राहुल गांधी ने आज जरूरी संवाद किया। जरूरी पहल की।जरूरी मुद्दा उठाया।
एजुकेशन सिस्टम पर बात की।यह पहल इसीलिए अच्छी है कि इससे राजनीतिक डिस्कोर्स बदलेगा। उनकी बात को सपोर्ट कीजिए।खारिज कीजिए, इस मुद्दे पर बात कीजिए।
और बड़ी बात की यह संवाद उनसे किया जो इसके स्टेकहोल्डर हैं
भारत की शिक्षा व्यवस्था आज सिर्फ़ एक वसूली तंत्र बन गई है।
ज़रा सोचिए - देशभर के परिवार जितना पैसा सिर्फ़ NEET की तैयारी पर ख़र्च करते हैं, वो भारत सरकार के पूरे शिक्षा बजट के बराबर है।
आज कोटा से, और देश के हर कोने से, लाखों युवा एक सुर में कह रहे हैं - इस व्यवस्था ने हमारे साथ अन्याय किया है।
हर युवा अलग है, पर सबकी कहानी एक - या तो सपने देखने नहीं दिए गए, या देखे हुए सपने तोड़ दिए गए।
‘छात्रों की गूंज’ सिर्फ़ अभियान नहीं - एक क्रांति है। हमें एक ऐसी व्यवस्था बनानी है जो आपको बड़े सपने देखने का हक़ दे और आपकी ज़िंदगी गिरवी रखे बिना, उन्हें पूरा करने में आपका साथ दे।
#ChhatronKiGoonj
मुझे नहीं लगता कि अपने इतिहास में कभी इज़रायल और अमरीका की इतनी बड़ी हार हुई है। इसके पहले शायद उसे कभी मुआवज़ा नहीं देना पड़ा है।
वह स्ट्रेट और हॉर्मुज खुलवाने को ट्रम्प अपनी उपलब्धि बता रहा है जो खुली थी।
ईरान दुनिया के सामने एक महाशक्ति के रूप में आया है। व्यापार में छूट और फ्रोजेन एसेट रिलीज उसकी आर्थिक ताक़त को भी कई गुना बढ़ायेंगे।
जब हम शुरू में यह कह रहे थे कि जंग में ईरान भारी पड़ेगा तो केवल भक्त ही नहीं, कई कथित लिबरल भी मज़ाक़ उड़ा रहे थे। इतिहास और अंतराष्ट्रीय राजनीति की समझ न हो तो अमरीकी-यूरोपी मीडिया के असर में बह जाना स्वाभाविक था।
फ़िलहाल डील को खतरा सिर्फ़ इज़रायल से है जो लेबनान से अपनी फ़ौजें वापस बुलाने को तैयार नहीं लग रहा।
पाकिस्तान अपनी पैदाइश के बाद पहली बार इस स्तर की डिप्लोमेसी का हिस्सा बनकर पीसमेकर के रूप में सामने आया है, भारत पहली बार ऐसे किसी संकट में चल रही डिप्लोमेसी से इस क़दर बाहर रहा है।
प्रधानमंत्री युद्ध शुरू होने से पहले इजरायल की संसद में समर्थन कर आए थे। अब यह कैसी डिप्लोमेसी थी, यह आप तय कीजिए।
हम #America को खरी-खरी क्यों नही सुना पाएंगे?
कौन सा झूठ बोला था बेशर्म और बेहूदे Marco Rubio ने?
चीन जाने के लिए क्यों बदली गई Rubio के नाम की 'spelling'?
#China में ट्रम्प और #Rubio की आवाज़ क्यों नहीं निकली? अमेरिका ने चीन से क्यों नहीं कहा हमारे मंत्री पर लगे sanction हटाओ?
क्या मजबूरी है कि हम अमेरिका के सामने अपना मुंह खोल नहीं पाते?
हमारे नाविकों की हत्या में किन अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन हुआ?
हम छाती ठोंक कर अमेरिका से सवाल क्यों नहीं पूछते?
सरकार मारे गए नाविकों के परिवारों से संवेदना क्यों नहीं जताती? सरकार अपनों से क्यों बात नहीं करती?
👉🏾 इस शो में मेरी बात पूरी नहीं होती तो कहाँ होगी? जो संदीप ने कहा उसको ज़रूर करें, क्या है वो बात? 😊
आपकी राय
#DibangOfficial
"भगवान ही जांच करेंगे"🙂
जब भगवान के सामने चोरी हो रही थी तो वो क्या कर रहे थे?
उन्हें दिखा नहीं या वो अति उदार थे।
महंत कमल नयन दास की बात सुनकर रवीन्द्र नाथ टैगोर की कहानी "घोटक" (घोड़ा) याद आ गई जिसमें इंसान ईश्वर को मूर्ख बनाता है। यह छोटी से कहानी गूगल करने पर मिल जायेगी। असल में ईश्वर के नाम पर बांटने और मूर्खता का ही कारोबार नहीं चल रहा बल्कि इंसान ईश्वर को भी मूर्ख बनाने की क्षमता भी रखता है।
कोई जांच नहीं होगी। किसी नये मंदिर के नाम पर आपको फिर बेवकूफ बनाया जायेगा।
नेहरु का रिकॉर्ड साल , महीने और दिन गिनकर नहीं तोड़ा जा सकता. नेहरु ने अपने कालखंड में जो किया और देश को जो दिया , उससे इन 12 सालों की तुलना ही नहीं की जा सकती . समाज में नफ़रत और ज़हर का घोल नेहरु ने नहीं घोला था . नेहरु ने बड़े -बड़े संस्थान तब बनाए थे , जब देश गुलामी से आज़ाद हुआ था . हज़ार तरह की चुनौतियां थी. आर्थिक तौर भारत बहुत कमज़ोर था. अंग्रेज गरीबी और तंगी हमारे हिस्से में छोड़ गए थे . वैश्विक पटल भी भारत एक आज़ाद मुल्क के तौर पर अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रहा था . तब भी नेहरु ने ऐसे राष्ट्र की कल्पना को साकार करने की कोशिश की थी , जिसमें भाईचारा हो , मोहब्बत हो .धर्म आधारित राजनीति न हो , सांप्रदायिकता न हो .
नेहरु ने तरक्की की ऐसी बुनियाद रखी थी , जिसमें नफ़रत और साम्प्रदायिकता की कोई जगह नहीं थी . और आज ?
मीडिया को गुलाम बनाकर अपनी चाटुकारिता करवा लेने से कोई नेहरु नहीं बन सकता .
एक नामांकन रद्द हुआ, मीनाक्षी नटराजन का राजनीतिक पुनर्जन्म हो गया
राजनीति का अपना विचित्र रसायनशास्त्र होता है। कभी कोई नेता वर्षों तक संगठन के अंधेरे गलियारों में काम करता रहता है, सभाओं में बोलता है, चुनाव लड़ता है, हारता है, प्रभारी बनता है और फिर भी देश उसे ठीक से नहीं पहचानता। और कभी एक अधिकारी की कलम, एक विवादास्पद आपत्ति और एक संदिग्ध-सी न्यायिक व्याख्या उसे रातोरात राष्ट्रीय राजनीति के प्रकाश-वृत्त में खड़ा कर देती है।
मीनाक्षी नटराजन के साथ यही हुआ है।
उनका नामांकन कांग्रेस ने ग़लत ढंग से भरा हो, भाजपा ने असाधारण तत्परता से कानूनी छिद्र खोजा हो अथवा चुनाव-तंत्र के किसी दबे, डरे या अत्यधिक आज्ञाकारी अधिकारी ने अपनी शक्ति का ज़रूरत से अधिक इस्तेमाल किया हो; राजनीतिक परिणाम बिल्कुल साफ़ है: राज्यसभा का एक नामांकन रद्द हुआ है, लेकिन मीनाक्षी नटराजन की राजनीतिक शख्सियत पुनर्जीवित हो गई है।
आज वे मध्य प्रदेश में दृश्यता के स्तर पर दिग्विजय सिंह और कमलनाथ से भी अधिक चर्चा में हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि उनका राजनीतिक कद, जनाधार या अनुभव अचानक उन दोनों से बड़ा हो गया है। अर्थ यह है कि इस क्षण की पूरी राजनीतिक कथा उन्हीं के इर्द-गिर्द घूम रही है। दिग्विजय सिंह और कमलनाथ अब स्वयं कहानी के केंद्रीय पात्र नहीं, मीनाक्षी के समर्थन में खड़े वरिष्ठ नेता दिखाई दे रहे हैं। राजनीति में कई बार यही दृश्यात्मक परिवर्तन नेतृत्व की नई पदानुक्रम-रेखा खींच देता है।
कल तक मीनाक्षी एक पूर्व सांसद, संगठन की जिम्मेदार पदाधिकारी और राहुल गांधी की पुरानी राजनीतिक सहयोगी थीं। आज वे उस महिला का चेहरा बन गई हैं जिसे संसद पहुंचने से पहले ही रोक दिया गया। राजनीति में पराजित उम्मीदवार को सहानुभूति मिलती है, लेकिन कथित अन्याय का शिकार बनाए गए उम्मीदवार को नैतिक पूंजी मिलती है। यह पूंजी वोटों, पदों और संसदीय सदस्यता से भी अधिक टिकाऊ हो सकती है; बशर्ते नेता उसे संभाल सके।
मीनाक्षी की अपनी सीमाएं हैं। वे अक्खड़ कही जाती हैं, संवाद में सहज नहीं मानी जातीं और संगठन में उनके काम करने के तौर-तरीकों को लेकर असंतोष भी रहा है। लेकिन इस विवाद ने उन्हीं कमजोरियों को एक अलग राजनीतिक अर्थ दे दिया है। जो कल तक अक्खड़पन था, वह अब सत्ता के सामने न झुकने वाली दृढ़ता बताया जाएगा। जो दूरी थी, वह सादगी और आत्मसम्मान बनेगी। जो संगठनात्मक कठोरता थी, वह सिद्धांतनिष्ठा कहलाएगी।
अब असली परीक्षा कांग्रेस की है। वह मीनाक्षी को केवल कुछ प्रेस कॉन्फ्रेंसों, धरनों और “लोकतंत्र की हत्या” जैसे परिचित वाक्यों तक सीमित रखती है या उन्हें मध्य प्रदेश में एक व्यापक राजनीतिक अभियान का चेहरा बनाती है। उन्हें गांव-गांव ले जाया जा सकता है; महिलाओं, युवाओं और कार्यकर्ताओं के बीच इस सवाल के साथ प्रस्तुत किया जा सकता है कि क्या एक अस्पष्ट निजी शिकायत किसी महिला की संसदीय राह रोक सकती है?
भाजपा ने यदि रणनीति के तहत उनका नामांकन रुकवाया है तो संभव है उसने कांग्रेस का एक सांसद रोक लिया हो; लेकिन अनजाने में एक राष्ट्रीय नेता गढ़ दिया हो। और कांग्रेस ने यदि अपनी लापरवाही से यह परिस्थिति पैदा की है तो इतिहास ने उसकी ग़लती में भी एक अवसर छिपा दिया है। राजनीति में कभी-कभी संसद की बंद होती हुई एक खिड़की, जननेता बनने का पूरा दरवाजा खोल देती है। मीनाक्षी नटराजन इस समय ठीक उसी दरवाजे पर खड़ी हैं।
@MNatarajanINC #MinakshiNatrajan
सुबह सुबह ये बात मैं बहुत भारी मन से लिख रहा हूं। पिछले कुछ महीनों के फील्ड वर्क, रिसर्च, अध्ययन और विशेषज्ञों से बात के बाद मेरा यह विश्वास और दृढ़ हुआ है कि हम आधुनिकता और संपत्ति के डेरे, जो हमारे शहर बना रहे हैं वो हमारी नेचुरल वेल्थ और संसाधनों को पूरी तरह नष्ट कर रहे हैं।
जो झीलें, तालाब और जलधारायें हमारे पास हुआ करती थीं उनका जलागम नष्ट करके पिछले कुछ दशकों में ये शहरी बसावटें खड़ी की गईं हैं और इस कारण पैदा हुआ ख़तरा हम नहीं देख पा रहे।
सच ये है कि शहरों ने न केवल आसपास की वॉटर बॉडीज़ को प्रदूषित और नष्ट कर दिया है वह दूर दराज़ के गांवों और कस्बों का पानी खींचकर अपनी जल संकट की भरपाई कर रहे हैं।
बढ़ते हीटआईलैंड प्रभाव के पीछे एक कारण यह भी है। हमारे शहरों में ग्राउंड वॉटर की समस्या का बढ़ना इसका एक और संकेतक है। मैंने कार्बनकॉपी पॉडकास्ट के लिए इस बारे में दो विशेषज्ञों आईआईटी दिल्ली के डॉ अजय माथुर और संरक्षण जीवविज्ञानी और रीवाइ्ल्डर विजय धस्माना और पर्यावरण कार्यकर्ता भवरीन कंधारी से बात की है। पूरी बातचीत का लिंक कमेंट सेक्शन में है। अगर संभव हो तो देखें .. हो सकता है बहुत रुचिकर नहीं लगे लेकिन आपको जानकारी ज़रूर मिलेगी।
राहुल गांधी की आलोचना करना फैशन बन गया है. @ashutosh83B का @Ram_Guha को जवाब. इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने लिखा है कि मोदी का मुक़ाबला करने के लिए राहुल के पास अनुशासन, गंभीरता और अनुभव नहीं है.
“एक राजा था। उसके चाटुकारों ने उसको कह दिया था कि वह महान है। एक दिन किसी ने उसको आईना दिखा दिया। इसके बाद राजा ने ऐलान कर दिया, “जो आईना दिखाए वह दुश्मन है। जो सवाल पूछे है वो ग़द्दार है।
ऐसा ही एक राजा हमारे देश में भी है”
किस्तों में महंगाई
घरेलू LPG सिलेंडर ₹29 महंगा हुआ है. ईरान युद्ध के बाद से सिलेंडर की क़ीमत करीब ₹90 बढ़ चुकी है. मार्च में क़ीमत ₹60 बढ़ी थी. इसके बावजूद पेट्रोलियम कंपनियों को हर सिलेंडर पर ₹600 से ज़्यादा घाटा हो रहा है.
भारत अपनी ज़रूरतों का आधा से ज़्यादा LPG विदेश से मँगवाता है. ईरान युद्ध के कारण Strait of Hormuz बंद है . भारत की 90% LPG इसी रास्ते से आती थी. पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतें भी इसी कारण बढ़ी हैं. जब तक यह रास्ता नहीं खुलेगा तब तक महंगाई से राहत मुश्किल है.
काले पानी की स्मृति से निकोबार के नीले पानी तक
मैं कोई राहुल गांधी का प्रशंसक नहीं हूँ। किसी भी नेता का नहीं हूँ। लेकिन वे कोई ऐसा काम करें, जो बहुत अलग तरह का हो तो उसकी प्रशंसा करना एक नागरिक के तौर पर मेरा फ़र्ज़ है। राहुल गांधी अभी निकोबार द्वीप समूह में गए हुए हैं ओर वे बहुत सारी बातें वहाँ की बता रहे हैं। आप लोगों को भी वहाँ ज़रूर जाना चाहिए।
अंडमान भी जाइए; लेकिन केवल समुद्र के किनारे तस्वीरें खिंचवाने या पर्यटन की औपचारिकता पूरी करने के लिए नहीं। वहाँ की हवा में उस आज़ादी की यातना अब भी घुली हुई है, जिसे मुख्यभूमि पर बैठे हम लोग अक्सर भाषणों की सुविधाजनक पंक्ति बना देते हैं।
अंडमान वह भूगोल है, जहाँ 1857 के बाद से सैकड़ों विद्रोहियों, क्रांतिकारियों और राजनीतिक बंदियों को निर्वासित किया गया। सेल्युलर जेल की दीवारों पर दर्ज़ नाम बताते हैं कि भारत की स्वतंत्रता केवल दिल्ली, मुंबई और कोलकाता की सभाओं में नहीं लड़ी गई; वह समुद्र से कटे उन अँधेरे कमरों में भी लड़ी गई, जहाँ आदमी की आवाज़ को दूसरे आदमी तक पहुँचने से रोकने के लिए अलग-अलग कोठरियाँ बनाई गई थीं। वहाँ इतिहास को नारे की तरह नहीं, थोड़ी विनम्रता के साथ पढ़ना चाहिए।
और फिर अंडमान से आगे निकोबार जाइए। ग्रेट निकोबार के समुद्र में डुबकी लगाइए। वहाँ पानी के भीतर उतरकर समझ में आता है कि प्रकृति कोई सरकारी फ़ाइल नहीं, जिसमें एक जंगल काटकर दूसरे प्रदेश में पौधारोपण का हिसाब बराबर कर दिया जाए। मूँगे की चट्टानें करोड़ों वर्षों का जीवित स्थापत्य हैं; उन्हें किसी परियोजना की प्रस्तुति में हरे रंग की पट्टी बनाकर वापस नहीं उगाया जा सकता।
प्रकृति-विशेषज्ञ और पक्षी-अध्येता मृदुल वैभव अभी वहाँ महीनों रहकर लौटे हैं और उन्होंने बड़ा गहरा अध्ययन किया है। उन्होंने मुझे बताया कि इन द्वीपों की दुनिया कितनी विरल है। यहाँ निकोबार मेगापोड है, जो अपने अंडे साधारण घोंसले में नहीं, पत्तियों और मिट्टी के विशाल टीले में सेता है। निकोबार ट्री-श्रू, केकड़ा खाने वाला मकाक, डुगोंग, सर्पेंट ईगल, विशाल लेदरबैक समुद्री कछुआ, खारे पानी का मगरमच्छ और ऐसे अनेक पक्षी, जीव तथा वनस्पतियाँ हैं, जो पृथ्वी पर बहुत कम जगह बची हैं। यहाँ शोम्पेन और निकोबारी समुदाय भी हैं, जिनके लिए जंगल ज़मीन का टुकड़ा नहीं, पूरी सभ्यता, स्मृति और जीवन-पद्धति है।
ग्रेट निकोबार में विशाल बंदरगाह, हवाई अड्डा, बिजली संयंत्र और नई टाउनशिप बनाने की योजना है। सरकार इसे सामरिक और आर्थिक आवश्यकता बताती है तथा पर्यावरणीय सुरक्षा का आश्वासन देती है। लेकिन ऐसे आश्वासनों की परीक्षा विज्ञापन से नहीं, जंगल, समुद्र और स्थानीय समुदायों के भविष्य से होगी।
राहुल गांधी ने निकोबार जाकर इस संकट की ओर देश का ध्यान खींचा; यह अच्छी बात है। राजनीति को कभी-कभी चुनावी नक़्शे से बाहर निकलकर पृथ्वी का नक़्शा भी देखना चाहिए। समुद्र में उनकी डुबकी का वास्तविक अर्थ तभी होगा, जब उसके बाद संसद में प्रश्न, स्वतंत्र पर्यावरणीय समीक्षा, आदिवासी अधिकारों की रक्षा और परियोजना की पूरी पारदर्शिता की माँग लगातार उठे।
अंडमान हमें बताता है कि स्वतंत्रता की क्या क़ीमत चुकाई गई। निकोबार पूछ रहा है; क्या विकास की क़ीमत हर बार जंगल, समुद्र, आदिवासी और आने वाली पीढ़ियाँ ही चुकाएँगी?
@RahulGandhi@MridulVaibhav1@VinodJakharIN
I visited the southernmost tip of India.
I stood at Indira Point. I walked under trees that have stood for centuries. I dove into coral reefs among the most vibrant on earth.
And I sat with the people who live there. Tribal communities, whose land is being taken away by violating the Forest Rights Act. Settlers, many of them former soldiers, placed on these islands by the Indian government, who aren’t getting fair compensation.
The Modi government and BJP tells you Great Nicobar Project is about defence. It is not.
Expand INS Baaz - we will back the government fully. The Navy has been asking for expansion for five years - it has been ignored.
They tell you it is about a transhipment port. It is not. India is already building one in Kerala, which is on the mainland.
What it actually is: 1.5 crore trees felled. Coral reefs erased from official maps. Soldiers and tribals displaced - so one businessman can build hotels and casinos on India’s most irreplaceable ecological land.
Every young Indian I have spoken to understands this. You know that no amount of profit is worth destroying what can never be recovered.
I stand for ecologically balanced development. These islands can be the most extraordinary sustainable destination the world has ever seen. That is the India worth fighting for.
#GreenOverGreed
#NicobarMatters
#WorldEnvironmentDay
विश्व पर्यावरण दिवस के मौक़े पर राहुल गांधी ने निकोबार पर अपनी डॉक्यूमेंटरी रिलीज़ की। इसमें राहुल गांधी ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि मोदी सरकार के ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट का रक्षा रणनीति से लेना देना नहीं है, लेकिन ये इकोलॉजी को बिगाड़ने वाला ज़रुर है।
कूनो नेशनल पार्क का नाम कौन नहीं जानता।
जी हां। वही कूनो जहां नामीबिया से भारत में पहली बार चीते लाये गये। क्या आप जानते हैं कि विख्यात वन्य जीव विशेषज्ञों ने कूनो को गिर के शेरों का दूसरा घर बनाने के लिए परिश्रम किया और इस बारे में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश भी दिया। लेकिन आज एशियाई शेर केवल गुजरात में सिमटे हैं जो उनकी सेहत के लिए अच्छा नहीं है।
क्यों? क्या है पूरी कहानी?
जानिये इस वीडियो में विशेषज्ञों की जुबानी।
पूरे वीडियो का लिंक कमेंट सेक्शन में है।
गुड न्यूज़ बाजार के लिए बुरी ख़बर बन गई. कल अमेरिका के जॉब मार्केट के आँकड़े आए. पिछले महीने 1.72 लाख नई नौकरियाँ लगीं. अनुमान था कि 85 हज़ार नौकरियाँ लगेगी.अमेरिकी शेयर बाजार खुश होने के बजाय गिर गया. टेक्नोलॉजी शेयरों के एक्सचेंज NASDAQ में तो 4% तक गिरावट आई. बाजार को लग रहा है कि नई नौकरियाँ लगने का मतलब अर्थव्यवस्था मजबूत है. ईरान युद्ध के कारण महंगाई बढ़ रही है. ऐसे में फ़ेडरल रिजर्व ब्याज दरें बढ़ा सकता है. इससे शेयर बाज़ार को नुक़सान होगा. भारतीय बाजार में भी इस ख़बर से बच नहीं पाया. Gift Nifty में करीब 1.51% गिरावट आई. भारतीय बाजार बंद होने के बाद Gift में कारोबार जारी रहता है. पूरा असर सोमवार को ही पता चलेगा.
आपको क्या लगता था की न्यूज़ चैनल सिर्फ विपक्ष और मुस्लमान से ही लड़ेंगे? उन्हें हर बात के लिए जिम्मेदार ठहराएंगे!
अभी क्या लग रहा है की सिर्फ किसान,यूट्यूब टीचर या स्टूडेंट्स को ही खालिस्तानी, दो कौड़ी या पाकिस्तानी कहेंगे?
अगर ऐसा लग रहा है तो आप अभी भी गलत है!
अभी यह समाज के हर वर्ग को इसी तरह "दो कौड़ी" साबित करेंगे जो अपनी आवाज दर्ज कराएगा!
यह शुरुआत है अंत नहीं!
पर्यावरण बचाने के नाम पर हर राज्य का मुख्यमंत्री पेड़ लगाने की घोषणा कर देता है और जंगलों का काटा और बर्बाद किया जाता है।
पेड़ लगाने की घोषणा सैकड़ों या हज़ारों की संख्या में नहीं बल्कि लाखों और करोड़ों की संख्या में होती है। जनता भी खुश और ठेकेदार, नेता और कंपनियां भी। अब राजधानी को ही लीजिये। यहां दिल्ली में थीम पार्क का झुनझुना थमाया जा रहा है। ये पर्यावरण बचाना नहीं बल्कि खुद को धोखा देने जैसा ही है। इस पर मेरी रिपोर्ट पढ़िये। थोड़ी लंबी है और अंग्रेज़ी में है लेकिन सारी जानकारियां और तथ्य (रेफरेंस) के साथ दिये गये हैं।
How structural planning—not theme parks—must solve India’s urban heat crisis https://t.co/xTnKBZQmQu
#India में क्यों न बने ऐसा कानून?
आज, 1 जून 2026 से #Malaysia में लागू होगा एक नया नियम जिसके तहत 16 साल से कम उम्र के बच्चों को Social Media Account बनाने की इजाज़त नहीं होगी. नियम तोड़ने पर कंपनियों पर 25 लाख डॉलर यानी करीब 24 करोड़ रूपए तक का जुर्माना लगेगा.
कई और देशों में भी इसी तरह का कानून है:
#Australia: 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट पर रोक लगानेवाला पहला देश है. ये नियम 2025 से लागू.
#France: 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चे अभिभावकों की इजाज़त से ही सोशल मीडिया इस्तमाल कर पाते हैं. कानून बना.
#Brazil: नाबालिगों के सोशल मीडिया के इस्तमाल के लिए माता-पिता की सहमति ज़रूरी.
क्या है आपकी राय?