मैं ख़ामोश-मिज़ाज हूँ, गुफ़्तगू कम रखता हूँ,
तन्हाई पसंद है, पर रिश्तों में वफ़ा रखता हूँ।
रोज़ बात से नहीं, एहसास से रिश्ते टिकते हैं,
मेरे नज़दीक रिश्ता ज़िम्मेदारी है, मैं उम्र भर निभाता हूँ।
उसे याद करके न दिल को रंज़ीदा कर,
जो तुझे फरामोश करके भी शाद रहा।
उसकी मुसर्रत में ही अपनी मुसर्रत तलाश ले,
यही तो सच्ची मोहब्बत का सिला रहा।
तूने चाहा था जिसे अपनी जान से ज्यादा,
वो आज किसी और का होकर भी बा-वफ़ा न रहा।
जिन हाथों ने बीच भँवर में छोड़ा था हमें,
उनकी बातो से अब दिलासा अच्छा नहीं लगता।
अब तो आदत है तन्हा किनारे तक आने की,
किसी के सहारे का भरोसा अच्छा नहीं लगता।
जेब ख़ाली हो तो अपने भी सवाल करते हैं,
और जवाब में सच बोलना अच्छा नहीं लगता।
औलाद की आँखों में उम्मीद, माँ की ख़ामोशी,
इन दोनों के बीच मुस्कुराना अच्छा नहीं लगता।
गिरेगा तू कई बार, मगर उठना भी तुझी को है,
किसी और को अपने ख़्वाब उजाड़ने न देना।
ये दुनिया तमाशा देखेगी, ताली नहीं देगी,
तू अपनी लौ को यूँ ही बुझने न देना।
इक़्तिदार का हिस्सा बन जाए तो ,आवाम का कोई रहता नहीं,
तख़्त से लिपट जाए तो, इंसान का कोई रहता नहीं।
जो कल तक आवाम की सदा था कूचा-कूचा,
आज क़स्र में है, अब ज़ुबां का कोई रहता नहीं।
एक यार मेरा, एक मेरा अश्कार दुश्मन है,
हैरान हूँ दोनों को, यक-जा देख कर।
जिनकी एड़ियाँ रेज़ा-रेज़ा कर दीं इस संग-दिल ज़मीं ने,
वो भी किस्मत सुनाते हैं सबका दस्त देख कर।
यहाँ मय्यत को भी शोहरत की ज़रूरत है,
लोग जनाज़े में भी आते हैं अब हैसियत देख कर।
तलाश-ए-हक़ में निकले हैं, ठहरना हमको आता नहीं,
जुस्तजू जितनी बढ़ती है, सुकून उतना ही पाता नहीं।
एक राज़ पाते हैं तो सौ राज़ और उभरते हैं,
ये इश्क़-ए-इल्म है, इसका कोई सिरा आता नहीं।
चाहे कितना भी बच कर चलो,
रंग उसका चढ़ ही जाता है।
फूलों में रहोगे तो महक जाओगे,
कीचड़ में रहोगे तो सन ही जाओगे।
इसलिए क़लम के साये में रहो,
यहाँ किरदार निखर ही जाता है।