प्राचीन काल में वैदिक सनातन धर्म सख्त अनुष्ठानों, बहुत महंगे पशुबलि वाले यज्ञों और कठोर जाति व्यवस्था से भर गया था। आम लोग और व्यापारी इनके बोझ से परेशान रहने लगे थे।
तब शाक्य कुल के राजकुमार सिद्धार्थ गौतम (बुद्ध) ने एक सरल मार्ग दिखाया – चार आर्य सत्य, अष्टांगिक मार्ग, करुणा, अहिंसा और व्यक्तिगत प्रयास से दुखों से मुक्ति। इसमें न महंगे पुजारी चाहिए थे और न जटिल अनुष्ठान और यह र���जा और व्यापारियों को यह बहुत पसंद आया। सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद बौद्ध धर्म अपनाया और स्तूपों तथा मिशनरियों के माध्यम से इसे पूरे भारत और विदेशों तक फैला दिया।
बाद में सनातन धर्म ने मजबूती से पुनरुत्थान किया। गुप्त सम्राटों ने मंदिरों, वैदिक शिक्षा और हिंदू संस्कृति को बढ़ावा दिया। आदि शंकराचार्य ने पूरे भारत में यात्रा की, मठों की स्थापना की और अद्वैत वेदांत दर्शन को मजबूत किया। बाद में बुद्ध को भगवान विष्णु का अवतार मान लिया गया।
दोनों परंपराओं ने एक-दूसरे को प्रभावित किया और भारत के समृद्ध इतिहास को आकार दिया। यह एक महान सबक है – अच्छी चीजें समय के साथ खुद को ढाल लेती हैं!
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A professor once explained ‘marketing’ like this:
1. You tell a girl, “I’m rich, marry me.”- That’s Direct Marketing.
2. Your friend tells her you’re rich- That’s Advertising.
3. She walks up to you and says, “You’re rich, marry me.”-That’s Brand Recognition.
4. You tell her you’re rich and she slaps you. - That’s Customer Feedback.
5. Before you say anything, your wife arrives.- That’s Market Restriction. 😄
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वॉरेन बफे का बतौर सीईओ अंतिम संदेश
असल पूंजी तो परिवार, दोस्त और सादगी ही है। अपना शहर नहीं छोड़ा, तभी अच्छा कर पाया
अब मैं शांत रहूंगा। 95 की उम्र में जिंदा होना मेरे लिए चमत्कार से कम नहीं है। बचपन में मैं मर ही गया था। 1938 में एक बार बहुत तेज पेट दर्द हुआ। रात में ही अस्पताल जाना पड़ा जहां मेरी अपेंडिक्स सर्जरी हुई। टीचर ने सहपाठियों से मुझ��� पत्र लिखवाए। मैंने लड़कों वाले तो फेंक दिए, लेकिन लड़कियों के पत्र बार-बार पढ़े। 1958 में मैंने ओमाहा में पहला और एकमात्र घर खरीदा। मैंने कुछ साल वाशिंगटन और न्यूयॉर्क में बिताए, लेकिन जल्दी समझ गया कि मेरा घर ओमाहा ही है। यहां के पानी में शायद कोई जादू है। दोस्तों, परिवार, सादगी और ईमानदारी की जो दुनिया यहां मिली, वही मेरी असली पूंजी रही। किसी और शहर में होता तो मैं शायद इतना अच्छा नहीं कर पाता। कभी कभी किस्मत आपको सही जगह पर जन्म देती है। मैं उस मामले में बेहद भाग्यशाली रहा।
मेरे परिवार में अब तक सबसे लंबी उम्र 92 साल की रही है। मैं उसे पार कर चुका हूं। बूढ़ा होना कोई उपलब्ध नहीं, भाग्य की कृपा है। कुछ लोग जन्म लेते ही विशेषाधिकारों के साथ आते हैं जबकि कुछ के हिस्से संघर्ष आता है। मैं अमे��िका में जन्मा। स्वस्थ, गोरा, पुरुष और मध्यमवर्गीय परिवार में। यह जैकपॉट था। मेरे तीनों बच्चे 70 से ऊपर हैं। मैं चाहता हूं कि वे मेरे रहते मेरी संपत्ति का अधिकतर हिस्सा अपने फाउंडेशन के जरिए समाज को लौटाएं अगर वे सरकार या अन्य संस्थाओं से थोड़ा बेहतर काम करे��गे तो मुझे और मेरी पत्नी को गर्व होगा।
नए सीईओ ग्रेग एबल को उन जोखिमों की पहचान है, जिन्हें कई अनुभवी सीईओ नजरअंदाज कर देते हैं। मैं भी कई बार ऐसे हालात में समय पर कदम नहीं उठा पाया। एक बार सुधार के नाम पर कंपनियों से कहा गया कि सीईओ और कर्मचारियों के वेतन का अनुपात सार्वजनिक करें। पर इससे पारदर्शिता नहीं, ईर्ष्या बढ़ गई। आप गलतियों से मत डरिए, उनसे सीखकर आगे बढ़ें। सही नायक पहचानकर अनुकरण करें। अल्फ्रेड नोबेल ने जब गलती से अपना मृत्युलेख पढ़ा तो खुद को बदलने की ठानी और नोबेल पुरस्कार की स्थापना की। आप किसी अखबार की गलती का इंतजार न करें। आज ही तय करें कि अपनी कहानी कैसी लिखवाना चाहते हैं। फिर वैसी ही जिंदगी जीएं। पैसे, शोहरत या सत्ता से महानता नहीं आती। किसी की मदद करके ही आप दुनिया बेहतर ��ना सकते हैं। दयालुता सस्ती नहीं, अमूल्य है। गोल्डन रूल ध्यान रखें। दूसरों से वैसा ही व्यवहार करें, जैसा अपने लिए चाहते हैं। सफाईकर्मी भी उतना ही इंसान है, जितना चेयरमैन।
-वॉरेन बफे
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वॉरेन बफे की नेटवर्थ 13 लाख करोड़ रुपए है। उम्र 95 वर्ष है। पूरी तरह सक्रिय हैं। साठ साल से अपनी कंपनी बर्कशायर हैथवे को संभाल रहे हैं। बतौर सीईओ उन्होंने अपनी टीम को यह आखिरी संदेश दिया है जिसका संक्षि���्त हिंदी अनुवाद दैनिक भास्कर ने बहुत सरल शब्दों में प्रकाशित किया है। प्रत्येक व्यक्ति को यह पढ़ना चाहिए और पढ़वाना चाहिए। इसलिए, कि हम बड़े, सफल और प्रसिद्ध लोगों से प्रभावित होते हैं। इसलिए क्योंकि हमें यह बताया जाता रहा है कि अपनी जगह छोड़ने पर ही सफलता मिलती है। बफे अमेरिका के नेब्रास्का राज्य के करीब पांच लाख की आबादी वाले शहर ओमाहा में जन्मे और यहीं से काम किया। इसलिए भी कि आमतौर पर पिता अपने बच्चों से छोड़ा गया धन दोगुना करने की अपेक्षा करते हैं, बफे उसे जनकल्याण में लगाने की उम्मीद कर रहे हैं। इसलिए भी पढ़ें क्योंकि जिंदगी के फलसफे बहुत सरल से हैं। लेकिन यह बात अगर मैं कहूं कि दूसरों से वैसा ही व्यवहार करें जैसा अपने लिए चाहते हैं तो उसका वह असर नहीं होता लेकिन यही बात वॉरेन बफे भी कह रहे हैं।
जब चे ग्वेरा को एक चरवाहे ने धोखा देकर उनके छिपने के स्थान पर बंदी बना लिया, तो एक सैनिक ने चरवाहे से आश्चर्य से पूछा: तुम उस व्यक्ति को कैसे धोखा दे सकते हो जिसने अपना पूरा जीवन तुम्हारी, तुम्हारी और तुम्हारे अधिकारों की रक्षा में लगा दिया? चरवाहे ने शांति से उत्तर दिया: दुश्मन के खिलाफ उसकी लड़ाई ने मेरी भेड़ों को डरा दिया!
कई साल पहले, मिस्र में, ग्र��ंड कमांडर मोहम्मद करीम ने नेपोलियन के विशाल सैन्य अभियान के खिलाफ प्रतिरोध का नेतृत्व किया था। जब उन्हें बंदी बनाया गया, तो अदालत ने उन्हें मौत की सजा सुनाई। लेकिन नेपोलियन ने उन्हें बुलाया और कहा: मुझे उस व्यक्ति को मारने का अफसोस है जिसने बहादुरी से अपने देश की रक्षा की। मैं नहीं चाहता कि इतिहास मुझे एक नायक हत्यारे के रूप में याद रखे। अगर तुम मेरी सेना को हुए नुकसान के लिए 10,000 स्वर्ण मुद्राए�� चुका दोगे तो मैं तुम्हें माफ़ कर दूँगा। मोहम्मद करीम हँसते हुए जवाब देते हैं: मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं, लेकिन व्यापारियों पर मेरे 1,00,000 से ज़्यादा स्वर्ण मुद्राएँ बकाया हैं। नेपोलियन ने उसे थोड़ी राहत दी। करीम ज़ंजीरों में जकड़े और सैनिकों से घिरे बाज़ार गए, इस उम्मीद में कि जिनके लिए उन्होंने अपना बलिदान दिया था, वे उनकी मदद करेंगे। लेकिन किसी व्यापारी ने कोई जवाब नहीं दिया। उ��्टे, उन्होंने उस पर अलेक्जेंड्रिया के विनाश और उनके संकट का कारण होने का आरोप लगाया। वह नेपोलियन के पास वापस गया। तब नेपोलियन ने उससे कहा: - मैं तुम्हें इसलिए नहीं मारूँगा क्योंकि तुमने हमारे खिलाफ लड़ाई लड़ी, बल्कि इसलिए कि तुमने उन कायर लोगों के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी, जो आज़ादी से ज़्यादा व्यापार को पसंद करते हैं। मोहम्मद राशिद रिदा ने संक्षेप में कहा: "जो अज्ञानी लोगों के लिए लड़ता है, वह उस व्यक्ति के समान है जो अंधे को रास्ता दिखाने के लिए खुद को आग में जला लेता है।"
Dear Peter Navarro,
India’s boardrooms aren’t run by Brahmins.
Tata? Not Brahmin.
Reliance? Not Brahmin.
Mahindra? Not Brahmin.
Wipro? Not Brahmin.
Birla? Not Brahmin.
But India’s soldiers, scientists, poets? Many were. From Param Vir Chakra heroes to Nobel minds like C.V. Raman, S. Chandrasekhar and Tagore. Unlike some others who are trying to lobby for the Nobel prize, our Brahmins got their prize only through merit.
– An Indian (not a Brahmin)