केंद्रीय बजट में शिक्षा की हिस्सेदारी -
2013-14 - 4.6%
2025-26 - 2.5%
दलालीशाला में गोदी मीडिया आपको बताएगा कि शिक्षा का बजट बढ़ता जा रहा है।
आपके पास दो विकल्प हैं - या तो अक्ल के अंधे बन जाओ, या फिर खुद से विश्वसनीय तथ्य खोजो।
राजस्थान के 'करोड़पति फकीर': कभी फीस, किताबों और रहने-खाने के पैसे तक नहीं थे, लोगों की मदद और स्कॉलरशिप से पढ़ाई पूरी की; 12 करोड़ रुपए बेटियों की पढ़ाई पर दान कर दिए, पढ़िए… झुंझुनूं के करोड़पति फकीर की पूरी कहानी
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कांग्रेस एक राजनीतिक दल है या पार्टी छोड़कर जाने वाले अनुशासनहीन नेताओं का पुनर्प्रतिष्ठा-बहाली क्लिनिक
पूर्व मंत्री महेंद्रजीत सिंह मालवीय 2023 में कांग्रेस से बागीदौरा विधायक बने। लेकिन कांग्रेस की सरकार चली गई तो यह कहते हुए वे भाजपा में चले गए, “मैं छात्र जीवन से ही अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ा रहा हूं… एक बार फिर अपने घर वापस लौटा हूं।”
लोग हैरान थे कि कुछ ही दिन पहले जिसे सीडब्लूसी का मेंबर बनाया था, वह नेता अब क्या बोल रहा है। कुछ नेता तो यह कहने लगे कि अब समझ आया, कांग्रेस की तरफ से वागड़ में भाजपा के खि़लाफ़ कमज़ोर उम्मीदवार क्यों खड़े किए जा रहे थे। यह संदेश देने कि इस नेता के अलावा और कोई जीत ही नहीं सकता।
सवाल ये है कि चालीस वर्षों तक कांग्रेस ने मालवीय को क्या नहीं दिया? वे सरपंच और प्रधान रहे। सांसद बने। चार बार विधायक चुने गए।कई विभागों के मंत्री और बाद में कैबिनेट मंत्री रहे। उनके पास ग्रामीण विकास, पंचायती राज, जनजातीय क्षेत्र विकास, तकनीकी शिक्षा और जल संसाधन जैसे प्रभावशाली विभाग रहे। उनकी पत्नी रेशम मालवीय भी तीन बार बांसवाड़ा की जिला प्रमुख रहीं। और भी बहुत से परिजन प्रमुख पदों पर रहे। पार्टी उन्हें राज्य की सीमाओं से उठाकर राष्ट्रीय नेतृत्व की पहली पंक्ति तक ले गई। वागड़ का ऐसा कौनसा पद है, जिनमें से 50 प्रतिशत पर मालवीय परिवार के लोग नहीं रहे?
कांग्रेस जैसे लोकतांत्रिक दल का विवादों में रहे एक आदिवासी युवा को अचानक इतना लंबा अवसर देना अपने-आप में सामान्य नहीं था। उनकी राजनीतिक शुरुआत के कुछ किस्से वागड़ में बहुत चर्चित हैं।
वागड़ में वर्षों तक टिकटों, पंचायती राज संस्थाओं, संगठनात्मक पदों और स्थानीय सत्ता-संरचना पर मालवीय का प्रभाव इतना व्यापक रहा कि कांग्रेस का क्षेत्रीय संगठन वहाँ पार्टी कम और एक राजनीतिक रियासत अधिक दिखाई देने लगा, जिसके सामंत और ठिकानेदार मालवीय थे। कार्यकर्ता पार्टी के नहीं, किसी क्षत्रप के अनुयायी बना दिए गए; संगठन की सीढ़ियां योग्यता से कम और निकटता से अधिक तय होने लगीं।
एक पूरे क्षेत्र की राजनीति जब किसी एक व्यक्ति और उसके परिवार के आसपास केंद्रित कर दी जाती है, तब नेता शक्तिशाली अवश्य हो जाता है, लेकिन पार्टी भीतर से खोखली होने लगती है। यह चाहे वागड़ का मामला हो या पूरे राजस्थान का। नेता निकल जाए तो संगठन भी उसके पीछे बहने लगता है। न भी निकले तो नेता अपनी मनमानी करता है। कांग्रेस ने वागड़ में यही भूल की।
भाजपा ने जिस प्रभाव को लेकर मालवीय को स्वीकार किया था, मतदाताओं ने उसका निर्मम परीक्षण कर दिया। भारत आदिवासी पार्टी के राजकुमार रोत ने मालवीय को 2.47 लाख मतों से हराया और धरातल का सच बयां कर दिया। वे अपने साथ क्षेत्रीय प्रभाव का जो विराट दावा लेकर गए थे, उसकी भी चुनाव में सार्वजनिक परीक्षा हो गई और पता चल गया कि वागड़ में मालवीय कांग्रेस के कारण ही नायक बने हुए थे, कांग्रेस मालवीय के कारण नहीं थी। लेकिन अब एक बार फिर कांग्रेस के कुछ नेता वागड़ की कांग्रेस को मालवीय के हवाले करके भूल करना चाहते हैं।
कांग्रेस में इस नेता की प्रतिष्ठा और ठसके की स्थिति यह थी कि सोनिया गांधी, डॉ. मनमोहन सिंह या राहुल गांधी सहित कोई नेता किसी कार्यक्रम में आता तो मालवीय मेवाड़-वागड़ के प्रतिनिधि चेहरे के रूप में अग्रिम पंक्ति में राष्ट्रीय नेताओं के एक कुर्सी छोड़कर या तो दाएं दिखते या बाएं। लेकिन भाजपा तो भाजपा है। वह नेताओं को उनकी औकात में रखती है। भाजपा में प्रवेश के बाद मालवीय की हालत यह हाे गई कि प्रदेश अध्यक्ष सीपी जोशी या मदन राठौड़ भी जाते तो उन्हें आखिरी पंक्ति में जगह मिलती। कांग्रेस का सर्वेसर्वा रहा नेता भाजपा में गेट से अनुमति के लिए इंतज़ार करता था।
ये हैरानी है कि कांग्रेस ने भी उन्हें वापस ऐसे ले लिया, मानो कुछ हुआ ही नहीं था। कोई यह पूछने वाला नहीं कि जब पार्टी को आपकी सर्वाधिक आवश्यकता थी, तभी आपने उसका हाथ क्यों छोड़ा? लोकसभा में कांग्रेस ने 11 सीटें जीतीं। मालवीय साथ होते तो ये 13 या ज्यादा भी हो सकती थीं। इस लिहाज से यह नुकसान खड़गे, राहुल और डोटासरा का बड़ा नुकसान था।
लेकिन यह घुटन-वुटन सब बनावटी बातें हैं। मालवीय के मामले में सबसे अधिक विचारणीय है उनकी वापसी का समय। राजस्थान में पंचायती राज और नगर निकाय चुनाव निकट हैं। भाजपा में रहते हुए वागड़ में प्रधान, जिला प्रमुख, पंचायत समिति और जिला परिषद के टिकटों पर फिर से निर्णायक नियंत्रण प्राप्त करना संभव नहीं था; क्योंकि जो सूनेड़ कांग्रेस में है, उसकी तो भाजपा में कल्पना भी नहीं की जा सकती।
इसलिए सवाल है कि क्या कठिन समय में पार्टी के साथ टिके रहे आदिवासी कार्यकर्ता अब एक बार फिर पीछे कर दिए जाएंगे? क्या जिन लोगों ने मालवीय के भाजपा में रहते हुए कांग्रेस का झंडा उठाए रखा, उन्हें अब उन्हीं की वापसी पर अपनी जगह खाली करनी पड़ेगी? क्या पंचायत और जिला परिषद के टिकट फिर मालवीय के राजनीतिक परिवार और निजी नेटवर्क के अनुसार तय होंगे?
कांग्रेस की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं है कि उसके नेता पार्टी छोड़कर चले जाते हैं। उसकी त्रासदी यह है कि किसी बड़े नेता के जाते ही वह दूसरा नेतृत्व खड़ा करने के बजाय वह उसी अनुपस्थित सामंत की हवेली की चौकीदारी करती रहती है। जिस व्यक्ति ने स्वयं घोषित किया कि भाजपा उसका घर है, कांग्रेस को उससे कहना चाहिए था—आप अपने चुने हुए घर में सम्मानपूर्वक रहिए। वागड़ में कांग्रेस अब उन लोगों को आगे बढ़ाएगी, जिन्होंने विपत्ति में उसका साथ नहीं छोड़ा। यही संगठनात्मक न्याय होता। यही नए नेतृत्व को जन्म देता। इससे पार्टी के कार्यकर्ता को संदेश मिलता कि निष्ठा का मूल्य है और दलबदल की कीमत होती है।
लेकिन कांग्रेस में अक्सर इसका ठीक उलटा होता है। जो कार्यकर्ता पांच वर्ष धूप में झंडा उठाता है, उसे टिकट वितरण के समय बरामदे में खड़ा रखा जाता है; और जो नेता चुनाव से पहले पार्टी का जहाज छोड़ देता है, लौटते ही उसके लिए बैठक की अगली कुर्सी साफ़ कर दी जाती है।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने मालवीय को सार्वजनिक रूप से जिस व्यक्तिवाद के लिए फटकारा, वह भी पहली ही बार एक अलग तरह का सही ट्रीटमेंट था। यह मालवीय को उनकी हैसियत का एहसास करवाना तो था ही, उन नेताओं को भी संदेश था कि पीसीसी के नेतृत्व को किसी का गुड्डा न समझा जाए, जिन्हें मालवीय अपना प्रभु बनाकर अब तक कांग्रेस में मनमानी करते रहे थे। सचिन पायलट के बाद संभवत: यह पहली बार था, जब कांग्रेस के मंच से इस तरह की भाषा किसी नेता ने बोली। यह भाषा कांग्रेस की सामान्य मखमली राजनीति की तुलना में निस्संदेह अधिक स्पष्ट थी। डोटासरा का ताजा कथन सीपी जोशी के उस कोलेबोरेटर वाली शब्दावली से अधिक शक्तिशाली; लेकिन एहसास कराने वाली फटकार अधिक था। लेकिन मालवीय के संदर्भ में डोटासरा वाला उपचार अभी भी पर्याप्त नहीं था। उन्होंने 500 एमजी की खुराक के बजाय अभी फाइव एमजी की टेबलेट ही दी।
इतिहास का व्यंग्य देखिए। 2005 में जब गोविंद सिंह डोटासरा लक्ष्मणगढ़ पंचायत समिति के प्रधान बने और 2008 में पहली बार विधायक निर्वाचित हुए, तब तक मालवीय सांसद रह चुके थे और राजस्थान की राजनीति में कहीं अधिक ऊंची सीढ़ियां चढ़ चुके थे। बाद के वर्षों में डोटासरा राज्य मंत्री बने, जबकि मालवीय कई प्रभावशाली विभागों के मंत्री और कैबिनेट मंत्री रह चुके थे। अंततः समय का पहिया ऐसा घूमा कि कभी कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यसमिति में बैठे मालवीय को उसी डोटासरा के पीछे खड़े होकर अपनी राजनीतिक भूल सुननी पड़ी।
कांग्रेस को यह तय करना होगा कि वह विचार, निष्ठा और संघर्ष से संचालित राजनीतिक संगठन है या चुनावों से पहले खुलने वाला पुनर्वास केंद्र। जो लोग सत्ता की दिशा देखकर अपने घर का पता बदलते हैं, उनके लिए वापसी का द्वार बंद करना आवश्यक नहीं; लेकिन वापसी का अर्थ यह भी नहीं हो सकता कि उन्हें फिर वही चाबियां सौंप दी जाएं, जिनसे उन्होंने कभी पार्टी का दरवाजा बाहर से बंद किया था। कांग्रेस के पुनरुद्धार का पहला नियम बहुत सरल है—लौटकर आने वालों को सदस्यता दीजिए, किंतु संकट में टिके रहने वालों का अधिकार मत छीनिए। क्योंकि जिस पार्टी में दलबदल लाभदायक और निष्ठा घाटे का सौदा बन जाए, वहां कार्यकर्ता अंततः संघर्ष नहीं करते। वे या तो घर बैठ जाते हैं या कोई नया घर खोज लेते हैं।
आज लोकसभा में अतारांकित प्रश्न के अंतर्गत राजमार्गों पर 40/75 मीटर को लेकर स्थिति स्पष्ट करने के सम्बन्ध में भारत सरकार से जवाब मांगा, जिसके प्रत्युत्तर में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय द्वारा बताया गया है कि इस विषय का अधिकार क्षेत्र राज्य सरकार के अंतर्गत आता है। 40/75 मीटर कंट्रोल लाइन के संबंध में केन्द्रीय मंत्रालय द्वारा कोई अधिसूचना जारी नहीं की गई है। मंत्रालय ने यह भी बताया कि यह विषय फलोदी दुर्घटना प्रकरण में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिनांक 13 अप्रैल, 2026 को दिए गए निर्देशों से संबंधित है। साथ ही मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि भवन रेखा (Building Line) एवं कंट्रोल लाइन का विनियमन, अधिसूचना जारी करना तथा उसका क्रियान्वयन संबंधित राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है। अतः राजस्थान में इन प्रावधानों का क्रियान्वयन एवं अनुपालना राजस्थान सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है।
भारत सरकार के इस स्पष्टीकरण से अब यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया है कि इन निर्देशों के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी किसकी है। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद से राजस्थान के हजारों नागरिक, व्यापारी, किसान एवं संपत्ति मालिक अपने घरों, व्यवसायों एवं आजीविका को लेकर असमंजस और चिंता की स्थिति में हैं।
यद्यपि सड़क सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है, लेकिन इसके साथ-साथ आम नागरिकों की वास्तविक चिंताओं के प्रति भी उतनी ही संवेदनशीलता आवश्यक है। अत: राजस्थान सरकार इस विषय पर क्रियान्वयन की प्रक्रिया तथा प्रभावित परिवारों व व्यवसायों के हितों की सुरक्षा के लिए किए जाने वाले उपायों के संबंध में तत्काल सार्वजनिक स्पष्टीकरण जारी करे, ताकि आमजन तक सही व स्पष्ट सूचना पहुंचे। सही स्पष्टीकरण से भ्रम की स्थिति दूर होगी, भ्रामक सूचनाओं पर रोक लगेगी तथा आमजन का विश्वास मजबूत होगा। राजस्थान की जनता को अब और अधिक अनिश्चितता की स्थिति में नहीं रखा जाना चाहिए। प्रदेश की जनता को स्पष्ट नीति, पारदर्शी दिशा-निर्देश तथा यह भरोसा मिलना चाहिए कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का पालन करते समय आमजन की पुश्तैनी जमीन और उस पर स्थापित आवास व अन्य व्यावसायिक गतिविधियों तथा आजीविका सम्बन्धि समस्याओं की पूरी सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी।
#MeraChuruLokSabhaParivar
हम हमारा हक मांगते
नहीं किसी से भीख मांगते
- ये नारे राजस्थान के बाड़मेर में गूंजे, जहां छात्र स्कूल के सामने धरने पर बैठे हैं।
ये पहला मामला नहीं है, यूपी और बिहार में भी स्कूली छात्र शिक्षकों की कमी और सुविधाओं को लेकर आवाज बुलंद कर रहे हैं।
पिछले 10 साल में 94,000 सरकारी स्कूल बंद हो चुके हैं। स्कूल में शिक्षकों और बुनियादी सुविधाओं की कमी से पूरा सिस्टम बर्बाद है।
BJP सरकार ने देश की शिक्षा व्यवस्था को तबाह कर दिया है। ऐसे में सवाल है- जब पढ़ेगा ही नहीं इंडिया, तो आगे कैसे बढ़ेगा इंडिया?
सरकार को सबसे पहले यह समझना होगा कि शिक्षा की संरचना और उसकी आत्मा को लेकर उसकी समझ बेहद सीमित है। वह आज भी यह नहीं समझ पाई है कि आखिर क्यों हजारों युवा अपने कक्षाओं और परिसरों से निकलकर सड़कों पर उतर आए। उनका प्रतिरोध कोई फैशन, सोशल मीडिया का चलन या क्षणिक उत्तेजना नहीं था; वह गहरी बेचैनी, नैतिक प्रतिबद्धता और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की आकांक्षा की अभिव्यक्ति था।
हताशा में सरकार को जेन-ज़ी की भाषा की नकल करने की भूल नहीं करनी चाहिए। उनकी शब्दावली उधार लेने से पहले उनकी आकांक्षाओं, आशंकाओं और न्याय-बोध को समझना आवश्यक है। राजनीतिक संप्रेषण, राजनीतिक समझ का विकल्प नहीं हो सकता। प्रश्न यह नहीं है कि सरकार जेन-ज़ी की तरह बोल सकती है या नहीं; प्रश्न यह है कि क्या वह इस पीढ़ी की बात सुनने और उसे समझने का साहस रखती है।
RS | Manoj Kumar Jha | The Public Examinations (Prevention of Unfair Mea... https://t.co/AARWj9WL9Q via @YouTube
क्या आप लोगों ने कभी विचार किया है कि हमारे आपके द्वारा अपने बैंक खातों में बैलेंस में देखना करने से बिगाड़ 4 वर्षों में बैंकों को कितना लाभ हुआ है??
एक आंकड़े के अनुसार सभी बैंकों ने मिलकर पिछले चार वर्षो में करीब 26100 करोड़ रुपए मिनिमम बैलेंस नॉट मेंटेंड के नाम पर वसूल किए हैं!
🚨 UP में नकली दवाओं के सिंडिकेट पर बड़ा एक्शन
🔹फर्जी बिलिंग, क्रॉस-बिलिंग और फेक बैंक ट्रांजैक्शन के जरिए नकली दवाएं बेचने वाले गिरोह का भंडाफोड़
🔹लखनऊ के अमीनाबाद थाने में अब तक 6 FIR दर्ज, कई आरोपियों पर BNS की धाराओं में केस
🔹जांच में करोड़ों रुपये की फर्जी बिलिंग और बिना दवा स्टॉक के कारोबार का खुलासा
🔹कई संदिग्ध दवा फर्मों का संचालन रोका गया, कई प्रतिष्ठान सील
🔹FSDA का दावा—नकली दवाओं का नेटवर्क राजस्थान और उत्तराखंड तक फैला, कार्रवाई जारी
#UttarPradesh #FakeMedicines #FSDA #Lucknow
@ZeeBusiness@CMOfficeUP
The Government celebrates Gross FDI. The truth lies in Net FDI.
Net FDI has crashed by 97% - from ‘USD 27.99 bn in 2022-23’ to just ‘USD 0.96 bn in 2024-25’!!.
Meanwhile, foreign investors have taken out nearly USD 180 bn through repatriation and disinvestment in four years. If India is such an attractive investment destination, why is net FDI collapsing?
You cannot hide an investment crisis behind gross numbers.
And despite relentless propaganda, the Centre's own data show Kerala has outperformed several major States in attracting FDI during last four years...
#Rajyasabha #FDI #keralam
चेन्नई में फिजिकल परीक्षा देने पहुंचे सभी राजस्थानी छात्रों के लिए....
दक्षिणी भारत मीणा समाज (DBMS) चेन्नई के मीणा भाइयों द्वारा भोजन, रहने एवं अन्य आवश्यक व्यवस्थाओं की जो निःस्वार्थ सेवा की गई,
वह वास्तव में सराहनीय और प्रेरणादायक है।🙏
लक्ष्य नहीं, जीवित पेड़ चाहिए
राजस्थान में करोड़ों पौधे लगाने के दावे और उनमें से बहुत कम पौधों का सत्यापन होना केवल एक प्रशासनिक आंकड़ा नहीं, बल्कि हमारी पर्यावरणीय सोच पर भी बड़ा सवाल है। पर्यावरण संरक्षण केवल कागजों, बैठकों और लक्ष्यों से नहीं हो सकता। जब तक धरातल पर ईमानदारी से काम नहीं होगा, तब तक हरियाली के दावे सिर्फ फाइलों की शोभा बढ़ाते रहेंगे।
वृक्षारोपण कोई एक दिन का उत्सव नहीं है। पौधा लगाकर फोटो खिंचवा लेना या लक्ष्य पूरा कर लेना पर्यावरण संरक्षण नहीं कहलाता। असली काम तो उसके बाद शुरू होता है। पौधे को पानी मिले, खाद मिले, ट्री गार्ड मिले, समय-समय पर उसकी देखभाल हो और वह एक दिन छायादार वृक्ष बनकर खड़ा हो—यही वृक्षारोपण की सफलता है। यदि पौधा जीवित नहीं रहा, तो करोड़ों पौधे लगाने का दावा भी अर्थहीन है।
सरकारें लक्ष्य तय करती हैं, यह आवश्यक भी है। लेकिन केवल लक्ष्य तय करने से मंजिल नहीं मिलती। मंजिल तो लगातार चलने, निगरानी करने और जिम्मेदारी निभाने से हासिल होती है। आज जरूरत इस बात की है कि जितने पौधे लगाए जा रहे हैं, वे जीवित रहें, सुरक्षित रहें और आने वाली पीढ़ियों के लिए हरियाली का आधार बनें। वृक्ष लगाने वाले की जिम्मेदारी वहीं समाप्त नहीं होनी चाहिए। जिसने पौधा लगाया है, वही उसके संरक्षण का भी दायित्व निभाए। यही सोच विकसित करनी होगी।
यह भी किसी से छिपा नहीं है कि वृक्षारोपण के नाम पर कई बार अनियमितताओं और भ्रष्टाचार की शिकायतें सामने आती रही हैं। कहीं पौधे केवल रिकॉर्ड में लगते हैं, कहीं देखभाल के नाम पर खर्च तो होता है, लेकिन जमीन पर उसका असर दिखाई नहीं देता। सरकार को इस पूरे तंत्र पर कड़ी निगरानी रखनी होगी। पर्यावरण संरक्षण जैसे पवित्र कार्य में भ्रष्टाचार किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।
वृक्षारोपण केवल सरकारों के भरोसे भी नहीं छोड़ा जा सकता। समाज की भागीदारी इसके बिना अधूरी है। राजस्थान पत्रिका समाचार समूह वर्षों से ‘हरियालो राजस्थान’ अभियान के माध्यम से लाखों पौधे लगा चुका है। इस अभियान की सबसे बड़ी विशेषता केवल पौधे लगाना नहीं, बल्कि उन्हें जीवित रखने और बड़ा करने का सतत प्रयास है। यही मॉडल व्यापक स्तर पर अपनाने की जरूरत है।
आज एक और बात पर गंभीरता से विचार करना होगा। पेड़ वही लगाए जाएं जो स्थानीय जलवायु और मिट्टी के अनुकूल हों। केवल दूसरे राज्यों या देशों की नकल में पौधे लगाने से अपेक्षित परिणाम नहीं मिलेंगे। योजनाबद्ध तरीके से स्थानीय प्रजातियों और विशेष रूप से फलदार वृक्षों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। फलदार पेड़ केवल हरियाली ही नहीं बढ़ाते, बल्कि पक्षियों और अन्य जीवों के लिए भोजन का आधार भी बनते हैं। आज जैव विविधता पर बढ़ते संकट और पक्षियों के घटते बसेरों के बीच यह और अधिक जरूरी हो गया है।
प्राकृतिक संतुलन संयोग से नहीं बनता, उसके लिए दूरदृष्टि, नीति और सामूहिक संकल्प चाहिए। यदि हम सचमुच हरियाला राजस्थान और हरियाला भारत चाहते हैं, तो हमें पौधों की संख्या नहीं, जीवित वृक्षों की संख्या बढ़ाने पर ध्यान देना होगा। आखिरकार, पर्यावरण की रक्षा नारों से नहीं, बल्कि धरती पर खड़े उन वृक्षों से होगी जो आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ हवा, छाया और जीवन देंगे।#निगहबान #Rajasthnpatrika
नक़ली कैप्सूल तो तुम कह रहे हो,
जाने कितने गरीब केमिस्ट यही बेच बेच के आज अपने लिए प्लॉट और जमीनें जुटा पा रहे हैं और अमीरों की मुख्य धारा में आने का प्रयास कर रहे हैं।
हर वक़्त नकारात्मक नजरिये से ना देखें,
कुछ सकारात्मक पहलू को भी टटोलें।
कोयला घोटाला मामले में निचली अदालत की ओर से पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को जारी किया समन गलत था : सुप्रीम कोर्ट।
यह फैसला मनमोहन सिंह जी के निधन के करीब डेढ़ साल बाद आया है। साल 2025 में निचली अदालत के जज ने CBI की ओर से दो क्लोजर रिपोर्ट खारिज करते हुए मनमोहन सिंह को समन जारी किया था। उस समन को मनमोहन सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
आज CJI जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने फैसला सुनाया कि निचली अदालत के जज ने CBI की क्लोजर रिपोर्ट खारिज करते समय तय कानूनी सिद्धांतों का पालन नहीं किया। उनके पास ऐसा कोई ठोस कारण नहीं था, जिसके आधार पर क्लोजर रिपोर्ट ठुकराकर उन्हें समन किया जाता।
ये पूर्व प्रधानमंत्री का मामला है, आम आदमी के बारे में सोचकर देखिए।
E 20 का गणित
चावल से भी Ethanol बनता है. सरकारी कंपनी FCI ने करीब ₹37 किलो भाव पर चावल ख़रीदा और Ethanol बनाने वाली Distilleries को करीब ₹23 किलो भाव पर बेचा. यह जानकारी सरकार ने राज्यसभा में दी है. इससे करीब ₹10 हज़ार करोड़ का नुक़सान होने का अनुमान है.
बात यहीं नहीं खत्म होती है. सरकार ने ख़ुद माना है कि तेल कंपनियाँ जिस भाव पर Ethanol ख़रीदी हैं वो पेट्रोल से ज़्यादा महंगा है. इस कारण E 20 पेट्रोल सस्ता नहीं बेचा जा सकता है. Ethanol बनाने के लिए एक तरह से सरकार सब्सिडी दे रही है, ये पैसा भी टैक्स देने वाली जनता ही चुका रही है.
नाबार्ड की नई रिपोर्ट बता रही है गांवों की स्थिति ठीक नहीं है। साहूकारों से कर्ज का चलन बढ़ रहा है, खर्च करने की क्षमता कम हुई है। ग्रामीण अपने भविष्य को लेकर परेशान हैं। लेकिन इस मुद्दे पर बात ही नहीं हो रही।
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एक लीटर इथेनॉल, एक लीटर पेट्रोल की तुलना में लगभग 33% कम ऊर्जा देता है। इसलिए E20 (20% इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल) का ऊर्जा घनत्व शुद्ध पेट्रोल की तुलना में लगभग 6.7% कम होता है।
FY2025-26 में भारत ने 42.6 MMT पेट्रोल की खपत की। ऊर्जा-समतुल्यता के आधार पर, यही ऊर्जा शुद्ध पेट्रोल से प्राप्त करने के लिए केवल 39.76 MMT पेट्रोल पर्याप्त होता। यानी, कम ऊर्जा घनत्व के कारण लगभग 2.83 MMT अतिरिक्त पेट्रोल की खपत हुई।
पिछले तीन वित्तीय वर्षों में इथेनॉल ब्लेंडिंग 11.8% से बढ़कर 20% हो गई। इस दौरान कम ऊर्जा घनत्व के कारण अनुमानतः 6.57 MMT अतिरिक्त पेट्रोल की खपत हुई, जिसकी अनुमानित लागत ₹88,234 करोड़ रही। #E20 #Ethanol
@reporters_co
बढ़प्पन और जिम्मेदारी!
बात तब की है जब पंडित जवाहरलाल नेहरू जी प्रधानमंत्री थे। हमारे गढ़वाल क्षेत्र में दीपा देवी नाम की एक साध्वी थीं । पहाड़ में तब तक शराब की इतनी पहुंच नहीं थी जितनी कि अब है । शराब के नाम पर टिंचरी सप्लाई होती । जब इसने पहाड़ के हर आदमी को अपनी गिरफ्त में ले लिया तो गुस्साई साध्वी ने शराब की दुकानों में आग लगा दी। टिंचरी के ख़िलाफ़ इस आंदोलन के कारण साध्वी दीपा देवी का नाम टिंचरी माई पड़ गया।
यह पौड़ी जिले की बात है । उसके बाद यही टिंचरी माई जब कोटद्वार भाबर में रह रही थीं तो वहां उन्होंने देखा कि सिगड्डी कृषि क्षेत्र में सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी नहीं है। इस असुविधा के कारण लोगों की खेती बहुत प्रभावित हो रही थी। माई ने निश्चय किया कि वह दिल्ली जाएंगी और प्रधानमंत्री से बात करेंगी। बिना किसी लाव-लश्कर के वह पहुंच गई दिल्ली और वहां से फिर तीन मूर्ति भवन।
एक दिन जब प्रधानमंत्री नेहरू तैयार होकर अपने कार्यालय के लिए निकल रहे थे तो टिंचरी माई दौड़ती हुई आई और उन्होंने प्रधानमंत्री का हाथ पकड़कर कहा कि 'बता खेती के लिए पानी देगा या नहीं देगा? कुछ दुस्साहस और कुछ बुखार के कारण टिंचरी माई का पूरा शरीर जल रहा था। नेहरू जी ने अपना हाथ छुड़ाकर उनका माथा छुआ और कहा कि आपको बुखार है हम पहले आपका इलाज करवाएंगे और उसके बाद पानी भी देंगे। तब ना नेहरू जी के हाथ में फोन था ना टिंचरी माई के पास सोशल मीडिया में फेसबुक या इंस्टाग्राम जैसा अकाउंट, ना वहां कोई दूरदर्शनी कैमरा, फिर भी यह घटना इतिहास में दर्ज़ है।
आज़ के समय में जब बिना कैमरे के मोदी जी मुंह दिखाई के लिए तैयार नहीं होते तब भी कोई एक ऐसी दिल छू जाने वाली वास्तविक तस्वीर नहीं दिखती जो पूर्व नियोजित न हो। रेडियो पर मन की बात चला देने से क्या हो जाएगा जबकि अपनी प्रशंसा के सिवा विरोध का एक भी स्वर आपके कानों तक नहीं पहुंच रहा है। नीट पेपर लीक के कारण जिन 19 परीक्षार्थियों ने खामोशी से मौत को गले लगा लिया उनके बारे में देश के प्रधान सेवक की चुप्पी बहुत निराशाजनक है, इसलिए जंतर-मंतर के बागियों ने पार्लियामेंट के डकैतों को भगाने के लिए जो नगाड़े बजाए हैं हम उसका स्वागत करते हैं।
#मैंचुपरहूंगा
साभार
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