उत्तर प्रदेश में हज़ारों सरकारी स्कूल बंद किए जा रहे हैं. क्या यही "डबल इंजन विकास" है? जहाँ गरीब के बच्चे सिर्फ इसलिए पढ़ाई से बाहर हो जा रहे हैं, क्योंकि उनका स्कूल अब मौजूद नहीं?
गाँवों में प्राइवेट स्कूल दूर हैं, बेतहाशा महंगे हैं, और गरीबों के बस से बाहर. ये बच्चे जानते हैं कि पढ़ाई ही इनका भविष्य है, मगर सरकार इनकी क़लम और किताबें छीन रही है.
ये कोई योजनागत सुधार नहीं, ये शिक्षा का निजीकरण है, मासूम सपनों की हत्या है. ये सवाल सिर्फ सरकार से नहीं है, ये सवाल हम सब से भी है.
यूपी में सरकारी स्कूलों के बंद किए जाने के ख़िलाफ़ अब एक जन आंदोलन खड़ा हो चुका है. गाँव-गाँव से आम लोगों द्वारा विरोध की अनगिनत वीडियो वायरल हो रही हैं. शिक्षकों द्वारा भी विरोध हो रहा है. आम लोग भी इसमें शामिल हैं. आप भी आज ज़ोर लगाओ, इसमें शामिल हो जाओ.
#मधुशाला_नहीं_पाठशाला_दो
बेसिक शिक्षा मंत्री बनने के बाद आज तक अपने और आपकी सरकार ने युवाओ के लिए कुछ नहीं करा अब हालत यह हो चुके है 27 हज़ार स्कूलों को आपकी सरकार बंद कर रही है और युवाओ की ये हालत कर दी है, आत्महत्या करने को तैयार है
#SaveVillageSchools@myogiadityanath@yadavakhilesh@RajatsinghAU
हर साल उम्मीदें जगती हैं,
हर साल वो टूट भी जाती हैं।
किताबों में दिन-रात खोए,
पर वैकेंसी की ख़बरें न आईं।
अब लड़ाई सिर्फ नौकरी की नहीं,
ये हमारे अधिकारों की है।
एकजुट हो, आवाज़ उठाओ,
और दिखा दो कि युवा भारत अब चुप नहीं रहेगा।
#WeWantVacancy@EduMinOfIndia@PMOIndia
मुख्यमंत्री जी हम अभ्यर्थी हैं विपक्ष नहीं।
क्या आप चाहते हैं कि छात्र आत्महत्या का प्रयास करें ?
क्योंकि आप अपने ही छात्रों की नहीं सुन रहे हैं आपके नौकरशाह और आपके राजनेता कह रहे हैं कि हम विपक्ष द्वारा पोषित लोग हैं।
आप अपने छात्रों की पहचान करने में सक्षम नहीं हैं?
#UPPCS_ROARO_ONESHIFT
#UPPSC_हम_छात्र_हैं_विपक्ष_नही
#UPPSC_No_Normalization
युवाओं में बढ़ता असंतोष
क्या दुनिया के इस सबसे युवा देश में युवाओं के मुद्दे और उनकी ऊर्जा वर्तमान राजनीति को संचालित करेगी ?
पिछले कुछ समय से सरकारी आयोग हो या एजेंसियों का चयन हो या परीक्षाओं की अनियमितता हो या उनमें बदलाव को लेकर हो जैसे इस समय नॉर्मनलाइजेशन और दो दिन एग्जाम कराने को लेकर व्यापक आंदोलन हो रहे है जिसके कारण यह सवाल बहुत से लोगों के मन में आया है। अगर इन मुद्दों का सिरा पकड़े रखें तो यह सवाल हमें हमारी व्यवस्था के पूरे सच को उजागर करने में मदद देता है।
पहले पायदान पर खड़े होकर देखें तो यह मामला राज्य सरकार के उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की RO/ARO नामक परीक्षा के कुछ केंद्रों पर धांधली होने का आरोप था। इस धांधली के कुछ प्रमाण भी परीक्षार्थियों के हाथ लग गए। और इसके कारण परीक्षा को कैंसिल कर दिया गया लेकिन दोबारा परीक्षा कराने के दौरान एक ही दिन में न कराकर इसे दो दिन में और एक normalisation
की प्रक्रिया जोड़ा जा रहा जिससे युवाओं को बहुत नुकसान होगा।
परीक्षा कैसे ली जा रही है, इस पर आयोग का कोई नियंत्रण नहीं होता है. कई-कई साल तक परीक्षाएं टाली जाती हैं और परिणाम आने के बाद भी नियुक्ति पत्र नहीं मिलते. नौकरी में ज्वॉइनिंग नहीं करवायी जाती. कुल मिलाकर अंधेरगर्दी है. लेकिन, आज तक आयोग इन शिकायतों के निवारण की कोई व्यवस्था नहीं बना पायी है.
सरकारी नौकरियां बहुत कम हैं और उम्मीदवार बेहिसाब. इसलिए जाहिर है, इन चंद नौकरियों के लिए जानलेवा प्रतिस्पर्धा होती है. विद्यार्थी अपनी औपचारिक पढ़ाई को छोड़कर कई-कई साल तक तैयारी करते हैं, मां बाप के सीमित संसाधन में से किसी तरह पैसा निकालकर कोचिंग लेते हैं. सामान्य घर से आनेवाले इन विद्यार्थियों की पूरी जवानी इसी चक्कर में बीत जाती है. इसलिए जब इन परीक्षाओं में धांधली की बात सामने आती है, तो युवाओं के आक्रोश की कोई सीमा नहीं बचती.
एक सीढ़ी और गहराई में जाने पर हम देखते हैं कि यह समस्या सिर्फ सरकारी नौकरियों में धांधली की नहीं है. इस समस्या की जड़ में है देश में व्यापक बेरोजगारी. हर साल कोई एक करोड़ युवा रोजगार के बाजार में उतरते हैं और हमारी व्यवस्था इनमें से मुट्ठी भर को ही कायदे का रोजगार दे पाती है.
आंकड़ों में देखें, तो देश में आर्थिक वृद्धि हुई है. लेकिन, इसका रत्तीभर भी असर रोजगार के अवसरों में वृद्धि के रूप में दिखायी नहीं देता. रोजगार की तलाश में घूम रहे अधिकांश युवाओं को किसी ना किसी कच्ची नौकरी से संतोष करना पड़ता है. या तो असंगठित क्षेत्र की नौकरी, जिसमें जब मालिक का मन हुआ लगाया और जब मन हुआ हटा दिया. या फिर पिछले दो दशक में इसी कच्ची नौकरी के नये स्वरूप यानी कॉन्ट्रैक्ट की नौकरी.
प्राइवेट सेक्टर ही नहीं, सरकारी नौकरी में भी अब इन्हीं अस्थायी कॉन्ट्रैक्ट नौकरियों की भरमार है. कहने को यहां नियुक्ति पत्र मिलता है, बैंक में वेतन भी मिलता है. लेकिन, व्यवहार में यह नौकरी असंगठित क्षेत्र की कच्ची नौकरी से बहुत अलग नहीं है. जिन्हें ये भी नसीब नहीं होता, वे बेरोजगारों की फौज में गिने जाते हैं. सचमुच बेरोजगारों की संख्या इस औपचारिक आंकड़े से बहुत अधिक है.
#UPPSC_No_Normalisation
#uppcs2024