Message from Sonam :
20th JULY
आज़ादी का दूसरा आन्दोलन
भय मुक्त भारत, अन्याय मुक्त भारत
Freedom from injustice (Like paper leaks)
Freedom from Fear (my illegal detention)
India’s 2nd FREEDOM MOVEMENT
March to the Parliament
Please make it a big success
Sent through Gitanjali
from my illegal detention at Safdarjung
ਸਭ ਤੇ ਵਡਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਨਾਨਕੁ ਜਿਨਿ ਕਲ ਰਾਖੀ ਮੇਰੀ ॥
Sabh Te Vadda Satguru Nanak Jin Kal Rakhi Meri ||
(Guru Nanak is the greatest of all; he saved my honour in this dark age of Kalyuga.)
Dhan Guru Nanak !!
Sachiaara | ਸਚਿਆਰਾ | سچیارا
Sachiaara means one who lives in truth - not someone who merely speaks facts, but someone whose thoughts, actions, and intentions align with what is real.
In Gurbani, the question is asked: “Kiv Sachiaara hoeeai?” How does one become truthful?
Sachiaara is not about image or reputation. It is about inner alignment with Hukam - living without deceit,
without double standards, without bending truth for comfort.
A Sachiaara person does not perform goodness.
They embody it quietly. Their integrity remains the same
whether seen or unseen. Truth for them is not strategy - it is foundation.
To become Sachiaara is to let ego fall away until only sincerity remains.
And when sincerity becomes your nature, truth no longer needs defense - it simply lives through you.
यदि भारत ने विश्व पर इंग्लैंड की तरह साम्राज्य स्थापित किया होता!
(भाग 6)
यदि भारत ने विश्व पर इंग्लैंड की तरह साम्राज्य स्थापित किया होता तो, लोग "ओ माय गॉड" OMG ना कहते। अपितू, पूरे विश्व के लोग "हे प्रभु" कहते।
एक आश्चर्यजनक विडंबना: भारतीय संस्कृति की रक्षक "राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ" जैसी संस्था ने भी, अपनी वेशभूषा में "निक्कर एवं कानों वाली शर्ट" को अधिकारिक रूप से स्वीकार किया हुआ है। जिस का भाव यह है कि उन्होंने यूरोपीय शैली की एक वेशभूषा को अपने जीवन में स्थान दे दिया है। यदि भारत ने विश्व पर अपना साम्राज्य इंग्लैंड की तरह स्थापित किया होता तो: आज यह संघ वाले विदेशी वेशभूषा न पहनते, बल्कि अपनी भारतीय वेशभूषा पहनते। विदेश की भी बड़ी-बड़ी संस्थाएं भारतीय वेशभूषा पहनती तथा भारतीय वेशभूषा पहन कर उसी पर गर्व करती। यह अंतर होता है: साम्राज्य स्थापित कर के, किसी को (कॉलोनी) उपनिवेश बनाने वालों की सभ्यता का! और, उपनिवेश गुलाम (कॉलोनी) बनने वाली जनता की मानसिकता, सभ्यता,भाषा एवं धर्म का। जनता भले ही कितनी नैतिक, धार्मिक हो; उस जनता की सभ्यता, भाषा, धर्म आदि सभी, उपनिवेश बनाने वाले आक्रांताओं के आगे बड़ी शीघ्रता से पिघल जाते हैं। जैसे, गर्म पानी में बर्फ की टुकड़ी पिघल जाती हैं। उपनिवेश बने गुलाम लोगों की ना कोई सभ्यता बचती है, ना भाषा, ना धर्म। उन गुलामों की तो केवल जनता बचती है, जो अक्रांताओं का अत्याचार सहने के लिए विवशता में जीवित रहती है।
दूसरे देशों को अपना उपनिवेश (कालोनी) न बनाने वाले: धार्मिक, नैतिक भारत को अस्त्रों शस्त्रों के लिए, आर्थिक विकास के लिए और अनेक प्रकार की सहायता के लिए इंग्लैंड एवं अमरीका से भीख मांगनी पड़ती है। इस के विपरीत, पूरे विश्व को अपने अत्याचारों से पीड़ित करने वाले, विश्व को अपना उपनिवेश (कालोनी) बनाने वाले, (कई देशों पर बंब बरसाने वाले, 50 से अधिक देशों की बढ़िया चल रही सुचारू सरकारों को गिराने वाले) इंग्लैंड एवं अमरीका को: भारत के आगे हाथ फैला कर भीख नहीं माँगनी पड़ती। यह अंतर है: क्रूरता व अनैतिकता से साम्राज्य स्थापित करने वाले अमरीका, इंग्लैंड का: तथा, नैतिकता और धार्मिकता रख कर किसी देश को गुलाम न बनाने वाले भारत का।
जीवन की कटु, परंतू अटल सच्चाई यह है कि सदैव ही एक शक्तिशाली धनवान की नकल; धनहीन, शक्तिहीन व्यक्ति करता है। शक्तिशाली धनवान व्यक्ति: पाप कर के ही धनवान व शक्तिशाली बनता है। कोई भी व्यक्ति, कभी भी (केवल) धर्म कार्यों से, नैतिक कार्यों से: धनवान, शक्तिशाली नहीं बन सकता। धनवान बनने हेतु उसे पाप तो करने ही पड़ते हैं। इसी लिए सतगुरु नानक देव जी ने लिखा है "पापा बाझहु होवै नाही" (पन्ना 417)। अर्थ: पाप किए बिना: धन एवं शक्ति प्राप्त नहीं होती। इस का सब से बढ़िया प्रत्यक्ष उदाहरण है कि मानव जाति बाकी सभी जाति प्रजातियों को मार कर, उन पर अत्याचार कर के ही, आज पूरी पृथ्वी पर शासन कर रही है। मानव जाति ने पूरी पृथ्वी को अपना उपनिवेश बनाया हुआ है।
पुलाड़ में या पाताल में: किसी समुन्द्र में, या किसी जंगल में: जो भी कोई नई खोज होती है, उस में जो कोई नई जातियां प्रजातियां मिलती हैं, उनके नाम अंग्रेज़ी में रखे जाते हैं, या किसी यूरोपीय भाषा में रखे जाते हैं। यदि भारत ने विश्व पर साम्राज्य स्थापित किया होता तो यह सभी नाम: भारतीय भाषा में रखे जाते।
सभी जातियों प्रजातियों के जीव, जंतुओं के, या वनस्पति के जो भी नाम रखे जाते हैं: उन में जो विज्ञानक नाम होते हैं; वह लातिनी भाषा में रखे जाते हैं। परंतु, जो प्रचलित नाम लोगों के लिए होता है, वह अंग्रेज़ी में होता है। अंग्रेज़ी वाला नाम विश्व प्रसिद्ध हो जाता है, जिस को सभी देशों के लोग अचेत में ही उपयोग करने लगते हैं। वैज्ञानिक नाम लातिनी में इस कारण रखा जाता है, क्योंकि लातिनी भाषा अंग्रेज़ी की मूल भाषा है एवं योरूप की सभी भाषाओं का मूल है। जैसे कि भारत की भाषाओं का मूल संस्कृत है। इसी कारण लैटिन भाषा में विज्ञानक नाम (साइंटिफिक नाम) रखे जाते हैं। यदि भारत ने विश्व पर इंग्लैंड की तरह साम्राज्य स्थापित किया होता, तो इन सभी जीव जंतुओं एवं वनस्पति के वैज्ञानिक नामों का नाम-संस्करण, भारतीय भाषा में होता।
विश्व के सभी सागरों के नाम; अचेत में ही पूरा विश्व अंग्रेज़ी में ही ले रहा है। सभी नक्शों पर भी अंग्रेज़ी में रखे नाम ही लिखे जाते हैं। जैसे: इंडियन ओशन, अटलांटिक ओशन, रेड सी: आदि। यदि भारत ने विश्व पर अपना साम्राज्य स्थापित किया होता तो विश्व के सागरों के नाम अंग्रेज़ी में ना होते। पूरा विश्व, भारतीय भाषाओं में ही सागरों के नाम रखता एवं लेता, जैसे कि आज वह अंग्रेज़ी में रख रहा है। स्वतंत्र देशों की जनता को यह पता ही नहीं चलता कि हम तो स्वतंत्र देश हैं, हमारी अपनी भाषा भी समृद्ध है; फिर भी हम अंग्रेज़ी में ही क्यों इन सागरों के नाम ले रहे हैं ? यहां तक कि हम भारतीय अपने देश के सागर का नाम भी अंग्रेज़ी में "इंडियन ओशन" ही लेते हैं। हम अपने सागर को "भारतीय सागर" नहीं कहते।
गरीब में आत्मसम्मान (स्वाभिमान) नहीं होता, उस की कोई इज्जत नहीं होती। क्योंकि, उस को शक्तिशाली, धनवान के सामने झुकना ही पड़ता है। इस लिए शक्तिशाली, धनवान बनिए। अपने भारत को भी शक्तिशाली, धनवान बनाएं।
आज विश्व के सभी लोग समय का आकलन, इंग्लैंड वालों के अनुसार घंटे, मिनट, सेकंड में कर रहे हैं। यदि भारत ने विश्व पर साम्राज्य स्थापित किया होता; तो सभी लोग भारतीय पद्धति के अनुसार समय का आकलन करते। जैसा के गुरुवाणी में लिखा हुआ है: पल, विसुए, चसिआ, घड़ीआ, पहिरा, थिती आदि “विसुए चसिआ घड़ीआ पहरा थिती वारी माहु होआ” (सतिगुरू नानक देव जी)।
गूगल पर कोई खोज करने हेतु यदि किसी शब्द को इंग्लिश में टाइप कर के खोज करें; तो वह खोज अत्यंत विस्तृत जानकारी भरपूर होती है। गूगल पर ही उसी शब्द को किसी भारतीय भाषा में लिख कर खोज करें तो; वह खोज उतनी विस्तृत जानकारी भरपूर नहीं होती। क्योंकि, खोज इंग्लिश में नहीं की गई थी। इंग्लैंड का विश्व पर साम्राज्य स्थापित होने कारण, गूगल आदि सभी खोज संग्रहों में, इंग्लिश का ही साम्राज्य बना हुआ है। गूगल पर when I searched "where is India". 6,030,000,000 results (0.22s),अंग्रेज़ी में खोज करने से 6 अरब 3 करोड़ उत्तर मिले। जब मैंने हिंदी में खोज किया "भारत कहां पर है"। हिंदी में खोज करने से केवल 94,400,000 results (0.29s) 9 करोड़ 44 लाख उत्तर मिले। इस टैस्ट से पूर्ण रूप से स्पष्ट हो जाता है कि गूगल भी इंग्लिश में खोज करने को प्राथमिकता देती है। एवं इंग्लिश में भारत संबंधी सामग्री भी हिंदी के मुकाबले में कहीं अधिक मात्रा में उपलब्ध है। गूगल के इस पक्षपाती व्यवहार के पीछे एक ही कारण है, जो मैं इस पूरे लेख में बता रहा हूं कि इंग्लैंड के विश्व पर साम्राज्य स्थापित करने कारण, इंग्लिश भी विश्व पर अपना साम्राज्य स्थापित कर के; अपना शासन चला रही है।
भारतीय संस्कृति दक्षिण पूर्व एशिया के कई देशों में प्रचलित एवं स्थापित है जैसे: चीन, जापान, थाईलैंड, कंबोडिया, इंडोनेशिया, मलेशिया आदि। परंतु वहाँ पर भी भारतीय संस्कृति कुछ अंश-मात्र ही है; भारतीय भाषा वहां पर भी उपयोग नहीं होती, परंतु इंग्लिश उपयोग होती है।
इस कारण, यदि भारत ने अपने धर्म, अपनी संस्कृति, अपनी भाषा की सुरक्षा करनी है और इन को प्रफुल्लित कर के स्थापित करना है; तो विश्व पर अपना साम्राज्य स्थापित करना अत्यंत आवश्यक है, भले ही हमें कोई कितना भी बुरा कहता रहे। नैतिक वृति वाले लोग, इंग्लैंड को चाहे कितना भी बुरा कहते रहें, इंग्लिश को कितनी गालियां निकालें; परंतु उन को राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यवहार एवं वार्तालाप तो इंग्लिश में ही करने पड़ेंगे तथा विनय पत्र (एप्लीकेशन) एवं पत्राचार भी इंग्लिश में ही लिखने पड़ेंगे।
उपरोक्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुए, भारत को अपनी संस्कृति, भाषा व धर्म की रक्षा हेतु: एवं, इन सभी को प्रफुल्लित कर के विश्व में स्थापित करने हेतु: विश्व पर अपना साम्राज्य स्थापित करना चाहिए, भले ही उस के लिए कुछ पाप, अनैतिक कर्म भी करने पड़ें।
जय भारत।
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Delhi's Water S.O.S
India Today’s Part 2 investigation reveals alarming systemic failures in Delhi’s drinking water network, as residents face sewage-contaminated supply amid official denial and growing health risks.
#5Live | @Sonal_MK@Sreya_Chattrjee
केश-रहित (मोने) श्रद्धालुओं को भी: सिख प्रवान कीजिए।
खालसा जी! सिख पंथ को प्रफुलित करने हेतु हमें, केश-रहित (मोने) श्रद्धालुओं को भी: सिख प्रवान करना चाहिए। जिस से, 'हिन्दू' कहलाये जाते सभी श्रद्धालु; खुद-ब-खुद “सिख” बन जाएंगे। क्योंकि, हर मोना “हिंदू” नहीं, हर केशधारी “सिख” नहीं। बहुत सारे केश-रहित लोग, हम से कहीं अधिक श्रद्धालु हैं। सिखी केश-दाढ़ी व बाहरी स्वरूप से नहीं; सिखी तो श्रद्धा से है “सतिगुर की नित सरधा लागी मोकउ” (म ४, पन्ना 982)। मोने लोगों को “सिख” मान लेने से, सिख पंथ की गिनती बढ़ कर 50 करोड़ हो जाएगी। मोने (सहजधारी) सिखों और केश-धारी सिखों का आपसी विरोध भी खत्म हो जाएगा।
अकाल तख्त साहिब समेत बड़े गुरुद्वारों पर कब्जा होने के कारण; "हम अमृतधारी खालसा" ने मोने लोगों को 'हिंदू' कह कर, अपने से दूर कर दिया है। वास्तव में तो वह "सिख" थे और अब भी हैं। इस लिए, अमृतधारी खालसा को यह याद रखने की आवश्यकता है कि प्रत्येक गुरु नानक नाम लेवा "सिख" है। गुरु जी ने हमें कोई ऐसा अधिकार नहीं दिया है कि हम किसी को कहें "तुम सिख नहीं हो"। हम अमृतधारी खालसे तो पूरे सिख पंथ का एक छोटा सा भाग है। सिख पंथ: केवल "अमृतधारी खालसा" नहीं, सिख पंथ तो बहुत विशाल है और यह सभी गुरु नानक नाम लेवा संप्रदाओं को मिलाकर बनता है। ब्रह्म ज्ञानी भाई घनैया, गुरु के महान प्रेमी भाई नंद लाल, छोटे साहिबजादों को चोरी दूध पिलाने वाला मोती राम मेहरा, साहिबजादों के अंतिम संस्कार के लिए मोहरें विछाकर जमीन खरीदने वाला दीवान टोडर मल आदि सिख; दसवें पातशाह जी के समय में भी "अमृतधारी" नहीं थे: लेकिन, वह भी महान “सिख” थे। दसवें गुरु जी ने कभी भी मोने लोगों को "यह सिख नहीं हैं" कह कर पंथ से निष्कासित नहीं किया और गुरु ग्रंथ साहिब में कहीं भी यह नहीं लिखा कि "केवल केशधारी लोग ही 'सिख' हो सकते हैं और मोने (केश-रहित) 'सिख' नहीं हो सकते।” इस लिए, हर मोना “हिंदू” नहीं; हर केशधारी “सिख” नहीं।
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@gupta_rekha delhi k pollution ka kuch socha h ???? Ya koi bhi maare apko farak nhi padhta??? Work from home krvaye jisse gaddiyo ka pollution khẩtam ho
#Punjab इस आपदा की घड़ी में पूरी तरह से बेसहारा छोड़ दिया गया है। 😡😡
ना राज्य सरकार दिख रही है, ना केंद्र सरकार, और गोदी मीडिया ने तो जैसे अपनी ज़ुबान ही गिरवी रख दी हो।
क्योंकि ना तो पंजाब में चुनाव हैं, और ना ही बलात्कारी पार्टी की सरकार है
#PunjabFloods#PunjabFloodAlert #punjabflood2025
आज जब punjab मुसीबत में है कई इलाके पूरे के पूरे पानी में डूबे हुए है तो इस एक अकेले दिलजीत दोसांझ पंजाब के शेर ने 10 गांवो को गोद लिया है
जहाँ ये तीन फेज में सब कुछ करेगा राहत से लेकर रिबिल्ड तक .
मैं हूँ पंजाब , पंजाबी आ गए ओये ❤️
"This can only happen in Punjab.
For the first time, we are requesting people to stop bringing ration and relief material, because the 𝘀𝘁𝗼𝗰𝗸𝘀 𝗵𝗮𝘃𝗲 𝗮𝗹𝗿𝗲𝗮𝗱𝘆 𝗽𝗶𝗹𝗲𝗱 𝘂𝗽."
𝗧𝗵𝗲𝘀𝗲 𝗮𝗿𝗲 𝘁𝗵𝗲 𝘄𝗼𝗿𝗱𝘀 𝗼𝗳 𝗔𝗺𝗮𝗿𝗽𝗿𝗲𝗲𝘁 𝗦𝗶𝗻𝗴𝗵 from Global Sikhs, an organisation actively engaged in relief and rehabilitation across Punjab’s flood-hit districts.
Punjab today is facing its 𝘄𝗼𝗿𝘀𝘁 𝗳𝗹𝗼𝗼𝗱𝘀 𝗶𝗻 𝟯𝟳 𝘆𝗲𝗮𝗿𝘀.
Rivers Satluj, Beas, and Ravi have breached danger levels after relentless rainfall from the Himalayan states.
Thousands of families have lost their homes, their crops, and, tragically, even loved ones.
And yet, amid this devastation, 𝘁𝗵𝗲 𝗣𝘂𝗻𝗷𝗮𝗯𝗶 𝘀𝗽𝗶𝗿𝗶𝘁 𝗼𝗳 𝗿𝗲𝘀𝗶𝗹𝗶𝗲𝗻𝗰𝗲 𝗮𝗻𝗱 𝗴𝗲𝗻𝗲𝗿𝗼𝘀𝗶𝘁𝘆 has shone through:
From cooking langars in 𝘄𝗮𝗶𝘀𝘁-𝗱𝗲𝗲𝗽 𝘄𝗮𝘁𝗲𝗿, to distributing essentials on boats, to even setting up '𝗺𝗲𝗱𝗶𝗰𝗮𝗹 𝗹𝗮𝗻𝗴𝗮𝗿𝘀' for the sick and injured, the response has been extraordinary.
Many are also 𝘂𝘀𝗶𝗻𝗴 𝘁𝗵𝗲𝗶𝗿 𝘁𝗿𝗮𝗰𝘁𝗼𝗿𝘀 𝘁𝗼 𝗰𝗮𝗿𝗿𝘆 𝘀𝗮𝗻𝗱 and plug breaches in riverbanks to prevent further flooding.
These acts of 𝗰𝗼𝗺𝗽𝗮𝘀𝘀𝗶𝗼𝗻 and 𝗰𝗼𝘂𝗿𝗮𝗴𝗲 are inspiring.
But we must remember that community heroism 𝗰𝗮𝗻𝗻𝗼𝘁 𝗯𝗲 𝗼𝘂𝗿 𝗹𝗼𝗻𝗴-𝘁𝗲𝗿𝗺 𝗮𝗻𝘀𝘄𝗲𝗿 to man-made disasters.
Scientific reports have warned us again and again that 𝗯𝗼𝘁𝗵 𝘁𝗵𝗲 𝗳𝗿𝗲𝗾𝘂𝗲𝗻𝗰𝘆 𝗮𝗻𝗱 𝗶𝗻𝘁𝗲𝗻𝘀𝗶𝘁𝘆 𝗼𝗳 𝗲𝘅𝘁𝗿𝗲𝗺𝗲 𝘄𝗲𝗮𝘁𝗵𝗲𝗿 𝗲𝘃𝗲𝗻𝘁𝘀 𝗶𝗻 𝗜𝗻𝗱𝗶𝗮 will rise sharply.
Still, we continue with reckless construction in the mountains, poor planning, and administrative negligence.
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In this time of crisis, 𝗔𝗰𝗵𝗮𝗿𝘆𝗮 𝗣𝗿𝗮𝘀𝗵𝗮𝗻𝘁 is repeatedly sounding the alarm about climate change:
“Climate change is not just a future threat. It is already assaulting us in our homes.
Scientists warn we may be nearing 𝗶𝗿𝗿𝗲𝘃𝗲𝗿𝘀𝗶𝗯𝗹𝗲 𝘁𝗶𝗽𝗽𝗶𝗻𝗴 𝗽𝗼𝗶𝗻𝘁𝘀.
That means once certain thresholds are crossed, no amount of effort will be able to undo the damage.
𝗥𝗶𝘃𝗲𝗿𝘀 𝘄𝗶𝗹𝗹 𝗸𝗲𝗲𝗽 𝘀𝘄𝗲𝗹𝗹𝗶𝗻𝗴, floods will keep intensifying, and 𝘃𝗶𝗹𝗹𝗮𝗴𝗲𝘀 𝘄𝗶𝗹𝗹 𝗸𝗲𝗲𝗽 𝗱𝗿𝗼𝘄𝗻𝗶𝗻𝗴, even if humanity later decides to act.
But the window for action is still open.
𝗪𝗵𝗮𝘁 𝗺𝗮𝘁𝘁𝗲𝗿𝘀 𝗻𝗼𝘄 𝗶𝘀 𝗻𝗼𝘁 𝗼𝗻𝗹𝘆 𝘀𝗽𝗲𝗲𝗱, 𝗯𝘂𝘁 𝘀𝗶𝗻𝗰𝗲𝗿𝗶𝘁𝘆.
These may be our last years, not just to restore ecological balance, but also to decide what kind of civilization we wish to be remembered as.