दिल्ली में महिपालपुर, एयरपोर्ट के ठीक पास में है।
हालत देखो बच्चे जान से खेलकर स्कूल आ जा रहे हैं।
वीडियो बनाने वाली महिला कह रही हैं CM रेखा गुप्ता को वीडियो भेजूंगी।
@gupta_rekha बेचारी कैसे बताएं उनको सैकड़ों मोहल्ले से ऐसे ही वीडियो आ रही हैं।
सड़क साफ सफाई नाली की मांग करना कितना बड़ा अत्याचार है, जब ये मुद्दे उनको चुने जाने का आधार ही नहीं हैं।
छोटा बघाड़ा से शनिवार 22 अगस्त को शाम 4:15 बजे को आंचल मौर्या लापता हो जाती है जिसका प्रयागराज प्रशासन अभी तक सुराग तक नहीं लगा सकी ।
अपहरण कर्ता आँचल के फोन से ही बार बार लड़की के भाई विशाल मौर्य को मैसेज कर रहा , बावजूद उसके प्रशासन उसका पता नहीं लगा सकी ,
क्या हत्या हो जाएगी तब प्रशासन सक्रिय होगा ,
@Uppolice@igrangealld@prayagraj_pol@ADGZonPrayagraj@DM_PRAYAGRAJ
बहुत दुखद घटना
ना पुलिस का डर ना कानून का राज ,क्या यही है रामराज्य ?
कन्दैला हत्याकांड बेहद दुखद एवं चिंताजनक है। पूराकलंदर थाना क्षेत्र के कन्दैला गांव में राम लगन मौर्य जी की गोली मारकर हत्या कर दी गई सूबे में पिछड़े समाज पे अत्याचार बढ़ गई है पुलिस प्रशासन से मांग करते है की निष्पक्ष जाच करे और दोषियों को कठोर सजा मिले
उम्मीद करते दोषियों के घर को बुल्डोज़ किया जाएगा
@kpmaurya1@yadavakhilesh@palshyamLalsp
यूपीएससी इंटरव्यू पैनल बिल्कुल निष्पक्ष नहीं है।
ब्राह्मण जाति की अपाला मिश्रा मुख्य परीक्षा में 816 अंक लाती हैं,जबकि अनुसूचित जाति की रिया डाबी मुख्य परीक्षा में 859 अंक।
अनुसूचित जाति की रिया डाबी मुख्य परीक्षा में ब्राह्मण जाति की अपाला मिश्रा से 43 अंक अधिक लाती हैं।
इधर इंटरव्यू में ब्राह्मण जाति की अपाला मिश्रा को 215 अंक दिए जाते हैं,वहीं अनुसूचित जाति की रिया डाबी को 162 अंक दिये।
अनुसूचित जाति की रिया डाबी को इंटरव्यू में अपाला मिश्रा से 53 अंक कम दिए।
अगर अनुसूचित जाति की रिया डाबी को इंटरव्यू में 200 अंक भी दिए होते, तो रिया डाबी UPSC में AIR-1 प्राप्त करतीं।
यूपीएससी का इंटरव्यू पैनल अनुसूचित जाति के साथ भेदभाव करता है।
इसलिए मैं कहता हूँ कि सवर्णों की ईमानदारी से तो मेरिट बनती नहीं,बल्कि द्रोणाचार्यों के द्वारा बना दी जाती है।
आज दिनांक 25-08-2026 को जनपद गौतमबुद्ध नगर विधानसभा जेवर में बहुजन समाज पार्टी द्वारा आयोजित विशाल कार्यकर्ता सम्मेलन में आदरणीय बहनजी का संदेश लेकर पहुंचे बहुजन समाज पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक माननीय श्री आकाश आनंद जी का संबोधन साथ ही श्री सतवीर नागर जी को जेवर विधानसभा में बसपा का प्रभारी/प्रत्याशी घोषित करते हुए।
"इस बार वोट हाथी को
अपने पुराने साथी को"
#बहनजी_का_संदेश
#युवाओ_की_आस_आकाश
#जयभीम #मिशन_2027
#नोएडा #lucknow #BSP
मैं दो दशक से लिख/व्यख्यान दे रहा हूँ की "आरक्षण गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं है";यह प्रतिनिधित्व है जो हज़ारों सालों की सामाजिक, सांस्कृतिक,राजनैतिक,धार्मिक,शिक्षा,संसाधन आदि की वंचना की छतिपूर्ति है जिसे जाति व्यवस्था के आधार पर थोपा गया था।अत:आरक्षण आर्थिक आधार पर नहीं हो सकता
जातिवादियों का गिरोह गुप्त चर्चा कर रहा है आरक्षण हटाना है मगर अभी सिर्फ सुधार की बात करेंगे।
उसमें भी एक टकला बाबा कह रहा है-सिर्फ रिफॉर्म की बात करेंगे मगर ये भी मायावती को पसंद नहीं आ रहा है।
15 साल हो गए सरकार गए हुए, खौफ़ फिर भी नहीं निकल पा रहा है🔥
महाराष्ट्र में वर्गीकरण समर्थक अपना प्रतिशत काहे नही देखते
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बिहार में;
चमार जाति = 5.25%
बाल्मीकि/मेहतर = 00.24%
दुसाध = 5.32%
धोबी = 00.84%
पासी = 1%
कुल पद = 2035
चमार = 111 (5.4% अथार्त प्रतिशत 5.25% के आसपास)
दुसाध = 88 (4.34% अथार्त अपने प्रतिशत 5.31% से कम)
धोबी = 59 (2.92%अथार्त अपने प्रतिशत 0.84% से ज्यादा)
पासी = 49 (2.42% अथार्त अपने प्रतिशत 1% से ज्यादा)
लेकिन इन मोहतर्मा अपने ब्राह्मण ठाकुर व अन्य मित्रो के साथ मिलकर ऐसा माहौल बनाने की सोच रही है जैसे चमार को कई गुणा ज्यादा मिल गया।।जबकि;
"दुसाध को नुकसान हुआ। लेकिन वर्गीकरण का सबसे ज्यादा विरोध बिहार में दुसाध ही करते है क्योंकि रामविलास पासवान जी जानते थे कि जब तक एकता है तब तक पूछा जा रहा है"
इसलिए मुझे धोबी व पासी के द्वारा अपने प्रतिशत से 3 गुणा ज्यादा शीट लेने पर आपत्ति नही है। अच्छी बात है कि वो पढ़कर मौका ले रहे है।।
प्रश्न : यह है कि ऐसा मौका बाल्मीकि व अन्य क्यो नही भुना रहे।
उत्तर : जैसे यह मोहतर्मा बाल्मीकि से आह्वान करने की पढ़ाई करो, और धोबी व पासी की तरह अपने प्रतिशत से कई गुणा ले लो कि जगह "चमार हाय हाय" में व्यस्त है।
यह मोहतर्मा इसकी जगह कह सकती थी कि;
"बाल्मीकि मात्र दशमलव 2 प्रतिशत (0.2%) होने के बाद भी उनके पास अवसर है कि वो पढ़कर 16% आरक्षण पर हक जमा सकते है।।अब अगर बाल्मीकि की लिए वर्गीकरण भी कर दिया जाए तो 0.2% पर कितना मिलेगा?
"
ऐसी ही मूर्खता महाराष्ट्र में हो रही है।।
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1.मातंग मात्र 2% है।
2.चमार कि उससे सम्बंधित जातिया भी 2% के आसपास है।
3.महार 8% है।
अब मातंग व चमार महाराष्ट्र में 2%-2% में क्या कर लेंगे? जबकिं वो 14% पर बिहार में पासी व धोबी की तरह शिक्षित होकर अपना हक जमा सकते है।
वर्गीकरण के नाम पर एक तरह से बाल्मीकि का कंधा इस्तेमाल करके जो जातिया हमेशा आरक्षण ही नही बल्कि एससी/एसटी के खिलाफ रही है वो मुख्यतया सवर्ण जातिया अपना हित साधना चाहते है। उन्हें आर्टिकल 30 के अल्पसंख्यक आरक्षण जो कि एससी/एसटी से बेहतर है से आपत्ति नही है लेकिन एक नफरत, चिढ़, जो एससी/एसटी के प्रति डीएनए में पूर्वजो से मिली है, उंसके आधार पर नए नए प्रयोग करते रहते है।
अब इस मोहतर्मा से जाटव हाय हाय करवाते रहते है। जबकि इस मोहतर्मा को समझना चाहिए कि इन लोगो को तुम्हारे व्यक्तिगत मैटर से कुछ लेना देना नही है, न ही कोई sympathy है। वो तो एससी/एसटी के ही बिल्कुल खिलाफ है।।
विकास कुमार जाटव
साथियों मुझे बताते हुए अतयंत हर्ष हो रहा है की मेरी किताब का दक्षिण एशिया संस्करण प्रकाशित हो गया है। यह भारत, नेपाल, बंदलादेश, श्रीलंका एवं भूटान में सस्ते दाम पर मिलेगी। अभी अमेज़ॉन पर लन्दन/अमरीकी संस्करण रूपए 22000/-का बिक रही है. अब यह 1100/- में भारत में बिकेगी।
दिल्ली में हो रहे “आरक्षण विरोधी” प्रदर्शन तथाकथित उच्च जातियों की अपनी वर्चस्व बचाने की एक नग्न कोशिश को बेनकाब करता है।
SCs, STs तथा OBCs के सामाजिक न्याय के खिलाफ अपने वर्चस्व को बचाए रखने और सामाजिक जाति प्रथा की रक्षा करने के लिए उन्होंने बेशर्मी से “ऊंची जाति” की अपनी पहचान को सबसे आगे रखा।
कल का यह तमाशा ठीक उसी “राष्ट्र-विरोधी” खतरे को सामने लाता है, जिसके बारे में डॉ. बी. आर. आंबेडकर ने 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा में अपने समापन भाषण में चेतावनी दी थी।
बाबासाहेब ने कहा था कि जातियां स्वाभाविक रूप से राष्ट्र-विरोधी होती हैं क्योंकि वे सामाजिक जीवन को खंडित करती हैं, अलगाव को संस्थागत रूप देती हैं, और समुदायों के बीच ईर्ष्या तथा द्वेष के एक निरंतर चक्र को जन्म देती हैं।
कल, जब लोग खुले तौर पर गर्व के साथ “सवर्ण” पहचान और राजनीतिक नारों के तहत मार्च कर रहे थे, तब वे सक्रिय रूप से उसी राष्ट्र-विरोधी विभाजन को व्यवहार में ला रहे थे!
उन्होंने उस जाति व्यवस्था की रक्षा के लिए अपने सवर्ण अभिमान और वर्चस्व का हथियार की तरह इस्तेमाल किया जो सच्ची बंधुत्व की भावना को असंभव बना देती है।
“...यदि हम वास्तव में एक राष्ट्र बनना चाहते हैं। क्योंकि बंधुत्व तभी एक तथ्य हो सकता है जब एक राष्ट्र हो। बंधुत्व के बिना समानता और स्वतंत्रता केवल रंग की पुताई से अधिक कुछ नहीं होगी।”
बाबासाहेब के लिए राष्ट्र का निर्माण केवल राजनीतिक या संवैधानिक स्तर पर नहीं, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी होना आवश्यक था। और इसके लिए बंधुत्व अनिवार्य था। यहीं उनकी बंधुत्व को लेकर कही गई बात बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। बंधुत्व के बिना समानता टिक नहीं सकती।
कोई भी समाज बंधुत्व प्राप्त करने का दावा तब तक नहीं कर सकता जब अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़ा वर्गों के लिए सामाजिक न्याय की नीति के खिलाफ तथाकथित उच्च जातियां अपने जातिगत विशेषाधिकार का इस्तेमाल विरोध के रूप में करती हैं।
सच्चा लोकतंत्र तब ढह जाता है, जब वंचित और शोषित समुदायों की उन्नति को तथाकथित उच्च जातियों के वर्चस्व पर सीधे हमले के रूप में देखा जाने लगता है।
बंधुत्व जब तक एक जीवंत सामाजिक वास्तविकता नहीं बनता, तब तक समानता और स्वतंत्रता केवल एक सतही “रंग की पुताई” हैं, जो सामाजिक न्याय की पहली चुनौती के सामने ही उखड़ने लगती हैं।
मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह प्रदर्शन आरएसएस-भाजपा द्वारा राजनीतिक रूप से संगठित किया था। लेकिन कांग्रेस नेतृत्व की चुप्पी उतनी ही निंदनीय है। जब सामाजिक न्याय के खिलाफ सवर्ण गर्व को इतनी खुलेआम इस्तेमाल किया जाता है, तो चुप्पी का अर्थ मिलीभगत होता है!
जय भीम। जय संविधान। जय भारत।
"पानी नही मूत्र पिलायेंगे" इस प्रकार के नारे आरक्षण हटाने के नाम पर लग रहे। मुद्दा "आरक्षण हटाना नही" बल्कि देश की 27% जनसँख्या अथार्त "एससी/एसटी" के प्रति पूर्वजो से डीएनए से मिली नफरत है।
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आज Pay back to Society कार्यक्रम में सब्सक्रिप्शन से तीन की मदद करी। जो वाकई काफी परेशान थे, काफी समय से आग्रह कर रहे थे। । जिन मित्रो ने मुझे सब्स्क्राइब किया है उनका Pay back to Society में योगदान देने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया। काफी जरूरतमंद बार बार आग्रह करते रह्ते है, उनमे मेरे आग्रह पर मित्र मदद कर देते है लेकिन काफी ज्यादा छूट जाते है। उनसे माफी चाहते है क्योंकि 90% से ऊपर समाज उदासीन है।
अब आरक्षण पर आ जाते है।
तीन दिनों से आरक्षण हटाओ के नाम पर जो ड्रामेबाजी चल रही है, उसमे;
1.किसी से बहस न करे। क्योंकि यह अब स्थाई है। इसके अलावा आरक्षण हटाने की मांग करने उनका लोकतांत्रिक अधिकार है। उन्हें अपने इस लोकतांत्रिक अधिकार का यूज करने दे। बल्कि उन्हें जंतर मंतर से हटा देना गलत है। उन्हें करने देना चाहिए था।
2.हालाँकि जो इस बहाने एससी/एसटी को अपशब्द कहे उंसके खिलाफ एफआईआर दर्ज जरूर करवाए।
3.यह जो आरक्षण हटाने के नाम पर आंदोलन चल रहे है उंसकी स्वयं ज्यादा चर्चा न करे। क्योंकि जो विषय हट नही सकता है, उसपर काहे अपनी एनर्जी गलत लोगो से विवाद में बेकार करे।
4.लेकिन यह ध्यान रखे कि कट्टर हिन्दू , सनातन के नाम पर जो प्रदर्शन कर रहे है जो हिन्दू धर्म का ठेकेदार मानते है, वो ही बार बार एससी को "5000 साल से पानी नही मिला" के नाम पर चिढ़ा रहे है।
आरक्षण हटाने का मुद्दा केवल एससी एसटी से नह जुड़ा है। ओबीसी को भी मिलता है और सबसे बड़ी बात अल्पसंख्यक वर्गों (मुस्लिम, जैन, सिख) को आर्टिकल 30 का सबसे बेहतरीन दुनिया का आरक्षण मिलता है। यह फ्रिंज एलिमेंट्स कभी आर्टिकल 30 में मिल रहे आरक्षण का विरोध नही करते है। कभी जैन या मुस्लिम को इस आधार पर टारगेट नही करते है। उनका टारगेट केवल और केवळ एससी/ एसटी है क्योंकि;
"इन वर्गों के प्रति उनके पूर्वजो से नफरत डीएनए से ट्रांसफर हुई है"
इसलिए केवल मुद्द्या "आरक्षण" का नही बल्कि एक नफरत का है। नफरत जिसमे अल्पसंख्यक मुस्लिम, जैन, सिख को भाई मानते है लेकिन एससी/एसटी को खत्म करने की मंशा रखते है।
5.प्रश्न यह है कि;
"दगड़ू समाज के प्रतिशत के आधार पर मिले प्रतिनिधित्व अथार्त नौकरी के बाद उन्ही के चरणों मे पहली सैलरी, चढ़ावा उल्टा लेटरकर चढ़ाकर आता है जो उसे "5000 सालों से प्यासा" कहकर चिढ़ाते है, व इस चढ़ावे के एक हिस्से को आरक्षण खत्म करो अभियान में चन्दा देकर आते है"
इसमे असली गुनहगार "दगड़ू टाइप" के एससी/एसटी सरकारी कर्मचारी है।
विकास कुमार जाटव
वैसे भी सरकार इतने सारे अधिकारियों कर्मचारियों को नौकरी पर ना रख कर अरबों रुपए बचा रही है जिससे सरकार को अपना प्रचार प्रसार करने के लिए पैसे की कमी महसूस नहीं होती जिसका फायदा चुनाव में मिल जाता है,बाकी इस कार्य के लिए ठेके पर आसानी से मजदूर मिल जाते हैं।
बीते एक दशक में केंद्र सरकार के खाली पद करीब दोगुने हो गए। 2015 में 4.21 लाख पद खाली थे, जो 2024 में बढ़कर 8.24 लाख हो गए। कुल मंजूर पदों में रिक्तियों की हिस्सेदारी 11.5% से बढ़कर 21% हो गई। इस अवधि में केंद्र के विभिन्न विभागों में पदों की कुल मंजूर संख्या में 2.74 लाख का इजाफा हुआ। फिर भी भरे हुए पद 1.29 लाख घट गए।
सरकारी कंपनियों में करीब आधे कर्मचारी ठेके पर हैं। 2015 में ये आंकड़ा 18.6% था, जो 2025 में 49.1% हो गया। 2015 में रेलवे में कोई पद खाली नहीं था। 2024 में 2.40 लाख पद (16.2%) खाली हैं। हेल्थ में भी वेकेंसी की शून्य से 6% पहुंच गई।
बीते एक दशक में केंद्र सरकार के खाली पद करीब दोगुने हो गए। 2015 में 4.21 लाख पद खाली थे, जो 2024 में बढ़कर 8.24 लाख हो गए। कुल मंजूर पदों में रिक्तियों की हिस्सेदारी 11.5% से बढ़कर 21% हो गई। इस अवधि में केंद्र के विभिन्न विभागों में पदों की कुल मंजूर संख्या में 2.74 लाख का इजाफा हुआ। फिर भी भरे हुए पद 1.29 लाख घट गए।
सरकारी कंपनियों में करीब आधे कर्मचारी ठेके पर हैं। 2015 में ये आंकड़ा 18.6% था, जो 2025 में 49.1% हो गया। 2015 में रेलवे में कोई पद खाली नहीं था। 2024 में 2.40 लाख पद (16.2%) खाली हैं। हेल्थ में भी वेकेंसी की शून्य से 6% पहुंच गई।
@Kamlesh41855513 कालेजियम का कमाल
यहां कोई आरक्षण नहीं है
क्योंकि
यहां मेरिट नहीं,जाति देखकर सेलेक्सन होता है
यहां कोई परीक्षा नहीं होती,बस जाति ही काफी है।
यह एक ऐसी संस्था है जिसके एक आदेश से देश की पूरी व्यवस्था हिल जाती है।
ये देश का दुर्भाग्य है कि इतनी बड़ी संस्था में एक जाति का वर्चस्व है
भाजपा व कांग्रेस की केन्द्र और राज्यों में रही सरकारों ने हमेशा से उन्हीं जातियों के लोगों को बढ़ावा दिया है जो पहले से ही काफी सम्पन्न व अमीर रहे हैं सबका साथ सबका विकास का ढींढोरा पीटने वाली पार्टी का यही चाल चरित्र है।
दलितों के प्रति छूआछूत की मानसिकता आज भी इनके दिमाग में है
भाजपा स्वर्णों की पार्टी हैं दलितों-पिछड़ों कि नहीं। भाजपा और उसके समर्थित दलों की 22 राज्यों में सरकार हैं।
लेकिन इन 22 राज्यों में एक भी CM दलित नहीं है जबकि देश में दलितों की आबादी 22% हैं। भाजपा के पास 22 राज्यों में 22% दलितों के लिए एक मुख्यमंत्री का पद नहीं हैं।
सम्राट चौधरी,नयाब सिंह सैनी,मोहन यादव, भूपेंद्र पटेल OBC मुख्यमंत्री हैं जबकि ओबीसी की आबादी देश में सबसे ज्यादा है 52% लेकिन हिस्सेदारी केवल 18%
3 आदिवासी मुख्यमंत्री हैं।
जबकि स्वर्णों को भाजपा ने भर भर के मुख्यमंत्री बनाया हैं। भाजपा और समर्थित दलों ने 15 स्वर्णों को मुख्यमंत्री बनाया जिनकी आबादी 15% नहीं हैं। लेकिन उनको 68% हिस्सेदारी दी हैं।
भाजपा दलितों पिछड़ों की रोटी छीन कर स्वर्णों को खिला रही है