और फिर एक दिन ऐसा आता है जब आप किसी को प्रेम कर ही नहीं पाते..मर जाती है सारी भावनाएं..मन शून्य अवस्था में चला जाता है..हम भागने लगते हैं लोगों से..सिर्फ अंधेरा ही होता है हमारे इर्दगिर्द..हम स्वयं को उसे समर्पित करके इंतज़ार करते रहते हैं स्वयं के अंत का।
मैं ग्लानि में नहीं जीना चाहता, मुझे समझौते पसंद नहीं और न ही पछतावे में मरना चाहता हूं पर मुझे यकीन है मैं मारा जाऊंगा अपनी मृत्यु से नहीं वरन् मुझे मारेगी मेरी अधूरी ईच्छाएं, टूटे स्वप्न का कोई टुकड़ा आ घुसेगा मेरी गर्दन पर...!!!
मैं उन बातों से दूर भागता हूँ जो मुझमें अनगिनत खामियाँ दिखाती हैं,क्योंकि किसी के द्वारा कुछ ही सेकेंड में कही गई बात मुझे कई महीनों तक परेशान करती रहती है धीरे-धीरे उसका असर इतना गहरा हो जाता है कि मैं खुद को ही तुच्छ समझने लगता हूँ,और अपनी ही नजरों में कहीं छोटा पड़ जाता हूँ..!