रामायण और महाभारत जैसे भारतीय धार्मिक ऐतिहासिक महाकाव्यों के फिल्म या सीरियल निर्माण में पात्रों की कास्टिंग की सबसे बड़ी भूमिका होती है।
देखो, आप रामकथा आपने हिसाब से कई तरह से लिख सकते हैं पर फिल्मांकन एक अलग चीज है। उसमें भगवान राम का चरित्र निभाने के लिये एक ऐसा अभिनेता चाहिये जिसकी पहले कोई छवि न रही हो।
या तो बिल्कुल नया हो या कोई जानता न हो पहले से।
रामानंद सागर और बी आर चोपड़ा की जीत यही थी।
एक तो उन्होंने पहली बार बड़े स्केल पर रामायण और महाभारत बनाई और अभिनेता वो चुने जिनकी कोई पूर्व छवि थी ही नहीं।
उसके बाद उनके चुने अभिनेता/अभिनेत्रियों ने भी जान लगा दी अपना किरदार निभाने में।
इस वजह से उनके सीरियल सुपर मेगा बंपर ही नहीं उससे ऊपर जो होता है, वैसे हिट हुये।
इसके अलावा वो अपनी फिल्म मेकिंग में सरल रहे। ज्यादा तड़क भड़क नहीं थी।
अगर आप रामचरित मानस पढ़े होंगे तो जान जायेंगे कि रामानंद सागर की रामायण के शुरू के एपिसोड के संवाद तक मानस की चौपाइयों का गद्य रूप भर थे।
मैं उस पीढ़ी का हूं जब हम साल भर रामलीला का इंतजार करते थे और रात भर टाट बोरा बिछा कर रामलीला देखते थे। जहां ताड़का वध, परशुरामी, केवट संवाद, लंका दहन, अंगद संवाद विशेष आकर्षण होते थे।
जो पात्र रामलीला खे��ते थे, वो भले पीठ पीछे सिगरेट वगैरह पीते हों(मैं गारंटी नहीं ले सकता), पर यथासंभव सात्विक रहने का प्रयास करते दिखते थे।
रामानंद सागर की रामायण और बी आर चोपड़ा की महाभारत के अलावा तीसरी बड़ी सफलता 2014 की स्टार प्लस की महाभारत को मिली और उसमें भी कास्टिंग ही एक बड़ा कारण था।
भगवान राम का चरित्र कृष्ण से बिल्कुल अलग है।
उनसे आप ��क सहज सम्मानजनक दूरी बना के चलते हैं। वो पैदायशी राजकुमार हैं, अपने समय के दो धुर विरोधी ऋषियों से शिक्षा पाये और तत्कालीन तीसरे सबसे बड़े ऋषि अगस्त्य का आशीर्वाद पाया।
उन्हें खुद का परिचय देने की जरूरत कभी नहीं पड़ी।
स्त्री ताड़का को बिना हिचक मारा, अहिल्या को पुनः सामाजिक प्रतिष्ठा दी और बिल्कुल अनजान वानरों की सेना के प्रमुख तक बन गए।
ऐसे पुरुष के चेहरे पर एक सहज स्वाभाविक रौब होगा, ओज होगा और आंखों में कृपालुता और व्यक्तित्व से शांत विनम्र और साहसी दिखेगा।
इतनी खूबियां एक साथ दिखा पाना लगभग असंभव है। इसीलिए वो भगवान थे
अरुण गोविल बहुत अच्छा करके गए और बेंचमार्क स्थापित कर दिया।
रणबीर कपूर निसंदेह बेहद अच्छे अभिनेता हैं पर उनकी एनिमल मूव��� अभी आकर गई जिसमें बोल्ड सीन भी थे और नशेबाजी भी।
और भी कई मूवीज हैं उनकी जिनमें उन्होंने अच्छी एक्टिंग की।
रामायण मूवी देखते समय आपको रणबीर कपूर को देखते ही उनकी याद आएगी।
यहीं पर अरुण गोविल जीत जाते हैं।
बस।
अरुण गोविल ने जो भगवान राम जिए,
अरविंद त्रिवेदी ने जो रावण का रोल किया और दारा सिंह जो हनुमान जी का रोल करके गए, उसके बाद अगले 1 हजार साल तक तो किसी ये रोल करने ही नहीं चाहिए थे।
और फिर दुनिया की पचास कहानियां छोड़ के ये रामायण बनाना ही क्यों है भाई? जब तुमसे होता नहीं?
रामानंद सागर पर भगवान की कृपा थी।
रामानंद सागर के पास कोई टेक्नॉलाजी नहीं थी लेकिन उन्हें राम के व्यक्तित्व की समझ थी. दृष्टिहीन रविन्द्र जैन देख नहीं सकते थे लेकिन उन्होंने अपने सुरों में राम को देख लिया था. आज के डायरेक्टर-प्रोड्यूसर हालीवुड और मार्वल यूनिवर्स की बराबरी के चक्कर में भूल जाते हैं कि राम का पूरा व्यक्���ित्व सहजता का पर्याय है. उनको क्रुद्ध-व्याकुल और अधीर दिखाना उनके व्यक्तित्व के साथ अन्याय करना है. रामायण के सबसे बड़े विलेन रावण के चरित्र तक में मर्यादा है.
रामायण की पूरी कहानी ही मर्यादा में रहने की कहानी है. यही कारण है कि बड़े-बड़े वीएफएक्स और सीजेआई से बने रामायण दर्शकों को असहज कर देते हैं. अब तक बने तमाम रामायण और आज का टीजर देखने के बाद यही समझ आता है कि एक बार देख तो लेंगे लेकिन दिल से कहें तो अपनी पुरानी रामायण ही ठीक है. 🙏
#रामायण
कुछ लोग कह रहे हैं कि नई वाली रामायण फ़िल्म में खोट मत निकालो। वहीं कुछ का कहना है कि रामानंद सागर वाली उस ज़माने के हिसाब से थी, अब ज़माना बदला है तो नई वाली आधुनिक युग के हिसाब से है।
ये लोग असली समस्या समझ ही नहीं पा रहे। आप राम��यण के किरदारों को भारतीय वेश-भूषा व परिवेश में क्यों नहीं दिखा सकते? लंका सोने की थी। वहाँ के चरित्र स्वर्ण धारण करते थे। पहले 'आदिपुरुष' ने दिखाया कि वो अंधकार में डूबी कोई नगरी है जहाँ चमगादड़ों का साम्राज्य हैं, वहीं अब नमित मल्होत्रा द्वारा निर्मित रामायण दिखा रही है कि लंका पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव पर स्थित मध्य-यूरोप का कोई बर्फीला राज्य था। शुरुआती दृश्य में ही बर्फीले पहाड़ दिखाई दे र��े हैं। कुहासा दिख रहा है।
क्या इस देश में कहीं वन नहीं बचे हैं? कहीं कोई जल-प्रपात नहीं है? ऐसे दृश्य फ़िल्माने के लिए भी आपको VFX की ज़रूरत पड़ती है। आजकल AI से भी इनसे सुंदर दृश्य बना दिए जाते हैं। भारतीय उपमहाद्वीप की कहानी है, भारत में शूट करो न भाई।
एक दृश्य में जब श्रीराम परशु के साथ कलाबाजियाँ कर रहे हैं, उस समय उनके पीछे खड़े लोगों के भाव पढ़िए। कोई भाव ही नहीं है, एकदम एक्सप्रेशनलेस। मूर्तियों की तरह खड़े हैं वो। रणबीर कपूर के अभिनय में कोई कमी नहीं है, अयोध्या छोड़ते वक़्त नौका से जब वो पीछे मुड़कर देखते हैं तब अपनी भूमि व अपनों से बिछड़ने का दर्द उनके चेहरे पर स्पष्ट दिखाई देता है। पुष्पक विमान वाला दृश्य ठीक है, भले ही वाल्मीकि रामायण में जो वर्णित है उससे ये एकदम अलग है।
जयजयकार व पुष्पवर्षा करते प्रजाजनों के बीच श्रीराम जिस तरह से चलते दिखाई दे रहे हैं, वो उनके चरित्र से मेल नहीं खाता। श्रीराम में कृतज्ञता थी, मर्यादा थी, विनम्रता थी। रोती प्रजा उनके साथ वनगमन को उद्यत थी। ऐसे में बिना किसी का अभिवादन स्वीकार किए वो बढ़ते चले जा रहे हैं, ऐसा देखना किसी को भी नहीं पचेगा।
साहस की कमी: मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व का सबसे बड़ा संकट
दिसंबर 2023 में जब भारतीय जनता पार्टी ने राजस्���ान में सत्ता संभाली, तो मुख्यमंत्री के रूप में श्री भजनलाल शर्मा का चयन एक चौंकाने वाला निर्णय था। न वे किसी बड़े गुट के नेता थे, न जन-आंदोलन से उभरे थे। उनकी नियुक्ति की सबसे बड़ी वजह यही मानी ��ई कि वे किसी के लिए भी 'खतरा' नहीं थे। लेकिन राजनीति का यह कटु सत्य है जो नेता किसी को चुनौती नहीं देता, वह स्वयं भी चुनौतियों से बचता नहीं, बल्कि उन्हें झेलता है।शर्मा की असली समस्या अनुभवहीनता नहीं है वे संगठन में लंबे समय से सक्रिय रहे हैं। समस्या है निर्णायकता का अभाव। और यह अभाव किसी प्रशिक्षण से नहीं भरा जा सकता, क्योंकि साहस कोई पाठ्यक्रम नहीं है।
भजनलाल शर्मा को मुख्यमंत्री बनाने के ��ीछे BJP हाईकमान की रणनीति स्पष्ट थी वसुंधरा राजे के प्रभाव को नियंत्रित करना और एक 'मैनेजेबल' चेहरा सामने रखना। यह रणनीतिक दृष्टि से समझ में आता है, लेकिन इसके गंभीर दुष्परिणाम भी होते है: जिस नेता को 'सुरक्षित' समझकर चुना जाता है, वह अक्सर अपने फैसलों में भी 'सुरक्षित' यानी जोखिम-रहित रास्ते ही चुनता है।शासन में साहस की जरूरत हर कदम पर होती है चाहे कोई कठोर प्रशासनिक निर्णय हो, पार्टी के भीतर अस��मति जताना हो, या जनता की अपेक्षाओं को प्राथमिकता देना हो। जब मुख्यमंत्री स्वयं निर्णायक नहीं होता, तो उसके चारों ओर एक ऐसा तंत्र पनपने लगता है जो उसकी शिथिलता का लाभ उठाता है।
राजस्थान की प्रशासनिक स्थिति पर नज़र डालें तो स्पष्ट दिखता है कि निर्णयों में विलंब, नौकरशाही की मनमानी और राजनीतिक हस्तक्षेप की शिकायतें लगातार बढ़ी हैं। जिले स्तर पर अधिकारी बड़े शहरों की ओर तबादले के लिए जुगाड़ म���ं लगे हैं। कानून-व्यवस्था के मामले में प्रतिक्रिया देर से और दबाव में आती है, सहजता से नहीं। यह स्थिति तब बनती है जब सत्ता का केंद्र बिंदु धुंधला होता है। नौकरशाही, लॉबी समूह, प्रेशर ग्रुप सभी उस शून्य को भरने लगते हैं जो एक निर्णायक नेतृत्व के अभाव में बनता है। मुख्यमंत्री कार्यालय प्रतीकात्मक तो रहता है, लेकिन सत्ता की वास्तविक लगाम कहीं और से खिंचती है।
राजस्थान के राजनीतिक इतिहास में ��ो बिल्कुल अलग नेतृत्व शैलियाँ ��िखती हैं। वसुंधरा राजे, चाहे उनसे असहमति हो या सहमति एक बात के लिए जानी जाती थीं: वे फैसला लेती थीं। IAS अधिकारी जानते थे कि उनके सामने अधकचरी फाइल नहीं जानी चाहिए। दूसरी ओर अशोक गहलोत अपनी तमाम सीमाओं के बावजूद राजनीतिक प्रबंधन में माहिर थे। उन्होंने 2020 के राजनीतिक संकट में अपनी सरकार बचाई, यह साहस के बिना संभव नहीं था। भजनलाल शर्मा के पास न वसुंधरा की दृढ़ता है, न गहलोत की राजनीतिक चतुराई। वे ���क अच्छे संगठन कार्यकर्ता हो सकते हैं लेकिन एक बड़े प्रदेश का मुख्यमंत्री बनना इससे कहीं अधिक माँगता है।
अनिर्णायक नेतृत्व की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि वह एक स्व-विस्तारित समस्या है। जितना नेता झिझकता है, उतना ही अधिक लोग उसके निर्णय को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। और जितने अधिक लोग उसे प्रभावित करते हैं, उतना ही वह निर्णय लेने में और अधिक उलझता जाता है। एक कमज़ोरी अनेक समस्याओं को जन्म देती है। आज राजस्थान में यही हो रहा है, मंत्रिपरिषद के भीतर विभिन्न गुट हैं। हाईकमान के अलग-अलग 'प्रतिनिधि' हैं जो जयपुर में अपना प्रभाव जमाने की होड़ में हैं। नौकरशाही के अपने खेमे हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री की भूमिका एक सक्रिय शासक की नहीं, बल्कि एक 'मध्यस्थ' की बनकर रह गई है और मध्यस्थ कभी इतिहास नहीं बनाते।
भजनलाल शर्मा की सरकार को अभी लगभग सवा दो वर्ष हुए हैं। पाँच वर्ष के कार्यकाल में यह समय कम नहीं है, लेकिन समय अभी बाकी है, पर केवल साहसिक निर्णयों के लिए। राजस्थान की जनता ने बड़े बहुमत से BJP को जनादेश दिया था उस जनादेश का सम्मान केवल शपथ लेने से नहीं होता, शासन करने से होता है।
यदि मुख्यमंत्री शर्मा अपनी नेतृत्व शैली में मूलभूत बदलाव नहीं लाते और वे दिल्ली की ओर देखते रहने की बजाय जयपुर से स्वयं निर्णय लेना शुरू नहीं करते तो 2028 में राजस्थान का इतिहास उन्हें 'एक अवसर' के रूप में नहीं, 'एक अवसर चूक जाने' के रूप में याद करेगा।
ज्ञान उधार लिया जा सकता है, साहस नहीं और राजस्थान को ��भी साहस की जरूरत है।
बचपन में जो होली हमने देखा है अब वो होली नहीं है ।
पहले की होली में हर गाँव में एक टोली बनती थी जो सबके घर में जाकर रंग गुलाल लगाते थे , ढोल बाजे बजते थे। शोर शराबा इतना होता था की सबको मालूम पड़ जाता की होली है।
लेकिन अब वो होली नहीं रही ख़ास कर शहरों में मालूम भी नहीं पड़ता।
अब का नियम है कि होली के दिन अगर आप अपने पड़ोसी के घर जाएँगे तभी आपके पड़ोसी भी आपके घर पर आयेंगे। अगर बच्चे जाएँगे पड़ोसी के घर तो वो लोग भी वापस बच्चे ही भेजेंगे😄
आपके शहर या गाँव में कैसा होली होता है ढोल बाजे वाला या नया वाला?
#Holi
#होली
रूस से भर मन सस्ता तेल भी ले लिया
मदर ऑफ़ ऑल डील करके नए मार्केट भी खोल लिए
भारत रूस चीन की तिकड़ी की झलक भी दिखा दी
दुनिया भर में भारत का रौला भी दिखा लिया
अब अमेरिका से डील भी कर ली
कॉम्पीटेटर्स में सबसे कम टैरिफ भी ले लिया
ऊपर से अब व��नेजुएला वाला सस्ता तेल लेंगे सो अलग
इसे कहते हैं फादर ऑफ़ ऑल डील जो भारत ने कर दिखाया 😃
@Viveksbarmeri पत्रकार जी प्रशासनिक हलकों में तो चाटुकारिता और चापलूसी नेतागिरी की लाइन से भी ज्यादा घर कर चुकी है.. राज्य स्तर से लेकर जिला और ब्लॉक स्तर तक सम्मान सिर्फ उन्हीं को मिलता है जो सरकार से ज्यादा अपने अफसरों की निजी नौकरी करते..असली हकदारों के नाम ���भी आगे नहीं आते
नितिन नबीन जी कायस्थ हैं - पश्चिम बंगाल में कायस्थ मतदाताओं का प्रभाव है, बंगाल में सर्वाधिक समय तक मुख्यमन्त्री रहे ज्योति बसु भी कायस्थ थे, मित्रा, बोस, घोष, दत्ता, पालित, नंदी, गुहा, चंद्रा, धर आदि सरनेम वाले बंगाली कायस्थ ही हैं।
मोदी जी ने सच ही कहा था, बिहार से गंगा बंगाल जाती है, अब ममता को नींद नहीं आएगी।
-गजब रणनीति बनाते हैं मोदी-शाह
-कोई कल्पना भी नहीं कर सकता।
मनरेगा से सिर्फ महात्मा गांधी का नाम नहीं हटाया गया है. इसके अलावा भी कई खतरनाक बात हुई है 👇
पहले इस स्कीम को केंद्र सरकार चलाती थी. मतलब 90% फंड केंद्र सरकार का था और 10% फंड राज्य सरकार का.
अब सिर्फ 60% फंड केंद्र का होगा और 40% फंड राज्य सरकार का होगा.
इसके अलावा पहले मनरेगा में रेबर की डिमांड के आधार पर फंड आता था, अब एक लिमिटेड फंड आएगा, ये फंड खत्म हुआ तो काम खत्म.
किस राज्य को कितना फंड मिलेगा, ये केंद्र सरकार तय करेगी. इसके पैरामिटर होंगे, लेकिन हम जानते हैं इस मामले में विपक्ष की सरकारों को क्या मिलेगा और किस आधार पर ये तय किया जाएगा.
मजदूरों को खेती किसानी के सीजन में दो महीने काम नहीं मिलेगा. रोजगार गारंट का ये एक्ट दो महीने तब रोजगार की कोई गारंटी नहीं देगा.
मतलब लेबर को उसके भाग्य के भरोसे छोड़ दिया गया. अब उन्हें काम देने वाला थोड़े से अनाज पर काम करवाए या किसी और तरह से शोषण करे, सरकार को फर्क नहीं पड़ता.
ऊपर से नए नाम की ब्रांडिंग के लिए करोड़ों खर्च होंगे, और प्रचार मोदी का होगा.
एक दशक पहले तक सरपंचों के पास भरपूर बजट आता था…
फिर सरपंच अपने सुविधानुसार…
टाँका, हॉल, टॉयलेट, आवास जैसी चीजें ग्रामीणों को देता था…
रक़म देते वक़्त 30% कमीशन काट कर बाक़ी ग्रामीण को दे दिया करते थे…
फिर सरकार ने निर्माण कार्य का बजट ग्रामीणों के खातों में भेजना शुरू किया…
तब सरपंचों ने नया तरीक़ा निकाला…
कार्य स्वीकृत करने के ग्रामीणों से एडवांस में पैसे ले लिए जाते…
1,00,000 का काम स्वीकृत करवाना है…तो 30,000 सरपंच साहब को चढ़ावा चढ़ाया जाए…
मतलब सरकार कुछ भी कोशिश कर लें…!!!
“आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है” की तर्ज़ पर भ्रष्टाचार नित नए रिकॉर्ड स्थापित करता जा रहा है…