इधर, सुप्रीम कोर्ट के CJI कह रहे हैं- दिल्ली में हवा सांस लेने लायक नहीं है!
उधर, सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार की उस सिफारिश को हरी झंडी दी है, जिसमें कहा गया कि अब 100 मीटर से ऊंची पहाड़ियों को ही 'अरावली' माना जाएगा!
ऐसे में अरावली का 90% हिस्सा ही गायब हो जाएगा!
#Arawali
अभी दिल्ली-NCR में प्रदूषण और खराब वायु गुणवत्ता को लेकर हाहाकार मचा हुआ है। हालात किसी हेल्थ इमरजेंसी जैसे हैं -लोग साफ हवा के लिए तरस रहे हैं , सामान्य रूप सांस लेना भी मुश्किल हो गया है।
ऐसे समय में, जब सरकार से ठोस समाधान और नीतिगत हस्तक्षेप की उम्मीद थी, एक ऐसा कदम उठाया गया है जो आने वाले समय में दिल्ली-NCR सहित उत्तर भारत के कई हिस्सों के लिए और भी गंभीर पर्यावरणीय संकट खड़ा कर सकता है।
केंद्र सरकार ने अरावली पर्वत श्रृंखला की नई परिभाषा सुप्रीम कोर्ट के सामने रखी और सुप्रीम कोर्ट ने उसे स्वीकार कर लिया है। इस नई परिभाषा के अनुसार, अब केवल वही भू-आकृतियाँ अरावली मानी जाएंगी जो अपने आसपास के भू-भाग से कम से कम 100 मीटर ऊँची हों।
समस्या यह है कि इस मानक के तहत अरावली का लगभग 90% हिस्सा अरावली की श्रेणी में आएगा ही नहीं, क्योंकि यह हिमालय जैसी ऊँची पर्वत श्रृंखला नहीं, बल्कि कऱोड़ों वर्षों में क्षरण से बनी बेहद पुरानी लो-राइज ���र्वतमाला है -जिसके बहुत कम हिस्सों की ऊँचाई 100 मीटर से अधिक है।
चूंकि नए मानक के बाद इन क्षेत्रों को अरावली नहीं माना जाएगा, इसलिए उन पर पर्यावरण संरक्षण कानून भी लागू नहीं होंगे। इसका सीधा असर यह होगा कि अरावली से जुड़े जंगल, पहाड़ी ढलान, खनन-प्रतिबंधित क्षेत्र और संवेदनशील इको-ज़ोन संरक्षण की कानूनी सुरक्षा से बाहर हो जाएंगे -और फिर बेकाबू खनन, जंगलों की कटाई, निर्माण और अंधाधुंध दोहन का रास्ता खुल जाएगा।
पर्यावरण विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यह फैसला दिल्ली-NCR के लिए बेहद ख़तरनाक हो सकता है, क्योंकि अरावली न केवल रेगिस्तान की गर्म हवाओं और धूल को रोकती है, बल्कि यह पूरे क्षेत्र के लिए भूजल रिचार्ज का बड़ा प्राकृतिक स्रोत भी है। अरावली के सिमटने का मतलब है गंभीर जलवा���ु संकट।
कुल मिलाकर -यदि यह अंतिम रूप से लागू हो गई, तो पूर्वी गुजरात से लेकर हरियाणा तक लगभग 700 किलोमीटर में फैली दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला के अस्तित्व पर संकट है ।
हवा, जंगल, पहाड़, जल स्रोत और जैव-विविधता हमारे जीवन और भविष्य की बुनियाद हैं। हम विकास के नाम पर इन्हें ��ोने का जोखिम उठा रहे हैं, जबकि इनके बिना विकास का अर्थ ही शून्य रह जाएगा।
आज शाम को बंगाल में रेजिडेंट डॉक्टर के गैंगरेप और हत्या के वि���ोध में रेजिडेंट डॉक्टर्स द्वारा RD ग्राउंड SMS मेडिकल कॉलेज से अमर जवान ज्योति, विधानसभा तक रैली का आयोजन किया गया, जिसमें 3000 से अधिक साथी शामिल हुए। न्याय की इस लड़ाई में शामिल सभी साथियों का बहुत-बहुत धन्यवाद।
इस रैली में JARD के अध्यक्ष (जयपुर एसोसिएशन ऑफ रेजिडेंट डॉक्टर्स) के नाते राज्य भर के मेडिकल, गैर-मेडिकल, गैर-राजनीतिक, और राजनीतिक संगठनों जैसे ABVP, NSUI, ट्रेड यूनियन, महिला कार्यकर्ता, और विभिन्न संगठनों ने भाग लिया उनका तहे दिल से सम्मान करता हु। रेजिडेंट डॉक्टर्स ने हॉस्टल से 3.5 किलोमीटर का पैदल मार्च किया।
इसके बाद बहन की आत्मा की शांति के लिए अमर जवान ज्योति पर 2 मिनट का मौन रखा गया।
इसके बाद का संबोधन आप सभी के साथ साझा करता हूँ।
@jardsmsjaipur
@AIIMSRDA
@FordaIndia
@drsfaizanahmad
@FAIMA_INDIA_
@Sarkaridoctor12
This is a collective blot on the conscience of the Nation 🙌
Wish we had more directors and head of institutions like you sir 🙌
#RGKarMedicalCollegeHospital
This is Safdarjung Hospital in Delhi right now.
Hundreds of healthcare workers and doctors protesting in solidarity with Kolkata Victims
#justiceformoumitadebnath
Protest at Lady Hardinge Medical College in Delhi
Hundreds of Female Doctors and MBBS students chanting slogans and demanding Central protection Act.
#justiceformoumitadebnath
कोलकाता, बिहार, उत्तराखंड और यूपी में महिलाओं के साथ हुई क्रूरताओं ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। इस समय देश भर की महिलाएं दुख और गुस्से में हैं।
जब भी ऐसी घटनाएं होती हैं तो देश की महिलाएं देखती हैं कि सरकारें क्या कर रही हैं? उनकी बातों और उपायों में कितनी गंभीरता है? जहां भी महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सख्त संदेश देने की जरूरत हुई, वहां आरोपियों को बचाने की कोशिशें की गईं। महिलाओं पर जघन्य अत्याचार के मामलों में बार-बार नरमी बरतना, आरोपी को राजनीतिक संरक्षण देना और सजायाफ्ता कैदियों को जमानत/पैरोल देने जैसी हरकतें महिलाओं को हतोत्साहित करती हैं।
इससे देश की महिलाओं में क्या संदेश जाता है? जब सरकारी आंकड़ों में हर दिन 86 रेप हो रहे हों, महिलाएं सुरक्षा की आशा किससे करें?