@ECRlyHJP@spjdivn
ये हर रोज की कहानी है जहाँ खगरिया से samastipur चलने वाली ट्रेन हर रोज़ late चलती है
क्या इसमें हम कुछ सुधार की आशा कर सकते है ??
इस रूट की हर ट्रेन के साथ यही कहानी है
दिल्ली पुलिस भी भाजपा के जैसे शब्दावली का प्रयोग करती हैं, दिल्ली पुलिस का रही है आप अपने समर्थकों के साथ वापस चले जाओ।
हकीकत और सच्चाई यह है कि दिल्ली जंतर मंतर पर माननीय डिंपल यादव जी के साथ सिर्फ पार्टी के सांसद हैं।
आरोप लगाना तो कोई मोदी सरकार के प्रशासन से सीखे।
@dimpleyadav@yadavakhilesh
नेहा को अब इस आंदोलन का चेहरा बना देना चाहिए।
हाँ, मैं यह बात पूरी जिम्मेदारी के साथ कह रहा हूँ।
पिछले 21 दिनों से नेहा लगातार अनशन पर हैं। शरीर कमजोर हुआ, लेकिन हौसला नहीं। सरकार का दबाव बढ़ा, लेकिन उनकी आवाज़ नहीं डगमगाई।
हर बार उन्होंने उसी आत्मविश्वास के साथ आंदोलन की बात की, सरकार को चुनौती दी और लोगों का हौसला बढ़ाया।
दूसरी तरफ, सोनम वांगचुक के बाद जब आंदोलन की कमान अभिजीत दीपके ने संभाली, तो आज अनशन की घोषणा करते समय उन्हें भावुक होकर रोते देखा।
भावुक होना कोई कमजोरी नहीं है, लेकिन यह लड़ाई बहुत लंबी और बेहद कठिन है। यहाँ हर दिन मानसिक दबाव बढ़ेगा, हर तरह की रणनीति अपनाई जाएगी और नेतृत्व की परीक्षा बार-बार होगी।
इसीलिए मेरी राय है कि अब आंदोलन को ऐसा चेहरा चाहिए जो सिर्फ़ संघर्ष की बात न करे, बल्कि संघर्ष की मिसाल बनकर सामने खड़ा हो।
मेरे अनुसार वह चेहरा नेहा हैं।
JNU की पृष्ठभूमि, जन आंदोलनों का अनुभव, 21 दिनों का कठिन अनशन और हर परिस्थिति में अडिग रहने का उनका साहस उन्हें इस भूमिका के लिए मज़बूत दावेदार बनाता है।
यह किसी व्यक्ति को छोटा या बड़ा साबित करने की बात नहीं है। यह आंदोलन को मज़बूत करने की बात है।
अगर नेतृत्व में बदलाव या जिम्मेदारियों का पुनर्वितरण आंदोलन को नई ऊर्जा देता है, तो उस पर खुलकर विचार होना चाहिए।
और सबसे ज़रूरी बात—21 दिनों से अनशन पर बैठी नेहा का स्वास्थ्य अब सर्वोच्च प्राथमिकता होना चाहिए। उनका जीवन किसी भी आंदोलन से अधिक मूल्यवान है।
मेरी राय साफ़ है—नेहा को आंदोलन की अग्रिम पंक्ति में लाया जाना चाहिए।
क्या आप सहमत हैं, या आपकी राय अलग है?