2018 में लगभग ₹85,000 करोड़ के सामूहिक घाटे के गर्त से लेकर 2026 में लगभग ₹1.98 लाख करोड़ के रिकॉर्ड ल��भ के शिखर तक पहुँचने का श्रेय पब्लिक सेक्टर बैंकों में जमीनी स्तर पर काम कर रहे कर्मचारियों को जाता है जिन्होंने पार्लियामेंट स्ट्रीट से पंचायत स्तर तक सरकारी योजनाओं, किसानों, बेरोजग��रों तथा छोटी पूंजी बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
जब PSBs लगातार रिकॉर्ड लाभ और बेहतर प्रदर्शन दे रहे हैं तब 5 Days Banking और निष्पक्ष PLI पर मुहर लगनी चाहिए। बैंकिंग व्यवस्था को मजबूत बनाने वाले कर्मचारियों को 5 डे बैंकिंग और सम्मानजनक PLI मिलना जायज हक है।
हमारी मांग 5 डे बैंकिंग
हमारा हक़ सम्मानजनक PLI
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सरकारी बैंक, हर 5 साल में ट्रांसफर, फ्रॉड प्रतिशत 83%
प्राइवेट बैंक, जहां ज्वाइनिंग वहीँ रिटायरमेंट, फ्रॉड प्रतिशत 17%
(आंकड़े RBI वेबसाइट से है)
यह बताता है कि इस AI के युग में हर 5 साल में उत्तर से दक्षिण भेजने वाली ट्रांसफर की नीति एक वैचारिक भ्रम है न कि जमीनी सच्चाई। फ्रॉड नियंत्रित होता है मजबूत टेक्नोलॉजी से, कड़े नियंत्रण से और लगातार होने वाले सुधार से।
इस एडवांस्ड टेक्नोलॉजी के युग में हर 5 साल में ट्रांसफर से न सिर्फ बैंक की मार्केट में पकड़ कमज़ोर होती है बल्कि खर्च भी बढ़ता है।
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सरकारी बैंकों में स्केल-IV तक के अधिकारियों की लोन देने का प���वर अधिकतम ₹10 लाख तक सीमित है वो भी डिजिटल पोर्टल आधारित और लगभग 100% नियम आधारित प्रक्रिया में। लोन माफी करने का तो अधिकार हीं नहीं ब्रां�� लेवल पर, पूरा अधिकार कंट्रोलिंग ऑफिस की कमिटी के पास है।
फिर ऐसा कौन सा गंभीर “विजिलेंस एंगल” है जो 2026 के Ease of Doing Business युग में भी अधिकारियों को CVC guidelines के नाम पर पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण भेजने को मजबूर करता है?
2006 वाले ट्रांसफर मॉडल को 2026 में ढोना सरकारी बैंकों के लिए बेहद महंगा सौदा बन चुका है। वित्तीय रूप से भी और मानव संसाधन के स्तर पर भी।
अब समय आ गया है कि नीति में व्यावहारिक और आधुनिक सुधार किए जाएँ।
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एक सज्जन ने पूछा “काला बिल्ला क्यों लगाए हो?”
हमने शांत स्वर में कहा “हम आपको कम ब्याज देंगे और आपके पड़ोसी को ज़्यादा”
सज्जन भड़क उठे “यह तो सरासर अन्याय है”
हमने जवाब दिया “ठीक यही अन्याय आज हमारे साथ हो रहा है, इसीलिए यह काला बिल्ला है।”
हम असंवैधानिक PLI स्कीम का विरोध करते हैं।
यह सिर्फ विरोध नहीं यह न्याय और समानता की लड़ाई है।
#Approve5DayBankingNow
*विगत 10 वर्षों से लंबित है पांच दिवसीय बैंकिंग की मांग आम जनता के हित में है।*
*साथियों जब संवाद विफल हो जाता है, तब सत्याग्रह(हड़ताल के रूप में) एक ज़िम्मेदार और शांतिपूर्ण रास्ता बनता है*हड़ताल अधिकारियों और कर्मचारी के अस्तित्व की लड़ाई है*
When the world is moving to a 4-day week, and banking is already 24x7 in the digital era, bankers asking for a 5-day week isn’t a luxury. It’s justice.
IBA has agreed. The understanding is signed.
Now the Government must honour its commitment – no more excuses, no more delays.
Respect the Settlement. Deliver it.
We demand #5DayBankingNow