सुरक्षित स्थान का ही उपयोग करें। सुरक्षित सड़कें, सुरक्षित यात्रा। #EncroachmentFreeHighways #ClearHighwaysSafeJourneys #RoadSafety
IIT की परीक्षा में syllabus होता है, लेकिन जिंदगी की परीक्षा में सबकुछ out of syllabus होता है।
Life में curiosity बनाए रखिए, अपनी learning instinct को जगाए रखिए, चेतना बनाए रखिए। जो बातें बिना सोचे-समझे स्वीकार कर ली जाती हैं, जरा उन्हें परखिए, उन पर सवाल उठाइए। लेकिन सिर्फ सवाल पूछकर मत रुकिए, उनका समाधान खोजने का साहस भी रखिए।
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हिंदी की कविता, जहाँ अपने सबसे सहज रूप में शास्त्रीय मर्यादा की लक्ष्मण रेखा के भीतर खड़ी दिखाई देती है, उस पंचवटी का नाम है, 'गोपालदास नीरज'।
कवि-सम्मेलन की लोकप्रियता का कीर्ति स्तम्भ जहाँ तक पाखण्ड के मुलम्मे से अछूता दिखाई देता है, वहाँ तक नीरज की दमक साफ़ दिखाई देती है।
लौकिक लोभ और पारलौकिक कविताई के मध्य हर बार कविताई को वरीयता देने का स्वभाव जहाँ तक बचा रह गया, वहाँ तक नीरज का पता मिलता है।
जनता की रुचि के अनुरूप कविता 'बनाने' की बजाय, अपनी कविता के अनुरूप जनमानस को ढाल लेने का जादू जहाँ आकर ग़ायब होने लगता है, वह नीरज के कारवां का आख़िरी छोर है।
इन्टरनेट और सोशल मीडिया जनित, वैतण्डी स्टारडम के पीछे भागते हुए, कबीराई बेपरवाही की खुशबू से बहुत दूर निकल आई पीढ़ी, जब कभी उस कस्तूरी की तलाश में आत्ममग्न होगी, तब उसे नीरज की देहरी तक लौटना ही होगा।
चित्र से चरित्र तक आमूलचूल कवि होने का एहसास है नीरज। 2018 में उनकी दैहिक रुख़सती के आठ साल बाद, आज एक बार फिर, उनके साथ बीते क़ीमती पल स्मृति पटल पर चलचित्र की भाँति तैर रहे हैं।
मैंने उनकी स्मृति, उनके अध्ययन, उनकी सादगी और उनकी लोकप्रियता का वैराट्य कई बार अपनी आँखों से निहारा है। मैंने उनके युग में साँस ली है। मैंने एकलव्य की भाँति उनके द्रोणाश्रम से 'कवि होने का लुत्फ़' लेना सीखा है। पहली बार बैरागी जी के संचालन में लालकिला कवि सम्मेलन के मंच पर नीरज जी को देखा था। वाइन कलर का, लगभग पठानी कुर्ता-पायजामा पहने, सिर पर टोपी लगाए एक वृद्ध काया जब मंच पर उपस्थित हुई तो हज़ारों लोगों से भरा तालकटोरा स्टेडियम खड़े होकर तालियाँ बजाने लगा। स्वास्थ्य कारणों से अध्यक्ष होने के बावजूद वे अंत तक नहीं बैठ पा रहे थे, सो संचालक महोदय ने बीच में ही नीरज जी को काव्यपाठ के लिए आवाज़ दी।
मसनद पर बैठकर छोटे माइक से जब नीरज जी की आवाज़ गुंजित हुई तो ऐसा लगा जैसे शरारत ने बहुत गंभीर होने का फ़ैसला कर लिया हो।
"इतने बदनाम हुए...." यही तीन शब्द गूंजे थे और श्रोताओं की तालियों से पूरा स्टेडियम उत्सवित हो उठा। शरारती मुस्कराहट के साथ उन्होंने कोई बीस-पच्चीस मिनिट काव्यपाठ किया और फिर जब उठकर चले तो एक बार फिर श्रोताओं ने खड़े होकर उनका अभिवादन किया।
उस दिन नीरज सचमुच किसी देवदूत जैसे लगे। गीत का जीता-जागता कोई गंधर्व जिसके आगमन और प्रस्थान पर देवता पुष्प वृष्टि करते हों।
इसके बाद मैं सैंकड़ों बार उनसे मिला और हर बार उनके सान्निध्य को सौभाग्य मानकर उन पलों को भरपूर जिया। एक बार नैनीताल में उनके आभामंडल से मैं ऐसा सम्मोहित हुआ, कि उनके चरण स्पर्श करते हुए मैं बाकायदा उन्हें छूकर उनके पुद्गल परमाणुओं का वैशिष्ट्य महसूस कर रहा था।
'नीरज जी मुझे जानते हैं' -यह एहसास मेरे लिए कवि सम्मेलनीय जीवन का पहला सम्मान-पत्र था। अलीगढ़ नुमाइश का कार्यक्रम था। नीरज जी की अध्यक्षता थी। उससे पहले दो बार नीरज जी मेरे संचालन में काव्यपाठ कर चुके थे। अलीगढ़ में शशांक प्रभाकर ने मुझे कहा, "नीरज जी कह रहे हैं चिराग़ से संचालन करवाओ।" उस दिन यह वाक्य मेरे लिए किसी वरदान मिलने जैसी प्रसन्नता का कारण बना।
उसके बाद के अनेक संस्मरण हैं, उस गीतपुरुष के साथ। उन आँखों की जीवन्तता, रह-रहकर याद आती है। सफदरजंग अस्पताल में आख़िरी बार उनकी जीवित काया के चरण छुए थे। उस समय वे बेहोश थे। मैं उनसे मिलकर घर तक पहुँचा भी नहीं था, कि शशांक भाई ने उनके महाप्रयाण की सूचना दी। मैं उल्टे पाँव सफदरजंग अस्पताल पहुँचा। सम्भवतः मैं उनके चरण स्पर्श करनेवाला आख़िरी मनुष्य रहा। मुझे आशीर्वाद भी मिला... मैंने अपने लेखन में नीरज जी की खनक सुनी है। मुझे आज भी महसूस होता है कि वह गीत-गंधर्व मेरे लेखन का मापदण्ड बनता जा रहा है। मैं कह सकता हूँ कि नीरज का कारवां कभी नहीं गुज़रेगा। उसके गुबार में भी गीत उभर-उभर आएंगे।
✍️ चिराग़ जैन
स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे
- गोपालदास 'नीरज'
उतने सूर्यास्त के उतने आसमान
उनके उतने रंग
लम्बी सड़कों पर शाम
धीरे बहुत धीरे छा रही शाम
होटलों के आसपास
खिली हुई रौशनी
लोगों की भीड़
दूर तक दिखाई देते उनके चेहरे
उनके कंधे जानी -पहचानी आवाज़ें
कभी लिखेंगें कवि इसी देश में
इन्हें भी घटनाओं की तरह!
आलोक धन्वा
जाते जाते ही मिलेंगे लोग उधर के
जाते जाते जाया जा सकेगा उस पार
जाकर ही वहाँ पहुँचा जा सकेगा
जो बहुत दूर संभव है
पहुँच कर संभव होगा
जाते जाते छूटता रहेगा पीछे
जाते जाते बचा रहेगा आगे
जाते जाते कुछ भी नहीं बचेगा जब
तब सब कुछ पीछे बचा रहेगा
और कुछ भी नहीं में
सब कुछ होना बचा रहेगा|
विनोद कुमार शुक्ल