दुनिया इतनी छोटी तो नहीं कि मैं ना ढूंढ पाऊं दूसरा प्रेम..
मैं दूसरे इंसान में उसी की आँखें दे���ना चाहता हूं
तुम्हारी नहीं
उसी की हंसी,उसी की छुअन चाहता हूं
तुम्हारी नहीं
और एक दिन ये होगा...
~खुशी ठाकुर 🌸❤️
राजस्थान के गॉंवों में जल संरक्षण से जुड़ी परम्परा समंद हिलोरना
कल देवझूल��ी ग्यारस पर हर गॉंव में ये परम्परा निभाई गई।
लेकिन तालाबों के हालात देखकर मन दुखी हो गया।
आप हमारे गाँव के इस तालाब की सुंदरता देखो।
केर के पेड़ों पर लगे फुल,जाल खेजड़ी के पेड़ ओर सुंदर साफ तालाब है ये जिसका संरक्षण गाँव के लोग करते है।
कई गाँव के लोगों ने तालाबों का संरक्षण छोड़ दिया है ओर ये परंपरा एक औपचारिकता बनकर रह गई है।
महिलाएं जो नई बहके रू�� में गॉंव में आती है उन्हें गॉंव के जलस्रोत तालाब से जोड़ने के लिए ये परम्परा रही होगी जैसा प्रतीत होता है।
एक महीने तक त तालाब से माटी नाखी जाती थी ओर सफाई की जाती थी इन नई नवैली बहुओं द्वारा तब ये समंदर हिलोरना होता था ओर देवझूलनी ग्यारस पर भाई बहन को चुनड़ी उढाने आता था।
अब बस रीले बनती है तालाब का अता पता ही नही है।
वह खोई हुई चीज़ नहीं मिलती दिनों तक
कितनी ही ची��़ों में उसकी
झलक आती है अँधेरे में
हम उससे मिलती जुलती चीज़ को
उठा कर तौलने भी लगते हैं।
घर में रास्ते में बरसों बाद भी कौंध जाती
है वह खोई हुई चीज़ ।
और जब चीज़ों के खोने के बारे में
बातें होती हैं, वही याद आती है
सबसे अधिक
~प्रयाग शुक्ल ���🤍
“व्यक्ति की गरिमा” 🇮🇳
स्वप्न झरे फूल से,
मीत चुभे शूल से,
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!
नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,
पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई,
पात-पात झर गये कि शाख़-शाख़ जल गई,
चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,
जंगली फूलों को देख कर लगता है
वो बग़ैर अतिरिक्त
अपेक्षाओं के उगते है
उन्हें खुद से कोई उम्मीद हो ना हो
दूसरों को खूब उम्मीद देते हैं।
कुछ लोग भी ऐसे ही होते हैं
~तेजस्विनी 🌸🩷
(तस्वीर _ @ExploredandLost )
एक दिन फेरी लगाता कोई
आएगा मोहल्ले में लेकर
बसंत-
उसकी सरकारी खिड़कियों में
नहीं पड़ेगी आवाज़
वो एक नौकरशाह है
जिनके कमरे ठंडे या गर्म रहते हैं
पर कभी नहीं रहते
बसंत।
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