I hate politics. विचरण मन का आचरण तन का,कल हों न हों.श्रीकृष्ण का दीवाना भावनाओं का पथिक-
पहाड़ी! यादों के गलियारे से!!रमता जोगी!मीडिया में झांकें! रिपोस्ट!
बह चली बयार
लुट न जाये सिंगार
उड़ा न ले कहीं
बेताब वो तैयार
बांध लो आंचल
कहीं छूट न जाये
शीशे की दीवार
चलना हुआ दुश्वार
संभलना जरा
गिरे हो हर बार
थाम लो जिगर
कहीं टूट न जाय
हर गली में तैयार
बैठे हैं चितचोर
बिखरे हैं इधर
तार-तार बेजार
बेदर्द जमाना है यह
कहीं लूट न जाय...
रुबाई -
तेरी. ख़ुशबू मेरी. साँसों में.. उतर जाती है,
मेरी.. हर रात तेरे.. नाम से.. भर जाती है,
मैं.. तुझे सोचता. रहता हूँ दुआ की सूरत,
और दुनिया मेरे क़दमों से गुज़र जाती है।
#अशोक_मसरूफ़
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किताबों की दुकान और तुम-
एक छोटी-सी किताबों की दुकान,
लकड़ी की अलमारियाँ,
और पन्नों की
पुरानी-सी महक।
तुम हर क़िताब को
ऐसे पलट रहे थे,
जैसे शब्दों से नहीं,
यादों से मिल रहे हो।
मैंने कई शीर्षक देखे,
कई लेखक देखे,
मग़र उस दिन
सबसे दिलचस्प कहानी
तुम थे।
दुकान से निकलते वक़्त
एक बात समझ आई,
कुछ लोग क़िताब नहीं लिखते,
ख़ुद एक क़िताब होते हैं।
शेर-
हज़ारों लफ़्ज़ थे चारों सिम्त सजे हुए जो तेरे
मग़र तेरी ख़ामोशी सबसे बड़ी क़िताब लगी।
#अशोक_मसरूफ़
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जब
पवन मंद-मंद मुस्काए
झरनों से झर-झर संगीत बहे
गगन में काले बादल छाएं
रिमझिम बूंदों की रागिनी पर
मयूर भी मस्त हो नाच दिखाएं
तो... मैं प्रीत लिखूं।
जब
धरती सुनहरी धूप नहाए
खेतों में फसलें लहलहाएं
अंबर से शीतल चांद चांदनी बरसाए
रात की नीरव खामोशी में
मन उमंगों के दीप जलाए
तो...
रुबाई --
तेरे.. रुख़सार की.. रंगत से सहर जागती है,
तेरी.. आवाज़.. से वीरान.. डगर. जागती है,
मेरी धड़कन को इजाज़त ही नहीं तेरे बग़ैर,
तेरे.. आने से.. मेरी पूरी.. उमर. जागती है।
#अशोक_मसरूफ़
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