New Ethanol Rule: भारत में अब पेट्रोल में Ethanol की मात्रा पहले से ज्यादा बढ़ने वाली है. सरकार ने E22, E25, E27 और E30 जैसे नए फ्यूल ब्लेंड स्टैंडर्ड जारी कर दिए हैं. यानी आने वाले समय में पेट्रोल में 30 प्रतिशत तक Ethanol मिलाया जा सकता है. सरकार का कहना है कि इससे कच्चे तेल पर निर्भरता कम होगी और प्रदूषण भी घटेगा.
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प्राईवेट स्कूल के मास्टर 10-20 हजार की
सैलरी से बच्चों को अंग्रेजी पढ़ना सिखा देते हैं।
और सरकारी मास्टर 60-70 हजार में
5 वीं तक बच्चे को
अपना नाम लिखना भी नहीं सिखा पाते हैं।
जिम्बाब्वे क्रिकेट में रन का तूफान, 50 ओवर के मैच में टीम ने बनाए 822 रन!
जिम्बाब्वे में एक ऐसा वनडे मैच हुआ (इंटरनेशनल नहीं) जिसमें एक टीम ने 50 ओवर में 822 रन बना दिए. यह मैच स्कॉर्पियन क्रिकेट क्लब और मेथाने लॉयंस के बीच खेला गया और इसमें स्कॉर्पियन क्रिकेट क्लब ने जो बल्लेबाजी की उसने सारे रिकॉर्ड धराशायी कर दिए. इस टीम ने चार विकेट पर 822 रन का बड़ा स्कोर बना दिया. इस लक्ष्य का पीछा करने उतरी मेथाने लायंस की टीम की बल्लेबाजी बिलकुल फिसड्डी निकली. यह टीम कुल मिलाकर 7 विकेट पर 28 रन ही बना सकी. और स्कॉर्पियन की टीम को 794 रन की बड़ी जीत मिली.
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मैंने 7 साल बॉस के लिए रातें जलाईं, बदले में 500 रुपये मिले—फिर उसी 12 करोड़ के प्रोजेक्ट में मेरा नया ID देखकर पूरा ऑफिस काँप गया
मेरे पुराने बॉस का फोन सुबह 8 बजे आया, और कॉल उठाते ही उन्होंने चीखकर कहा—
“आर्या, तू अभी तक ऑफिस क्यों नहीं पहुँची? 12 करोड़ का प्रोजेक्ट आज सबमिट होना है! अगर क्लाइंट ने कॉन्ट्रैक्ट कैंसल कर दिया तो भरपाई तेरे बाप करेगा?”
मैंने मोबाइल कान से थोड़ा दूर कर लिया।
7 साल तक जिस आदमी ने मुझे इंसान नहीं, मशीन समझा था, वही आज भी मुझे आदेश दे रहा था।
सबसे अजीब बात यह थी कि मैं अब उसकी कर्मचारी थी ही नहीं।
और आज मेरा पहला दिन उसी क्लाइंट कंपनी में था, जिसके सामने वह हमेशा मुझे नीचा दिखाकर खुद चमकता था।
मैं आर्या मेहरा, गुड़गांव की एक मिडिल क्लास लड़की, जिसने नोएडा की एक मार्केटिंग एजेंसी में 7 साल तक दिन-रात काम किया। त्योहार हो, रविवार हो, बुखार हो या घर में परेशानी—मेरे लिए हमेशा एक ही लाइन होती थी, “आर्या संभाल लेगी।”
मेरे बॉस राघव भाटिया को लगता था कि मेरी चुप्पी मेरी कमजोरी है।
फोन पर वह फिर गरजा—
“कहाँ मर गई है तू? फाइनल रिपोर्ट का पासवर्ड क्या है? क्लाइंट के लोग रास्ते में हैं!”
मैंने शांत आवाज में कहा—
“सर, मैंने तो 10 दिन पहले इस्तीफा दे दिया था।”
कुछ सेकंड खामोशी रही। फिर लाइन कट गई।
उसके 2 मिनट बाद HR की नेहा मैम का फोन आया।
“आर्या, ये क्या बचपना है? राघव सर बहुत गुस्से में हैं। हाँ, बोनस को लेकर थोड़ा इशू हुआ था, पर इतना बड़ा प्रोजेक्ट छोड़कर कोई भागता है क्या?”
मैं हँसी नहीं, बस मुस्कुरा दी। वह बोनस नहीं, मेरी इज्जत का मजाक था।
पिछले साल मैंने उसी प्रोजेक्ट से कंपनी को करोड़ों का फायदा दिलाया था। प्रेजेंटेशन मैंने बनाए, क्लाइंट मीटिंग मैंने संभाली, रात 3 बजे तक रिपोर्ट मैंने सुधारी। मेरी माँ की तबीयत खराब थी, फिर भी मैंने अस्पताल के कॉरिडोर में बैठकर एक्सेल शीट भेजी थी।
लेकिन वार्षिक समारोह में “साल की सर्वश्रेष्ठ कर्मचारी” का अवॉर्ड मिला मेरी जूनियर सिया मल्होत्रा को।
उसे 2 लाख का बोनस, नया फोन और सबके सामने तालियाँ मिलीं।
मुझे मिला—500 रुपये का गिफ्ट वाउचर।
जब मैंने पूछा, “मेरा बोनस इतना कम क्यों?”
नेहा मैम बोली थीं—
“आर्या, तुम मेहनती हो, पर टीम में घुलती-मिलती नहीं। ऑफिस पार्टी में नहीं आतीं, लोगों से हँसती-बोलती नहीं। कंपनी सिर्फ काम नहीं देखती, व्यवहार भी देखती है।”
मैंने तब भी कुछ नहीं कहा था। क्योंकि जिस दिन टीम पार्टी कर रही थी, मैं क्लाइंट के लिए डेक बना रही थी। जिस रात सबने पब में फोटो डाली, मैं माँ को डॉक्टर के पास ले जाकर वापस लैपटॉप खोलकर बैठी थी।
आज वही लोग मुझे “कृतघ्न” कह रहे थे।
मैंने नेहा मैम से कहा—
“मेरे सभी हैंडओवर फाइल्स सर्वर पर हैं। मेरा नोटिस भी पूरा हो चुका है। अब कृपया मुझे फोन मत कीजिए।”
वह झल्लाईं—
“तुम समझती क्या हो खुद को? तुम्हारी उम्र 31 है, शादी नहीं हुई, डिग्री भी बड़ी नहीं है। बाहर इतनी आसानी से नौकरी नहीं मिलती। इंडस्ट्री छोटी है, राघव सर चाहें तो तुम्हारा करियर खत्म कर देंगे।”
मेरी उंगलियाँ ठंडी पड़ गईं, मगर आवाज नहीं काँपी।
“मैम, 7 साल मैंने डर में काम किया। अब नहीं।”
कॉल काटते ही मेरी आँखें भर आईं। मैं अपने छोटे से कमरे में आईने के सामने खड़ी थी। माँ रसोई में चाय बना रही थीं और बोलीं
“बेटा, आज नई नौकरी का पहला दिन है। रोना मत। जिसकी मेहनत सच्ची होती है, भगवान देर से सही, दरवाजा खोलता जरूर है।”
मैंने उनके पैर छुए और बैग उठाया
आज मुझे “तारा इंफ्रा ग्रुप” में जॉइन करना था वही बड़ा क्लाइंट, जिसके 12 करोड़ के कैंपेन को मैंने अपने हाथों से खड़ा किया था।
ऑफिस पहुँचते ही रिसेप्शनिस्ट ने मुस्कुराकर कहा
“मैम, अर्जुन सर आपका इंतजार कर रहे हैं।”
अर्जुन खन्ना, तारा ग्रुप के डायरेक्टर, हमेशा सीधे बोलते थे। उन्होंने मुझे बैठने को कहा और सामने एक फाइल रख दी
“आर्या, तुम्हारी पुरानी कंपनी ने आज हमारे प्रोजेक्ट का फाइनल ऑडिट बुलाया है। सच कहूँ तो हमें भरोसा नहीं है। हमें वह इंसान चाहिए जो इस काम को सच में जानता हो।”
मैं समझ गई
“आज तुम हमारी तरफ से जाओगी। प्रोजेक्ट ऑडिट हेड बनकर।”
मेरे हाथ में नया ID कार्ड दिया गया।
उस पर लिखा था
Project Audit Head: आर्या मेहरा
मुझे लगा जैसे 7 साल की बेइज्जती का जवाब मेरे हाथ में रख दिया गया हो।
लेकिन जैसे ही मैं पुरानी कंपनी के गेट पर पहुँची, मैंने शीशे के दरवाजे के पार राघव सर को देखा। वह सिया पर चिल्ला रहे थे, और मेरी पुरानी सीट पर बैठा कोई मेरी फाइलें खोलने की कोशिश कर रहा था।
मैंने गहरी साँस ली दरवाजा खुला।
और पूरे ऑफिस की नजर एक साथ मेरी गर्दन में लटके तारा ग्रुप के ID कार्ड पर जम गई।
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