कई हिन्द�� युवाओं को लगता था कि—
पुलिस की सख्ती सिर्फ़ CAA के विरोध में प्रदर्शन करने वालों (मुसलमानों) के लिए है।
जेल सिर्फ़ शरजील इमाम और उमर ख़ालिद जैस��� लोगों के लिए है।
बुलडोज़र सिर्फ़ मुसलमानों और मस्जिदों पर ही चलता है।
लेकिन अब उनकी यह ग़लतफ़हमी धीरे-धीरे दूर हो रही है।
एक मजबूत भारत वही है जहाँ हर नागरिक, चाहे उसका नाम कुछ भी हो, कानून के सामने खुद को सुरक्षित महसूस करे। भेदभाव विकास का नहीं, विनाश का रास्ता है।
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किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसके कानून की ताकत से नहीं, बल्कि उस कानून की निष्पक्षता से होती है। लेकिन आज सवाल उठ रहे हैं—क्या कानून की लाठी सिर्फ एक ही समुदाय की तरफ मुड़ती है?
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जब लिंचिंग करने वालों को हार पहनाए जाते हैं और घर तोड़ने की कार्रवाई चयनात्मक हो जाती है, तो न्याय प्रणाल�� की साख दांव पर लग जाती है। क्या हम एक ऐसा देश बन रहे हैं जहाँ 'बुलडोजर न्याय' ही नया संविधान है?
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