गुरु से शिष्य करै चतुराई। सेवा हीन नर्क में जाई।।
शिष्य होय सरबस नहीं वारै। हिये कपट मुख प्रीति उचारे।।
जो जिव कैसे लोक सिधाई। बिन गुरु मिले मोहे नहिं पाई।।
सरलार्थ:- जो शिष्य गुरु के साथ हेराफेरी (चतुराई) करता है। उसकी सेवा (भक्ति) नष्ट हो जाती है। वह नरक का अधिकारी होता है।
गुरु से करै कपट चतुराई। सो हंसा भव भरमें आई।।
गुरु से कपट शिष्य जो राखै। यम राजा के मुगदर चाखै।।
सरलार्थ:- जो हंस (भक्त) गुरु जी से कपट युक्त व्यवहार करता है, वह हंस (भक्त) संसार में पुनः पशु-पक्षियों के जीवन प्राप्त करके कष्ट उठाता भटकता रहता है।
दशवाँ अंश गुरु को दीजै। जीवन जन्म सफल कर लीजै।।
गुरु बिन होम यज्ञ नहिं कीजे। गुरु की आज्ञा माहिं रहीजे।।
सरलार्थ:- अपनी कमाई का दसवां अंश अर्थात् 10% प्रतिशत दान गुरुजी को करें और अपना मानव जीवन सफल करें।
सतगुरु की गति हृदय धारे। और सकल बकवाद निवारै।।
गुरु के सन्मुख वचन न कहै। सो शिष्य रहनिगहनि सुख लहै।।
सरलार्थ:- जो ज्ञान सतगुरु जी बतायें, उसी के अनुसार भक्ति-साधना करनी चाहिए तथा अन्य जो व्यर्थ की भक्ति साधना तथा ज्ञान व नाचना-गाना, माँस-मदिरा सेवन आदि-आदि छोड़ दे।