कसुमल रंग की पगड़ी, हाथ मे छड़ी वाली अजीम शख्सियत
लेखक : सुरेश गुर्जर, कोटा ( कर्नल साहब के पुराने साथी )
वो शख़्स थे कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला।
उनकी धज ऐसी थी, की मुस्कुरा देते तो देहात की पगडंडिया दिखाई देती थी और रंग में आ जाते तो शेक्सपियर, कार्ल मार्क्स, नेपोलियन बोनापार्ट , अब्राहम लिंकन और रूस की क्रांति के किस्से बेबाक अंग्रेजी में धारा प्रवाह से फूट पड़ते थे।
पकी हुई उम्र और तेज से तमतमाते व्यक्तित्व वाले कर्नल बैंसला साहब को समाज के नेतृत्व ने तब दस्तक दी जब उन्होंने सितंबर 2006 मे हिण्डोन मे आंदोलन करके गुर्जर आरक्षण आंदोलन की नींव रखी।
हमने 2008 में देखा, की हाथों में माइक लिए अपनी कौम को जागता हुआ वह शख्स बयाना के किले और खानवा के युद्ध का हवाला देते हुए, इतिहास के मुड़े हुए पन्नों को सीधा करते हुए, सामने बैठे जन समुद्र को बरसों की नींद से जगा रहा था।
हमने वह वक्त भी देखा है, जब कोटा रेलवे स्टेशन से रेल में चढ़ते वक्त कर्नल साहब की बैंत रेल की पटरी पर गिर गई और उनकी बैंत को निकालने के लिए ट्रेन को रोका गया। तो अगले दिन अखबारों की सुर्खियां बनी, " कोटा स्टेशन पर कर्नल बैंसला की बैंत के लिए रुकी ट्रेन "
क्या रूप था उनका, आवाज में क्या लरज थी उनकी, कितनी गहरी पीड़ाए उनके मन में, कि जब एक प्रधान संपादक उनसे मिलने आए वार्ता के लिए और कर्नल साहब को कहा कि आप यह आरक्षण क्यों माँग रहे हैं , आप का तो पुश्तैनी दूध का काम है , आप दूध का काम क्यों नहीं करते? कोई बडी डेरी लगवा लीजिए ।
तो कर्नल साहब ने गरज कर कहा “अब मेरे बच्चे दूध का काम नहीं करेंगे, मेरे बेटे और बेटियां डॉक्टर बनेंगे , इंजीनियर बनेंगे , सचिवालय की कुर्सियों पर बैठेंगे। आप हमसे दूध का काम कब तक करवाओगे? आप लोग क्यों नहीं करते हो दूध ���ा काम ? लोकतंत्र में हम अपनी हिस्सेदारी लेकर रहेंगे। “
स्मृति और बुद्धि की तीक्ष्णता ऐसी की पुरानीसे पुरानी घटनाएं व बहुत पुराने साथी , उन्हें चुटकी में याद आ जाते थे।
एक बार हम कोटा से झालावाड़ एक मीटिंग के लिए जा रहे थे। तो कर्नल साहब से मिलने सर्किट हाउस में उनके साथ फौज में सैनिक रहे श्री राम सिंह भडाना जी आए। राम सिंह जी चुप���ाप एक सोफे पर बैठे गये। कर्नल साहब और लोगों से मिल रहे थे / बात कर रहे थे। जब उन पर नजर पड़ी , कर्नल साहब तुरंत बोले "राम सिंह "!
राम सिंह जी बढ़ाना 30 से 40 साल बाद कर्नल साहब से मिल रहे थे। कर्नल साहब ने उन्हें पहचानने में 40 सेकंड भी नहीं लगाये। यह बुद्धि और स्मृति का तेज था कर्नल साहब मे।
मुझे याद आ रहा है कि 2009 राजस्थान विधानसभा के चुनावों से पहले, झालावाड़ जिले की सामाजिक महापंचायत हुई। पूरी रात भर कोटा झालावाड़ रोड पर रेलमपेल सी स्थिति रही। बड़ी और साधारण गाड़ियां पूरी रात इस रोड पर चली थी । उस दिन स्वाभाविक था मुझे पूरी रात जागना ,चूंकि आंदोलन से जुड़े देश भर के लोग आ रहे थे ।
हमारे साथी और हम कोटा झालावाड़ रोड पर सभी लोगों को बीच-बीच में रोकने खाने पीने की जरूरत पूरी करने के लिए जागे रहे । उस दिन कर्नल साहब ने मुझे फोन किया कि “मैं कर्नल बैंसला बोल रहा हूं ।मेरे साथ 50-60 लोग हैं । मैं अभी करोली से पूर्व विधायक स्व हंसराज जी गुर्जर की
मूर्ति अनावरण करते हुए कोटा आ रहा हूं ।हमारा इंतज़ाम रखना। कोटा रूक कर अल सुबह झालावाड़ चलेंगे “
बहुत प्रयास करने पर भी किसी होटल ने कमरा नहीं दिया - आंदोलन की महक हवा में जो थी। कोटा मे उनके रात्रि विश्राम के लिए जब कोई ठिया नहीं मिला, तो हमने झालावाड़ रोड आलनिया माताजी के मंदिर में कर्नल साहब के रात्रि विश्राम का निर्णय लिया।
क्योंकि सारा कार्यक्रम जल्दबाजी में हुआ था, ऐसे में कर्नल साहब को मंदिर पर थोड़ी देर छोड़कर, मैं बिस्तर की व्यवस्था करने निकल पड़ा।
थोड़ी देर बाद जब वापस लौटा तो देखा कि कर्नल साहब वही फर्श पर गहरी नींद में सो रहे हैं। आज भी सोचता हूं , कितना पवित्र ह्रदय होगा उनका, कितनी सरलता थी उनमें, जमीन से कितना जुड़ाव था उनका। बस फर्श पर लेटे और नींद आ गई।
सन 2013 मे सोशल मीडिया नहीं था, और वीडियो रिकॉर्डिंग कम होती थी। पर लोग कर्नल साहब को बहुत ध्यान से सुनते थे।
वो मंच पर पैरों को लटका कर सबसे पहले महिलाओं और बच्चों से मुखातिब होते थे , यह उनके नेतृत्व की ख़ासियत थी । ऐसा लगता की कर्नल साहब सभा में उपस्थित हर व्यक्ति से सीधा संवाद कर रहे हैं। एक खुली किताब की तरह अपने बात रख रहे हैं। कर्नल साहब सीधे कहते “ ईश्वर के आगे हाजिर नाजिर होते हुए गुर्जरों , मैं आपको अपनी बात कहने आया हूं”
ये वक्तव्य उनके शब्दों में शुमा�� होते थे।
ऐसे थे हमारे लीडर।