एक बेचारी कौम।
नहीं, मार खाते इन बच्चो की बात नही कर रहा। उस पुलिसवाले की कर रहा हूँ, जो लाठी भांज रहा है।
जिसने देशभक्ति, जनसेवा की कसम उठाई है।
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जवानी में एग्जाम देते है।
यूपीएसी की तैयारी करते हैं। सपना कलेक्टर बनने का होता है। लेकिन जब रैंक नीची आती है, तो कोई बात नही, आईपीएस भी प्रेस्टीजियस सर्विस है।
90% वे होते है, जो डीएम बनने में फेल रहे। राज्यो में डिप्टी कलेक्टर चयन होने से फेल रहे। वहां पीएससी होती है।डीएसपी, इंस्पेक्टर के पदों पर पास करने के लिए कोचिंग, किताबे और दिन रात गलाने के बाद, वे सफल होते हैं।
लेकिन बल में ज्यादा संख्या तो उनकी है, जो कॉन्स्टेबल होते हैं। जब सिपाही की बहाली होती है, एग्जाम वहां भी होता है।कई किलोमीटर दौड़ते भागते, फिजिकल टेस्ट पार करके, यह वर्दी मिलती है।
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ट्रेनिंग होती है। पोस्टिंग मिलती है।
बैज पर लिखा होता है - सद्ररक्षणाय खलनिग्रहणाय, शुभ कर्मन ते कबहुं न टरौं” "देश भक्ति – जन सेवा” मृदु भावे दृढ़ः कृत्ये", "परित्राणाय साधुनाम"
अलग अलग राज्य, अलग अलग बैज।
तमाम शास्त्रों, उपनिषदों से निकले बड़े बड़े बोल.
लेकिन एक्रोस द स्टेट्स, कॉमन सिर्फ एक बात है- इस मोटो को मटियामेट करने में खप रही जिंदगी..
शपथ, सँविधान की रक्षा की होती है। मगर असल मे वह सरकार की रक्षा होती है। जो बहुत आसानी से पार्टी की रक्षा, उसके नेताओ की ताबेदारी में बदल जाती है।
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पुलिस क्राइम कंट्रोल नही कर सकती।
दरअसल क्राइम, दुनिया की कोई ताकत कंट्रोल नही कर सकती। पुलिस पकड़ सकती है, पनिश करवा सकती है। लेकिन परीक्षा देकर आये आदमी जब बीट, थाने या जिले में आते है, तो मालूम होता है- क्राइम रोकना नही, मैनेज करना है।
किसे करने की इजाजत है,और किसे नही करने देना है- यह ऊपर के आदेश के अनुसार,सुनिश्चित करना है। ऐसे में क्राइम में प्रति, मजबूरन, अपने भीतर सहनशीलता जागृत करनी होती है।
और फिर, बहुत सारी अनैतिक चीजो के प्रति सहनशीलता जागृत हो जाती है। मोट्टो मटियामेट होने लगता है। उदासीनता घर कर जाती है। पहले कुछ महीनों, या साल में इंसान खत्म हो जाता है।
एक रोबोट पैदा होता है।
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यह कम दर्दनाक पहलू है।
ज्यादा दर्दनाक पहलू, प्रदर्शनों, विरोध और आंदोलनों के दौरान मिली ड्यूटी है। हाथ मे लाठी, आंसू गैस, एके47 कुछ भी दी जा सकती है। इन हथियारों से मन्त्रालयो सचिवालयों में बैठे कायरों को डिफेंड करना है।
वह विचार- जिसके खिलाफ जनता आयी है, पुलिसवाले ने नही दिया। पॉलिसी- पुलिस ने नही बनाई। अक्षमता का असंतोष- उसके अपने विरुद्ध नही।
उसके दिल मे शायद उन आन्दोलनकारियो के लिए सहानुभूति भी है, दर्द है। उसकी बन्दूक के सामने, उसके बच्चो जैसे बच्चे हैं। उसके चाचा, ताऊ, भाई हैं- या उसकी उम्र के लोग है।
वे तो नारे लगा रहे हैं, मार्च कर रहे है, पोस्टर हिला रहे, मजाक बना रहे। यह सब उनका राइट है, उनके ऊपर अधिकार का भाव है जिन्हें सत्ता और टैक्स का पैसा सौपा है।
लेकिन जिनकी यह कारस्तानी है। जिन्हें आकर,मिलकर, बात करके मसला सुलझाना चाहिए, वह अपने अहंकार के पांच सितारा किले में बैठकर तमाशा देखता है।
भीड़ के सामने पुलिस को धकेल देता है।
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ऐसा नही की सभी संवेदनशील हैं। क्योकि यह जॉब, सम्वेदना की हत्या सबसे पहले करता है।
मगर जिनके भीतर भी जरा सा इंसान जिंदा हो, भीतर से अपने आपको भी गरियाता है। दिल्ली प्रोटेस्ट में जिन जवानों, अफसरों ने लाठी चलाई, पैलेट गन दागी- पेपर लीक उन्होंने नही कराया था।
एक बेईमान, बेकार प्रणाली उनकी सहमति से नही बनी थी। लेकिन लाठी लेकर वे पेपर लीक को डिफेंड कर रहे थे। पटना, मुंबई, उत्तराखंड, बंगलौर, चंडीगढ़-
कहीं भी हर जगह लाठी चलाना,
उनका अपना चयन नही था।
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लेकिन जब जांच होगी, आयोग बैठेगा,
सुप्रीम कोर्ट संज्ञान लेगा..
तब एक दरोगा, चार कॉन्स्टेबल सस्पेंड कर दिए जाएंगे। और जिस आदमी की सरपरस्ती में हालात पैदा हुए- संसद में उसका स्वागत होगा।
जयजयकार होगी।
लाइन हाजिर दरोगा, कुछ कॉन्स्टेबल- टीवी पर यह देख रहे होंगे। तब क्या आपको नही लगता, कि सत्ता, विपक्ष, मुद्दा, आंदोलनकारी आदेश और जमीर के बीच कसमसाते ये लोग..
हिन्दुस्तान की सबसे बेचारी कौम है।
मैं पहले दिन से इस बात पर कायम हूं कि CJP को BJP ने ही बनाया है.
पहले दिन से प्लान था कि विपक्ष को डिस्क्रेडिट करके, अपने हिसाब का विपक्ष तैयार कर दिया जाए.
एयरपोर्ट पर परमिशन देना हो, या जंतर-मंतर पर धरना चलते देना हो. सब कुछ प्लान के हिसाब से था.
मैं ये गारंटी के साथ कह सकता हूं- 20 तारीख से पहले मोदी सरकार चाह देती तो 1 घंटे धरना ना चल पाता, लेकिन सरकार ने स्क्रिप्ट के हिसाब से चलने दिया.
वांगचुक जिन्हें खुद अमित शाह ने जेल से निकाला था, उनका भूख हड़ताल करना, और अचानक से एक सुबह उन्हें उठा लेना. सब कुछ स्क्रिप्ट के हिसाब से था.
बस 20 तारीख को जो हुआ, वो ना BJP को पता था, ना ही CJP को अंदाजा. बड़ी संख्या में लोग दिल्ली पहुंच गए.
यहां से सब कुछ स्क्रिप्ट के बाहर चला गया. इसलीए CJP की पूरी टीम ही मौके से गायब हो गई. किसी को एक लाठी नहीं पड़ी.
देश भर से आए बच्चों ने सब कुछ झेला, और उसके बाद ये मामला बहुत बड़ा हो गया. जो अब BJP और CJP के कंट्रोल से बाहर था.
स्क्रिप्ट का अंत करीब-करीब ऐसा ही था, जिसमें सरकार संवेदनशील लगे और विपक्ष के नाम पर कुछ लोग खड़े कर दिए जाएं, जो सरकार के हिसाब से हों.
क्योंकि विपक्ष पिछले 3 साल में बहुत ज्यादा मजबूत हो गया था. खासकर युवाओं के बीच में अपनी पहुंच मजबूत की थी. इसी बात को तोड़ने के लिए CJP का नाटक किया गया.
जब 20 तारीख के बाद मामला स्क्रिप्ट के बाहर गया तो पहले कुछ वक्त इंतजार हुआ. फिर वांगचुक को खुद सरकार ने सूप पिलाकर मामला खत्म किया.
और आखिर में धमेंद्र का इस्तीफा हो गया.
इस्तीफे के बाद जिस तरह से सरकार के मंत्री बता रहे हैं कि धरना तत्काल खत्म किया जाए, वो बताता है कि इसे कौन चला रहा था.
आप खुद सोचिए, ये जितने सेलिब्रेटी हैं, ये अचानक से कैसे बोलने लगे. एक जैसी टीशर्ट पहनकर, कॉओर्डिनेटेड तरीक से. जिनके लिए पैसा ही सब कुछ है, वो देश की चिंता क्यों करने लगे, वो भी अचानक.
अब लोगों के बीच ये भ्रम पैदा हो गया कि CJP की सरकार सुन रही है, विपक्ष वही है. सरकार यही भ्रम लोगों में बनाए रखना चाहती है. और स्क्रिप्ट के हिसाब से ये बात लोगों में चली गई.
सरकार को अपने हिसाब का विपक्ष मिल गया, जिसे वो अपने हिसाब से चला सकती है. जो भी इस भ्रम जाल में फंस रहा है, वो अपना और देश का नुकसान कर रहा है.
इस पूरे आंदोलन में लेफ्ट के जितने भी छात्र संगठन, कांग्रेस के छात्र और युवा संगठन और बाकी विपक्ष के छात्र संगठन शामिल हैं, उनकी मंशा साफ थी. वो असल में विपक्ष का काम कर रहे थे.
इस आंदोलन में जितने भी युवा थे, जो देश के अलग-अलग कोनों से जुड़े, सबकी मंशा साफ थी.
बस CJP का मामला अलग है, जिसपर बहुत संदेह है. इसे लेकर सावधान रहना ठीक.