मेरा यह अकेलापन अब कोई मजबूरी या सज़ा नहीं है, बल्कि इस मतलबी भीड़ से थककर चुना हुआ मेरा अपना एक शांत और पवित्र कोना है, क्योंकि संसार के सारे रिश्ते किसी न किसी मोड़ पर अपनी कीमत वसूल कर ही लेते हैं, पर यह अकेलापन मुझसे बिना कुछ माँगे ताउम्र मेरा साथ निभा रहा है...
एक आंदोलन है, जो चाहता है कि देश के सभी स्कूल ठीक हो। वो चाहता है कि देश के गरीब, पिछड़े तबके से आने वाले बच्चों को भी अच्छी शिक्षा मिले। ज़मीनी स्तर पर वो सरकार और प्रशासन को स्कूलों के लिए जवाबदेह बनाना चाहता है।
एक राजनैतिक दल है, जिसकी देश के 60% राज्यों में सरकार है। वो स्कूल ठीक करने की बजाय आंदोलन करने वालो के साथ हिंसा करने, मारपीट करने, गाली-गलौज करने, और फर्जी FIR करने में व्यस्त है।
मजे की बात यह है कि यह दल खुद को देशभक्त और आंदोलन को गद्दार कहता है।
मेरी पूरी ज़िंदगी सिर्फ़ एक दौड़ बनकर रह गई। बीते कल में 'अपनों' में थोड़ा अपनापन तलाशने के लिए भागता रहा, आज परिवार और ज़िम्मेदारियों का बोझ उठाए भाग रहा हूँ, और आने वाले कल में शायद मौत की तरफ़ भागूँगा। इस पूरी दौड़-धूप में 'मैं' कहाँ हूँ, शायद मुझे अपने लिए जीने की मोहलत कभी मिलेगी ही नहीं।🌻
पुरुष भी टूटते हैं, पुरुष भी थकते हैं, पुरुष भी ख़ुद से हारे होते हैं.. हाँ, फ़र्क बस इतना है वो रोते हैं, किंतु एकांत में क्योंकि वो जानते हैं उनके आँसू समाज की बनाई इस कठोर दीवार को हिला सकते हैं और वो इस व्यवस्था को तोड़ना नहीं चाहते...