(कविता- मध्यरात्रि में चौराहा)
ये जो खूब पड़े सन्नाटे हैं
जैसे अभी-अभी खाली हुआ कोई हृदय हो
तंग गलियाँ
जहाँ स्वयं की ही साँसे सुनता पथिक हो
पदचापों के साथ समिश्रित
कुत्तों के भौंकने की द्यवनियाँ
जहाँ से हर कोई तेज गति से निकलना चाहे।।
-सुरेन्द्र ‘वीर’ पंचारिया
#kavishala
जब हृदय संवेदनाएं लिख नहीं पाता,
मुख से किसी को वेदनाएं कह नहीं पाता है,
कैसे जीता है मनुष्य का विवेक?
जब हृदय और विदारक हो जाता है,
गद-गद होकर भी रो नहीं पाता है,
तब चाहता है किसी की बाँहें,
या चाहता है केवल एकांत।।
-सुरेन्द्र ‘वीर’ पंचारिया
#शब्दनिधि#काव्य
( कविता- केवल एक शब्दांश )
मैंने सोचा एक ‘शब्दांश’
और उस पर किया चिंतन
एक या दो मध्यरात्रि तक
निशा की घोर अंधेरों में
चँद्रमा एवं तारों की रश्मि तक..
-सुरेन्द्र ‘वीर’ पंचारिया
#शब्दनिधि#कविता#काव्य
१/२
मैं उकेरुँ तेरी प्रतिच्छाया को
अपने
हृदय में
स्वप्नों में
बातों में
आँखों में
और तुझसे मिलता रहूँ
तुझे
बिन कहे
बिन देखे
बिन बोले।।
-सुरेन्द्र ‘वीर’ पंचारिया
एक हिस्सा पकड़ा मैंने रात्रि का
जिसमे मिलती है यातनाएं
पीड़ा, जो जुड़ी होती है
हर उस गहरी याद से
तथा उस अनचाही चिंता से,
तत्पश्चात निद्रा निद्रा कहाँ रह पाती है?
वो बदल जाती है
करवटों और लंबी खींची पलकों की झपकियों में।।
-सुरेन्द्र ‘वीर’ पंचारिया
यह तुम जो अक्स देखती हो मेरी
यक़ीनन तुम ही तो हो,
और हाँ!!
तुम्हारा मुस्कुराना रास आता है हमें
हर बार वज़ह नहीं जाननी होती।।
-सुरेन्द्र ‘वीर’ पंचारिया
#शब्दनिधि#काव्य#शायरी
★★
माँ ज्ञान
माँ मर्यादा
माँ प्रेम की मूरत
माँ से अस्तित्व
मेरा और
मेरी दुनिया का
माँ, जिससे ही होता हूँ मैं पूरा
माँ
जिसकी गोद में मिलती है मुझे परम शांति
सुकून की नींद
और विकारयुक्त विचारों से मुक्ति।।
एक सच्चा बेटा बनने की ओर.... माँ ❣️🥰
-सुरेन्द्र ‘वीर’ पंचारिया
चित को थोड़ा शांत करो
विचलित हृदय को कहो थोड़ा धीर धरो
मन में जो उथल-पुथल है
इस प्रकार निवारण करो
हृदय और मस्तिष्क दोनो पर ना अघात हो
ओ सखी! चित को थोड़ा शांत करो
मौन अच्छा है
भरा मन एक समय के बाद
उलझन बढ़ा ही देता है।।
🤗🤗
-सुरेन्द्र ‘वीर’ पंचारिया
@avykataprem_1 अहा!! 🥺❣️❣️
तुम्हारा कहना सत्य है
जैसे हृदय और आँखों का
प्रेम संबंध होता है...
जानता हूँ
हृदय विदारित है
ध्वनित है
जैसे मौन बहती नदी का
अंतर्भाग होता है...
-सुरेन्द्र ‘वीर’ पंचारिया
( कविता- चार दोस्त)
हम में से एक का नाम था ‘सागर’
बड़ी विचित्र बातें करता था
हतिम, शक्तिमान आदि की कहानियाँ कहता था,
चूँकि हमारे घर में टी वी था नहीं
तो वो पूरा प्रसारण बन जाया करता था।
-सुरेन्द्र ‘वीर’ पंचारिया
पोस्टर- सखी @avykataprem_1
पूरी कविता पोस्टर में पढ़ें...
हाँ!!
प्रेम में पड़े दो प्रेमी
सुनते है भावों को
हृदय के स्पंदन से
आँखों के मिलन से
और यदि एक दूजे से दूर हो
तो वो साथ रहते हैं
यादों में
ख्यालों में
स्वप्नों की अलग दुनिया में ।।
-सुरेन्द्र ‘वीर’ पंचारिया