तुम जयपुर के मौसमों सी हो।
तुम्हारी गर्मजोशी और उसकी सर्दी,
तुम्हारा गुस्सा और उसकी गर्मी,
तुम्हारा रोमांस और उसकी बारिश,
इस सब के बीच मैं तुम्हारी ज़िन्दगी में पतझड़ सा हूँ,
आता हूँ, रहता हूँ, चंद दिन, साल दर साल।
बस, मौसम की करवट बदलने।
हूँ गर्दिशों में.. माहताब की तरह
आज जो गया तो कल फिर से लौट आऊँगा
के यार में कोई सितारा तो नहीं..
के जो टूटा तो खों ही जाऊँगा
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