हर गली कूचे में रोने की सदा मेरी है
शहर में जो भी हुआ है वो ख़ता मेरी है
ये जो है ख़ाक का इक ढेर बदन है मेरा
वो जो उड़ती हुई फिरती है क़बा मेरी है
वो जो इक शोर सा बरपा है अमल है मेरा
ये जो तन्हाई बरसती है सज़ा मेरी है
~फ़रहत एहसास
पूरा इलाज-ए-वस्ल भी करने के बावजूद,
ये ज़ख़्म बरक़रार है भरने के बावजूद...
अब भी है साहिलीयत-ए-जान-ओ-बदन वही,
दरिया में उसके साथ उतरने के बावजूद...
~ फ़रहत एहसास जी
@farhat_ehsas