।। श्वेताश्वतर उपनिषद् ।।
अजात इत्येवं कश्चिद्भीरुः प्रपद्यते ।
रुद्र यत्ते दक्षिणं मुखं तेन मां पाहि नित्यम् ।।२१।।
(चतुर्थोऽध्यायः)
श्वेताश्वतरोपनिषद् का यह मन्त्र उपनिषदों के अत्यन्त मार्मिक प्रार्थना-मन्त्रों में से एक है। यहाँ साधक उस परम रुद्र की शरण ग्रहण करता है - जो अजन्मा, अविनाशी, नित्य और अद्वितीय ब्रह्म हैं। भगवत्पादाचार्�� श्री आदि शंकराचार्य के अनुसार इस मन्त्र का उद्देश्य केवल दैवी संरक्षण की याचना नहीं, बल्कि उस परम सत्य की शरण ग्रहण करना है, जिसके ज्ञान से समस्त भय का अन्त हो जाता है। अद्वैत वेदान्त का मूल सिद्धान्त है कि भय का कारण द्वैत है। जहाँ ‘दूसरा’ प्रतीत होता है, वहीं भय उत्पन्न होता है; जहाँ केवल ब्रह्म का अनुभव होता है, वहाँ अभय ही अभय है। अतः यह मन्त्र बाह्य सुरक्षा से कहीं अधिक, आत्मज्ञान की दिव्य याचना है।
‘अजात’ : जो कभी उत्पन्न नहीं होता !
मन्त्र का प्रथम शब्द है - “अजात।”
भगवत्पादाचार्य के अनुसार ब्रह्म का न जन्म है, न उत्पत्ति, न परिवर्तन। जो जन्म लेता है, वह काल के अधीन होता है; जो काल के अधीन है, वह नश्वर है। परन्तु परमब्रह्म नित्य, स्वयं सिद्ध और अविकार हैं।
इसी सत्य को माण्डूक्यकारिका में गौड़पादाचार्य अजातिवाद के रूप में प्रतिपादित करते हैं और भगवत्पादाचार्य उसका समर्थन करते हैं। ब्रह्म न उत्पन्न होता है, न किसी अन्य से उत्पन्न करता है; समस्त उत्पत्ति व्यवहारिक स्तर पर मायिक प्रतीति है।
‘भीरुः प्रपद्यते’ : भयभीत जीव की शरणागति ।
उपनिषद् कहता है कि भयभीत जीव उस अजन्मा परमात्मा की शरण लेता है।
भगवान् आदि शंकराचार्य के अनुसार यहाँ “भय” केव��� बाह्य संकटों का नहीं है। वास्तविक भय है - जन्म और मृत्यु का भय, अज्ञान का भय, असुरक्षा का भय, कर्मबन्धन का भय और पुनर्जन्म का भय। जब जीव संसार की अनित्यता को समझता है, तब उसकी शरणागति किसी सीमित आश्रय में नहीं, बल्कि उस नित्य ब्रह्म में होती है जो कभी परिवर्तित नहीं होता।
‘रुद्र’ : दुःख का निवारण करने वाला !
यहाँ “रुद्र” शब्द का अद्वैतार्थ अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। भगवत्पादाचार्य के अनुसार रुद्र वह हैं, जो समस्त दुःखों, अविद्या और संसारबन्धन का नाश करते हैं। वे किसी सीमित देवता के र��प में नहीं, बल्कि परमब्रह्म के ईश्वररूप स्वरूप हैं।
रुद्र की कृपा का अर्थ है - अज्ञान का विनाश और आत्मज्ञान का उदय। “दक्षिणं मुखम्’ अनुग्रह और करुणा का प्रतीक !
मन्त्र का सबसे सुन्दर पद है - “यत्ते दक्षिणं मुखम्।” “दक्षिण” यहाँ केवल दिशा का बोधक नहीं, बल्कि मंगल, करुणा, अनुग्रह और कल्याण का प्रतीक है।
भगवान् आदि शंकराचार्य के अनुसार साधक ईश्वर के उसी अनुग्रहकारी स्वरूप की प्रार्थना करता है, जो ज्ञान प्रदान करता है, भय को दूर करता है और आत्मस्वरूप का प्रकाश करता है।
अद्वैत में ईश्वर की कृपा और आत्मज्ञान परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हैं। ईश्वर की कृपा से ही अन्तःकरण शुद्ध होता है और ब्रह्मविद्या के योग्य बन��ा है।
‘पाहि नित्यम्’ : निरन्तर संरक्षण का वास्तविक अर्थ है ! मन्त्र का समापन है - “तेन मां पाहि नित्यम्।” यह संरक्षण केवल शारीरिक रक्षा नहीं है। भगवत्पादाचार्य के अनुसार वास्तविक रक्षा है - अविद्या से रक्षा, देहाभिमान से रक्षा, विषयासक्ति से रक्षा, अहंकार से रक्षा और पुनर्जन्म के बन्धन से रक्षा। जो ज्ञान जीव को उसके शुद्ध आत्मस्वरूप में स्थापित कर दे, वही परम संरक्षण है।
अध्यासभाष्य और अभय !
भगवत्पादाचार्य के प्रसिद्ध अध्यासभाष्य के अनुसार जीव शरीर, मन और अहंकार का अध्यास आत्मा पर करता है। इसी मिथ्या तादात्म्य से समस्त भय उत्पन्न होता है। जब आत्मज्ञान होता है, तब यह अध्यास समाप्त हो जाता है। ज्ञानी अनुभव करता है कि आत्मा कभी जन्मी नहीं, अतः उसका विनाश भी नहीं हो सकता। यही वास्तविक अभय है।
यह मन्त्र भक्तिभाव और अद्वैतज्ञान का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करता है। भयभीत जीव अजन्���ा, अविनाशी और करुणामय रुद्र की शरण ग्रहण करता है और उनके मंगलमय स्वरूप से नित्य संरक्षण की प्रार्थना करता है। किन्तु भगवत्पादाचार्य आदि शंकराचार्य के अनुसार इस संरक्षण का परम अर्थ आत्मज्ञान की प्राप्ति है। जब साधक ईश्वर की कृपा से अपने ही आत्मस्वरूप में स्थित अद्वैत ब्रह्म का साक्षात्कार करता है, तब जन्म, मृत्यु, भय, कर्म और अज्ञान के सभी बन्धन स्वतः नष्ट हो जाते हैं। व���ी वास्तविक अभय है, वही परम शान्ति है, वही मोक्ष है। यही श्वेताश्वतरोपनिषद् का दिव्य सन्देश, अद्वैत वेदान्त का हृदय और मानव जीवन का सर्वोच्च आध्यात्मिक पुरुषार्थ है।
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।। “श्वेताश्वतर” उपनिषद् ।।
सर्वतः पाणि���ादं तत् सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ।।१६।।
(श्वेताश्वतरोपनिषद्, तृतीयोऽध्यायः)
उपनिषदों का परम उद्देश्य मनुष्य को बाह्य भेदों से ऊपर उठाकर उस एक अखण्ड, सर्वव्यापक और अद्वितीय सत्य का अनुभव कराना है, जो समस्त विश्व का आधार और सभी प्राणियों का अन्तरात्मा है। श्वेताश्वतरोपनिषद् का यह मन्त्र उसी सार्वभौम सत्य का उद्घोष करता है। इसमें परमात्मा की ऐसी विराट् अनुभूति का वर्णन है, जिसमें सम्पूर्ण विश्व उसी एक चैतन्य का विस्तार बन जाता है।
भगवत्पाद भगवान आदि शंकराचार्य इस मन्त्र की व्याख्या करते हुए स्पष्ट करते हैं कि यहाँ परमात्मा के हाथ, चरण, नेत्र, मुख अथवा कानों का कोई स्थूल वर्णन नहीं है। ब्रह्म निराकार, निरवयव और निर्विशेष है। उपनिषद् प्रतीकात्मक भाषा में यह बताती है कि समस्त प्राणियों के हाथ उसी के हाथ हैं, समस्त नेत्र उसी की दृष���टि हैं, समस्त मुख उसी की अभिव्यक्ति हैं और समस्त श्रवण उसी की चेतना से सम्भव है। यह वर्णन ब्रह्म की सर्वव्यापकता का है, किसी दैहिक विराट् स्वरूप का नहीं।
“सर्वतः पाणिपादम्” सभी कर्मों का आधार !
भगवत्पादाचार्य के अनुसार संसार में जितने भी हाथ कार्य कर रहे हैं और जितने भी चरण गतिशील हैं, उन सबकी क्रियाशक्ति का वास्तविक आधार वही एक परमात्मा है। हाथ और पैर केवल उपकरण हैं; उनमें चेतना का संचार ���रने वाला आत्मतत्त्व ही उन्हें कर्मयोग्य बनाता है। इसलिए प्रत्य���क कर्म वस्तुतः उसी परम चेतना की अभिव्यक्ति है। यह अनुभूति साधक को अहंकार से मुक्त कर कर्म को ईश्वरार्पण की भावना प्रदान करती है।
“सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्” सभी दृष्टियों का द्रष्टा !
मन्त्र का अगला भाग बताता है कि उसके नेत्र, मस्तक और मुख सर्वत्र हैं। भगवान आदि शंकराचार्य के अनुसार इसका अर्थ यह है कि समस्त प्राणियों की दृष्टि का आधार एक ही चैतन्य है। नेत्र केवल देखने का साधन हैं; वास्तविक द्रष्टा आत्मा है। केनोपनिषद् भी कहती है- “चक्षुषश्चक्षुः” वह नेत्रों का भी नेत्र है। वही समस्त ज्ञान और अनुभव का मूल प्रकाश है।
“सर्वतः श्रुतिमत्” समस्त श्रवण का आधार !
श्रवण की शक्ति भी उसी आत्मचैतन्य से प्रकाशित होती है। कान केवल ध्वनि ग्रहण करते हैं; सुनने का अनुभव आत्मा के कारण ही सम्भव होता है। इसी प्रकार बोलना, सोचना, अनुभव करना और समस्त इन्द्रियों की क्रियाशीलता उसी एक चेतना पर आधा���ित है। इसलिए उपनिषद् परमात्मा को समस्त इन्द्रियों का आधार कहती है, यद्यपि वह स्वयं इन्द्रियगोचर नहीं है।
“सर्वमावृत्य तिष्ठति” सबमें व्याप्त, फिर भी सबसे परे !
भगवत्पादाचार्य के अनुसार इसका अर्थ यह नहीं कि ब्रह्म किसी पदार्थ की भाँति संसार में फैला ह��आ है। वह सम्पूर्ण जगत् का अधिष्ठान है। जैसे - आकाश पात्रों से विभाजित नहीं होता और स्वर्ण आभूषणों के भेद से परिवर्तित नहीं होता, वैसे ही ब्रह्म सबमें व्याप्त होकर भी किसी सीमा से बँधता नहीं। वह प्रत्येक हृदय में अन्तर्यामी है, किन्तु किसी एक शरीर तक सीमित नहीं।
आदि शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि यह मन्त्र किसी सगुण देवता की शारीरिक महिमा का वर्णन नहीं करता, बल्कि यह प्रतिपादित करता है कि एक ही आत्मा समस्त जीवों में समान रूप से प्रकाशित है। अनेक शरीर और अनेक व्यक्तित्व दिखाई देते हैं, परन्तु चेतना एक ही है। अविद्या के कारण जीव स्वयं को शरीर-मन तक सीमित मानता है; ज्ञान होने पर वह अनुभव करता है कि वही चेतना सम्पूर्ण विश्व में समान रूप से विद्यमान है। यही अद्वैत वेदान्त का सार है।
इस मन्त्र का मनन साधक की दृष्टि को परिवर्तित कर देता है। तब प्रत्येक प्राणी में ईश्वर का दर्शन होने लगता है। सेवा उपासना बन जाती है, करुणा आत्मबोध की अभिव्यक्ति बन जाती है और समता तथा अहिंसा स्वाभाविक जीवन-मूल्य बन जाते हैं।
आज जब संसार विभाजन, संघर्ष और संकीर्णता से ग्रस्त है, तब यह मन्त्र स्मरण कराता है कि यदि एक ही आत्मा सबमें विद्यमान है, तो किसी के प्रति घृणा या हिंसा वास्तव में अपने ही आत्मस्वरूप के प्रति अज्ञान है। इसलिए अद्वैत केवल दार्शनिक सिद्धान्त नहीं, बल्कि मानव-एकता, सामाजिक समरसता और विश्वशान्ति का शाश्वत आधार है।
श्वेताश्वतरोपनिषद् का यह मन्त्र सम्पूर्ण वेदान्त का सार प्रस्तुत करता है। परमात्मा किसी दूरस्थ सत्ता का नाम नहीं, बल्कि प्रत्येक हाथ की शक्ति, प्रत्येक नेत्र की दृ��्टि, प्रत्येक कान की श्रवणशक्ति और प्रत्येक हृदय की चेतना के रूप में विद्यमान है। भगवत्पाद आदि शंकराचार्य के भाष्य के अनुसार यह सम्पूर्ण वर्णन ब्रह्म की सर्वव्यापकता और जीव-ब्रह्म-अभेद का प्रतीकात्मक प्रतिपादन है।
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अनेनैव प्रकारेण वृत्तिर्ब्रह्मात्मिका भवे���्।
उदेति शुद्धचित्तानां वृत्तिज्ञानं ततः परम् ।।१३७।।
("अपरोक्षानुभूति")
अद्वैतवेदान्त में आत्मसाक्षात्कार की प्रक्रिया का सूक्ष्मतम रहस्य वृत्ति-ज्ञान में निहित है। प्रस्तुत श्लोक में भगवत्पादाचार्य यह प्रतिपादित करते हैं कि यथोक्त विवेक कार्य-कारण-निरसन, नाम-रूप-भेद की निवृत्ति तथा ब्रह्मैकत्व की दृढ़ भावना के द्वारा अन्तःकरण की वृत्ति स्वयं ब्रह्माकार हो जाती है, और तत्पश्��ात् शुद्ध चित्त में परमज्ञान का उदय होता है।
“अनेनैव प्रकारेण” अर्थात् पूर्वोक्त विवेक-प्रक्रिया के द्वारा, जिसमें साधक बार-बार यह विचार करता है कि यह समस्त जगत् केवल नाम-रूपात्मक आभास है और तत्त्वतः ब्रह्म ही है। यह निरन्तर मनन और निदिध्यासन अन्तःकरण को विषयवृत्तियों से निवृत्त कर ब्रह्मैक्य-वृत्ति में प्रतिष्ठित करता है।
“वृत्तिर्ब्रह्मात्मिका भवेत्” - यहाँ ‘वृत्ति’ से अभिप्राय अन्तःकरण की ज्ञानात्मक प्रवृत्ति से है। जब मन बाह्य विषयों से हटकर आत्मतत्त्व में अवस्थित होता है, तब उसकी वृ���्ति ‘अहं ब्रह्मास्मि’ के अखण्ड बोध में परिणत होती है। यह ब्रह्माकार-वृत्ति है; न कोई कल्पना, न कोई विकल्प, अपितु शुद्ध चैतन्य में लीन एकरूपता की अनुभूति। जैसे स्वर्ण को पहचान लेने पर आभूषणों का भेद लुप्त हो जाता है, वैसे ही इस वृत्ति के उदय से समस्त भेद-बुद्धि का क्षय हो जाता है।
भगवद्पादाचार्य आदि शंकराचार्य जी की दृष्टि में यह ब्रह्माकार-वृत्ति ही अविद्यानिवृत्त्युपाय है। यद्यपि ब्रह्म स्वयं नित्य, स्वप्रकाश और साक्षिरूप है, तथापि अविद्या के आवरण को हटाने के लिए अन्तःकरण में इस विशेष वृत्ति का उदय आवश्यक प्रतीत होता है। यह वृत्ति दीपक के समान है जो स���वयं प्रकाशमान होकर अज्ञान-अन्धकार को दूर कर देती है, और अन्ततः स्वयं भी लीन हो जाती है।
“उदेति शुद्धचित्तानां” - यह ज्ञान केवल उन्हीं साधकों में प्रकट होता है, जिनका चित्त शुद्ध, निर्मल और एकाग्र हो चुका है। शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा और समाधान इन साधनचतुष्टय से युक्त चित्त ही इस ज्ञान का पात्र बनता है। अशुद्ध, विक्षिप्त या विषयासक्त मन में यह ब्रह्माकार-वृत्ति स्थिर नहीं हो सकती।
“वृत्तिज्ञानं ततः परम्” - इस ब्रह्मात्मक वृत्ति के उदय से जो ज्ञान प्रकट होता है, वह सामान्य बौद्धिक ज्ञान नहीं, अपितु अपरोक्ष आत्मानुभूति है। यह ज्ञान प्रत्यक्ष के समान साक्षात् है- जहाँ ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान का त्रिपुट भेद लीन हो जाता है। यही वह अवस्था है जहाँ साधक जानता नहीं, अपितु स्वयं ज्ञानस्वरूप हो जाता है।
यहाँ एक अत्यन्त सूक्ष्म बिन्दु है; यह वृत्तिज्ञान अन्ततः स्वयं का भी अतिक्रमण करता है। जैसे काँटे से काँटा निकालकर दोनों त्याग दिए जाते हैं, वैसे ही ब्रह्माकार-वृत्ति अविद्या को नष्ट कर स्वयं भी लीन हो जाती है, और केवल शुद्ध, निर्विकल्प, अखण्ड चैतन्य शेष रहता है।
उपनिषद् इसी सत्य को उद्घोषित करती है - “ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति” ब्रह्म को जानने वाला स्वयं ब्रह्म ही हो जाता है। यह ‘होना’ कोई परिवर्तन नहीं, अपितु अपने नित्य स्वरूप की प्रत्यभिज्ञा है।
अतः इस श्लोक का सार यह है कि निरन्तर विवेक और निदिध्यासन से अन्तःकरण ब्रह्माकार हो जाता है; उस शुद्ध चित्त में जो ज्ञान उदित होता है, वही परम आत्मसाक्षात्कार है। वहाँ न साधक रहता है, न साधन केवल अद्वितीय ब्रह्मस्वरूप का अखण्ड प्र���ाश ही शेष रहता है।
यही अद्वैत का परम निष्कर्ष है; वृत्ति से परे, ज्ञान से परे, केवल स्वप्रकाश, शुद्ध, नित्य ब्रह्म ही आत्मरूप से अनुभूत होता है।
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ततः साधननिर्मुक्तः सिद्धो भवति योगिराट् ।
तत्स्वरूपं न कैकस्य विषयः मनसो गिराम् ।।१२६।।
("अपरोक्षानुभूति")
अद्वैत-वेदान्त के परमाचार्य भगवत्पाद भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य इस श्लोक में साधना की पराकाष्ठा तथा उसके परम फल का दिव्य निरूपण करते हैं। पूर्ववर्ती श्लोकों में उन्होंने अभ्यास, ध्यान, धारणा और समाधि के क्रमिक उत्कर्ष को स्पष्ट किया; यहाँ वे उस अन्तिम अवस्था का उद्घाटन करते हैं, जहाँ साधक समस्त साधनों से परे होकर, सिद्धत्व को प्राप्त करता है और आत्मस्वरूप में पूर्णतः प्रतिष्ठित हो जाता है।
“ततः साधननिर्मुक्तः” - यहाँ “ततः” शब्द उस क्रम का बोध कराता है, जो निरन्तर अभ्यास, ब्रह्मनिष्ठ चिन्तन और अन्तःकरण-शुद्धि के पश्चात् प्राप्त होता है। जब साधक “कृतिमानन्द” से “सहजानन्द” की ओर अग्रसर होकर मन को पूर्णतः वश में कर लेता है, तब वह साधनों की आवश्यकता से मुक्त हो जाता है। साधन जैसे - ध्यान, जप, उपासना, चिन्तन ये सभी प्रारम्भ में आवश्यक होते हैं; किन्तु जब लक्ष्य की प्राप्ति हो जाती है, तब ये साधन स्वतः ही अप्रासंगिक हो जाते हैं। जैसे - नदी समुद्र में मिलकर अपन�� पृथक् धारा को खो देती है, वैसे ही साधन आत्मसाक्षात्कार में लीन होकर अपना प्रयोजन पूर्ण कर लेते हैं।
“सिद्धो भवति योगिराट्” - ऐसा साधक “सिद्ध” हो जाता है अर्थात् वह पूर्णता को प्राप्त कर लेता है। यहाँ “योगिराट्” शब्द विशेष महत्त्वपूर्ण है, जो योगियों में श्रेष्ठ, आत्मनिष्ठ, पूर्णतया जागृत पुरुष है। यह सिद्धि कोई अलौकिक चमत्कार या योगसिद्धि नहीं, बल्कि आत्मस्वरूप में अचल प्रतिष्ठा है। य�� वही अवस्था है, जहाँ साधक जान लेता है - “नाहं कर्ता, न भोक्ता, केवलं साक्षी चैतन्यरूपः ब्रह्मास्मि।” इस बोध के साथ वह समस्त बन्धनों से मुक्त हो जाता है।
“तत्स्वरूपं” - अब भगवद्पादाचार्य उस आत्मस्वरूप की ओर संकेत करते हैं, जो इस सिद्धावस्था में प्रत्यक्ष होता है। यह स्वरूप नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, स्वप्रकाश चैतन्य है, जो न जन्म लेता है, न नष्ट होता है, न परिवर्तित होता है। यह न तो विषय है, न वस्तु; यह सबका अधिष्ठान, सबका प्रकाशक है।
“न कैकस्य विषयः मनसो गिराम्” - यहाँ भगवत्पाद एक अत्यन्त सूक्ष्म सत्य का उद्घाटन करते हैं। यह आत्मस्वरूप न तो मन का विषय है, न वाणी का। मन, जो संकल्प-विकल्पात्मक है, केवल सीमित वस्तुओं को ही ग्रहण कर सकता है; ��ाणी भी केवल नाम-रूपों का ही वर्णन कर सकती है। किन्तु आत्मा अनन्त, निराकार और अव्यवहित है। अतः वह न मन द्वारा कल्पित हो सकता है, न वाणी द्वारा व्यक्त।
यह वही तत्त्व है, जिसे उपनिषद् कहते हैं - “यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह” जहाँ वाणी और मन दोनों ही पहुँच नहीं पाते। इसका अर्थ यह नहीं कि आत्मा अज्ञेय है; अपितु यह कि वह विषय रूप से ज्ञेय नहीं है। वह स्वयं ज्ञानस्वरूप है जिसके प्रकाश में मन ���र वाणी कार्य करते हैं। अतः उसे जानना वस्तुतः “स्वयं होना” है, न कि किसी अन्य वस्तु की भाँति उसे जानना।
दार्शनिक दृष्टि से यह अद्वैत का परम निष्कर्ष है। जहाँ द्वैत है, वहाँ विषय-ज्ञान सम्भव है - ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का त्रिपुटी-भेद रहता है। किन्तु जहाँ अद्वैत है, वहाँ यह त्रिपुटी लीन हो जाती है। आत्मा न ज्ञाता है, न ज्ञेय; वह स्वयं ज्ञानस्वरूप है अखण्ड, निरवच्छिन्न चैतन्य।
इस अवस्था में साधक न तो किसी साधन का आश्रय लेता है, न किसी अनुभव का आग्रह करता है। वह न कुछ प्राप्त करना चाहता है, न कुछ त्यागना; वह पूर्णतः तृप्त, पूर्णतः मुक्त और पूर्णतः शान्त होता है। यही “जीवनमुक्ति” की ��वस्था है जहाँ जीवन्मुक्त पुरुष संसार में रहते हुए भी उससे असंग रहता है, जैसे कमलपत्र जल में रहकर भी जल से अछूता रहता है।
अतः, भगवत्पाद आदि शंकराचार्य इस श्लोक में यह प्रतिपादित करते हैं कि साधना का परम फल है - साधनातीत स्थिति, जहाँ साधक स्वयं ब्रह्मस्वरूप में प्रतिष्ठित होकर, मन और वाणी की सीमाओं से परे उस अनिर्वचनीय सत्य का अनुभव करता है। यही अद्वैत वेदान्त की चरम सिद्धि है - जहाँ न कुछ कहना शेष रहता है, न कुछ जानना; केवल होना शुद्ध, स्वप्रकाश, अनन्त ब्रह्मस्वरूप होना।
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द्रष्टृ-दर्शन-दृश्यानां विरामो यत्र वा भवेत्।
दृष्टिस्तत्रैव कर्तव्या न नासाग्रावलोकिनी।।११७।।
("अपरोक्षानुभूति")
भगवद्पादाचार्य भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्यकृत अपरोक्षानुभूति का यह अत्यन्त गूढ़ श्लोक अद्वैत वेदान्त की साधना का भीतरी रहस्य उद्घाटित करता है। यहाँ आचार्य साधक को बाह्य दृष्टि-संयम से उठाकर उस परम चैतन्य की ओर ले जाते हैं, जहाँ द्रष्टा, दर्शन और दृश्य यह त्रिपुटी ही विराम को प्राप्त हो जाती है। यही वह आध्यात्मिक बिन्दु है, जहाँ ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का व्यवहारात्मक भेद लीन होकर केवल अखण्ड आत्मस्वरूप शेष रह जाता है। आचार्य का स्पष्ट निर्देश है कि दृष्टि वहीं स्थिर करनी चाहिए; केवल नासिका के अग्रभाग को देखने में नहीं।
अद्वैत वेदान्त में समस्त अनुभव-व्यवहार त्रिपुटी पर आधारित है - एक देखने वाला, एक देखने की क्रिया और एक देखा जाने वाला विषय। यही त्रिविध विभाग संसार-अनुभव का आधार है। जब तक यह भेदबुद्धि विद्यमान है, तब तक द्वैत का क्षेत्र बना रहता है। जीव स्वयं को द्रष्टा मानता है, जगत् को दृश्य, और मन-बुद्धि की वृत्तियों को दर्शन का माध्यम। किन्तु यह समस्त व्यवस्था अविद्या के अधीन है, क्योंकि परमार्थतः आत्मा न तो किसी दूसरे को देखती है, न उससे भिन्न कोई दृश्य वस्तु है, न देखने की कोई पृथक् क्रिया। वहाँ केवल स्वप्रकाश, निरवच्छिन्न, अखण्ड चैतन्य ही है।
इसी सत्य की ओर संकेत करते हुए आचार्य कहते हैं - “द्रष्टृदर्शनदृश्यानां विरामः”। विराम अर्थात् शान्ति, उपशम, निवृत्ति, लय। जहाँ यह त्रिपुटी शान्त हो जाए, जहाँ देखने वाला देखने की क्रिया से मुक्त हो जाए, जहाँ दृश्य का पृथक् अस्तित्व न रह जाए, जहाँ अनुभव का सारा द्वैत एक अधिष्ठान में विलीन हो जाए वही आत्मतत्त्व है, वही ब्रह्म है, वही साधना का वास्तविक केन्द्र है। यह विराम किसी शून्यता का नाम नहीं, न ही किसी जड़ निष्क्रियता का; यह तो उस पूर्ण चैतन्य की स्थित��� है, जिसमें विभाजन का मिथ्यात्व प्रकट हो जाता है।
शंकरभाष्य की शैली में कहें तो द्रष्टा-दर्शन-दृश्य की यह त्रिपुटी अध्यासजन्य है। जैसे रज्जु पर सर्प का अध्यास होने से भय, दूरी, देखने वाला और देखा जाने वाला सर्प - इन सबका व्यवहार प्रारम्भ हो जाता है, वैसे ही ब्रह्म पर जगत् का अध्यास होने से ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेय का यह सारा व्यापार खड़ा हो जाता है। किन्तु जब यथार्थज्ञान उदित होता है, तब सर्प नहीं ��हता केवल रज्जु रह जाती है। उसी प्रकार ब्रह्मज्ञान में त्रिपुटी का व्यवहार निवृत्त हो जाता है और केवल स्वप्रकाश आत्मा शेष रहती है। अतः दृष्टि उसी पर स्थापित होनी चाहिए जहाँ भेद का यह सारा व्यापार शान्त हो जाए।
यहाँ “दृष्टि” का अर्थ पुनः बाह्य नेत्र-चेष्टा नहीं है। यह अ��्तःकरण की तत्त्वनिष्ठा है, चित्त की आत्माभिमुखता है, साक्षीस्वरूप में प्रतिष्ठा है। आचार्य कह रहे हैं कि दृष्टि उस चैतन्य में स्थिर करो जहाँ देखने वाला भी लय को प्राप्त हो, देखे जाने का विषय भी, और देखने की प्रक्रिया भी। अर्थात् चित्त को ऐसी आत्मनिष्ठा में प्रतिष्ठित करो जहाँ सब भेद उपशम को प्राप्त हों। यही निदिध्यासन की परिपक्व अवस्था है; यही अद्वैत की अनुभूति का द्वार है।
इस श्लोक में प���नः नासाग्रावलोकन का उल्लेख अत्यन्त सार्थक है। अनेक योगमार्गों में नासाग्रदृष्टि चित्त-एकाग्रता के लिए उपयोगी मानी गई है; परन्तु आचार्य यह स्पष्ट करते हैं कि वह साधना का परम लक्ष्य नहीं है। नासिका के अग्रभाग को देखना केवल दृष्टि को एक स्थान पर रोकना है; परन्तु आत्मदृष्टि वह है जो समस्त त्रिपुटी का अतिक्रमण कर दे। बाह्य दृष्टि का स्थिरीकरण प्रारम्भिक सहायक हो सकता है, परन्तु यदि उससे आगे ���ित्त आत्मतत्त्व में लीन न हो, तो वह साधना के शिखर तक नहीं पहुँचाती। इसलिए भगवद्पाद का आग्रह है दृष्टि उस पर रखो जहाँ द्रष्टा, दर्शन और दृश्य सबका विराम हो।
इसका गम्भीर आध्यात्मिक आशय यह है कि मुक्ति बाह्य अनुशासन की पूर्णता से नहीं, वरन् भेदबुद्धि की निवृत्ति से होती है। जब तक “मैं देख रहा हूँ” और “यह देखा जा रहा है” ऐसी वृत्ति बनी हुई है, तब तक सूक्ष्म अहंता शेष है। पर जब यह भी लीन हो जाता है, तब आत्मा स्वयं में स्वयं का प्रकाश बनकर स्थित होती है। वहाँ कोई दूसरा नहीं, कोई माध्यम नहीं, कोई क्रिया नहीं केवल सत्ता, केवल चैतन्य, केवल आनन्द। यही "अपरोक्षानुभूति" है।
वस्तुतः इस श्लोक में ध्यान की पराकाष्ठा का निरूपण है। सामान्य ध्यान में विषय रहता है, ध्यानकर्ता रहता है, ध्यान की प्रक्रिया रहती है। परन्तु परब्रह्मनिष्ठा में यह सब विलीन हो जाता है। वहाँ ध्यान भी ध्यान नहीं रहता; केवल सहज आत्मस्वरूप की स्थिति रह जाती है। यही कारण है कि वेदान्त में ज्ञान की परिपक्वता को अखण्डाकार-वृत्ति कहा गया है !
सनातन धर्म संस्कृति में सभी पर्व केवल लोकाचार नहीं, अपितु ब्रह्मविद्या की प्राप्ति में सहायक और आत्म जागरण की तत्परता की प्रेरणा हैं। होलिका दहन का यह पावन अवसर, भगवद्पादाचार्य भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य की अद्वैत-दृष्टि से देखा जाए तो केवल अधर्म पर धर्म की विजय ही नहीं अपितु अविद्या-जन्य अध्यास के दहन और आत्मस्वरूप के प्रकाश का प्रतीक है।
पुराणोक्त कथा में हिरण्यकशिपु अहंकार और देहाभिमान का प्रतीक है, होलिका अविद्या की दाहिका शक्ति का और भक्त प्रह्लाद शुद्ध आत्मनिष्ठा का। अद्वैत वेदान्त के अनुसार संसार के समस्त बन्धन “अध्यास” हैं ।
“स्मृतिरूपः परत्र पूर्वदृष्टावभासः” यह देह, मन, अहंकार आदि का आत्मा पर आरोप ही बन्धन है।
होलिका दहन का अग्निकुण्ड हमें स्मरण कराता है कि यह देहाभिमान, कर्तृत्व-भोक्तृत्व की भावना, ‘अहं मम’ का आग्रह ये सब अविद्या की होलिका हैं। जब तक यह अध्यास विद्यमान है, तब तक हिरण्यकशिपु रूपी अहंकार जीव पर शासन करता है।
भगवद्गीता में भगवान् कहते हैं कि
“ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते”ज्ञानरूपी अग्नि समस्त कर्म-बंधन को भस्म कर देती है। अतः होलिका दहन की लौ बाह्य अग्नि मात्र नहीं, वरन् ज्ञानाग्नि का प्रतीक है। यह अग्नि प्रह्लाद की भाँति आत्मनिष्ठ को नहीं जलाती क्योंकि आत्मा नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्त है- “नैनं दहति पावकः”।
अद्वैत वेदान्त का मर्म है - “ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः।”
जब जीव अपने को देह नहीं, अपितु साक्षी चैतन्य जान लेता है, तब होलिका की ज्वाला में उसका अहंकार ही दग्ध होता है, आत्मा नहीं।
होलिका दहन का शास्त्र���य संदेश यह है कि हम अपने अंतःकरण में स्थित काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य को ज्ञान की ज्वाला में समर्पित करें। उपनिषद् उद्घोष करती है ; “तमसो मा ज्योतिर्गमय” अज्ञानरूपी अन्धकार से ज्ञानरूपी प्रकाश की ओर ले चल।जब अंतःकरण शुद्ध होता है तब समाज में भी समरसता और सद्भाव का प्रकाश फैलता है। अद्वैत का तत्त्व ही सार्वभौमिक प्रेम का आधार है; क्योंकि जहाँ भेद नहीं, वहाँ द्वेष नहीं। जहाँ आत्मैक्�� का अनुभव है, वहाँ करुणा, मैत्री और सहयोग स्वाभाविक हैं।
अतः इस पावन अवसर पर हमारा संकल्प केवल सामाजिक सद्भाव का ही न होकर ब्रह्मविद्या की ओर उन्मुख होने का भी होना चाहिए। हम अपने अंतस् के अध्यास, अहंकार और अविद्या को ज्ञानाग्नि में अर्पित करें । आत्मस्वरूप की ज्योति को प्रज्वलित करें और परम् कल्याणकारी अद्वैत-दृष्टि से समरस आत्म-वैभव संपन्न समाज के निर्माण में योगदान दें।
परमेश्वर से प्रार्थना है कि यह पावन अग्नि हमारे अंतस् में समाहित अज्ञान-अविद्या जन्य विकारों को भस्म कर आत्मप्र��ाश का अनुभव कराए। होलिका दहन का यह उत्सव हमें स्मरण कराए कि सत्य, ज्ञान और ब्रह्मतत्त्व ही शाश्वत हैं शेष सब अध्यासरूप है। आप सभी को ज्ञान, शान्ति और आत्मप्रकाश से परिपूर्ण होलिका दहन की हार्दिक मंगलकामनाएँ।
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गायन्ति देवाः किल गीतकानि, धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे ।
स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते, भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात् ।।
जयतु जयतु भारत-जननी त्रिभुवन-वन्द्या, तपोभूमि-धन्या; ऋषियों की प्रज्ञा, वेदों की वाणी और गंगा-यमुना-सरस्वती की निर्मल धारा से अनुप्राणित वह पुण्य-भूमि, जिसके कण-कण में साधना का स्वेद, सेवा का संस्कार और सत्य का तेज विद्यमान है। भारतवर्ष केवल भू-भाग ही नहीं; यह आत्म-चेतना के परमोत्सव की देवधरा है, जहाँ धर्म का धवल प्रकाश और लोकमंगल का शाश्वत संकल्प है; यह मात्र भूभाग ही नहीं स्वयं भगवद्-भार्या है, जहाँ मनुष्य देह की सीमाओं से ऊपर उठकर आत्मा की अनन्तता का साक्षात्कार कराता है।
हे भारत माता ! तेरी वक्षस्थल पर हिमालय की अडिगता है - जो हमें धैर्य, संकल्प और साधना सिखाती ह��। तेरी नसों में नदियों का करुण प्रवाह है, जो हमें जीवनद��यिनी समता और अनुग्रह का पाठ पढ़ाता है। तेरी आँखों में अमृत-स्नेह है, जो हर प्राणी में “स्व” को देखने की दृष्टि देता है और तेरे हृदय में अद्वैत का दिव्य सन्देश, जो कहता है कि “भेदों के पार भी एकता है; नाम-रूप की विविधताओं में भी एक ही चैतन्य का आलोक स्पंदित है।” यहाँ भारत की स्तुति केवल भावुकता नहीं, यह तत्त्व-विचार है; क्योंकि “भारत-भाव” यदि किसी रूप में पूर्ण है, तो वह एकात्म-दृष्टि में पूर्ण है, जहाँ अपना-पराया, ऊँच-नीच, जाति-भाषा-प्रान्त की सीमाएँ, आत्मज्ञान की अग्नि में शिथिल हो जाती हैं।
भगवत्पाद आदि शंकराचार्य के अनुसार मनुष्य का दुःख अज्ञान से जन्मता है; अर्थात् आत्मा की अनन्तता को विस्मृत कर देह-बुद्धि में बँध जाना। उनके तत्त्व-विचार का केन्द्र है-अध्यास : “मैं देह हूँ” और “यह मेरा है” इस मिथ्या अध्यारोपण से संसार का बन्धन बनता है। जब यह अध्यास निवृत्त होता है, तब आत्मा अपने स्वरूप में प्रकाशित होती है-शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, साक्षी-चैतन्य। अद्वैत कहता है कि सत्य एक है-वह ब्रह्म अर्थात् आत्मा है। जगत् नाम-रूप की विविध छवियाँ हैं; व्यवहार में सत्य पर परमार्थ में अधिष्ठान-आत्मा पर ही स्थित हैं। समस्त प्राणी उसी एक चैतन्य की अभिव्यक्तियाँ हैं, इसलिए करुणा, न्याय, सद्भाव और शान्ति अद्वैत का नैतिक निष्कर्ष हैं, केवल सामाजिक नारा नहीं। यही कारण है कि भारतवर्ष का “आलोक” केवल बाह्य विकास का प्रकाश नहीं, बल्कि अन्तःकरण की जागृति है, वह जागृति जो मनुष्य को विभाजन स��� समन्वय की ओर, उपभोग से साधना की ओर, और अहंकार से अहं-निवृत्ति की ओर ले जाती है।
भारतीय गणतंत्र का आदर्श - समानता, न्याय, सद्भाव और शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व है। अद्वैत-दृष्टि केवल विचारधारा नहीं, बल्कि जीवन का स्वाभाविक अनुशासन है। जब हम “एकात्म” को समझते हैं, तब समानता आत्मा की स्वीकृति बनती है; न्याय केवल व्यवस्था नहीं, धर्म बनता है; सद्भाव केवल शिष्टाचार नहीं, स्वभाव बनता है; और शान्ति केवल प���िस्थिति नहीं, स्थिति बन जाती है। यहाँ संविधान का सम्मान एक आध्यात्मिक अर्थ भी ग्रहण कर लेता है, क्योंकि वह हमें याद दिलाता है कि विविधताओं के बीच एकता ही भारत की प्राण-धारा है।
आइये ! हम सब राष्ट���र को समन्वित, एकीकृत, सर्वसम्पन्न और अक्षुण्ण बनाए रखने के दिव्य संकल्प के साथ राष्ट्र-आराधना करें ! कर्तव्य को अपना व्रत बनाएँ, अनुशासन को अपना आभूषण, सत्य को अपना साहस, करुणा को अपना संस्कार और सेवा को अपनी साधना; क्योंकि अद्वैत का उन्नत भाव यही है कि “मैं अकेला नहीं-समष्टि में ही मेरा विस्तार है; “मैं पृथक नहीं-एक ही चैतन्य का अंश नहीं, अपितु उसका ही स्वरूप हूँ।”
हे भारत माता ! तेरे चरणों मे�� प्रणाम। तेरे आलोक से विश्व आलोकित हो; तेरे ज्ञान से मानवता का हृदय जागे और तेरे अद्वैत-दर्शन से समस्त पृथ्वी पर एकता, न्याय और करुणा का उदय हो।
"गणतंत्र दिवस" की हार्दिक शुभकामनाएँ।
भारत माता की जय। जय हिन्द। 🇮🇳
@rashtrapatibhvn
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रथस्यैकं चक्रं भुजगयमिता: सप्त तुरगा
निरालम्बो मार्गश्चरणविकल: सारथिरपि ।
रविर्यात्येवान्तं प्रतिदिनमपारस्य नभस:
क्रियास��द्धि: सत्त्वे भवति महतां नोपकरणे ॥
“सविता सर्वस्य प्रसविता” ऋग्वेद का यह मंत्र स्मरण कराता है कि आदित्य-मण्डल में विराजमान भगवान भुवन-भास्कर सूर्यनारायण समस्त जगत् के प्रेरक, अंतर्यामी तथा परमात्मस्वरूप हैं। उदयकालीन सूर्य को नमस्कार करने वाला साधक पाप-राशि से विमुक्त होकर आरोग्य, तेज, बल और आयुष्य की प्राप्ति करता है। धरा के प्रत्यक्ष देवता भगवान सूर्य की उपासना, अर्घ्य-दान और पूजन सर्वथा श्रेयस्कर है।
मकर संक्रांति से प्रकाशमान का वर्धन होता है और इसके साथ दैवी सत्ता तथा सद्-प्रवृत्तियाँ अधिक सक्रिय होने लगती हैं। यह काल मानवीय चेतना को जाग्रत करता है, संकल्प को दृढ़ करता है और कर्म-शक्ति में नई गति भर देता है।
उत्तरायण का सूर्य आपके जीवन में शुभता, श्रेष्ठता और सत्प्रेरणा का उदय करे; आप में अंतर्निहित अनन्त शक्तियाँ नव-ऊर्जा, नव-उल्लास बनकर प्रकट हों और सूर्य की शुभ्र रश्मियाँ आपके पथ को निरन्तर आलोकित करती रहें। मकर संक्रांति “उत्तरायण” की हार्दिक शुभकामनाएँ
May the Sun of Uttarayan usher auspiciousness, excellence, and noble inspiration into your life. May the infinite powers within you awaken as new energy and fresh joy, and may the Sun’s pure rays ever illuminate your path.
Heartfelt wishes for Makar Sankranti “Uttarayan.”
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