America's GPS needs 24 satellites; but 30 satellites are maintained
China's Beidou needs ~30 satellites, but some 35 satellites are maintained (estimates)
India's regional system NAVIC needs 5-7 satellites(Full constellation); barely 3 satellites are maintained
Dear PM @narendramodi , NavIC was conceived, approved, and begun under the UPA as India’s own regional alternative to dependence on GPS and other foreign navigation systems. The full constellation was completed and made operational in 2016.
Now, roughly 10 years later, it has effectively fallen below operational navigation strength because ageing satellites were not replaced in time and recent replacement efforts have been delayed or unsuccessful.
Hope you realize the seriousness of this lapse as we enter an era of geopolitical uncertainties.
हिंदुओं का मानसिक पतन उसी दिन शुरू हो गया था,
जिस दिन “हर हर महादेव” की जगह “हर हर मोदी” बोला जाने लगा।
नेता आएँगे-जाएँगे, पर जिसने भगवान को नेता से बदला वो पहले ही मानसिक पतन का शिकार हो चुका है।
हनुमान बेनीवाल: वह किसान–नेता, जिसने अदृश्य हो जाने से इंकार कर दिया
ऐसे समय में, जब भारतीय राजनीति आज्ञाकारिता को साहस से अधिक मूल्य देती है, हनुमान बेनीवाल एक असुविधाजनक अपवाद की तरह खड़े दिखाई देते हैं।
राजस्थान की तपती हुई राजनीति में, जहाँ वफादारियाँ अक्सर जाति, सत्ता और परंपरा से तय होती हैं; बेनीवाल ने एक ऐसा रास्ता चुना जो प्रायः राजनीतिक निर्वासन की ओर जाता है। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी से न केवल विद्रोह किया, उसके बाहर रहकर अपना वजूद भी कायम रखा।
मेरे ख़याल से हाल के वर्षों में देवी सिंह भाटी के बाद राजस्थान में वे पहले नेता हैं, जिन्होंने यह साबित किया कि केंद्रीय सत्ता से अलग होकर भी जनाधार बनाया जा सकता है और उसे बचाए रखा जा सकता है। भाटी तो फिर भी वापस भाजपा में चले गए; लेकिन उन्होंने किसान आंदोलन के समय मोदी सरकार से भी टकराव मोल लेकर अपने आपको दु:साहसी साबित किया।
2 मार्च 1972 को नागौर ज़िले में जन्मे हनुमान बेनीवाल राजनीति से अनजान परिवार से नहीं आते। उनके पिता रामदेव बेनीवाल राजस्थान विधानसभा के दो बार सदस्य रहे। लेकिन राजनीतिक विरासत ने उन्हें रास्ता दिखाया, मंज़िल नहीं। उनकी असली दीक्षा विश्वविद्यालय के गलियारों, पुलिस की लाठियों और जेल की सलाखों के बीच हुई।
नब्बे के दशक में अगर राजस्थान विश्वविद्यालय छात्र राजनीति का उबलता हुआ केंद्र था तो इसलिए कि वहाँ हनुमान ही अपनी गदा घुमा रहे थे। वहीं से बेनीवाल उभरे—पहले महाराजा कॉलेज, फिर लॉ कॉलेज और अंततः राजस्थान विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष के रूप में।
एक आंदोलन के दौरान 1996 में गिरफ्तारी और फिर तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत के आदेश पर आधी रात को रिहाई—यह घटना कैंपस की लोककथा बन गई।
विश्वविद्यालय के छात्रावास में 1997 में हुए सामूहिक बलात्कार के विरोध में उन्होंने जो आंदोलन किया, उसने उन्हें केवल नेता नहीं, आक्रोश की आवाज़ बना दिया। पुलिस मुकदमों के बावजूद वे निर्दलीय चुनाव जीत गए।लेकिन छात्र राजनीति का सबसे निर्णायक क्षण तब आया जब उन्होंने ग्रामीण छात्रों के लिए पाँच प्रतिशत अतिरिक्त अंक की माँग को आंदोलन में बदला। यह कोई बड़ा नारा नहीं था, एक व्यावहारिक न्याय की माँग थी।
आठ दिनों की जेल और लगातार संघर्ष के बाद यह माँग मानी गई, और लगभग आठ हज़ार ग्रामीण छात्रों को विश्वविद्यालय में प्रवेश मिला। यहीं से बेनीवाल ने यह सीख ली कि अगर आंदोलन लंबा और ईमानदार हो तो संस्थाएँ भी झुकती हैं।
मुख्यधारा की राजनीति में उनका प्रवेश उतना सहज नहीं था। 2003 में पहला विधानसभा चुनाव हारने के बाद 2008 में वे भाजपा के टिकट पर खींवसर से जीते। लेकिन यह रिश्ता अस्थायी साबित हुआ। 2010 के दशक की शुरुआत में उन्होंने भाजपा के शीर्ष नेतृत्व पर भ्रष्टाचार और सत्ता-साठगाँठ के आरोप लगाए। पार्टी ने इसे अनुशासनहीनता कहा; बेनीवाल ने इसे नैतिक ज़िम्मेदारी। नतीजा—निलंबन और निष्कासन।यहीं से उनका असली राजनीतिक परीक्षण शुरू हुआ।
2013 में निर्दलीय जीतकर उन्होंने यह साबित किया कि भाजपा से बाहर रहना राजनीतिक आत्महत्या नहीं है। वे विधानसभा में ऐसे विधायक बने जो सत्ता के भीतर रहकर भी विरोध की भाषा बोलते थे। चाहे आरपीएससी के पेपर लीक हों, अवैध बजरी खनन हो या किसानों की उपेक्षा—बेनीवाल ने हर मुद्दे को सड़क तक पहुँचाया।
2015 में उन पर हुआ हमला और उसके बाद छात्रों का उग्र विरोध, उनकी जनस्वीकृति का प्रमाण था।2018 में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) की स्थापना एक जोखिम भी थी और एक घोषणा भी। किसान कर्ज़माफी, मुफ़्त सिंचाई बिजली और न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसे मुद्दों को लेकर उनके ‘किसान हुंकार’ महा-रैलियों ने राजस्थान की राजनीति को झकझोर दिया। आरएलपी राज्य की तीसरी राजनीतिक शक्ति बनकर उभरी—एक दुर्लभ उपलब्धि।
2019 में नागौर से लोकसभा जीतकर वे राष्ट्रीय राजनीति में पहुँचे, भाजपा-नेतृत्व वाले एनडीए के सहयोगी के रूप में। लेकिन यह गठबंधन भी स्थायी नहीं रहा। 2020 के कृषि क़ानूनों पर उन्होंने खुला विद्रोह किया—संसदीय समितियों से इस्तीफ़ा दिया, किसानों को दिल्ली कूच के लिए संगठित किया और अंततः एनडीए से नाता तोड़ लिया। ऐसी संसद में, जहाँ असहमति दुर्लभ होती जा रही है, यह कदम असाधारण था।
दिसंबर 2023 में संसद की सुरक्षा भंग होने की घटना के दौरान, जब घुसपैठिए लोकसभा कक्ष में कूदे, बेनीवाल उन सांसदों में थे जिन्होंने उन्हें काबू किया। बाद में उनका बयान कि “हीरोगीरी उतार दी”; उनकी राजनीतिक शैली का सटीक प्रतिबिंब था: सीधी, देहाती और दिखावे से मुक्त। हालाँकि उनकी राजनीति अजेय नहीं रही। फिर भी भाजपा और कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टियों के बलशाली नेताओं के सामने महाबली हनुमान ही साबित हुए। भले चुनाव उनके हाथ से निकल गया हो।
2024 के खींवसर उपचुनाव में उनकी पत्नी कनिका बेनीवाल की हार ने यह दिखाया कि करिश्मा भी सीमित होता है और जातीय समीकरण अब भी निर्णायक हैं। हालांकि कनिका चुुनाव हार गईं, लेकिन यह तय है कि गंगानगर की यह बेटी भी इस संघर्ष की राह से एक दिन विधानसभा या लोकसभा ज़रूर पहुंचेगी।
आज हनुमान बेनीवाल राष्ट्रीय राजनीति में एक असहज लेकिन साहस के स्थान पर खड़े हैं। 2024 में ‘इंडिया’ गठबंधन से जीतने के बाद भी उन्हें हाशिये पर रखे जाने की शिकायत रही। यह उस संरचनात्मक सच्चाई को उजागर करता है कि छोटे दलों के नेता, चाहे जितने लोकप्रिय हों, राष्ट्रीय गठबंधनों में अक्सर अस्थायी माने जाते हैं।फिर भी, राजस्थान की राजनीति में हनुमान बेनीवाल एक ज़रूरी याद दिलाते हैं कि लोकतंत्र अब भी सड़कों से जन्म ले सकता है, सिर्फ़ पार्टी मुख्यालयों से नहीं। यह भविष्य की राजनीति में टिक पाएगा या नहीं, कहना मुश्किल है। लेकिन इतना तय है कि बेनीवाल ने एक दुर्लभ काम किया है: उन्होंने विरोध को टिकाऊ बना दिया है। अगर हनुमान बेनीवाल की तरह का साहस भाजपा या कांग्रेस के कुछ नेताओं ने दिखाया होता तो राजस्थान आज एक अलग ही राह पर चल रहा होता!
हनुमान बेनीवाल को जन्मदिन की असीम शुभकामनाएँ!
@hanumanbeniwal@RLPINDIAorg@kanikabeniwal51
₹1400 करोड़ की अनुचित वसूली पर जयपुर की वाणिज्यिक अदालत ने फैसला दिया, जज ने कानून के हिसाब से निर्णय लिया, लेकिन उसी दिन उनका ट्रांसफर कर दिया गया
अब सवाल बहुत साधारण है
क्या अब जज को फैसला देने से पहले ये सोचना पड़ेगा कि सामने कौन है? अगर बड़े कॉरपोरेट के खिलाफ फैसला देना जोखिम बन जाएगा, तो आम आदमी को न्याय कैसे मिलेगा? यही सवाल आज जनता के मन में है और यही सवाल देश के बीच जाएगा।
I run every day for 30 minutes, if I miss a day I add 30 minutes to the next day.
This has truly been a game changer, tomorrow I’m supposed to run for 3 weeks.
सिक्किम के राज्यपाल महामहिम ओमप्रकाश माथुर खुद अविवाहित हैं। लेकिन समधी बनने की ठसक उन्होंने अपने भाई की पोती की शादी में पूरी कर ली है।
परसो उनके परिवार में शादी का बड़ा आयोजन था और तामझाम इतने भारी थे कि पाली जिले के लोगों के ऊपर असल में तो ये शादी आफत बनकर टूट पड़ी।
कोई व्यक्ति अपनी पारिवारिक खुशियों को कैसे जाहिर करता है यह उसका नितांत निजी विषय है लेकिन जब जिम्मेदार पद पर बैठे लोग ऐसी सनक दिखाते हैं तो उस पर चर्चा होनी चाहिए। और ओमप्रकाश जी माथुर के परिवार में हुआ यह शादी समारोह इसलिए चर्चा के योग्य है कि यहां खुलेआम दिखावे की सनक का भौंडा प्रदर्शन किया गया था।
इस शादी में तीन दिन तक पुलिस के 1500 जवानों का बेड़ा लगा था। लेकिन पूरे पाली जिले का पुलिस बेड़ा 1500 जवानों का नहीं है। इसलिए बाहर से पुलिस बेड़ा बुलवाना पड़ा था। पुलिस शादी संभाल रही थी तो सवाल है कि जिले को कौन संभाल रहा था ?
दूसरा सबसे बड़ा मैनेजमेंट डिजास्टर ये था कि जिस जगह शादी हुई थी उसकी उदयपुर और जोधपुर एयरपोर्ट से दूरी लगभग 150 किलोमीटर थी। तमाम VVIP इन्हीं एयरपोर्ट पर लैंड हुए थे। अब आप सोचिए इतने सारे VVIP को 150 किलोमीटर एस्कॉर्टिग करके लेकर जाने में कितने संसाधन बर्बाद हो जाते हैं, हम इसका अंदाजा भी नहीं लगा सकते। ओमजी भाईसाहब के पास जयपुर, जोधपुर और उदयपुर जैसे बड़े शहरों में भी शादी करने का विकल्प था जहां से ऐसी असुविधा से बचा जा सकता था। लेकिन चूंकि शादी रणकपुर में थी तो तीन जिलों की पुलिस और प्रशासन सिर्फ VVIP एस्कॉर्टिग में ही लगा रहा।
मेरे स्थानीय स्त्रोत बताते हैं कि जिस लालबाग रिसोर्ट में यह शादी थी वह खुद महामहिम राज्यपाल का ही रिसोर्ट है। शादी के बहाने इस रिसॉर्ट की ब्रांडिंग के बिजनेस आइडिया को डिलीवर किया जा रहा था। प्रशासन ने रातोंरात ही रिसॉर्ट तक जाने वाली तीन किलोमीटर की सड़क को फिर से बनाया। मजेदार बात ये है कि इस सड़क को बनाने के लिए पहले ना तो कोई प्रस्ताव लिया गया और ना ही बजट आवंटित हुआ। हम जिम्मेदार नागरिक होने के नाते ये सवाल जरूर करें कि बिना प्रस्ताव और बजट आवंटित किए कोई भी सरकार पैसे का दुरुपयोग कैसे कर सकता है ?
पूरी जनता ने एक महाबली महामहिम के पावर और रुतबे का तमाशा सरेआम देखा था। शादी महज एक बहाना भर थी।
संवैधानिक और जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों का जब ऐसा व्यवहार देखता हूँ तो मुझे पंडित नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी की शादी याद आती है। नेहरू चाहते तो पूरे इलाहाबाद (प्रयागराज) को इंदिरा की बेटी में चमका सकते थे। हिंदुस्तान नहीं बल्कि दुनिया भर के VVIP बुलाए जा सकते थे लेकिन प्रधानमंत्री होते हुए भी उन्होंने अपनी बेटी इंदिरा की शादी इतनी सादगी के साथ सम्पन्न करवाई कि पड़ोसियों तक को दिक्कत नहीं हुई।
लोकतांत्रिक तौर पर हम समझदार हो रहे हैं या बेवकूफ बन रहे है मुझे यह समझ नहीं आता। क्या शादियां एक पारिवारिक उत्सव है या फिर हनक और सनक दिखाने का माध्यम बन गई है। इस पर अब समाज को जरूर विमर्श करना चाहिए। क्योंकि ताकतवर लोगों द्वारा अब यही किया जा रहा है।