बुरी से बुरी बात को भली सिद्ध करने के लिए तर्क वितर्क कुतर्क ढूँढे जा सकते हैं और अपने पक्ष के समर्थन में कितने ही तथ्य तथा उदाहरण प्रस्तुत किये जा सकते हैं। इस तरह के विवादों का कभी अंत नहीं होता।
अतः श्रेष्ठ यही है कि ऐसी परिस्थिति से दूर रहा जाये।
"सत्य-असत्य का भेद करने के लिए मनोभूमि निष्पक्ष होनी चाहिए। उसमें किसी प्रकार का पूर्वाग्रह नहीं होना चाहिए। किसी मान्यता पर आग्रह जमा हो तो मनोभूमि पक्षपात ग्रसित हो जाएगी, तब अपनी ही बात को किसी न किसी प्रकार सिद्ध करने के लिए बुद्धि-कौशल चलता रहेगा।
अपने-अपने दलों में हर संभव तरीक़े से लोकतंत्र की बहुधा निर्मम हत्या करने वाले हमारे नेता जब-जब “लोकतंत्र ख़तरे में है ,लोकतंत्र बचाओ, लोकतंत्र मज़बूत करो” ,जैसे प्रलाप निहायत बेशर्मी के साथ करते हैं तो ऐसा लगता है जैसे हाफ़िज़ सईद , विश्व-शांति पर प्रवचन कर रहा हो😀👎
"चाहे महर्षियों का जन्म स्थान हो, चाहे योगियों की तपोभूमि हो, अथवा वहाँ कितने ही श्रेष्ठ पुरुषों ने जन्म लिया हो,
किन्तु जिस राष्ट्र के निवासियों में संगठन का बल एवं अटूट राष्ट्रभक्ति नही होती, वह राष्ट्र विश्व के लिए कभी वन्दनीय नही हो सकता।"