असतो मा सदगमय!
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मा अमृतगमय !!!
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आपका पैदा हुआ बच्चा, ईश्वर की अनुपम कृति।
अस्थि, मज्जा, पेशी, खून, नर्व, एंडोक्राइन, पाचन और तमाम किस्म के सिस्टम्स का अनोखा पैकेज।
इसके साथ कुछ मौलिक..
"पाशविक भावनाऐ"
बच्चे के विकास के साथ ये भावनाऐ आप पहले दूसरे साल में महसूस करते है।
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भय, भूख, खीज, चिढ़, खुशी, लालच, गुस्सा.. हर बात वो खुलकर प्रकट करता है। कोई शर्म नही, कोई लिहाज नही, कोई एटिकेट नही।
अपने बच्चे को कपड़े पहनाने शुरू कर दिए हैं, मगर उसकी भावनाऐ नग्न है। वो मौलिक पाशविक भावनाएं, निश्छल चीख से प्रकट करता है।
और फिर उसका शिक्षण प्रशिक्षण शुरू होता है। माता, पिता, गुरु, शाला, समाज, धर्म उसे पाशविकता से दूर कर मनुष्य बनाना शुरू करते है।
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गुस्सा मौलिक है,
सहनशीलता सीखनी होती है।
भय मौलिक है,
निर्भयता सीखनी पड़ती है।
खीझ, नफरत मौलिक है,
एडजस्टमेंट सीखना पड़ता है।
चीखना, लड़ना, रोना मौलिक है .. सुनना, मानना, हंसना और हंसाना सीखना पड़ता है। स्वार्थ मौलिक है, परमार्थ सीखना पड़ता है।
एक एक कदम बढ़ते हुए वो बालक, नग्न पाशविक भावनाओ को ज्ञान और मानुषिक गुणों से ढंकना शुरू करता है। उसकी मनुष्य होने की यात्रा आगे बढ़ती है।
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जितनी तेजी से सीखता जाए, उंसके परिपक्वन की दशा तय होती है। परिपक्वता आपकी डिग्री, पैकेज, बैंक बैलेंस, पॉपुलरिटी से तय नही होती।
वो तय होती है कि आपने नग्न पाशविक भावनाओ को सहनशीलता, एडजस्टमेंट, सुनने, हंसने, हंसाने और परमार्थ के वस्त्रों से कितना ढंक लिया है।
शिक्षा और धर्म हमे यही सिखाता है।अपने खुद की मेधा से अपने परिवेश को जीवन योग्य बनाने की गुणवत्ता पैदा करना सिखाता है।
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मनुष्य बनने की इस यात्रा को राजनीति प्रतिगामी दिशा में ले जा सकती है।
आपके भय, लालच, बदले, नफरत, खीझ के भाव को उघाड़कर। आपको वापस उस अरक्षित उम्र में ले जाकर जहां अपने परिवेश में सुरक्षित महसूस करने के लिए किसी बड़े के साथ कि जरूरत पड़े।
आप आत्मनिर्भरता ख़ो दें।
अवलंबित हो जाएं, अपने झुंड पर..और फिर जब पूरा झुंड भी असुरक्षा से पार न पा सके, तो जुट जाए किसी हमले की तैयारी में।
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राजनीति को ये डर मुफीद होता है।
इसी से झुंड मिलता है, सेना मिलती है, उस सेना को नफरत और भय का मोटिवेशन मिलता है। यही फ़ौज दिग्विजयी बनाती है।
प्रेम और निश्चिन्तता में निर्भीक लोग कभी सेना नही बनते, मिलिशिया नही बनते। राजा को, राजनीति को लड़ने वाले पशु चाहिए, परिपक्व नागरिक नही।
हम उस राजनीति में फंस चुके हैं।
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हंसता-खेलता, दुनिया को अपनी मुस्कान और मेधा से जीतता एक पूरा समाज, आज क्रिया-प्रतिक्रिया के विश्लेषण में डूबा है।
अपने झुंड बना रहा है, हमले की आशंका में हमले की तैयारी कर रहा है। हमले के समर्थन में सड़कों पर उतरने को तैयार है।
नफरत का बैरोमीटर फूट कर निकलने वाला है। धर्म की रक्षा को सेनायें तैयार हो रही है। फ़ौज को माकूल अफसर नही मिल रहे, डिग्रीधारी युवा भोथरे और नुकीले हथियारो को लहरा कर, आसपास को ललकार रहे हैं।
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क्या ये धर्म है?
क्या यही आपको शिक्षा मिली थी? क्या यही आपकी परिपक्वता है? क्या यही जीवन से मृत्यु के बीच असत्य से सत्य की यात्रा है, अंधेरे से प्रकाश की यात्रा है।
क्या यही मृत्यु से अमरता का मार्ग है?
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इस दीपावली, आप अपने बच्चो को रौशनी दे सकें, उन्हें प्रेम, सहिष्णुता, निर्भयता का अमृत दे सकें। यह अमृत खुद भी चख सकें।
मेरी ऐसी शुभकामनाएं हैं।
❤️
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(पहले ज़रा इस तस्वीर को इत्मीनान से देख लीजिए। ये तस्वीर मानव इतिहास का वो दस्तावेज़ हैं जिस पर सभ्य समाज को नाज़ होना चाहिए।)
दोनों हाथ छाती पर बांधे ये आदमी ऑगस्ट लैंडमेसर है। जब उसके चारों तरफ लोग नाज़ी सैल्यूट कर रहे हैं तब वो अपने आसपास के शोर से बेपरवाह धूप में आंखें
दैनिक भास्कर ने मोदी सरकार के कैबिनेट के दस मंत्रियों के ग्यारह सौ से अधिक ट्वीट्स का विश्लेषण किया है, जिसकेअनुसार कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर के दौरान इन मंत्रियों ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल के ज़रिये एक भी कोविड पीड़ित को ऑक्सीजन सिलेंडर या अस्पताल बेड दिलाने में मदद नही की
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